सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( २६७ ) ६ अ० ४ पा० ३ सं०
नास्य तैर्विन्दामि समाप्तिं स्तुतेः ॥
‘बर्हणा’ परिबर्हणा ।
“बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः ।” ( ऋ०सं०
१, ४, १७, ३ ) । इत्यपि निगमो भवति ॥३(१८)
अर्थः—“तुञ्जे तुञ्जे” इस ऋचा का मधुच्छन्दा ऋषि, इन्द्र देवता, गायत्री
छन्द और प्रात सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के अच्छाप मे विनियोग है ।
‘तुञ्जे तुञ्जे’ ( दाने दाने ) दान दान में दान से संतुष्ट
हुए हुए मुझ से ‘ये’ जो ‘उत्तरे’ ( उत्तरोत्तरे ) आगे आगे वाले
‘वज्रिणः’ वज्रधारी ‘इन्द्रस्य’ इन्द्र के ‘स्तोमाः’ स्तोत्र साधे
जाते हैं, ( तैः ) उन से ( अस्य ) इस की ‘सुष्टुतिम्’ ( स्तुतेः
समाप्तिम् ) स्तुति की समाप्ति ‘न’ नहीं ‘विन्चे’ ( विन्दामि)
प्राप्त होता हूं अर्थात् जितनी ही स्तुतियें उठाई जाती हैं,
वे सब इन्द्र को प्राप्त हो कर न्यून ही हो जाती हैं । इस
प्रकार यहां ‘स्तोम’ के सम्बन्ध से ‘तुञ्ज’ शब्द दान का पर्याय
है । क्यों कि ‘तुञ्ज’ धातु का दान अर्थ देखा जाता है ।
‘बर्हणा’ ( ८३ ) यह अनवगत ‘परिबर्हणा’ ( वृद्धि
अथवा हिंसा ) के अर्थ में है । ‘बर्हणा’ के आदि में ‘परि’
उपसर्ग जोड़ने से उस के अर्थ की प्रसिद्धि हो जाती है ।
“बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः” अर्थात् इन्द्र ने
‘बर्हणा’ अपनी वृद्धि से ‘असुरः’ ( मेघः ) मेघ ‘बृहच्छ्रवाः’
( बृहद्घोषः ) बड़े शब्द से युक्त ‘कृतः’ कर दिया । अर्थात्
जब इन्द्र ने मेघ पर वज्र मारा तो मेघ ने शब्द किया । यह
भी निगम है । इस प्रकार यहां शब्द की समानता और
असुर के सम्बन्ध से ‘बर्हणा’ शब्द ‘परिबर्हणा’ के अर्थ में
है ॥ ३ ( १८ ) ॥
३८

हिन्दी निरुक्त ( २६८ ) ६ अ० ४ पा० ४ सं०
( सं० ४ )
निघ०-ततनुष्टिः ॥८४॥ इलीबिशः
॥८५॥
निरु०-“यो अस्मै ग्रंस उत वा य ऊधनि सोमं
सुनोति भवति द्य माँ अह । अपाप शक्र स्ततनुष्टि-
रूहति तनूशुभ्रं मघवा यः क्वामखः ॥” ( ऋ०
सं० ४, २, ३, ३ ) ॥
'ग्रंसः' इति अहर्नाम । ग्रस्यन्ते ऽस्मिन्रसाः ।
गोः-'ऊध' उन्नततरं भवति। उपोन्नद्धम्-इतिवा।
स्नेहानुप्रदानसामान्यात् रात्रिः-अपि 'ऊधः'
उच्यते ।
स योऽस्मै अहनि अपिवा रात्रौ सोमं सुनोति
भवति-अह द्योतनवान् । अपोहति अपोहति शक्रः
तितनिषुं धर्मसन्तानात्-अपेतम् अलंकारिष्णुम्
अयज्वानं तनूशुभ्रं तनूशोभयितारं मघवा, “यः
कवासखः” यस्य कपूयाः सखायः ॥
“न्याविध्यदिलीबिशस्य दृढा विशृङ्गिणमभि-
नच्छुष्णमिन्द्रः ।” (ऋ०सं० १,३,३,२) ।
निरविध्यत् इलाबिलशयस्य दृढानिब्यभिनत्
शृङ्गिणं शुष्णम्-इन्द्रः ॥४ (१९)॥

हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ५ प्र० ४ पा० ४ खं०
'ततनुष्टिः' (८४) यह अनवगत 'तितनिषु' (फैलाने की इच्छावाला)
के अर्थ में है।
"यो अस्मै ०-० कवासखः" इस ऋचा का प्राजापत्य (प्रजापति का पुत्र)
सङ्गरण ऋषि, इन्द्र देवता, जगती छन्द है।
अर्थः 'यः' जो 'अस्मै' (इन्द्राय) इस इन्द्र के लिये 'प्र'से'
(अहनि) दिन में 'उत-वा' (अपिवा) 'यः' जो अथवा 'ऊधनि'
(रात्रौ) रात्रि में 'सोमम्' सोम को 'सुनोति' निचोड़ता है,
(सः) वह (अह) निश्चय 'द्युमान्' (द्योतनवान्) प्रकाशवान्
'भवति' होता है। और फिर जो इस से विपरीत पुरुष है,
उस (अपसन्तानात्-अपेत्यम्) पूर्वजों के आचरित धर्म मार्ग
से अलग हुये वा कर्मों से रहित हुयेको अर्थात्-'कर्म मत करो'
ऐसा कहने वाले को 'ततनुष्टिम्' 'तितनिषुम्' अपने धन को
अनेक वाणिज्य आदि के प्रकारों से बढ़ाने वाले किन्तु इन्द्र
देव की सेवा न करने वाले को 'तनूशुभ्रम्' (तनूशोभयिता-
रम् = अलङ्करिष्णुम्) अपने शरीर को ही सजाने वाले, किन्तु
(अयज्वानम्) देव का यजन न करने वाले को, और 'यः'
जो 'कवासखः' दुराचारियों से मित्रता रखने वाला है, उसे
'शक्रः' समर्थ 'मघवा' इन्द्र देव 'अप-अप-ऊहति' (अपोहति-
अपोहति) बार बार नाश करता है। कोई व्याख्याकार 'प्र-
कवासखः' को 'तनूशुभ्रम्' का विशेषण बताते हैं। उनका
अभिप्राय है, कि-जो शौकीन शरीर के ही पोषण में इष्ट
धन का व्यय करते हैं, वे कदाचित् सत्पुरुषों का संग क-
वाने हों, तो सुमार्ग में आ सकते हैं, किन्तु ऐसे आदमी यदि
'कवासख' दुर्जनों के संगी होवें, तो उन के सुमार्ग म आने की
कोई आशा नहीं है, इस लिये इन्द्र देव उनका नाश ही कर

हिन्दी निरुक्त ( ३०० ) ६ अ० ४ पा० ४ खं०


देता है । इस प्रकार यहां पर ‘ततनूष्टि’ शब्द शब्द और अर्थ
के अविरोध से ‘ विषय के उपभोग मात्र में तत्पर ’ पुरुष को
कहता है ।
इस मन्त्र का अक्षरार्थ ही इस बात को कह रहा है कि
जो पुरुष अपनी सम्पत्ति के धन भागको यज्ञोंके द्वारा लगाते
हैं वे ईश्वर के प्रिय होते हैं और वह उन्हें उज्ज्वल या की-
र्त्तिमान् बनाता है । और जो स्वार्थ के लिये ही संसार के
धन को वाणिज्य आदि के द्वारा बटोर कर घरमें धर लेते हैं,
वे उसके चोर हैं, उसे वे प्रिय नहीं लगते इसीसे अधोगति के
भागी बनते हैं, जैसा कि भगवद्गीता में भी कहा है--
“इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तै र्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥”
“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥”
[ गी० अ० ३ श्लो० १२, १३ ] ।
अर्थात्-यज्ञ के द्वारा पूजे हुये देवता तुम्हारे लिये वा-
ञ्छित भोगोंको देंगे । उनके दिये हुये पदार्थों को उनके अर्पण
न करके जो भोगता है, वह चोर ही है ॥
अच्छे लोग ईश्वर के यज्ञसे बचे हुये को खाते हुये सब
पापों से ( जो धनार्जन में किये गये होते हैं ) छूट जाते हैं ॥
इसमें दो बातें स्पष्ट रूपसे निकलती हैं- (१) कमाये हुए धन
को साधारण के साथ उनके समान ही भोगना चाहिए । (२)
जिनसे वह धन जिन चालाकियों से कमाया गया था और उस

  • में जितने पाप हुये थे, उनके साथ खाने में या उसे ईश्वरा-

हिन्दी निरुक्त (३०१) ६ अ० ४ पा० ५ खं०
र्पण करके सबके साथ पवित्र भाव से फिर मिले हुये को खाने
में उसे पाप लगने का कोई अवसर नहीं आता । क्योंकि उस
ने किसी तरह भी धन इकट्ठा किया, वह अपने लिये नहीं,
किन्तु जिनसे (लोकसे) लिया उन्हींके लिये किया गया था ॥
'इलीबिशः' (८५) यह एक पद अनवगत मेघ का नाम
है । इसकी शब्दसमाधि 'इलाबिलशयः' (इला या शब्द का
कारण जो जल उस के निकलने के बिलों को रोक कर शयन
करने वाला) है ।
“न्याविध्यदिलीबिशस्य दृढा विशृङ्गिण मभि-
नच्छुष्णमिन्द्रः” अर्थात् 'इन्द्रः' इन्द्र देवने 'इलीबिशस्य'
(इलाबिलशयस्य) मेघ के 'दृढा' (दृढानि) दुर्भेद्य या दृढ
स्थानों को 'न्याविध्यत्' (निरविध्यत्) भेदन किया । इतना
ही नहीं किन्तु 'विशृङ्गिणम्' (शिखरवन्तम्) शिखर वाले
अथवा (दीप्तिमन्तम्) बिजली से प्रकाशयुक्त मेघ को 'अभि-
नत्' भेदन किया । यहां शब्द की समानता और अर्थके अवि-
रोध से 'इलीबिश' मेघ है ॥ ४ (१६) ॥
(खं० ५)
निघ०-कियेधाः ॥८६॥ सृमिः ॥८७॥
विष्विपतः ॥८८॥
निरु०-“अस्मा इदु प्रभरा तूतूजानो वृत्राय वज्रमी-
शानः कियेधाः । गोर्न पर्व विरदा तिरश्चेष्य
र्णांस्यपां चरध्यै ॥” (ऋ०सं० १, ४, २९, २) ।
अस्मै प्रहर तूर्णं त्वरमाणो वृत्राय वज्रमीशानः ।

