निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 728, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) ६ अ० ४ पा० ८ खं०
कुरुङ्ग राजा के 'दिविष्टेषु' (क्रियासु) यज्ञादि क्रियाओं में
'शताश्वम्' सैकड़ों घोड़ों वाले 'राधः' दक्षिणारूप धन को
'स्थूरम्' (स्थूलम्) मोटा या बहुत 'अमन्महि' (मन्यामहे)
मानते हैं। इस प्रकार यहां 'दिविष्टि' शब्द से क्रियाओं का
बोध होता है। क्योंकि-यज्ञादि क्रियाओं में ही दान
होता है।
मेधातिथि इस मन्त्र में कहते हैं कि हम कुरुङ्ग राजा के
घोड़ों वाले दान को मनुष्यों में बड़ा दान मानते हैं। घोड़े के
दान की विधि दक्षिणा के रूप में पारस्करगृह्य सूत्र में भी
वैश्यको विवाह कर्ममें 'वैश्यश्चेदश्वम्' वाक्य से बताई गई है।
'स्थूर' क्या ? समाश्रितमात्र या उस में बहुत मात्रा या
परिमाण होता है। अर्थ क्या ? महान् = बड़ा।
'अणु' क्या ? अनु। अर्थात् स्थवीयान् या मोटे को अनु-
वर्त्तन करने वाला 'अणु' होता है। प्रयोजन-मोटे का विपरीत
'अणु' होता है। कैसे ? 'अनु' यह उपसर्गमात्र है, इस में
इसे नाम बनाने वाला प्रत्यय लुप्त (लोप हुआ हुआ) है,
इस से उस का श्रवण नहीं होता है। क्या और भी कोई शब्द
ऐसा है, जो केवल उपसर्ग से ही नाम बन गया हो ? है।
जैसे- 'सम्प्रति'। यह नाम वर्त्तमान काल का बोधक और
'सम्' 'प्रति' इन दो उपसर्गों से बना हुआ है। इस में कोई
प्रत्यय नहीं है।
'कुरुङ्ग' राजा हुआ है। वह कैसे ? वह कुरु देशमें गमन
करने से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह कुरुओं के प्रति जीतने को
गया था। अथवा कुल गमन से 'कुरुङ्ग' है। क्योंकि वह नित्य
ही शत्रु कुलों के प्रति जीतने जाता है।