निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं०
कहलाता है, और जो असत्य नहीं, सो 'नासत्य' कहलाता
है। दो बार निषेध करने से प्रकृत वस्तु ही हो जाती है।
'सत्य के प्रणेता (प्रवृत्त करने वाले) 'नासत्य' कहलाते
हैं, यह आग्रायण आचार्य मानते हैं।
अथवा—नासिका (नाक) से उत्पन्न हुये थे इस से
वे नासत्य हैं।
'पुरन्धि' (५१) अनवगत अनेकार्थ है।
'पुरन्धि' क्या ? 'पुरु' (बहुत) 'धी' (बुद्धि) वाला ।
सो कौन मन्त्र में पहिले 'भग' देवता कहा गया है, उसी का
यह पुनः कथन अर्थात्-विशेषण है। यह एक मत हुआ। दूसरा
मत है कि-'पुरन्धि' इन्द्र का नाम है। क्योंकि-यह बहुत २
कर्म वाला है, और पुरों (मेघों) का विदारण करने (फाड़ने)
वाला है। 'पुरन्धि' वरुण का नाम है, यह और मत है।
उसी की यह विशेषण द्वारा स्तुति है, कि-वह 'पुरन्धि' या
बहु बुद्धि वाला है। —
"इमामूनु कवितमस्य मायाम् " अर्थात् 'इमाम्'
इस 'कवितमस्य' (मेधावितमस्य) बड़े बुद्धिमान् वरुणदेव
की 'मायाम्' प्रज्ञा को (न किरादधर्ष) कोई नहीं दबा सकता
है, यह भी निगम है। इस प्रकार यहां वरुण देव प्रज्ञा के
द्वारा स्तुति किये जाते हैं, और 'धी' यह नाम बुद्धि का है,
सो जिसके 'पुरु' बहुत हो, उसे 'पुरन्धि' कहते हैं, इस से
वरुण पुरन्धि है, युक्त होता है।
'रुशत्' (५२) यह अनवगत वर्ण का नाम है। ज्वलन
(जलना) अर्थ में 'रुच' (भ्वा०आ०) धातु का है।
"समिद्धस्य रुशद्दर्शि पाजः " अर्थात्-'समि-
दृश्य , जलते हुए अग्नि देव का ‘ रुशत् ’ सुन्दर वर्ण और
‘ पाजः ’ बल ‘ अदर्शि ’ दिखाई दिया । यह भी निगम है
॥ ४ ( १३ ) ॥
( खं० ५ )
निघ०-रिशादसः ॥ ५३ ॥ सुदत्रः ॥५४॥
सुविदत्रः ॥५५॥ आनुषक् ॥५६॥ तुर्वणिः
॥ ५७ ॥ गिर्वणाः ॥ ५८ ॥
निरु०-“ अस्ति हि वः सजात्यं रिशादसो देवासो
अस्त्याप्यम् । ” ( ऋ० सं० ६, २, ३२, ५ )
अस्ति हि वः समानजातितो रेशयदारिणो
देवाः । अस्त्याप्यम् ।
‘आप्यम्’ आप्नोतेः ।
‘सुदत्रः’ कल्याणदानः ।
“ त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायः । ” ( ऋ०सं०
५, ३, २७, २ ) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘सुविदत्रः’ कल्याणविद्यः ।
“ आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् ” । ( ७,६,
१८, ४ ) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘ आनुषक् ’-इति नाम अनुपूर्वस्य अनुषक्तं
भवति ।
“ स्तृणन्ति बर्हिरानुषक् । ” ( ऋ०सं० ६, ३,
हिन्दी निरुक्त ( २७८ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं०
४२, १ ) इत्यपि निगमो भवति ।
'तुर्वणिः' तूर्णवनिः ।
“सतुर्वाणि र्महाँ अरेणु पौंस्ये” । [ऋ० सं० १, ४,
२१, ३, ] । इत्यपि निगमो भवति ।
गिर्वणा देवो भवति । गीर्भिरेनं वनयन्ति ।
“जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” । (ऋ० सं० ६, ६,
१२, ७ ) ॥ ५ (१४) ॥
अर्थः-हे 'रिशादसः' (रेशयदासिनः वा रेशयदारिणः )
हिंसकों को विदारण करने वाले ! 'देवासः' (देवाः !) देवो !