हिन्दी निरुक्त ( ३०२ ) ६ अ० ४ पा० ५ सं०
‘कियेधाः’ कियद्धा इतिवा । क्रममाणधा
इति वा ।
गोरिव पर्वाणि विरद मेघस्य, इष्यन्-अर्णांसि,
अपांचरणार्य ॥
‘भृमिः’ भ्राम्यतेः ।
“भृमिरस्युपिकृन्मर्त्यानाम् ।” (ऋ०सं१,२,३५,२)
इत्यपि निगमो भवति ।
‘विष्पितः’ विप्राप्तः ।
“पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन्” । (ऋ०सं०
५, ५, २, १) इत्यपि निगमो भवति ॥५ (२०)॥
‘कियेधाः’ (८६) अनवगत ‘कियद्धाः’ (कितने भी अपरिमारा जलको
धारण करने वाला) के अर्थमें, अथवा ‘क्रममाणधाः’ (क्रमण करता (चलता)
हुये को धारण करने वाला ) के अर्थ में है, और मेघ का नाम है ।
“अस्मा इदु ”इस ऋचा का नोधानाम् गौतम ऋषि है, त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र
देवता और आह्निक अहनों में अहीन सूक्त में विनियुक्त है ।
हे इन्द्र ! (एषः वृत्रः ) यह वृत्र या मेघ ‘कियेधाः’
(कियद्धाः ) कितने ही अपरिमारा जलको धारण किये हुये है,
‘अस्मै’ इस ‘वृत्राय’ मेघ के लिये तू ‘तुतुजानः’ (त्वरमाणः )
वेगसे युक्त हुआ हुआ ‘वज्रम्’ वज्र को ‘प्रभर’ मार । क्योंकि-
तुम हमारे ‘ईशानः’ ईश्वर हो, इस कारण आपसे ऐसे कहा
जाता है । और वज्र का प्रहार करके वज्र के प्रहार से व्याकुल
हुये इस मेघ के ‘तिरश्चा’ तिरछे चलने वाले वज्र से ‘गोः’
गौके ‘न’ समान ‘पर्व’ (पर्वाणि) पर्वों या ‘सन्धियों को

हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) ६ अ० ४ पा० ५ खं०

'विरद' विदारण कर अर्थात्-कोई गोका विकर्त्तन (छेदन)
करने वाला उसके पर्वों को काटता है, उसी प्रकार तू भी इस
मेघ के अवयवों को काट । किस अर्थ ? 'अर्णांसि' (जलानि)
जलों को 'इष्यन्' इच्छा करता हुआ 'अपां' जलों के 'चरथ्यै'
(चरणाय) प्रजाओं के अर्थ देने के लिये ॥
'भूमिः' (८७) यह अनवगत (भ्रमशाम्) घूमने वाला
के अर्थ में है । अनवस्थान (एक स्थान में नहीं टिकना)
अर्थ में 'भ्रम' (दिवा०प०) धातु से है, तथा अग्नि का नाम है।
"भूमिरस्यृषिकृन्मर्त्यानाम्" हे भगवन् ! अग्ने !
'त्वम्' तू 'मर्त्यानाम्' मनुष्यों का 'भूमिः' नाना योनियों में
जन्म व मरण के द्वारा घुमाने वाला और 'ऋषिकृत्' दर्शन
या विज्ञान का करने वाला 'असि' है । अर्थात् संसार और
उससे मोक्ष होना तुम्हारे ही अधीन है, इससे हमें सर्व वि-
ज्ञानके प्रदान से अनुग्रह करके इस संसार से आप छुड़ाओ ।
प्रयोजन यह कि-देवयान से ही हमें ले चल किन्तु पितृ-यान
से नहीं। इस प्रकार यहां 'भूमि' अग्नि है। क्योंकि ऐसे ही
अर्थ का अविरोध होता है ॥
• विष्वितः' (८८) यह अनवगत 'विप्राप्तः' (जहां
तहां फैला हुआ या सब जगह प्राप्त) के अर्थ में है ॥
"इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्या श्चिकित्वांसो
अचेतसं नयन्ति । प्रत्राजे चिन्नद्योगाधमस्ति पारं
नो अस्य विष्वितस्य पर्षन् ॥" [ऋ०सं० ५, ५,
२, १] ॥
"यदद्यसूर्य ब्रवोऽनागाः " इस सूक्त की "इमे-

