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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 713

हिन्दी निरुक्त ( ३०० ) ६ अ० ४ पा० ४ खं०


देता है । इस प्रकार यहां पर ‘ततनूष्टि’ शब्द शब्द और अर्थ
के अविरोध से ‘ विषय के उपभोग मात्र में तत्पर ’ पुरुष को
कहता है ।
इस मन्त्र का अक्षरार्थ ही इस बात को कह रहा है कि
जो पुरुष अपनी सम्पत्ति के धन भागको यज्ञोंके द्वारा लगाते
हैं वे ईश्वर के प्रिय होते हैं और वह उन्हें उज्ज्वल या की-
र्त्तिमान् बनाता है । और जो स्वार्थ के लिये ही संसार के
धन को वाणिज्य आदि के द्वारा बटोर कर घरमें धर लेते हैं,
वे उसके चोर हैं, उसे वे प्रिय नहीं लगते इसीसे अधोगति के
भागी बनते हैं, जैसा कि भगवद्गीता में भी कहा है--
“इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तै र्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥”
“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥”
[ गी० अ० ३ श्लो० १२, १३ ] ।
अर्थात्-यज्ञ के द्वारा पूजे हुये देवता तुम्हारे लिये वा-
ञ्छित भोगोंको देंगे । उनके दिये हुये पदार्थों को उनके अर्पण
न करके जो भोगता है, वह चोर ही है ॥
अच्छे लोग ईश्वर के यज्ञसे बचे हुये को खाते हुये सब
पापों से ( जो धनार्जन में किये गये होते हैं ) छूट जाते हैं ॥
इसमें दो बातें स्पष्ट रूपसे निकलती हैं- (१) कमाये हुए धन
को साधारण के साथ उनके समान ही भोगना चाहिए । (२)
जिनसे वह धन जिन चालाकियों से कमाया गया था और उस

  • में जितने पाप हुये थे, उनके साथ खाने में या उसे ईश्वरा-