'वः' ( युष्माकम् ) तुम्हारी 'सजात्यम्' (समानजातित्रा ) एक
जातीयता 'अस्ति' है, और वह 'आप्यम्' मनुष्यों को प्राप्त
करने योग्य है। अर्थात्-तुम्हारा आश्रयण करने से वे रक्षा
पा सकते हैं । इस प्रकार यहा पर शब्द की समानता और
अर्थ की योग्यता से 'रिशादसः' 'रेशयदारिणः' (हिंसक के
मारने वाले) के अर्थ में है, यह उपपन्न होता है ।
'आप्य' व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातु से है ।
'सुदत्र' ( ५४ ) अनवगत 'कल्याणदानः' ( पवित्र दान
वाला ) के अर्थ में है ।
“त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायः” अर्थात्- 'सुदत्रः'
सुन्दर दान करने वाला 'त्वष्टा' त्वष्टा देव हमारे अर्थ 'रायः'
(धनानि) धनों को 'विदधातु' देवे । इस प्रकार यहां धन के
सम्बन्ध से 'सुदत्र' शब्द 'कल्याण दान' के अर्थ में उपपन्न
होता है ।
हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं०
‘सुविदत्र’ (५५) शब्द अनवगत ‘कल्याणविद्य’ या उत्तम
विद्या वाला के अर्थ में है—
“आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्” अर्थात्—‘अग्ने ! ,
हे अग्नि देव ! ‘सुविदत्रेभिः’ उत्तम विद्या वाले पितरों के
सहित ‘अर्वाङ्’ हमारे अभिमुख ‘आ-याहि’ आ। यह भी निगम
है। यहां शब्द की समानता से ‘सुविदत्र’ शब्द ‘कल्याणविद्य’
के अर्थ में है।
‘आनुषक्’ (५६) यह नाम (अनवगत) ‘अनु’ (उपसर्ग)
पूर्वक संगार्थक ‘सञ्ज’ (भ्वा० प०) धातु का है। ‘आनुषक’
क्या ? अनुषक्त या पीछे लगा हुआ होता है।
“स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्” अर्थात्—जो यज्ञों में ‘आनु-
षक्’ अनन्तर अनन्तर (एक से एक) लगी हुई ‘बर्हिः’ कुशाओं
को ‘स्तृणन्ति’ बिछाते है।’ यह भी निगम है।
‘तुर्वणि’ (५७) क्या ? तूर्णवनि, अर्थात्—जो शीघ्र वनन
(सेवन) करता है।
“स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये” (“गिरे भृष्टि र्न
भ्राजते”) अर्थात्—‘तुर्वणिः’ शीघ्र अपने स्तुति करने वाले
को भजने वाला ‘महान्’ प्रभाव से बड़ा ‘सः’ वह इन्द्र ‘अरेणु
पौंस्ये’ अन्तरिक्ष (आकाश) में (पर्वतके शिखर के समान चम-
कता है)। यह भी निगम है।
‘गिर्वणस्’ (५८) देव होता है। क्यों कि—इसे गिराओं
(स्तुतियों) से वनन या याचन करते हैं।
“जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” अर्थात्- हे स्तोताओ ! तुम
‘गिर्वणसे’ स्तुतियों की गिराओं (वाणियों) से भजन योग्य
हिन्दी निरुक्त ( ८० ) ६ अ० पा० ३ ० ६
इन्द्र के लिये 'जुष्टम्' प्यारे 'बृहत्' ( साम ) बृहत् साम को
( उच्चारयत ) उच्चारण करो। यह भी निगम है। इस प्रकार
यहां अर्थ की उपपत्ति के अनुरोध से 'गिर्वणस्' शब्द देव का
वाचक होता है ॥ ५ ( १४ ) ॥
( खं० ६ )
निघ०-असूर्त्ते सूर्त्ते ॥५६॥ अम्यक् ॥६०॥
याहश्मन् ॥६१॥ जारयायि ॥६२॥
निरु०-असूर्त्ते सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि स-
मकृण्वन्निमानि ॥” [ ऋ० सं० ८, ३, १७, ४ ]
असुसमीरिताः सुसमीरित वातसमीरिता माध्य-
मका देवगणास्ते रसेन पृथिवीं तर्पयन्तो भूतानि
च कुर्वन्ति । “त आयजन्त” ( ऋ० सं० ८, ३,
१७, ४ ) इति-अतिक्रान्तं प्रतिवचनम् ।
“अम्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिः ।” [ ऋ०सं० २, ४,
८, ३ ] अमाक्ता-इतिवा अभ्यक्ता-इतिवा ।
“याहश्मिन्धायि तमपस्ययाविदत् ।” [ऋ० सं०