हिन्दी निरुक्त ( ३०४ ): ६ अ० ४ पा० ५ खं०
दिवः " यह ऋचा है। इस सूक्त पर शौनक ने अपने प्रति-
ज्ञा सूत्र में कहा है-कि-इस सूक्त की पहिली ऋचा सूर्य देवता
की है, और सब मित्रावरुण देवताओं की हैं। इसके अनुसार
" इमेदिवः " यह ऋचा मित्रावरुण इन दोनों ही की है
इस मतमें 'इमे' यह बहुवचन पूजा में है। क्योंकि-देवसंख्या
द्वित्व या दो ( २ ) है, जिसके अनुसार द्विवचन ही चाहिये
था। भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि-इस सूक्त में तीसरा अर्यमा
देवता भी प्रत्यक्ष होता है, इस कारण 'इमे' इत्यादि बहुवचन
मित्र वरुण और अर्यमा इन तीनों की बहुत्व संख्या के कारण
है, किन्तु पूजा के कारण नहीं, अतः शौनक का मत
विचारणीय है ।
'इमे' ये मित्र और वरुण देवता अथवा 'मित्र, वरुण
और अर्यमा देवता 'दिवः' (एत्य ) द्युलोक से आकर 'अनि-
मिषाः' आलस्य रहित तथा 'चिकित्वांसः' प्राणियों के सुकृत
और दुष्कृतों ( पापों) को जानते हुए 'अचेतसम्' मरे हुए
( प्रेत ) प्राणी को 'पृथिव्याः' पृथिवी से ( अमुं लोकम् )
कर्म के अनुसार उस लोक को 'नयन्ति' ले जाते हैं। जिस से
कि ऐसा है, इस लिए उन से मैं कहता हूं-'प्रव्राजे' (प्रकृष्टे
व्रजने मरणारूपे काले ) बड़े गमन या मरण-काल के आजाने
पर यदि 'गाधम्' संसार के पार करने में समर्थ हमारा कोई
कर्म या विज्ञान 'अस्ति' है, तो वे 'नद्यः ( नद्याः ) नदी के
'चित्' समान 'विष्पितस्य' लम्बे या सब संसार में व्यापक
'अस्य' इस संसार रूप मार्ग के 'पारम्' पार 'पर्षन्' (नयन्तु)
ले जावें । यह भी निगम है। इस प्रकार यहां शब्द की
समानता और अर्थ के अविरोध से 'विष्पितः शब्द 'विप्रासः'

हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
के अर्थ में है ।
जो लोग “ गरुड पुराण ” के प्रेतकल्प की समूलता
और मरे हुए प्राणियों के देवताओं के प्रबन्धसे परलोक गमन
को वेद में देखना चाहते हैं, वे इस मन्त्र को ध्यान से पढ़ें ।
इस मन्त्र में-“देवताओंका मरे हुए को इस लोक से परलोक
में लेजाना और उनको उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख
मिलने का बहुत उत्तम प्रबन्ध किया हुआ ” बतायागया है ।
प्रबन्ध की उज्ज्वलता जानने के लिये देवताओंके दो विशेषण
ध्यान से देखने योग्य हैं ।
(१) “अनिमिषाः” जो देवता इस पृथिवी से प्राणि-
यों को उस लोक में ले जाते हैं, उनकी पलक कभी नहीं
झिपती वे सदा ही अपने कर्त्तव्य में जागते रहते हैं, इस से
कोई यह न समझे कि-उनके सोजाने के समय हमारा मृत्यु
का समय आजावेगा, तो फिर हम न मरेंगे और न अपने
कर्मों के फल को ही भोगेंगे ।
(२) “चिकित्वान्स.” वे देवता प्राणियों के पाप
पुण्यों को भले प्रकार जानते हैं, बिना मीमांसा या नियम
विरुद्ध अथवा अन्याय पूर्वक किसी के साथ बर्ताव नहीं
कर सकते ॥ ५ ( २० ) ॥
( खं० ६ )
निघ०- तुरीपम् ॥ ८६ ॥ रास्पिनः
॥ ६० ॥ ऋजतिः ॥ ९१ ॥ ऋजुनीती
॥ ९२ ॥ प्रतद्वसू ॥ ६३ ॥
३६

हिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) ६ अ० ४ पा० ६खं०
निरु०-“ तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुवारं पुरुत्मना ।
त्वष्टा पोषाय विष्यतु राये नाभानो अस्मयुः ॥ ”
[ ऋ०सं० २, २, ११, ४] ॥
तत् नः तूर्णापि महत् सम्भृतम् आत्मना त्वष्टा
धनस्य पोषाय विष्यतु-इति ।
‘अस्मयुः’ अस्मान् कामयमानः ॥
‘रास्पिनः’ रास्पी रपतेर्वा । रसतेर्वा ।
“ रास्पिनस्यायोः ” ॥ [ ऋ० सं०२,१,१,४] ।
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘ऋञ्जतिः’ प्रसाधनकर्मा ।
( “आवऋञ्जसे ऊर्जा व्युष्टिषु ।” (ऋ०सं०
८, ३, १०, १ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ )
‘ऋजुः’-इत्यपि अस्य भवति ।
“ऋजुनीती नो वरुणः” । (ऋ०सं०१,६,१७,१)
इत्यपि निगमो भवति ।
‘प्रतद्वसू’ प्राप्तवसू ।
“हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभिस्वर” । ( ऋ०सं० ६,
१, १२, २, ) । इत्यपि निगमो भवति ॥ ६ (२१) ॥
‘तुरीपम्’ (८६) यह अनवगत ‘तूर्णापि’ ( झटपट व्यापन होने वाला )
के अर्थ में है । जल का नाम है । क्यों कि-वह तूर्ण (शीघ्र) व्याप जाता है ।
अर्थः- “तन्नस्तुरीपम्” इस ऋचाका दीर्घतमा ऋषि,

हिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
त्वष्टा देवता, अनुष्टुप् छन्द, है, और यह ऋचा आप्री सूक्त
में है, अर्थात्- उसी के विनियोग में इस का विनियोग है,
स्वतन्त्र नहीं ।
'नाभानः' ( न-अभानः = सदा दीप्यमानः ) सदा चमक-
ने वाला 'अस्मयुः' हमारे ऊपर अनुग्रह करने की कामना
करता हुआ 'त्वष्टा' त्वष्टा देव 'राये' ( रायः = धनस्य ) धन
के 'पोषाय' पोषण के लिये 'तत्' वह 'तुरीपम्' ( तूर्णापि )
जलं 'विष्यतु' बरसे या बरसावे ( यत् ) जो 'अद्भुतम्' ( महत्
संभूतम् ) बहुत ही उत्तम 'पुरुत्मना' ( आत्मना ) (बह्वात्म-
ना) अनेकरूपसे 'पुरुवारम्' देशान्तर में आवरण करने (छाजाने)
वाला हो । यहां 'त्वष्टा' मध्यम लोकके देवता और 'विष्यतु'
( वर्षतु ) के सम्बन्धसे 'तुरीप' जल है, यह उपपन्न होता है ।
इस मन्त्र में उत्तम जलकी अपेक्षा दिखलाई है । जितना
ही उत्तम जल बरसेगा उतना ही आरोग्य और आयुः-वृद्धि
आदि का कारण होगा । क्योंकि-जलसे ही ओषधि वनस्पति
आदि सब जीवन साधन होते हैं, उनमें जलके ही अनुसार
बल नीरोगता आदि गुण होते हैं, तथा स्वयम् जल पान में
उपयुक्त होकर उदर में अपनी उत्तमता के अनुसार लाभ
देता है ।
४ अस्मयुः ' यहां ' * अस्मान् कामयमानः ' हमें चाहने
वाला ॥
'रास्पिन' (६७) क्या ? 'रास्पी' शब्द करने वाला (जल)
अथवा स्तुति करने वाला ( पुत्र ) । कैसे ? शब्दार्थक ' रप '
(भ्वा० प०) धातु से अथवा शब्दार्थक ही ' रस ' (भ्वा०प०)
धातु से !

हिन्दी निरुक्त ( ३०८ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
“रास्पिनस्यायोः” अर्थात् 'रास्पिनस्य' शब्द करने
वाले या स्तुति करने वाले 'आयोः' जल की या पुत्र की
प्राप्ति के अर्थ ( हे ऋत्विजो ! ऐसा करो ।) यह भी निगम
होता है । इस प्रकार यहां 'रास्पिन' शब्द से जल अथवा
स्तोता कहा गया है ।
'ऋञ्जति' ( ६१ ) यह धातु प्रसाधन या किसी को
अपने अनुकूल बनाने अर्थ में है ।
भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि इस शब्द को 'भाऋञ्जीक'
शब्द के समान समझ कर भाष्यकार ने इस का निगम नहीं
पढा । इस से जान पड़ता है—मुद्रित पुस्तकों में यहां पर
“आवऋञ्जसे ऊर्जा व्युष्टिषु” यह जो निगम दिया
हुआ है, वह पीछे से निविष्ट किया हुआ है, या उक्त आ-
चार्य के समीपस्थ पुस्तकों में न था । इस उद्धृत खण्ड का
अब तक पता भी नहीं चला है कि यह कहां का है ।
'ऋजु' ( ६२ ) यह भी इस 'ऋञ्ज' ( भ्वा० प० ) धातु
का ही है ।
“ऋजुनीती नो वरुणः ( मित्रो नयतु विद्वान् ।
अर्यमा देवैः सजोषाः ॥”) (ऋ० सं० १,
६, १७, १, ) ॥
अर्थात्–'ऋजुनीती' सरलनीति वाला या सरलबुद्धि वाला
'वरुणः'वरुणदेव 'विद्वान्' विद्वान् 'मित्रः' मित्रदेव और 'अर्यमा'
अर्यमा देव 'देवैः' देवताओं के साथ 'सजोषाः' प्रसन्न होता
हुआ 'नः' हम को 'नयतु' इस लोक से परलोक में ले जावे ।
यहां ऋजु शब्द शब्द की समानता से 'ऋञ्ज' धातु से ही है,
अर्थ इस का प्रसिद्ध अथवा सरल हो सकता है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३०६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं०
'प्रतद्वसू' ( ६३ ) यह अनवगत 'प्राप्तवसू' ( जिन्होंने
धन को प्राप्त कर लिया हो ऐसे दो ) के अर्थ में है । 'अश्वौ'
( दो घोड़े ) अर्थ है ।
“हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभिस्वर” अर्थात्-'इन्द्र' हे
इन्द्र ! देव ! तेरे 'हरी' दोनों घोड़े 'प्रतद्वसू' अपने ऋजीष
( सोम के खखस या धान रूप धन को यज्ञ में प्राप्त हो गये
हैं, इस से तू 'अभि स्वर' हमारी ओर आ । यह भी निगम
है । इस प्रकार यहां 'हरी' इस पद के संबन्ध से 'प्रतद्वसू'
यह शब्द 'प्राप्तवसू' ( प्राप्त धन ) के अर्थ में उपपन्न होता
है ॥ ५ (२१) ॥
( खं० ७ )
निघ०-हिनोत ॥९४॥ चोष्कूयमाणः
॥ ९५॥ चोष्कूयते ॥ ९६ ॥ सुमतू ॥ ९७ ॥
दिविष्टिषु ॥ ९८ ॥
निरु०-“हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत
ब्रह्म सनये धनानाम् । ऋतस्य योगे विष्यध्वमूर्धः
श्रुष्टीवरी भूतनास्मभ्यमापः ॥” ( ऋ० सं० ७,
७, २६, १ ) ॥
प्रहिणुत नोऽध्वरं देवयज्यायै ।
प्रहिणुत ब्रह्म धनस्य सवनाय ।
ऋतस्य योगे यज्ञस्य योगे याज्जे शकटे इतिवा ।
'शकटं' शक्रदितं भवति। शनकैस्तर्कति-इतिवा ।

