निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१३ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं०
यही बात आती है ।
इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि जो इन्द्र के पूजक
या उस की आज्ञा में चलने वाले हैं, वे उस के इष्ट या प्यारे
हैं, और जो उस की पूजा या आज्ञा स्वीकार नहीं करते, वे
उस के द्वेष्य या अप्रिय हैं, चाहे वे बड़ी सम्पत्ति वाले क्यों
न हों। इन्द्र देव पर किसी की सम्पत्ति या वैभव का कोई
प्रभाव नहीं पड़ता, उस के न्यायालय में “दूध का दूध और
पानी का पानी” ही होता है। इसी से दरिद्र हो या धन-
वान् सब को सिर झुकाकर उसकी आज्ञा में रहना चाहिए ।
'चोषकूयमाण' यह चोषकूयति का चर्करीत वृत्त या यङन्त-
वृत्ति का प्रयोग है ।
'सुमत्' (६७) यह अनवगत 'स्वयम्' (आप) के अर्थ में है।
“उप प्रागात्सुमन्मेधायि मन्म” (उपैतु मां स्वयं
यन्मे मनः अध्यायि यज्ञेन) मुझे वह आप से आप प्राप्त
हो, जो यज्ञ से मेरे मन में आया है। यह अश्वमेध यज्ञ
का मन्त्र है ।
'दिविष्टिषु' (६८) अनवगत 'दिवः एषणेषु' (द्यु लोक को
प्राप्त कराने वाली क्रियाओं में) के अर्थ में है ॥७॥
( खं० ८ )
निघ०—दूतः ॥९९॥ जिन्वति ॥१००॥
निरु०-“स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिवि-
ष्टिषु ।” (ऋ० सं० ५, ७, ३३, ४) ।
'स्थूरः' समाश्रितमात्रो महान् भवति ।
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