४, २, २४, ३ ) ।
याहशे अधायितम् अपस्यया अविदत् ।
“ उस्रः पितेव जारयायि यज्ञैः ” [ ऋ०सं०
४, ५, १४, ४ ] ।
उस्र इव गोपिता अजायि यज्ञैः ॥ ६ (१५) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २८१ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं०
अर्थ:-‘असूर्त्ते’ ‘सूर्त्ते’, ये दो पद अनवगत हैं। पहिले का अर्थ
‘असुसमीरिता’ (प्राण वायु से प्रेरित) और दूसरे का ‘सुसमीर्रिते’ (विस्तृत)
अर्थ है।—
“असूर्त्ते०-न्निमानि” अर्थात्-‘ये’ (माध्यमकाः
देवगणाः) जो मध्यम लोक के देवता गण ‘असूर्त्ते’ (असुसमी-
रिताः = वातसमीरिताः) वायुसे प्रेरित हुए ‘सूर्त्ते’ (सुसमी-
रिते = विस्तीर्णे) विस्तृत ‘निषत्ते’ (निषण्णे) डटेहुए ‘रजसि’
(अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष लोकमें स्थित हैं, (ते) वे (रसेन पृथिवीं
तर्पयन्तः) जलसे पृथिवी को तृप्त करते हुए ‘इमानि’ इन
‘भूतानि’ प्राणियों को ‘समकूरवन्’ करते हैं। इस मन्त्र के
पूर्वार्द्ध में “ते आपजन्त” इत्यादि पाठ है। उसमें ‘ते’
(वे) पद आ गया है, और इस उत्तरार्द्ध में “ये भूतानि”
यहां ‘ये’ (जो) पद आया है, किन्तु शब्दस्वभावकी मर्यादा
से पहिले ‘ये’और पीछे ‘ते’ आना चाहिए। क्योंकि- जब
कोई कहता है, ‘वे जाते हैं, तो प्रश्न होगा-कौन ? और
जब कहेंगे-‘जो लाठी वाले हैं, वे जाते हैं,तो ‘वे’ को सुनकर
पूर्वोक्त प्रश्न नहीं उठ सकता । इससे सिद्ध हुआ कि-‘ते’ पद
सदा ही अपने उच्चारण से पहिले ‘ये’ पदके उच्चारण की
अपेक्षा रखता है। सुतराम् मन्त्र में शब्द-स्वभाव के विपरीत
‘ते’ पदका पहिले और ‘ये’ पदका पीछे प्रयोग किया है, इसे
‘अतिक्रान्त प्रतिवचन’ कहते हैं। वक्ता की इच्छानुसार
कभी २ ऐसा भी होता है। जैसा कि-‘वेजाते हैं, जो लाठी
वाले हैं’ यही प्रकार स्वतन्त्र-प्रकृति मन्त्र ने भी यहां
किया है।
‘अम्यक्’ (६०) यह अनवगत है। ‘अम्यक्’ क्या ? ‘अमाक्ता’ वह
३६
हिन्दी निरुक्त ( २८२ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
क्या ? संग्राम में शत्रु की ओर फेंकी हुई अथवा 'अभ्यक्ता'वह क्या ? नित्य-
काल ही शत्रुओं के प्रति गई हुई ।
“ अभ्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिः ” अर्थात्-‘ इन्द्र ! ’
हे इन्द्र देव ! 'सा' वह 'ते' तेरी 'ऋष्टिः' ऋष्टि (शस्त्र विशेष)
'अभ्यक्' मेघके प्रति गई हुई होती है । यहां वृष्टि और ऋष्टि के
संबन्धसे ' अभ्यक् ' शब्द ' अभि ' ( अव्यय ) और गत्यर्थक
'अञ्चू' ( भ्वा० प० ) धातुसे है, यह उपपन्न होता है ।
‘ यादृश्मिन् ’ (६१) यह अनवगत 'यादृशे' (जिसमें) के अर्थ में है ।
“ यादृश्मिन् धायि तमपस्यया विदत् ” अर्थात्-
हे भगवन् ! अग्निदेव ! तेरे भक्तने ‘ यादृश्मिन् ’ जैसे काममें
मनको 'अधायि' धारण किया 'तम्' उसको 'अपस्यया' हविः
के दान और स्तुति आदिसे 'अविदत्'पाया । यहां 'यादृश्मिन्'
पदका शब्द की समानतासे 'यादृशे' परिवर्तन युक्त होता है ।
‘जारयायि’ (६२) यह अनवगत 'अजायि 'के अर्थ में है ।
“उस्रः पितेव जारयायि यज्ञैः ” अर्थात्-अग्नि
देव 'यज्ञैः' ( यज्ञेषु ) यज्ञों में विहरण किया जाता हुआ
'उस्रः-पिता-इव' गोओं के पति साण्ड ( सांड ) के समान
'जारयायि' ( अजायि) अनेकरूप होता है । अर्थात्-सांड जिस
प्रकार पुत्र पौत्र आदिकोंसे अनेक हो जाता है, उसी प्रकार