हिन्दी निरुक्त ( ३१० ) ६ अ० ४ पा० ७ खं०
शब्देन तकति इति वा ।
“श्रुष्टीवरी भूतनास्मभ्य मापः । ”
सुखवत्यो भवता मस्मभ्यमापः ॥
“ चोष्कूयमाण इन्द्र भूरिवामम् । ” (ऋ०सं०
१, ३, १, ३) ।
ददत् इन्द्रं बहु वननीयम् ।
“एधमान द्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विशं
इन्द्रो मनुष्यान् ” ॥ (ऋ०सं० ४, ७,३३, १) ॥
व्युदस्यति एधमानान् असुन्वतः, सुन्वतः-
अभ्यादधाति । “ उभयस्य राजा ” दिव्यस्य च
पार्थिवस्य च ।
‘ चोष्कूयमाणः’-इति चोष्कूयतेः-चर्करीत-
वृत्तम् ॥
‘ सुमत् ’ स्वयम्–इत्यर्थः ।
“ उप प्रागात्सुमन्मेध्यायि मन्म । ” (ऋ०सं०
२, ३, ८, २) ।
उपप्रैतुमां स्वयं यन्मे मनोऽध्यायि यज्ञेन-इति
आश्वमेधिको मन्त्रः ॥
‘ दिविष्टिषु ’ दिव एषणेषु ॥ ७ ॥
'हिनोत' (६४) यह अनवगत 'प्रहिणुत' (प्रेरित करो) के अथमे है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३११ ) दै० अ० ४ पा० ७ खं०
“हिनोतानो” यह ऋचा कवष ऋषि की है। अपोनप्त्रीय ऋचाओं में
शस्त्र है।
अर्थः- हे (ऋत्विजः !) ऋत्विजो ! 'देवयज्या' (देव-
यज्यायै) देवताओंके यजनके अर्थ 'अध्वरम्' यज्ञ को 'हिनो-
त' (प्रहिणुत) प्रेरितकरो (भले प्रकार चलाओ) । और हमें
'धनानाम्' धनोंकी 'सनये' (सधनाय = लब्धये) प्राप्ति के
लिये (यूयम्) तुम सब 'ब्रह्म' स्तुतिरूप वेद को 'हिनोत'
(प्रहिणुत) प्रेरित करो (उच्चारण करो) । 'ऋतस्य योगे'
(यज्ञस्य योगे अथवा याज्ञे शकटे) और यज्ञ के संयोग में
अथवा यज्ञ-सम्बन्धि शकट में जो 'ऊधः' ओंढी के समान
अधिपवण-चर्म (सोमरस घालने के लिये ग्रह चमस, और
स्थाली आदि पात्रोंके नीचे बिछाया जाने वाला चर्म) को
'विष्यध्वम्' छोड़ दो। इस प्रकार ऋत्विजों से कहकर सोमसे
मिले हुए जलों से कहता है-
'आपः !' हे जलो ! (जलसमूह !) तुम 'अस्मभ्यम्'
हमारे लिए 'शृणीवरीः' (सुखवत्यः) सुख देने वाली 'भूतन'
(भवत) होओ ।
'शकट' क्यों ? शकृदित या गोबर से सना हुआ जैसा
होता है। क्योंकि-जब उसमें जुताहुआ बैल गोबर करता है,
तब उस गोबर से वह शकट या गाड़ा भी लिप्त हो जाता है।
अथवा- 'शनकैः-तकति' बोझसे दबा हुआ धीरे धीरे चलता
है। अथवा-'शब्देन तकति' शब्द करता हुआ चलता है, इससे
'शकट' है ।
'चोष्कूयमाणः' (६५) और 'चोष्कूयते' (९६) ये दो अनवगत हैं। इनमें
धातु ही अप्रतीत है। इन दोनों में पहिला सुबन्त (नाम) और दूसरा तिङन्त
(आख्यात) है। पहिले का अर्थ 'देता हुआ, और दूसरे का अर्थ 'हटाता

