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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दीनिरुक्त। ६३
ग्रह यज्ञके समीप निष्केवल्यमें शस्त्र होता है, अर्थात् जहां
महेन्द्र देवताका यज्ञ हो रहा है, मन्युं देवताके मन्त्रका
पाठ होता है। जिस प्रकार लड़केके विवाहमें देवी भैरव
आदि देवताओंके गीत गाये जाते हैं, और उनमें विवाहके किसी
कार्यका स्मरण न हो कर केवल उन देवताओंकी स्तुति होती है,
तथा उनकी स्तुतिसे ही प्रस्तुत विवाहादि संस्कारोंमें उपकार
होता है, इसी प्रकार यहांपर मन्यु देवताकी स्तुतिसे महेन्द्र
देवताके यज्ञमें उपकार होता है, किन्तु वहांके अनुष्ठान व महेन्द्र
देवताका उनके मन्त्रोंमें स्मरण नहीं होता, यही अन्य देवताओंके
शस्त्र व स्तोत्र मन्त्रोंके पाठकी अन्य देवताओंके यज्ञमें सङ्गति
है। यही प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यानमें रखना चाहिये।
शस्त्र—अप्रगीतमन्त्रसाध्या स्तुतिः स्तोत्रम्। विना गाये हुए
मन्त्र से स्तुति, शस्त्र है।
स्तोत्र--प्रगीतमन्त्रसाध्य स्तुतिः स्तोत्रम्। गाये हुए मन्त्रसे
स्तुति, स्तोत्र कहलाती है।
पूर्ण तथा अपूर्ण उदाहरण—
मन्त्र।
भाष्यकार निरुक्तमें उदाहरण मन्त्रोंको कहीं पूर्ण तथा कहीं
अपूर्ण रूपमें पढ़ते हैं, इसका प्रयोजन यह है कि—जो सम्पूर्ण पढ़े
जाते हैं, और निर्वचन किये जाते है, वे व्याख्या-धर्मके उपदेशके
लिये हैं, अर्थात् उनसे छात्रोंको मन्त्रकी व्याख्याका प्रकार ज्ञात
होगा, व्याख्या-प्रकारको जान कर, वे अन्य मन्त्रोंकी व्याख्या
कर सकेंगे।
यदि सभी मन्त्र पूर्ण पढ़े जावें और निर्वचन किये जावें, तो
शास्त्र अतिविस्तृत होजावें। अथवा सभी मन्त्रोंके खण्ड पढ़े

६४ अ० १ पा० २ ख० १ ॥
जांय और निवचन किये जांय, तो व्याख्या-धर्म प्रदर्शित नहीं हो,
इस कारण व्याख्या-धर्मके उपदेशार्थ कोई सम्पूर्ण पढ़े जाते हैं
तथा निर्वचन किये जाते हैं, और शास्त्रके अति गौरवके भयसे
कोई असंपूर्ण ही पढ़े जाते हैं ।
प्रत्येक मन्त्रमें ही जिस प्रकार सकल, आधा अथवा चौथाई
पढ़नेसे प्रयोजन जाना जा सकता है, वह संक्षेपसे यह प्रकार
है, कि—
“जिस जिस मन्त्रमें जिस जिस एकार्थ, अनेकार्थ, तथा
अनवगतसंस्कार पदको निर्वचन करता है, अथवा किसी शब्दान्तर
का अध्याहार करता है, यद्वा किसी विशेष अर्थको दिखाता है,
तथा कोई विपरिणाम करता है, या किसो सन्दिग्ध अर्थका निर्णय
करता है, ऐसे प्रयोजनोंके लिये सकल मन्त्रका अध्ययन करता है,
एवम् जिस मन्त्रमें आधे या चोथाई भागहीमे वैसा पद है, जिसका
कि—आचार्यको निर्वचन करना अभीष्ट है, तो उतना ही पढ़
देता है, यह उक्त प्रकारसे निपुणताके साथ सर्वत्र अन्वेषण
करना चाहिए ।
स्तुति वाक्य और स्मारक वाक्य ।
स्तुतिके लिये जिन वाक्योंका प्रयोग होता है, वे स्तुति-वाक्य
कहलाते हैं, तथा स्मरणमात्रके लिये उपयोगी होनेवाले वाक्य
स्मृतिवाक्य या स्मारक होते हैं । अर्थात् जिस वस्तुकी स्तुति करना
हो, उसमें गुणोंका बखान करना, स्तुति वाक्यका प्रयोजन है, एवम्
गुणोंके द्वारा अनुस्मरणीय वस्तुके स्वरूपका प्रकाश करना, स्मारक
वाक्यका प्रयोजन होता है । या यो समझिए कि—स्तुति-वाक्य
में विशेष्यके द्वारा बिशेषणोंका और स्मारक-वाक्यमें विशेषणोंके
द्वारा विशेष्यका ज्ञान होता है । जैसे—"देवदत्तश्चतुर्वेदाऽभिज्ञः"
‘देवदत्त चारों वेदोंका जाननेवाला है’ यहां पहिले देवदत्तका ज्ञान

हिन्दी निरुक्त । ६५
होता है, और पीछे उसके गुणोंका, एवम् "यश्चतुर्वेदाभिज्ञस्तमानय"
जो चारों वेदोंका जाननेवाला है, उसे ला, यहां पर पहिले विशेषण-
का और पीछे विशेष्यका ज्ञान होता है। यही दो प्रकार मन्त्रोंके हैं,
उनमें जो स्तुत्यर्थ होते हैं, वे शस्त्र तथा स्तोत्र नामसे बोले जाते हैं,
और जो केवल अनुष्ठान या देवताका स्मरणमात्र कराते हैं, वे
अन्य अन्य मन्त्र हैं। इसी लिये स्तोत्र व शस्त्र नामवाले मन्त्र
स्तोतव्य देवताकी स्तुतिमात्र करते हैं, किन्तु किसी प्रस्तुत वस्तु-
की स्मृति नहीं कराते ।
शस्त्र व स्तोत्र ।
“प्रउगं शंसति” “निष्केवल्यं शंसति” इत्यादि वाक्योंसे
'शंसति' क्रियाके द्वारा जिनका विनियोग होता है, वे शस्त्र कहाते
हैं, और “आज्यैःस्तुवते” “पृष्ठैः स्तुवते” इत्यादि वाक्योंसे स्तुवते
या स्तौति क्रियाके द्वारा जिन मन्त्रोंका विनियोग होता है, वे
स्तोत्र कहाते हैं। एवम् स्तोत्र मन्त्र गाये जाते हैं और शस्त्र गाये
नहीं जाने। यही इनका परस्पर भेद है, किन्तु देवताकी स्तुतिमें
दोनोंका प्रयोजन समान है। इनकी सार्थकता देवताकी स्तुतिमें
ही होती है, गुणोंके अनुवाद-मात्रसे नहीं, इसी कारण स्तोत्र व
शस्त्ररूप कर्मकी मुख्यताः ही है गौणता नहीं होती ।
द्वितीय पाद ।
( खं-१ )
अथ निपाता उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति ।
अप्युपमार्थे । अपि कर्मोपसंग्रहार्थे । अपि पद-
पूरणाः । तेषामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति ।
'इव'-इति भाषायांच । अन्वध्यायंच । “अग्नि-

६६ अ० १ पा० २ ख० १ ।
रिव, इन्द्र इव"-इति । 'न'-इति प्रतिषेधार्थीयो
भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । "नेन्द्रं देव
ममंसत"-इति प्रतिषेधार्थीयः । पुरस्तादुपचारस्त-
स्य, य-प्रतिषेधति । "दुर्मदासो न सुरायाम्"-
इत्युपमार्थीयः । उपरिष्टादुपचारस्तस्य, येनोप-
मिमोते ॥ १ ॥
अर्थ—अथ निपात । अनेक प्रकारके अर्थोंमें गिरनेवाले निपात
होते हैं। कोई उपमा अर्थमें। कोई अर्थोपसंग्रह अर्थमे ।
और कोई पद-पूरणके लिये होते है। उनमें ये चार [ इव, न, चित्,
नु ] उपमा अर्थमे होते है। 'इव' भाषा (लोक) और वेदमैं ।
(उदाहरण) "अग्निरिव" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] अग्निके
समान । "इन्द्रइव" [ ऋ० मं० ८, ८, ३१, २ ] इन्द्रके समान ।
'न'-यह लोकमे निषेध अर्थमें और वेदमे निषेध और उपमा दोनों
अर्थोंमे होता हैं। (उदाहरण) "नेन्द्र देवममंसत" [ ८, ३, २६,
१ ] आदित्य रश्मियोने इन्द्रको अपना देव या प्रकाशक नहीं माना ।
यहां निषेध अर्थमे है। जब निषेध अर्थमें होता है, तब उसका उच्चा-
रण आदिमें आता है। "दुर्मदासो न सुरायाम्" [ऋ० मं० ५, ७, १६,
१ ] मदिराको पान किये हुये पुरुषोंके समान सोम दुर्मद है । यहां
'न' उपमा अर्थ म है। जिससे कि-नकार पीछे या अन्तमें दिया
है, इससे उपमार्थक है।
( ख०-२ )
'चित्'-इत्येषोऽनेकर्मा । "आचार्य्यश्चिदिदं
ब्रूयात्"-इति पूजायाम् । 'आचार्य' आचारं
ग्राहयति, आचिनोति अर्थान्, आचिनोति बुद्धि-

' हिन्दी निरुक्त । ६७
मिति वा । “दधिचित्” इत्युपमार्थे । “कुल्माषां-
श्चित् आहर”—इत्यवकुत्सिते । कुल्माषाः = कुलेषु
सीदन्ति । 'नु' इत्येषोऽनेककर्मा । “इदं नु करि-
ष्यति”—इति हेत्वपदेशे । 'कथं नु करिष्यति"
इत्यनुपृष्टे । “ननु एतदकार्षीत्” इति च ।
अथापि उपमार्थे भवति ॥ २ ॥
अर्थ—'चित्' यह अनेकार्थ है । (उदाहरण) “आचार्य्यश्चिदिदं
ब्रूयात्” आचार्य ही ऐसा कह सकता है, और कौन कहेगा ? यह
पूजा अर्थमें है । आचार्य,—जो आचार सिखावे, या अर्थोंको
संग्रह करे या बुद्धिको संग्रह करे । “दधि चित्” दधिके समान ।
यह उपमा अर्थमें है । “कुल्माषांश्चित् आहर,” कुल्माषोको
तो तू ले आ, और क्या लावेगा ? यह निन्दा अर्थमें है ।
कुल्माष—जो कुलोंमें रहे । 'नु' यह अनेकार्थ है । “इदं नु
करिष्यति” कैसे करेगा, यह हेतुके न माननेमें है । कथं नु करि-
ष्यति” कैसे करेगा ? यह दुबारा प्रश्नमें है, और “ननु एतत्
अकार्षीत्” अवश्य इसने किया है, यह भी दुबारा प्रश्न ही में है।
और उपमा अर्थ में भी है ॥ २ ॥
“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” । वृक्षस्येव ते पुरुहूत
शाखाः । 'वयाः' शाखाः वेतेः । वातायना भवन्ति ।
“शाखाः” खशयाः । शक्नोतेर्वा । अथ यस्यांगमादर्थ
पृथक्त्वमह विजायते न त्वौद्देशिकमिव विग्रहेण
पृथक्त्वात् स कर्मोपसंग्रहः । 'च'-इति । समुच्चयार्थः

६८ अ० १ पा० २ ख० ३ ।
उभाभ्यां संयुज्यते “अहं च त्वं च वृत्रहन्” इति ।
एतस्मिन्नेवार्थे “देवेभ्यश्च पितृभ्यश्चा”—इत्याकारः ।
‘वा’—इति विचारणार्थे । “हन्ताहं पृथिवीमिमां
निदधानीहवेह वा” इति । अथापि समुच्चयार्थे
भवति । “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा”—इति ॥ ३ ॥
अर्थ—(उदाहरण)—“वृक्षस्य नु ते पुरुहूतवयाः” (ऋ० मं० ४,
६, १७, ३) हे पुरुहूत ! इन्द्र ! तेरे न आनेसे हमारे यज्ञके मार्ग
वृक्षकी शाखाओंके समान खाली हैं । वया नाम शाखा का है। ‘वी’
धातुसे होताहै। (क्योंकि-) वे वायुके स्थान हैं। शाखा = जो आ-
काश मे शयन करें । अथवा ‘शक्लृ’ शक्तौ धातुसे है ॥ इति उप-
मार्था निपाताः ॥
अथ कर्मोपसंग्रहार्थक निपात । वाक्यमे उच्चारण किये हुयेके
समान समासमें जिसके अध्याहारसे अर्थका भेद जाना जावे वह
कर्मोपसंग्रह निपात होता है। जैसे-‘च’ । यही ‘च’ कभी कभी
समुच्चय अर्थमें अलग अलग दो अर्थोंके साथ संयुक्त हुआ बोला
जाता है। जैसे—“अहं च त्वंच वृत्रहन् ! [ ऋ० सं० ६, ४,
४१, ५] हे वृत्रहन् ! इन्द्र ! मैं और तू । इसी समुच्चय अर्थमें
[उदाहरण] “देवेभ्यश्च पितृभ्य आ” [ ऋ० सं० ७, ६, २२, १ ]
देवोके लिये और पितरोंके लिये । यहां ‘आ’ निपात, आता है।
‘वा’ यह संशय अर्थमें है। [जैसे-] हन्ताहं पृथिवीमिमां निद-
धानीहवेह वा” [ ऋ० सं० ८, ६, २७, ३] इसी समय मैं इस
पृथिवीको यहां रखूं या यहां ! इसके अतिरिक्त समुच्चय अर्थमें
भी है। [जैसे] “वायुर्वा त्वा मनुर्वा त्वा” [य-सं० ६, ७] हे अश्व !
वायुं तुझे और तुझे मनु ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त। ६६

'अह' इति च, 'ह' इति च, विनिग्रहार्थीयौ ।
पूर्वेण संप्रयुज्येते । 'अयमहेदं करोतु,' 'अयसिदम्' ।
'इदं ह करिष्यति, इदं न करिष्यति, इति । अथापि
'उकार' एतस्मिन्नेवार्थे। उत्तरेण । 'मृषा इमे वदन्ति,
'सत्यमु ते वदन्ति, इति । अथापि पद-पूरणः ।
'इदमु' 'तदु' । 'हि' इत्येषः अनेक-कर्मा । 'इदं
हि करिष्यति'—इति हेत्वपदेशे । 'कथं हि
करिष्यति' इति अनुपृष्टे । 'कथं हि व्याकरिष्यति'
इति असूयायाम् । 'किल' इति विद्या-प्रकर्षे ।
'एवं किल' इति । अथापि 'न' 'ननु' इत्येताभ्यां
संप्रयुज्यते । अनुपृष्टे—'न किल एवम्' । 'ननु किल
एवम्' 'मा' इति प्रतिषेधे । 'मा कार्षीः ।' 'मा-
हार्षीः'—इति च । 'खलुक्त्वा' । 'खलुकृतम्' ।
अथापि पदपूरणे । 'एवं खलु तद् बभूव' इति ।
'शश्वत्' इति विचिकित्सार्थीयो भाषायाम् ।
'शश्वदेवम्' इति अनुपृष्टे । 'एवं शश्वत्, इति
अस्वयं पृष्टे । 'नूनम्' इति विचिकित्सार्थीयो
भाषायाम् । उभयमन्वध्यायम् । विचिकित्सार्थी
यश्च पदपूरणश्च । 'अगस्त्य इन्द्राय हविर्निरूप्य

७० अ० १ पा० २ ख० ४ ।
मरुद्भ्यः संप्रदित्सांचक्रे-कार स इन्द्र एत्य
परिदेवयाञ्चक्रे ॥ ४ ॥
अर्थ—'अह' और 'ह' विनिग्रह अर्थ में हैं [स्वभाव] [प्रस्तुत दो
वाक्योंमें] पूर्व [वाक्यगत अर्थ] के साथ संयुक्त होकर बोले जाते हैं।
[जैसे] 'अयमह इदं करोतु' = यह १ यह २ करे । 'अयमिदम्' =
यह ३ यह ४ करे। 'इदं ह करिष्यति,' 'इदं न करिष्यति' । [यज्ञ-
दत्त ] यह करेगा, यह न करेगा [ओदन न पकावेगा] । और
उकार भी इसी [विनिग्रह] अर्थ में हैं। [स्वभाव] दूसरे वाक्य-
गत अर्थके साथ संयुक्त होकर बोला जाता है। [जैसे-] 'मृषा
इमे वदन्ति' = ये झूठ बोलते है। 'सत्यमु ते वदन्ति' = वे सच
बोलते हैं। और पद-पूरण अर्थमें भी है। 'इदमु' [ऋ० सं०
३, ८, २, १] = यह। 'तदु' [ऋ० सं० १, ५, २, १] =
वह। 'हि' यह अनेकार्थ है। [जैसे] 'इदं हि करिष्यति' =
'यह करेगा ? । यह हेतुके अस्वीकारमें। 'कथ हि करिष्यति' =
कैसे करेगा ? । यह दुबारा प्रश्नमे । 'कथं हि व्याक-
रिष्यति' = कैसे व्याख्या करेगा ? । यह निन्दामें। 'किल'
यह विज्ञानके आधिक्यमें । [जैसे—कोई दूसरेसे सुनकर उसे
बहुत निश्चय कर दूसरेसे कहता है-] "एवं किल" = ऐसे ही
[यह युद्ध हुआ]। और 'न' 'ननु' इन दोनोंके साथ संयुक्त
होकर भी बोला जाता है। दुबारा प्रश्नमें। [किसी बातको
दूसरेसे सुनकर, कि—'यह ऐसा नहीं', फिर दूसरेसे पूछता है,
और उसपर भी श्रद्धा न करके फिर प्रथम पुरुषसे ही पूछता है।-]
'न किल एवम्' = ऐसा नहीं है ? 'ननु किल एवम्' = ऐसा नहीं
है। 'मा' यह प्रतिषेध अर्थमें है। [जैसे-] 'मा कार्षीः' = मत
० १—यज्ञदत्त। २—गौओको पिलावे। ३—देवदत्त। ४—भोजन करे।

हिन्दी निरुक्त । ७१
कर । और 'माहार्षीः' = मत लेजा । और 'खलु' यह [ प्रतिषेध
अर्थमें ] । [ जैसे-] 'खलु कृत्वा' = न करके । 'खलु कृतम्' = नहीं
किया । और पद-पूरण अर्थमे भी । 'एवं खलु तद् बभूव' = ऐसे
वह हुआ । 'शश्वत्'—यह संशय अर्थमें लोकमे आता है ।
[ वेदमे अन्य अन्य अर्थोमे भी यथा-संभव देखना चाहिये-]
'शश्वदेवम् = ऐसे ? । यह दोबारा प्रश्नमें । 'एवं शश्वत् ? = यह
विना अपने पूछे । 'नूनम्'—यह संशय अर्थमें लोकमें । वेदमें
दोनो अर्थोमें । संशय अर्थमें, और पदपूरण अर्थमें । [ उदाहरण
की भूमिका ] अगस्त्यने इन्द्रके लिये हवि निर्वाप या घाल कर
दूसरे देवताको देना विचारा, उस इन्द्रने आकर क्रोधपूर्वक
विलाप किया ।
इति द्वितीयः पादः ।
――――
तृतीय पाद ।
( खं०-१ )
“न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् ।
अन्यस्य चित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं विनश्यति ॥
न नूनमस्ति अद्यतनम्, नो एव श्वस्तनम् । 'अद्य'
अस्मिन्द्यवि । 'द्युः' इति अन्हो नामधेयम्, द्योतते
इति सत्ः । 'श्वः' उपाशंसनीयः कालः । 'ह्य'
हीनः कालः । “कस्तद्वेद यदद्भुतम्” । कस्तद्वेद
यदभूतम् । इदमपि इतरत् 'अद्भुतम्'—अभूतमिव ।

भवति । जरिता गरिता । दक्षिणा मघोनो = मघवती ।
‘मघम्’ इति धन नामधेयम् । मंहतेर्दानकर्मणः ।
‘दक्षिणा’ दक्षतेः समर्द्धयति कर्मणः । व्यृद्धं समर्द्ध-
यति,-इति । अपिवा प्रदक्षिणा गमनात् । दिशमभि
प्रेत्य,-दिक् । हस्तप्रकृतिः । दक्षिणोहस्तो दक्षतेरुत्साह
कर्मणः, दाशतेर्वा स्याद्दानकर्मणः । हस्तो हन्तेः । प्राशु
ईं नने । देहि स्तोतृभ्यः कामान् माऽस्मानविदोंहो,
माऽस्मानतिहायदाः । भगो नो अस्तु । बृहद् वदेम स्वे
वेदने । भगो भजतेः । ‘बृहत्’ इति महतो नामधेयम् ।
परिवृढं भवति । वीरवन्तः, कल्याणवीरा वा । वीरः =
वीरयति अमित्रान् । वेतेर्वा स्याद् गति-कर्मणः । वीरयते
र्वा । ‘सीम्’ इति परिग्रहार्थीयो वा पदपूरणो वा ।
“प्रसीमादित्यो असृजत्” । प्रासृजत्-इतिवा । प्रासृजत्
सर्वतः,-इति वा । “विसीमेतः सुरुचो वेन आवः इति
च । व्यवृणोत् सर्वतः आदित्यः । सुरुचः आदित्यरश्मयः
सुरोचनात् । अपि वा ‘सीम’ [ सीमा ] इत्ये-
तदर्थकसमुपदस्माद्दृश्येत पञ्चमीकर्माणम् । सीम्नः,
सीमतः, सीमातः मर्यादतः । सीमा मर्यादा । विसौ-
व्यतिदेशौ-इति । ‘त्व’ इति विनिग्रहार्थीयं सर्वनाम,
अनुदात्तम् । अर्द्धनाम-इत्येके ॥ २ ॥
१०