अग्नि देव भी बहुधा हो जाता है यहां 'जारयायि' पद का
'अजायि' अर्थ युक्त प्रतीत होता है ॥ ६ ( १५ ) ॥
( खं० ७ )
निघ०- अग्रिया ॥ ६३ ॥ चनः ॥६४॥
पन्नता ॥ ६५ ॥ शुरुधः ॥६६॥ अमिनः
हिन्दी निरुक्त ( २८३ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
॥ ६७ ॥ जज्झतीः ॥ ६८ ॥ अप्रतिष्कुतः
॥ ६९ ॥ शाशदानः ॥ ७० ॥
निरु०-“प्रवोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे
अग्रियोत वाजाः ।” [ ऋ० सं० ३, ७, ३, ३ ]
प्रास्थुर्वा जोषयमाणा अभवन् सर्वे, अग्रगम-
नेन-इति वा, अग्रसरणेन-इति वा, अग्रसम्पादिन्-
इति वा ।
अपिवा ‘अग्रम्’ इत्येतत् अनर्थकम्-उपबन्धम्-
आददीत ॥
“अद्धीदिन्द्र प्रस्थितेमा हवींषि चनो दधिष्व
पचतोत सोमम् ।” ( ऋ० सं० ८, ६, २१, ३ ) ।
अद्धि इन्द्र प्रस्थितानि इमानि हवींषि चनो
दधिष्व ।
‘चन’ इति अन्ननाम ।
( पचता- ) पचति नीमीभूतः ।
“ तं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीष्टाम् ।”
( ) । इत्यपि निगमो भवति ।
अपि वा मेदसश्च पशोश्च सात्त्वं द्विवचनं स्यात्’
यत्रहि एक-वचनार्थः प्रसिद्धं तद्भवति ॥
“ पुरोला अग्न पचतः ।” [ ऋ०सं० ३, १, ३१,
हिन्दी निरुक्त ( ३८४ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
२ ] । इति यथा ॥
‘शुरुधः’ आपो भवन्ति । शुचं संरुन्धन्ति ।
“ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीः” । (ऋ०सं०
३, ६, १०, ३) ।
‘अमिनः’ अमितमात्रो महान् भवति ।
अभ्यमितो वा ।
“अमिनः सहोभिः” । [ ऋ० सं० ४, ६,
७, १) । इत्यपि निगमो भवति ॥
'जज्जतीः' आपो भवन्ति । शब्दकारिण्यः ।
“मरुतो जज्जतीरिव” । (ऋ० सं० ४, ३,
९, ६) । इत्यपि निगमो भवति ॥
'अप्रतिष्कुतः' अप्रतिष्कृतः । अप्रतिस्खलि-
तो वा ।
“अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः” । (ऋ० सं० १, १,
१४, १) । इत्यपि निगमो भवति ॥
‘शाशदानः’ शाशद्यमानः ।
“ह्रस्वां मतिमतिरच्छाशदानः” । [ ऋ० सं०
१,३,३,३ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥७ (१६) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ६, ३ ॥
'अग्रिया' (६३) अनवगत सेना के आगे चलने वाल का अथवा
अपने को आगे करने वाले का अथवा आग्रही का नाम है ।—
हिन्दी निरुक्त ( २८५ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
“प्रवोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अ-
ग्रियोत वाजाः । ” अर्थात्-हे ऋभु देवो ! ‘वः’ तुम सब
से ( प्र ब्रवीमि )’ कहता हूं, ‘प्र-अस्थुः’ जो हविः भेजे हुए हैं
उन्हें ‘अच्छा’ भले प्रकार ‘जुजुषाणासः’ ( जोषयमाणाः ) सेवन
करते हुए तुम ‘विश्वे’ (सर्वे) सब ‘अग्रिया’ देव सेना के आगे
चलने वाले ‘अभूत’ ( अभवत ) हुए या होते हो । ‘उत’ और
हे ‘ वाजाः ’ ' हविओ ! तुम सब भी ऐसे ही हो । इस प्रकार
यहां अर्थ के अनुसार और शब्द की समानता से ‘अग्रिया’
पद् ‘अग्रगामिनः’ ( आगे चलने वाले ) के अर्थ में है ।
‘अग्रिया’ कैसे ? अथवा अग्र-गमन से, अथवा अग्र-सरण
( चलने ) से, अथवा अपने को अग्र सम्पादन करने से
( बनाने से ) है ।
अथवा ‘अग्र’-यह पद् अनर्थक उपबन्ध ( ‘या’ प्रत्यय )
को लेता है, अर्थात्-‘अग्र’ शब्द और ‘या’ प्रत्यय के योग से
‘अग्रिया’ शब्द बना है, किन्तु जो अर्थ ‘अग्र’ शब्द का है,
वही अर्थ ‘अग्रिया’ का है, क्योंकि ‘या’ प्रत्यय यहां किसी
अर्थ में न होकर शब्दमात्र के निर्माण में सहायक होता है ।