हिन्दी निरुक्त (३१२) ६ अ० ४ पा० ७ खं०
है,-यह है। दोनों में 'कु' (अदा० प०) मूल धातु है, और वही 'यङ्' प्रत्यय
के योग से 'चोष्कूय' के रूप में संयुक्त धातु हो गया है, उसी के ये नाम और
आख्यात नाम वाले दो रूप बने हैं। प्रथम का उदाहरण—
“चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामम्” अर्थात्-
'इन्द्र' ! हे इन्द्र ! 'भूरि' (बहु) बहुत 'वामम्' (वननीयम्)
वाञ्छनीय जल को 'चोष्कूयमाणः' (ददत्) देता हुआ
(“मा पणिर्भूः”) बनिये के समान कृपण (सूंजी) मत
हो। इस प्रकार यहां 'वणिक के समान मत हो' 'बहुत
वाञ्छनीय' इन पदों के सम्बन्ध से 'चोष्कूयमाणः' पद 'ददत्'
(देताहुआ) के अर्थ में है। दूसरे अर्थ का उदाहरण—
“एधमान द्विलुभयस्य राजा चोष्कूयते विश
इन्द्रो मनुष्यान्” अर्थात्-‘इन्द्रः’ इन्द्रदेव 'एधमान द्विट्'
(एधमानान् अपि असुन्वतः द्वेष्टि) बढते हुओं (सम्पत्ति-
मानों) को भी जो सोम का सवन नहीं करते-उसकी आज्ञा
में नहीं चलते, द्वेष करता है। और (सुन्वतः अभ्यादधाति)
सवन करने वालों या आज्ञामें चलने वालों को ऊँचा करता
है, या अभ्युदयसे संयुक्त करता है। 'उभयस्य राजा' (दिव्यस्य च
पार्थिवस्य च राजा) द्युलोक के धनका और पृथिवी के धन
का राजा (स्वामी) है। और 'विशः' बढते हुए नहीं यजन
करनेवाले मनुष्यों को 'चोष्कूयते' (व्युदस्यति) अभ्युदयसे हटाता
है, एवम् 'मनुष्यान्' अपने को पूजने वाले मनुष्यों को उन्नत
करता है। इस प्रकार यहां 'चोष्कूयते' पद 'व्युदस्यति'
(हटाता है-गिराता है-दण्डित करता है) के अर्थ में है।
क्योंकि-'एधमानद्विट् (बढते हुओं से द्वेष करने वा) शब्द से

हिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं०
यही बात आती है ।
इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि जो इन्द्र के पूजक
या उस की आज्ञा में चलने वाले हैं, वे उस के इष्ट या प्यारे
हैं, और जो उस की पूजा या आज्ञा स्वीकार नहीं करते, वे
उस के द्वेष्य या अप्रिय हैं, चाहे वे बड़ी सम्पत्ति वाले क्यों
न हों। इन्द्र देव पर किसी की सम्पत्ति या वैभव का कोई
प्रभाव नहीं पड़ता, उस के न्यायालय में “दूध का दूध और
पानी का पानी” ही होता है। इसी से दरिद्र हो या धन-
वान् सब को सिर झुकाकर उसकी आज्ञा में रहना चाहिए ।
'चोषकूयमाण' यह चोषकूयति का चर्करीत वृत्त या यङन्त-
वृत्ति का प्रयोग है ।
'सुमत्' (६७) यह अनवगत 'स्वयम्' (आप) के अर्थ में है।
“उप प्रागात्सुमन्मेधायि मन्म” (उपैतु मां स्वयं
यन्मे मनः अध्यायि यज्ञेन) मुझे वह आप से आप प्राप्त
हो, जो यज्ञ से मेरे मन में आया है। यह अश्वमेध यज्ञ
का मन्त्र है ।
'दिविष्टिषु' (६८) अनवगत 'दिवः एषणेषु' (द्यु लोक को
प्राप्त कराने वाली क्रियाओं में) के अर्थ में है ॥७॥
( खं० ८ )
निघ०—दूतः ॥९९॥ जिन्वति ॥१००॥
निरु०-“स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिवि-
ष्टिषु ।” (ऋ० सं० ५, ७, ३३, ४) ।
'स्थूरः' समाश्रितमात्रो महान् भवति ।
४०

