निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 718, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं०
के अर्थ में है ।
जो लोग “ गरुड पुराण ” के प्रेतकल्प की समूलता
और मरे हुए प्राणियों के देवताओं के प्रबन्धसे परलोक गमन
को वेद में देखना चाहते हैं, वे इस मन्त्र को ध्यान से पढ़ें ।
इस मन्त्र में-“देवताओंका मरे हुए को इस लोक से परलोक
में लेजाना और उनको उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख
मिलने का बहुत उत्तम प्रबन्ध किया हुआ ” बतायागया है ।
प्रबन्ध की उज्ज्वलता जानने के लिये देवताओंके दो विशेषण
ध्यान से देखने योग्य हैं ।
(१) “अनिमिषाः” जो देवता इस पृथिवी से प्राणि-
यों को उस लोक में ले जाते हैं, उनकी पलक कभी नहीं
झिपती वे सदा ही अपने कर्त्तव्य में जागते रहते हैं, इस से
कोई यह न समझे कि-उनके सोजाने के समय हमारा मृत्यु
का समय आजावेगा, तो फिर हम न मरेंगे और न अपने
कर्मों के फल को ही भोगेंगे ।
(२) “चिकित्वान्स.” वे देवता प्राणियों के पाप
पुण्यों को भले प्रकार जानते हैं, बिना मीमांसा या नियम
विरुद्ध अथवा अन्याय पूर्वक किसी के साथ बर्ताव नहीं
कर सकते ॥ ५ ( २० ) ॥
( खं० ६ )
निघ०- तुरीपम् ॥ ८६ ॥ रास्पिनः
॥ ६० ॥ ऋजतिः ॥ ९१ ॥ ऋजुनीती
॥ ९२ ॥ प्रतद्वसू ॥ ६३ ॥
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