‘चनः’ (६४) ( चना ) अनवगत अन्नका नाम है । [ लोग
कहते हैं कि-चने का नाम वेद शास्त्र में नहीं है, किन्तु यह
ख्याल उनका ठीक नहीं है, वेद के मन्त्रों में यह शब्द बहु-
तायत से आता है, निघण्टु में यहां प्राधान्य से इस नाम का
पाठ है, और यास्काचार्य भी इस ( चन ) शब्द को अन्न का
नाम अपने मुख से कहते हैं । ]-
“ अद्धीदिन्द्र प्रस्थितेमा हवींषि चनो दधिष्व
हिन्दी निरुक्त ( २८६ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
पचतोत सोमम् ” अर्थात्—'इन्द्र !' हे इन्द्र देव ! 'पचता'
पके हुए 'इमा' (इमानि) इन 'प्रस्थिता' (प्रस्थितानि) भेजे हुए
या दिये हुए 'हवींषि' हविन्नों को 'अद्धि' तू खा 'घनः'
(घने) अन्न को 'दधिष्व' पेटमें धारण कर 'उत' और 'सोमम्'
सोम को धारण कर ।
'घन' यह अन्न का नाम है ।
'पचता' (६५) यह अनवगत एक वचन, द्विवचन और बहुवचन होता
है । सो प्रकरण विशेष से निर्णय होता है ।—
( पचता- ) कैसे ? 'पचतिर्नामीभूतः' अर्थात् 'पचति' इस
आख्यात पद का ही यह नाम बन गया है ।
“तं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीष्टाम्” अर्थात्-इन्द्रा-
ग्नि देवता 'मेदस्तः' मेदा के स्थान में 'पचता' ( पक्वम् ) पके
हुए 'तम्' उस पशु को 'प्रति-ग्रभीष्टाम्' ग्रहण करें । यहां 'तम्'
का विशेषण होने से 'पचता' यह एकवचनान्त है, ऐसा
निश्चय होता है ।
अथवा 'पचता' यह मेदा और पशु दोनों का सात्व (द्रव्य
सम्बन्धी ) द्विवचन हो सकता है । अर्थात्–इन दोनों द्रव्यों
के अभिप्राय से द्विवचन है, किन्तु एक वचन नहीं । क्यों कि-
जहां एकवचन का अर्थ होता है, वहां वह (एक वचन) प्रसिद्ध
होता है । जैसे—
“पुरोला अग्ने पचतः” अर्थात्–'अग्ने' हे अग्नि देव !
'पुरोला' ( पुरोडाशः ) पुरोडाश 'पचतः' ( पक्वः ) पक गया ।
यहां 'पुरोला' और 'परिष्कृतः' पदोंके सम्बन्ध से तथा शब्द
के सारूप्य से 'पचतः' यह एकवचनान्त है । बहुवचन का
उदाहरण ' घन ' ( ६४ ) के उदाहरण “अद्धीदिन्द्र” में
हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं०
'पचता' आया है। वहां 'हवींषि' बहुवचन पदके सम्बन्ध से
वह बहुवचनान्त निश्चित होता है ।
'शुरुधः' ( ६६ ) जल होते हैं । क्योंकि-वे 'शुच्' मलके
शोक को रोधन करते ( रोकते ) हैं । ( 'शुगुधः' यह शब्द-
समाधि उचित है । भग० दु० ।)
“ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीः” अर्थात्-
क्योंकि-'ऋतस्य' ऋत की सम्बन्धिनी 'पूर्वीः' पहिली 'शुरुधः'
आप् ( जल ) हैं। यह भी निगम है ।
'अमिनः' ( ६७ ) यह अनवगत 'अमितमात्रः' ( जिसके
मन्त्रों का मान ( संख्या ) नहो महान् के अर्थ मे है । अथवा
'अभ्यमितः' ( जो किसी से हिंसितनहो ) के अर्थ में है ।
“अमिनः सहोभिः” अर्थात्-इन्द्र देव मध्यम और
उत्तम लोक में 'सहोभिः' (बलैः) अपने बलों से 'अमिनः'
(अमितमात्रः) अमितबल है, या अहिंसित बल है । अर्थात्-
उसके बलका किसी ने परिमाण (मांप ) अथवा तिरस्कार
नहीं किया है। यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता
और अर्थ की योग्यता से 'अमिन' शब्द 'अमितमात्र' अथवा
'अहिंसितमात्र' के अर्थ में है ।
'जज्झतीः' ( ६८ ) यह अनवगत, शब्द के अनुकरण पर
'आपः' ( जल ) प्रतीत होती हैं अर्थात्-'जज्झती' क्यों ? शब्द
करती हैं ।
“मरुतो जज्झती रिव” अर्थात्-'मरुतः' हे मरुतों !