हिन्दी निरुक्त ( ३१४ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं०
'अणुः' अनु स्थवीयांसम् । उपसर्गः लुप्तनामक-
रणः, यथा-'सम्प्रति' ।
'कुरुङ्गो' राजा बभूव । कुरु-गमनाद्वा । कुल-
गमनाद् वा ।
'कुरुः' कृन्ततेः ।
'क्रूरम्'-इत्यपि अस्य भवति ।
'कुलम्' कुष्णातेः । विकुषितं भवति ।
'दूतः' व्याख्यातः ।
'जिन्वतिः' प्रीतिकर्मा ।
“भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः”
[ ऋ० सं० २, ३, २३, ५ ] इत्यपि निगमो भवति
८॥ ( २२ ) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य चतुर्थः पादः ।' ६, ४ ॥
“स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु । राज्ञ-
स्त्वेषस्य सुभगस्य रातिषु तुर्वशेष्वमन्महि । ”
( ऋ० सं० ५, ७, ३३, ४ ) ।
यह ऋचा मेधातिथि ऋषि की है । बृहती छन्द है । और इसमे दान की प्रशंसा की गई है ।
अर्थः- ( वयम् ) हम 'तुर्वशेषु' ( मनुष्येषु ) मनुष्यों में
'रातिषु' (दानेषु) दानों के मध्य में 'सुभगस्य' सुभग या सुन्दर
ऐश्वर्य वाले या सुहावने 'त्वेषस्य' बड़े 'कुरुङ्गस्य' 'राज्ञः'

हिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं०
कुरुङ्ग राजा के 'दिविष्टेषु' (क्रियासु) यज्ञादि क्रियाओं में
'शताश्वम्' सैकड़ों घोड़ों वाले 'राधः' दक्षिणारूप धन को
'स्थूरम्' (स्थूलम्) मोटा या बहुत 'अमन्महि' (मन्यामहे)
मानते हैं। इस प्रकार यहां 'दिविष्टि' शब्द से क्रियाओं का
बोध होता है। क्योंकि-यज्ञादि क्रियाओं में ही दान
होता है।
मेधातिथि इस मन्त्र में कहते हैं कि हम कुरुङ्ग राजा के
घोड़ों वाले दान को मनुष्यों में बड़ा दान मानते हैं। घोड़े के
दान की विधि दक्षिणा के रूप में पारस्करगृह्य सूत्र में भी
वैश्यको विवाह कर्ममें 'वैश्यश्चेदश्वम्' वाक्य से बताई गई है।
'स्थूर' क्या ? समाश्रितमात्र या उस में बहुत मात्रा या
परिमाण होता है। अर्थ क्या ? महान् = बड़ा।
'अणु' क्या ? अनु। अर्थात् स्थवीयान् या मोटे को अनु-
वर्त्तन करने वाला 'अणु' होता है। प्रयोजन-मोटे का विपरीत
'अणु' होता है। कैसे ? 'अनु' यह उपसर्गमात्र है, इस में
इसे नाम बनाने वाला प्रत्यय लुप्त (लोप हुआ हुआ) है,
इस से उस का श्रवण नहीं होता है। क्या और भी कोई शब्द
ऐसा है, जो केवल उपसर्ग से ही नाम बन गया हो ? है।
जैसे- 'सम्प्रति'। यह नाम वर्त्तमान काल का बोधक और
'सम्' 'प्रति' इन दो उपसर्गों से बना हुआ है। इस में कोई
प्रत्यय नहीं है।
'कुरुङ्ग' राजा हुआ है। वह कैसे ? वह कुरु देशमें गमन
करने से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह कुरुओं के प्रति जीतने को
गया था। अथवा कुल गमन से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह नित्य
ही शत्रु कुलों के प्रति जीतने जाता है।

हिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) ६ अ० ५ पा० १ खं०
'कुरु' क्यों ? वह शत्रुओं को कृन्तन (छेदन) करता है ।
'कृत्' (तु० प०) धातु का है ।
'क्रूर' यह भी इसी 'कृत' (तु० प०) धातु का है ।
'कुल' 'कुष' (क्रया० प०) धातु से है। क्योंकि वह विस्तृत
होने से 'विकुषित' खुला हुआ या बिखरा हुआ जैसा होता है।
'दूत' ( ६६ ) अनवगत ( अ० ५ खं० १ में ) व्याख्यान
किया जा चुका है ।
'जिन्वति' ( १०० ) धातु प्रीति अर्थ में है। यहां
अप्रतीतार्थ होने से पढ़ा गया है ।
“भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ।”
अर्थात् पर्जन्य (मेघ) पृथिवी को तृप्त करते हैं और अग्नि
दिव् (द्युलोक) को तृप्त करते हैं । यह भी निगम है । इसकी
व्याख्या अ० ७ खं० २३ में भी होगी ॥६, ४॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥६,४॥
पञ्चमः पादः ।
( सं० १ )
निघ०-अमत्रः ॥ १०१ ॥ ऋन्धीषमः
॥१०२॥ अनर्शरातिम् ॥१०३॥ अनर्वा
॥१०४॥ असामि ॥१०५॥
निरु०-‘अमत्रः’ अमात्रः । महान् भवति ।
अभ्यमितो वा ।
“महा अमत्रो वृजने विरप्शी” । ( ऋ० सं०
३, २, १९, ४) । इत्यपि निगमो भवति ।