निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ७ अ० ४ पा० ५ खं०
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निः । निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन
नामधेयेन भजेते ॥ ५ (१८) ॥
इति सप्तमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥७,४॥
अर्थ :- “इन्द्रं मित्रम्०” इस ऋचा का अस्यवाम
ऋषि है ।
( इममेव ) 'अग्निम्' इसी अग्नि को 'इन्द्रम्' इन्द्र
'मित्रम्' मित्र 'वरुणम्' वरुण 'आहुः' कहते हैं- [ तत्वविद्
पुरुष ]-इन्द्र, मित्र और वरुण आदि नामों से इस अग्नि
को ही कहते हैं-उन नामों से अग्नि के अतिरिक्त कोई दूसरा
अर्थ नही है । 'अथो' ( अपि च ) और भी ( यः अयम् )
जो यह 'दिव्यः' ( दिविजः ) द्युलोक में होने वाला = रहने
वाला 'सुपर्णः' (सुपतनः) सुन्दर पतन ( गमन ) करने वाला
'गरुत्मान्' (गरणवान्) स्तुतिओं वाला अथवा रसों को नि-
गलने वाला ( गुर्वात्मा = महात्मा ) अथवा गुरु आत्मा वाला
या महान् आत्मा आदित्य है यह भी 'सः वह अग्नि ही
है । [ बहुत क्या ? ] ( इममेव अग्नि महान्तम् आत्मानम् )
इसी महान् अग्नि आत्मा को 'एकम्' 'सत्' ( आत्मानम् )
एक होते हुये आत्मा को 'विप्राः' (मेधाविनः) अभेद भाव से
देखते हुए मेधावी ब्राह्मण 'बहुधा' बहुत प्रकार से 'वदन्ति
कहते हैं-'अग्निम्' अग्नि, 'यमम्' यम, 'मातरिश्वानम्' मात-
रिश्र्वा, (वायु) 'आहुः' कहते हैं मेधावी ब्राह्मण इसी अग्नि
महान् आत्मा को एक होते हुये को भी इन्द्र, मित्र, वरुण,
आदित्य, यम, और मातरिश्वा कहते है ॥