'जज्झतीः-इव' शब्द करती हुई नदियों के समान तुम्हारी
ऋष्टिओं (अस्त्रों ) के प्रहारों से हत हुए मेघों से बिजली
हिन्दी निरुक्त ( २८६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं०
॥७३॥ द्विबर्हाः ॥ ७४ ॥ अक्रः ॥ ७५ ॥
उराणाः ॥७६॥
निरु०-‘सृप्रः’ सर्पणात् । इदमपि इतरत् ‘सृप्रम्’
एतस्मादेव । सर्पिर्वा । तैलंवा ।
“सृप्रकरस्नमूतये” ( ऋ० सं० ६, ३, २, ५ )
इत्यपि निगमो भवति ।
‘करस्नौ’ बाहू । कर्मणां प्रस्रातारौ ।
‘सुशिप्रम्’ एतेन व्याख्यातम् ।
“वाजे सुशिप्र गोमति” (ऋ० सं० ६, २, २, ३)
इत्यपि निगमो भवति ।
‘शिप्रे’ हनू । नासिके वा ।
‘हनूः’ हन्तेः ।
‘नासिका’ नसतेः ।
“विष्यस्व शिप्रे विसृजस्व धेने” (ऋ०सं० १, ७,
१३, ७) इत्यपि निगमो भवति ।
‘धेना’ दधातेः ।
‘रंसु’ रमणीयेषु रमणात् ।
“स चित्रेण चिकिते रंसु भासा” [ ऋ० सं० २,
५, २४, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ।
‘द्विबर्हाः’ द्वयोः स्थानयोः परिवृढः,-मध्यमे च
३७
स्थाने उत्तमे च ।
“उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः” ( ऋ० सं० ४,
६, ७, १ ) इत्यपि निगमो भवति ।
‘अक्रः’ आक्रमणात् ।
“अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनाम” [ ऋ० सं०
२, ८, १५, २ ] इत्यपि निगमो भवति ॥
‘उराणः’ उरु कुर्वाणः ।
“दूत ईयसे प्रदिव उराणः” ( ऋ० सं० ३, ५,
७, ३ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ १ ॥
अर्थः-‘सृप्र’ (७१) ( सर्प ) क्यों ? सर्पण ( सरकने ) से ।
यह दूसरा भी ‘सृप्र’ जो सर्पि या घृत अथवा तैल का नाम है
इसी ( सर्पण क्रिया के सम्बन्ध ) से है । क्यों कि-वह भी
सरकता है ।
“सृप्रकरस्नमूतये” अर्थात्-‘सृप्रकरस्नम्’ (दीर्घबाहुम्)
लम्बी भुजा वाले ( इन्द्र ) को ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये
( बुलाते हैं ) । यह भी निगम है ।
‘करस्न’ बाहु ( भुज ) होते हैं । क्यों ? कर्मोंके प्रस्नाता
( करने वाले ) होते हैं ।
‘सुशिप्र’ (७२) शब्द अनवगत इसी ‘सृप्र’ (७०) शब्द से
व्याख्यान किया गया । अर्थात् यह भी ‘सर्पति’ या ‘सृप’
( भ्वा० प० ) धातु से है ।
बाजे सुशिप्र गोमति” अर्थात्-‘सुशिप्र !’ हे सुन्दर
ठोडी वाले ! या हे सुन्दर नाक वाले ! ‘गोमति’ गोओं वाले
‘वाजे’ अन्न में । यह भी निगम है ।
'शिप्र' हनू (ठोड़ी) या नासिकाएँ ।
'हनु' कैसे ? हिंसार्थक 'हन्' (अदा०प०) धातु से है ।
'नासिका' कैसे ? प्राप्ति या नमस्कार (झुकना) अर्थ में
'नस' (स्वा०प०) धातु से है ।
"विष्वस्व शिप्रे विमृजस्व धेने" अर्थात्- हे
इन्द्र देव ! तू 'शिप्रे' अपनी ठोड़ियों को हविः के खाने के
अर्थ 'विष्वस्व' चला अथवा अपनी नासिकाओं को गन्ध के
सूंघने के अर्थ चला । और 'धेने' (आधस्त्ये दंष्ट्रे) नीचेकी
डाढें अथवा (जिह्वोपजिह्विके) जीभ और जीभके पासके स्थान
(कागली) को 'विसृजस्व' हविः भक्षण के अर्थ छोड़ (चला)
यह भी निगम है । यहां हविः के भक्षणके संबन्ध से 'शिप्रे'
यह हनु या नासिकाओं का नाम है । क्योंकि-भक्षण में ठोडी
तो चलती ही है किन्तु गन्धभक्षण नासिका से ही होता है,
इस लिये दोनों ही अर्थों का संभव है ।
'धेना' (जाड़) धारणार्थक 'धा' (जु०उ०) धातु से
है । क्योंकि-वह भी भक्षण के समय अन्न को पीसने के अर्थ
अन्न को धारण करती है ।
'रंसु' (७३) (सप्तमी का बहुवचन) अनवगत 'रमणी-
येषु' (रमण करने योग्यों में) के अर्थ में है । 'रंसु' कैसे ?
