निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१६ ) ६ अ० ५ पा० १ खं०
'कुरु' क्यों ? वह शत्रुओं को कृन्तन (छेदन) करता है ।
'कृत्' (तु० प०) धातु का है ।
'क्रूर' यह भी इसी 'कृत' (तु० प०) धातु का है ।
'कुल' 'कुष' (क्रया० प०) धातु से है। क्योंकि वह विस्तृत
होने से 'विकुषित' खुला हुआ या बिखरा हुआ जैसा होता है।
'दूत' ( ६६ ) अनवगत ( अ० ५ खं० १ में ) व्याख्यान
किया जा चुका है ।
'जिन्वति' ( १०० ) धातु प्रीति अर्थ में है। यहां
अप्रतीतार्थ होने से पढ़ा गया है ।
“भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ।”
अर्थात् पर्जन्य (मेघ) पृथिवी को तृप्त करते हैं और अग्नि
दिव् (द्युलोक) को तृप्त करते हैं । यह भी निगम है । इसकी
व्याख्या अ० ७ खं० २३ में भी होगी ॥६, ४॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥६,४॥
पञ्चमः पादः ।
( सं० १ )
निघ०-अमत्रः ॥ १०१ ॥ ऋन्धीषमः
॥१०२॥ अनर्शरातिम् ॥१०३॥ अनर्वा
॥१०४॥ असामि ॥१०५॥
निरु०-‘अमत्रः’ अमात्रः । महान् भवति ।
अभ्यमितो वा ।
“महा अमत्रो वृजने विरप्शी” । ( ऋ० सं०
३, २, १९, ४) । इत्यपि निगमो भवति ।