७४ अ० १ पा० ३ ख० २ ।
अर्थ—“नूनं सा०” [ ऋ० सं० २, ६, ६, ६ ] ‘नूनम्’ पदपूरण
या अनर्थक है। हे इन्द्र ! वह दक्षिणा, जो तेरे पुत्रके उत्पन्न करने
वाले कर्ममें हिरण्य आदि धन युक्त है, स्तुति करनेवाले [ यजमान ]
के लिये वर दे, स्तोताओ [ ऋत्विजों ] के लिये कामनाओंको दे,
हमें छोड़कर औरोंको न दे, हमारे पास धन हो, हम यज्ञ और
घरमें बडे वचन बोलें, हम अपुत्रताकी अवस्था में पुत्रवाले हों और
पुत्रवत्ताकी अवस्था मे वीर पुत्रवाले हों । [ खण्डार्थ ] वह तेरे
यजमानके लिये वर दुहे । [ प्रतिपदार्थ ] ‘वर’ नाम चाहने योग्य
वस्तुका है । ‘जरितृ’ नाम स्तुति करनेवालेका है । दक्षिणा जो
धन संयुक्त हो । मघोनी नाम मघवती और मघवती नाम धनवती
का है । ‘मघ’ नाम धनका है। दानार्थक ‘मंह’ धातुसे होता है ।
‘दक्षिणा’ समृद्धि अर्थवाले ‘दक्ष’ धातु से होता है । वह द्रव्य हीनको
आढ्य या समृद्ध बना देती है । अथवा दाहिनी ओरसे आनेके कारण
दक्षिणा है । दिशाके अभिप्रायसे दिशा दक्षिणा है । वह हस्तसे
उत्पन्न हुई है। [ पूर्वको मुख किये हुये प्रजापतिका जो दाहिना हाथ
हुआ वही दक्षिण दिशा होगई ] ‘दक्षिण’ जो हस्तका नामहै उत्सा-
हार्थक ‘दक्ष’ धातुसे या दान अर्थ मे ‘दाश’ धातुसे बनता है । ‘हस्त’
‘हन्’ धातुसे बनता है । वह हनन या मारने में शीघ्र है । [खण्डार्थ]
“देहि स्तोतृभ्यः कामान्” स्तुति करनेवालोंको उनके कामोंको दे ।
“मा अस्मान् अतिदंहीः” हमें छोड़कर मत दे । हमको धन मिले ।
हम अपने घर और यज्ञमें बडे वचन कहें । ‘भग’ ‘भज’ धातुसे
होता है । ‘बृहत्’ यह बड़े का नामहै । वह सब ओर बढ़ा हुआ होता
है । वीरवाले अथवा अच्छे वीरवाले । ‘वीर’ जो शत्रुओंको बहुत
प्रकारसे मारता है । अथवा गति अर्थवाले ‘वी’ धातुसे बनता है ।
[ क्योंकि-वह शत्रुओंके साम्हने जाता है ] अथवा ‘वीर’ धातुसे
बनता है । ‘सोम्’ यह परिग्रह अर्थमें है, अथवा पदपूरण है । [जैसे]

हिन्दी निरुक्त। ७५
“प्रसीमादित्यो असृजत्” [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] [‘सीम’ के
अनर्थक पक्षमें-] सूर्यने अपनी किरणोंको फैलाया। [परिग्रह अर्थमे]
सब ओरसे फैलाया। [और जैसे] “विसीमतः सुरुचो वेन आवः”
[य० वा० सं० १३, ३] [सा० सं० ४, ३, ६] मेधावी [आदित्यने]
अच्छे प्रकाशवाली किरणोंको सब ओर फैलाया। फैलाया सब
ओरसे आदित्यने] 'सुरुच्' नाम आदित्यकी किरणोंका है, क्योंकि
वे अच्छा प्रकाश फैलाती है। अथवा जो अनर्थक लगा हुआ
'सीम्' के रूपमे कहा गया है, वह सन्धिके भेदसे 'सीम'
शब्द मानना चाहिये और उसके आगे 'तः' यह प्रत्यय
पंचमी विभक्तिका अर्थ देता है। [जिससे] सीमसे, सीमासे,
मर्यादासे [अर्थ होता है] 'सीमा' नाम मर्यादाका है। क्योंकि
वह दो देशोंको अलग करती है। 'त्व' यह विनिग्रह अर्थ मे सर्व-
नाम और अनुदात्त। आधेका नाम है,—ऐसा कोई मानते
हैं॥२॥
“ऋचामुत्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो
गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां
यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत त्वः” ॥ इति ऋत्वि-
क्कर्मणां विनियोगमाचष्टे । ऋचामेकः पोषमास्ते
पुपुष्वान् होता । ऋक् = अर्चनी । गायत्रमेको
गायति शक्वरोषु उद्गाता । गायत्रं गायतै स्तुति-
कर्मणः । “शक्वर्यः ऋचः शक्नोतेः । तद् यदाभि
वृत्रमशकदद्धन्तुं तत् शक्करीणां शक्करीत्वम्”

७६ अ० १ पा० ३ ख० ३।
इति विज्ञायते। ब्रह्मा एको जाते जाते विद्यां
वदति। ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं वेदितुमर्हति।
ब्रह्मा = परिवृळ्हः (परिवृढः) श्रुततः। ब्रह्म परि-
वृळ्हं [परिवृढं] सर्वतः। यज्ञस्य मात्रां विमिमीते
एकोऽध्वर्युः। अध्वर्युः = अध्वरयुः = अध्वरं युनक्ति,
अध्वरस्य नेता, अध्वरं कामयते,—इति वा।
अपि वा अधीयाने 'युः' उपबन्धः। 'अध्वरः'—
इति यज्ञनाम। ध्वरति हिंसा-कर्मा, तत्प्रति-
षेधः॥ [त्व' इति] निपातः, इत्येके। तत्कथमनु-
दात्तप्रकृति नाम स्यात्?। द्रष्टव्यं तु भवति।
“उत त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहुः” इति द्वितीया-
याम्। “उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे” इति चतुर्थ्याम्।
अथापि प्रथमा-बहुवचने॥ ३॥
अर्थ—“ऋचां त्वः”० [ऋ० सं० ८, २, २४, ५]॥ यह ऋचा
ऋत्विजोंके कर्मोंके विनियोगको कहती है। इन चार बड़े
ऋत्वजोंमेंसे एक होता ऋत्विज् ऋचाओंकी पुष्टिको करता हुआ
रहता है। [ऋचाओकी यही पुष्टि है, कि—‘उनका देवताओंके
यथार्थ भावके चिन्तन, मर्मस्थानके युक्त रखने और प्रयत्नके साथ
अध्ययन करना।] ऋच् = जिसके द्वारा अर्चन किया जावे] एक
उद्गाता ऋत्विज् गायत्र या सामको गान करता है। [यह
उसका नियत कर्म है।] 'गायत्र शब्द स्तुत्यर्थक 'गै' (भ्वा० प०)

[Header] हिन्दी निरुक्त । ७७

धातुसे बनता है। 'शक्वरी' ऋचाका नाम है ('शक्' धातुसे
बनता है। यह बात ब्राह्मणमें भी जानी गई है,-कि जो [इन्द्र] इनके
द्वारा वृत्रको मार सका,—यही शक्वरी ऋचाओंमें शक्करीपन है।
एक ब्रह्मा ऋत्विज् जब जब प्रायश्चित्त प्राप्त होता है, अन्य ऋत्वि-
जोंके लिये अपने विज्ञानको कहता है। [क्योंकि—ब्रह्मा सब विद्या-
ओंवाला है, इससे सबको जानने योग्य है। ब्रह्मा सब प्रका-
रसे ज्ञान या श्रवणसे पूर्ण है। ब्रह्म (वेद) (न० लिं०) सब ओरसे
परिपूर्ण है। और एक अध्वर्यु ऋत्विज् यज्ञको नाना प्रकारकी
इतिकर्त्तव्यताको करता है। 'अध्वर्यु' नाम अध्वरयुका है, जो
अध्वरको जोड़ता है, या अध्वरको समाप्ति तक ले जाता है, या
अध्वरको करनेकी कामना करता है। अथवा 'अध्वर' शब्दमें
अध्ययन करनेवाले अर्थ में 'यु' यह उपबन्ध वा प्रत्यय होता है।
[जिससे 'अध्वरयु' नाम अध्वरके पढ़नेवालेका होता है।] 'अध्वर'
नाम यज्ञका है। 'ध्वृ' धातुका हिंसा अर्थ है, उसीके निषेध
का नाम 'अध्वर' है॥ कोई आचार्य 'त्व' शब्दको निपात बताते
हैं। [आक्षेप] यदि निपात है, तो अनुदात्तस्वर नाम कैसे
होगा ? [नहीं होगा]। प्रयोजन यह कि नाम माननेमें ही “फिषो-
ऽन्त उदात्तः” [फि० १। २] प्रातिपदिकका अन्त उदात्त होता है।
इस सूत्रके अपवाद “त्व त्वत्-सम-सिमेत्यनुच्चानि” [फि० ४, ६
त्वत्, त्व, सम और सिम ये शब्द अनुदात्त होते हैं,—इस सूत्रसे
'त्व' शब्द अनुदात्त सिद्ध होता है, जैसा कि होना चाहिये
और निपात माननेमें “निपाता आद्युदात्ताः” [फि० ४, ११] निपा-
तोंका पहिला स्वर उदात्त होता है,—इस सूत्रके अनुसार उदात्त
ही रहेगा। दूसरे, विभक्तियोंके साथ इसमें विकार देखा जाता
है, जो कि निपातोंमें सर्वथा नहीं है, इससे भी यह [त्व] नाम
ही सिद्ध होता है। [जैसे] द्वितीया विभक्तिके एक वचनमें “उत्

७८ अ० १ पा० ३ ख० ४ ॥
त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहुः”—[ऋ० सं०, ८, २, २३. ५,] वेदार्थ के
जाननेको सत्यलोकका स्थिरनिवासी कहते हैं। चतुर्थीके एक वच-
नमें “उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे” [ऋ० सं० ८, २, २३, ४]
वाणी एक अर्थज्ञके लिये अपने शरीरको प्रकाशित करती है।
और प्रथमाके बहु वचनमें ॥ ३ ॥
(खं० ४)
“अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा
बभूवुः। आदघ्नास उपकक्षास उत्वे ह्रदा इव
स्नात्वा उत्वे ददृश्रे ।” अक्षिमन्तः कर्णवन्तः
सखायः । 'अक्षि'चष्टेः । अनक्तेः इति आग्रायणः ।
तस्मादेते व्यक्ततरे इव भवत इति ह विज्ञायते ।
:'कर्णः' कृन्ततेः । निकृत्तद्वारो भवति । ऋच्छतेः
इति आग्रायणः । ऋच्छन्तीव खे उदगन्तामिति
ह विज्ञायते । मनसां प्रजवेष्वसमा बभूवुः। आस्य-
दघ्ना अपरे । उपकक्ष-दघ्ना अपरे । 'आस्यम्'-
अस्यते । आस्यन्दते एनत् अन्नम्—इति वा । दघ्नं
दध्यतेः स्रवति-कर्मणः । दस्यतेर्वा स्यात् । विदस्त-
तरं भवति । प्रस्नेया ह्रदा इव एके । प्रस्नेया
ददृशिरे स्नानार्हाः । 'ह्रदाः' ह्रदतेः शब्द-कर्मणः ।

हिन्दी निरुक्त । ७१
ह्रादतेर्वा स्यात् शीतीभाव-कर्मणः । अथापि समु-
च्चयार्थे भवति ॥ ४ ॥
• अर्थ—“अक्षण्वन्तः” [ ऋ० सं० ८, २, ३४, २ ] [१म पादार्थ-]
(सभी मनुष्य) आँखवाले, कानवाले या समान इन्द्रियवाले और
समान शास्त्रोंमें श्रम किये हुये हैं। [ एक पद निरुक्त-] 'अक्षि'
दर्शनार्थ 'चक्ष्' (अ० आ०) धातुसे बनता है। व्यक्ति अर्थवाले
'अञ्ज्' (रु० प०) धातुसे होता है,—यह आग्रायण आचार्य मानते
हैं। जिस कारण कि ये और अङ्गोंसे अधिक स्पष्ट या प्रकाशंतर
हैं [क्योंकि—रात्रिको विचरनेवाले जन्तुओंके ये अन्धकारमें भी
दिखाई देते हैं ] इसीसे इनका 'अक्षि'-यह नाम है,-यह ब्राह्मणमें
जाना गया है। 'कर्ण' शब्द छेदनार्थक 'कृत्' धातुसे बनता है।
[क्योंकि-] इसका द्वार कटा हुआ होता है। 'ऋच्छ' धातुसे
होता है,—यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। [क्योंकि-] आकाश
में प्रकट हुए हुये शब्द इनकी ओर जाते हैं,-और ये भी उनके
सामने लेनेके लिये जाते हैं,-यह ब्राह्मणमें जाना गया है। [२य
पादार्थ-] [तो भी-] मनकी दौड़ या कल्पनामें बराबर नहीं होते
हैं। [३य पादार्थ-] [किन्तु] कोई विद्वान् कल्पनामें मुखके
बराबर भरे हुये पानी वाले तडागके समान हैं। और कोई काखके
बराबर भरे हुये तडागके समान हैं। [एक पद निरुक्त-] 'आस्य'
शब्द असु क्षेपणे धातुसे बनता है [क्योंकि-इसके सामने अन्न
फेंका जाता है।] अथवा ['स्यन्दू प्रस्रवणे धातुसे ।] [क्योंकि-]
अन्न इसे गीला कर देता है। अर्थात् सूखा अन्न आने पर भी यह
लाल छोड़ता है, जिससे कि—गीला हुआ अन्न खाया जासके।
'दघ्न' शब्द स्रवण या झरने अर्थमें 'दघ्' धातुसे बनता है।
[क्योंकि—अगले परिमाणसे अधिक बहा हुआ होता है।] अथवा

८० अ० १ पा० ३ ख० ५ ।
क्षयार्थक 'दस्' धातुसे होता है। [क्योंकि-उत्तर परिभाषणसे]
अधिक क्षीण होता है। [४र्थ पादार्थ-] कोई विद्वान् विज्ञानमें
अगाध जलवाले तड़ागके समान देखे जाते हैं। [एक पद
निरुक्त] ["स्नात्वा"] 'प्रस्नेय नाम स्नान योग्यका है। 'ह्रद'
शब्द शब्दार्थक ह्रद् धातुसे बनता है। [क्योंकि-यह ताड़न किया
हुआ शब्दको करता है।] अथवा शीतीभाव या ठंडक
अर्थवाले 'ह्लाद्' धातुसे बनता है। [क्योंकि-वह ग्रीष्ममें भी
ठंडा ही रहता है।] और 'त्वत्' यह अन्य निपात समुच्चय अर्थमें
होता है॥ ४॥
विशेष-'ददृशिरे' यह पद मन्त्रगत "ददृश्रे" की व्याख्या है,
निरुक्तमें 'प्रस्नेयाः' पदके आगे किसी समय किसी लेखकके प्रमाद
से एक पद निरुक्तमें आगिरा हुआ प्रतीत होता है, यह चतुर्थ पादकी
व्याख्यामें 'एके' पदके साम्हने चाहिये। ऐसा होनेसे ही दोनों
स्थान ठीक होजाते हैं।
(ख० ५)
“पर्याया इव त्वदाश्विनम्। आश्विनञ्चपर्या-
याश्चः इति। अथ ये प्रवृत्तेऽर्थेऽमिताक्षरेषु ग्रन्थेषु
वाक्यपूरणा आगच्छन्ति पदपूरणा स्ते मिताक्षरेष्व्
अनर्थकाः। 'कम्' 'ईम्' 'इत्' 'उ' इति।
“निष्टृ॒ वक्त्रासँश्चिदिन्नरो भूरितो॑ वृकादिव। विभ्य-
स्यन्तो ववाशिरे शिशिरं जीवनाय कम्”॥ शिशिरं
शृणातेः। शम्नातेर्वा “एमेनं सृजता सुते।” आशु-

  • जतैनं सुते। तमिद्वर्द्धन्तु नो गिरः।” स्तुतयो

हिन्दी निरुक्त । ८१
गिरः । गृणातेः । “अयमुते समतसि” । अयं ते
समतसि इवोऽपि दृश्यते ॥ ५ ॥
॰ [जैसे] “पर्याया इव त्वदाश्विनम्” [ऋ० प्रा० १२, १०] आश्विन
और पर्याय। यहांसे पदपूरण निपात हैं। गद्य ग्रन्थोंमें जो
निपात अन्य पदोंसे ही अर्थ पूरा होनेपर वाक्यकी पूर्त्तिके लिये
आते हैं, वे ही पद्य ग्रन्थोंमें पदपूरण होते हैं। दोनों ही स्थलोंमें
अनर्थक होते हैं। [कौन] ‘कम्’ ‘ईम्’ ‘इत्’ ‘उ’ ये चार निपात।
[जैसे ‘कम्’] “निष्ठूक्त्रासः”००० कम्” [ ] वस्त्रोंसे रहित
बहुत सन्तानवाले कोई दरिद्र मनुष्य हेमन्त ऋतुमें भेड़ियेके
समान जाड़ेसे डरते हुए ऐसा पुकारते थे, कि ‘शिशिर ऋतु
हमारे जीवनके लिये आता है।’ [क्योंकि उसमें शीत कम होता
है, इससे उसमें हम सुखसे जीवेंगे।] शिशिर ऋतु जीवनके अर्थ
होता है। [क्योंकि उसमें शरद् ऋतुके बहुत धान्य पैदा होते
हैं। ‘शिशिर’ शब्द ‘शृ’ हिंसायाम् धातुसे होता है। अथवा
‘शम्’ हिंसार्थक धातुसे बनता है। [क्योंकि उस कालमें निर्विघ्न
होकर दावानल या वनका अग्नि सूखे ओषधि और वनस्पतियोंको
जला देता है। [ईम्] “एमेनम्०” [ऋ० सं० १, १, १७, २] हे
अध्वर्युओ ! सोमके निचूड़ जानेपर इसे उक्थ पात्र और चमस
पात्रोंसे तैयार करो। [इत्] “तमिद् वर्द्धन्तु नो गिरः” [ऋ० सं०
७, १, २०, ५] हमारी वाणियें उस सोमको वीर्ययुक्त करें।
‘गिर्’ नाम स्तुतिका है। [उ] “अयमु ते समतसि” [ऋ० सं० १,
२, २८, ४] हे इन्द्र ! यह तेरा सोम है, जिसके लिये तू नित्य गिरता
है। और ‘इव’ भी कभी अनर्थक आता है ॥ ५ ॥
११

८२ अ० १ पा० ३ खं० ६ ।
(मं० ३)
“सुविदुरिव” । “सुविज्ञायेते इव । अथापि
'न' इत्येषः, 'इत्' इत्येतेन संप्रयुज्यते परिभये ।
“हविर्भिरिके स्वरितः सचन्ते सुन्वन्त एके सवनेषु
सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभिर्नेज्जिह्मा-
यन्त्यो नरकं पताम” इति । नरकं = न्यरकं =
नीचैर्गमनम् । नास्मिन् रमणं स्थानमल्पमप्यस्ति,
इति वा । अथापि 'न च' इत्येषः 'इत्' इत्येतेन
संप्रयुज्यते अनुपृष्टे । “नचेत् सुरां पिबन्ति” इति ।
सुरा सुनोतेः । एवम् उच्चावचेषु अर्थेषु निपतन्ति,
ते उपेक्षितव्याः ॥ ६ ॥
इति तृतीयः पादः ।
अर्थ—ब्राह्मण यज्ञको अच्छे प्रकार जानते हैं। ब्राह्मणोंसे
यज्ञ और नक्षत्र भले प्रकार जाने गये हैं। यहांसे [निपात समा-
हार है।] 'न' यह 'इत्—इसके साथ सब ओरसे भय अर्थमें बोला
जाता है। [जैसे] “हविर्भिः”—कोई मनुष्य इस लोकसे हवि-
योंके दानसे स्वर्गको जाते हैं, कोई मनुष्य यज्ञोंमें सोमोके अभि-
षवण कर्मको करते हुये, कोई स्तुतियोंसे देवताओंको प्रसन्न करते
हुये और कोई दक्षिणाओंसे स्वर्गको जाते हैं। [यदि हम पति-
योंसे भी धोका करें, जिस अवस्थामें कि स्त्रियोंको यज्ञ आदि
कर्मका अधिकार नहीं है तो निरुपाय होकर, नरकमें गिरें ]
'नरक' नाम न्यरक अर्थात् नीचेको जाना या अधोगतिका है।

॥ हिन्दी निरुक्त । ८३
अथवा इसमें थोडा भी रमण स्थान नहीं है। और 'न च' यह
'इत्' इसके साथ अनुप्रश्न [दुबारा प्रश्न]में बोला जाता । [जैसे]
“नचेत् सुरां पिबन्ति”। जो नहीं सुरा [मदिरा] पीते हुए होते ।
[कोई किसीसे पूछता है—'हैं शुद्र ? उत्तर—हैं । फिर प्रश्न—
यदि हैं तो क्यो नहीं आते ? फिर उत्तर—'नचेत् सुरां पिवन्ति' यदि
सुरा न पीते हुये होते तो आजाते ।
इस प्रकार विविध अर्थोंमें निपात गिरते हैं, सो देखने
चाहिये ॥ ६ ॥
इति तृतीयः पादः ॥
द्वितीयपादकी विशेष व्याख्या ।
अथ निपाताः ।
उपमार्थकाः १—इव ( १ ) न ( २ ) चित् ( ३ ) नु ( ४ ) कर्मोप-
सङ्ग्रहार्थाः २—च( १ ) आ ( २ ) वा ( ३ ) अह ( ४ ) ह ( ५ ) उ (६)
हि ( ७ ) किल ( ८ ) [ निपात-समाहारौ—न किल, न-नु, किल ]
मा ( ६ ) खलु ( १० ) शश्वत् ( ११ ) नूनम् ( १२ ) सीम् १३ सीमा
( १४ ) त्व ( १५ ) त्वत् ( १६ ) कम् ( १७ ) ईम् ( १८ ) इत् ( १६ )
उ ( २० ) इव ( २१ ) [ निपात-समाहारौ ]-नेत्-[ न-इत् ] नचेत्,-
[ न-च-इत् ] पद-पूरणाः ३—कम् ( १ ) ईम् ( २ ) इत् ( ३ ) उ ( ४ )
[ कदाचित् ]-इव ( ५ )
प्रथमः खण्डः ।
( १ )—उपमार्थक-निपात ।
इव, न चित् और नु ये चार निपात उपमार्थक हैं। ये चारों
प्रायः अर्थवान् होते हैं, निरर्थक कहीं ही आते होंगे ।