[L20: रमणासे । अर्थात्-क्रीडार्थक 'रम्' (भ्वा० आ०) धातु और
सप्तमी विभक्ति के बहुवचन 'सु' के योगसे बनता है ।
"सचित्रेण चिकिते रंसु भासा" अर्थात्-'सः'
वह अग्निदेव 'चित्रेण' चित्र विचित्र 'भासा' अपनी ज्योति से
युक्त 'रंसु' रमणीय द्युलोक आदि स्थानों में 'चिकिते' प्रकाशता
है । यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ के
हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) ६ अ० ४ पा० १ खं०
अविरोध से 'रंसु' का 'रमणीयेषु' (रमणीयोंमें) अर्थ होता है।
'द्विबर्हाः' (७४) अनवगत 'द्विपरिवृढः' (द्वयोःस्थान-
योः परिवृढः) (दो स्थानों में अर्थात् मध्यम स्थान में विद्युत्
(बिजली) के रूपसे और उत्तम (द्यु) लोकमें सूर्य के रूपसे
बढ़ाहुआ) के अर्थ में है।
"उत द्विबर्हाः अमिनः सहोभिः" अर्थात्-'उत'
और इन्द्रदेव 'द्विबर्हाः' दोनों लोकों में बढ़ा हुआ और
'सहोभिः' बलों से 'अमिनः' (अमितमात्रः) बिना परि-
माण (अथाह) है। यह भी निगम है॥
'अक्रः' (७५) यह अनवगत 'आक्रमणः' (कोट) के
अर्थ में है। क्यों ? वह शत्रुके आक्रमण (चढ़ाई) से बचाता
है। [ अथवा अक्रमण से यह 'अक्र' है। क्योंकि वह दुर्गम होने
से क्रमण (लांघा) नहीं जाता।]
"अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनाम्" अर्थात्-सो
अग्निदेव 'समिथे' (संग्रामे) संग्राम में 'महीनाम्' शत्रु-सेनाओं
का 'अक्रो-न' दुर्ग के कोट के समान 'बभ्रिः' धारण करने वाला
है। यह भी निगम है। यहां शब्द की समानता और अर्थ के
अविरोधसे 'अक्र' नाम कोट का होता है ॥
'उराणः' (७६) अनवगत 'उरु-कुर्वाणः' (बहुत करते
हुए) के अर्थ में है।
"दूत ईयसे प्रदिव उराणः" अर्थात्- हे अग्नि
देव ! तू 'उराणः' थोड़े दिए हुए हविः को भी देवताओं की
तृप्ति में समर्थ बहुत करता हुआ 'प्रदिवः' सब यजमानों का
पुराना 'दूतः दूत 'ईयसे' (याच्यसे) याचना किया जाता है
यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ की
उपपत्तिका कारण ‘उरायाः’ पद का ‘उरु-कुर्वाणः’ (बहुत
करता हुआ) विपरिणाम होता है ॥ १ ॥
( खं २ )
निघ०-स्तियानाम् ॥ ७७ ॥ स्तिपाः
॥ ७८ ॥ जबारु ॥७६॥ जरूथम् ॥८०॥
कुलिशः ॥ ८१ ॥ तुञ्जः ॥ ८२ ॥
निरु०-‘स्तियाः आपो भवन्ति । स्त्यायनात् ।
“वृषा सिन्धूनां वृषभःस्तियानाम् ।” (ऋ०
सं० ४, ७, २०, १ ) इत्यपि निगमो भवति ॥
‘स्तिपाः’ स्तियापालनः । उपस्थितान् पाल-
यति इति वा ।
“स नःस्तिपा उत भवा तनूपाः” । (ऋ०
सं० ८, २, १९, ४ ) । इत्यपि निगमो भवति ॥
‘जबारु’ जवमानरोहि । जरमाणरोहि ।
गरमाणरोहि इति वा ।
“अग्ने रूप आरुपिंतं जबारु ” । ( ऋ० सं०
३, ५, २, २ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥
‘जरूथं’ गरूथम् । गृणातेः ।
‘जरूथं’ हन्यक्षिराये पुरन्धिम् ” । ( ऋ० सं०
५, २, १२, ६ ) । इत्यपि निगमो भवति ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ६ अ० ४ पा० २ खं०
'कुलिश' इति वज्रनाम । कुलशातनो भवति ।
“स्कन्धांसीव कुलिशेनाविवृक्णाहिः शयत
उपपृक्पृथिव्याः” [ ऋ०सं० १,२,३६,५ ] ।
'स्कन्धः' वृक्षस्य समास्कन्नो भवति ।
अयमपि इतरः 'स्कन्धः' एतस्मादेव । आस्क-
न्नंकाये ।
अहिः शयते उपपर्चनः पृथिव्याः ।
‘तुञ्जः' तुञ्जतेर्दानकर्मणः ॥ २ (१७) ॥
अर्थः-‘स्तियाः’ (७७) (अनवगत) क्या ? जल होते
हैं। क्यों ? स्त्यायन ( संहनन ) जोड़ने या जुड़ जाने से क्योंकि
जल ही पृथिवी के कणों को जोड़ते हैं, अथवा हिम (शीत)
के प्रभाव से स्वयम् जुड़ जाते हैं (पाला या बर्फ हो जाता है।)
“वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्” अर्थात्-
हे इन्द्र ! ‘सिन्धूनाम्’ बहने वाले जलों का तू ही 'वृषा' बरसने
वाला है। तू ही 'स्तियानाम्' जमे हुए जलों (बरफों का
'वृषभः' बरसने वाला है। यह भी निगम है। यहां शब्द की
समानता से ‘स्तियाः' शब्द ‘संहन्त्री’ (जमाने वालीं या
स्वयम् ‘संहताः' (जमी हुई) अपों (जलों) के अर्थ में है।
शब्द और संघात (इकट्ठा करना या होना) अर्थ में ‘स्त्यै’
(भ्वा०प०) धातु का है॥
'स्तिपाः’ (७८) (कूप) ‘स्तियापालन’ (जल से
अघाने वाला) के अर्थ में है। अथवा 'उपस्थितों (आये हुए
प्यासों) को जल के दान से पालन करता है, इससे 'स्तिपा' है।
[Header] हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० २ खं०
“ स नःस्तिपा उत भवा तनूपाः ” अर्थात्- हे
अग्नि देव ! ‘उत’ और ‘सः’ सो तू ‘नः’ हमारा ‘स्तिपाः’ कूंए
के समान ‘ तनूपाः ’ शरीरों को पालने वाला ‘भव’ हो । यह
भी निगम है । यहां अर्थ के अविरोध और शब्दकी समानता
से ‘स्तिपा’ कूप का नाम है ॥
‘ जवारु ’ ( ७९ ) ( सूर्य-मण्डल ) क्यों ? वह ‘जवमान-
रोहि’ वेग से चलता हुआ आकाश में रोहण करता ( चढ
जाता ) है । या ‘जरमाणरोहि’ भूतों को जराता हुआ आ-
काश में रोहण करता है । या ‘गरमाण-रोहि’ पृथिवीके रसों
( जलकणों ) को निगलता हुआ आकाश में चढजाता है ।
“अग्रेरुप आरुपितं जवारु” अर्थात्-हे यजमान
त उस वैश्वानर सूर्य देव को भज, जिसके ‘जवारू’ मण्डल को
‘ अग्रे’ पहिली सृष्टि के आदिमें देवताओंने ‘रूपः’ (पृथिव्याः)
पृथिवी के ऊपर ‘आरुपितम्’ चढाया या स्थापन किया है ।
यहां इस प्रकार ‘जवारू’ सूर्य-मण्डल का नाम है ॥
‘ जरूथ ’ ( ८० ) क्या ? ‘गरूथ’ ( स्तोत्र ) । सो क्यों ?
गरण किया जाता या बोलाजाता है । कैसे ? ‘गृणाति’ = गर-
णार्थक ‘गॄ’ (क्र्या० प० ) धातु से है ।
“ जरूथं हन्याक्षि राये पुरन्धिम् ” अर्थात्- हे
भगवन् ! अग्नि देव ! वसिष्ठ ने पूर्व कल्प में तेरे प्रति ‘जरूथम्’
( स्तोत्रम् ) स्तोत्र को ‘इन्’ ( गमयन् ) भेजते हुए ‘पुरन्धिम्’
बहु कर्म वाले अथवा बहु धनके देने वाले तुझको ‘राये’ धनके
अर्थ ‘यक्षि’ यजन किया है, वैसे ही मैं भी तेरा यजन करता
हूं । यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ की
उपपत्ति से ‘जरूथ’ यह स्तोत्र का नाम और स्तुत्यर्थक ( ज )
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० ३ सं०
( भ्वा० प० ) धातु का रूप है ॥
‘कुलिश’ ( ८१ ) अनवगत वज्र का नाम है। क्यों ?
यह ‘कूलशातन’ कनारों का तोड़ने वाला है।
“स्कन्धांसीव कुलिशेनाविवृक्णाहिः शयत
उपपृक् पृथिव्याः” । अर्थात्-‘कुलिशेन’ ( वज्रेण ) वज्र से
‘विवृक्णा ( विवृक्णानि = छिन्नानि ) कटेहुए ‘स्कन्धांसि-इव’
स्कन्धों ( वृक्षकी शाखाओं ) के समान इन्द्र के वज्र से छिन्न
हुआ ‘अहिः’ ( मेघः ) मेघ ‘पृथिव्याः’ पृथिवी के ‘उपपृक्’
ऊपर लगा हुआ ‘शयते’ सोता है। यहां मेघ का अवस्थान
ही सोना माना गया है। इस मन्त्रमें वधके संबन्धसे ‘कुलिश’
नाम वज्रका है, यह निर्णीत होता है।
‘स्कन्ध’ क्यों ? वृक्ष के समासक्त या लगा हुआ
होता है।
यह दूसरा ( मनुष्य का ) स्कन्ध भी इसी से होता है।
क्योंकि-वह काय ( देह ) में आसक्त चिपका हुआ होता है।
‘अहिः शयते उपपर्चनः पृथिव्याः’ मेघ सोता है, पृथिवी
पर लगा हुआ ॥
‘तुञ्ज’ ( ८२ ) ( दान ) दानार्थक ‘तुञ्ज’ ( भ्वा० प० )
धातु का है ॥ २ ॥ १७ ॥
( खं० ३ )
निघ०-बर्हणा ॥४३॥
निरु०-“तुञ्जे तुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः
न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ।” (ऋ० सं० १, १, १४, २)
दाने दाने य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणो