निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ अ० १ पा० ३ ख० ३।
इति विज्ञायते। ब्रह्मा एको जाते जाते विद्यां
वदति। ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं वेदितुमर्हति।
ब्रह्मा = परिवृळ्हः (परिवृढः) श्रुततः। ब्रह्म परि-
वृळ्हं [परिवृढं] सर्वतः। यज्ञस्य मात्रां विमिमीते
एकोऽध्वर्युः। अध्वर्युः = अध्वरयुः = अध्वरं युनक्ति,
अध्वरस्य नेता, अध्वरं कामयते,—इति वा।
अपि वा अधीयाने 'युः' उपबन्धः। 'अध्वरः'—
इति यज्ञनाम। ध्वरति हिंसा-कर्मा, तत्प्रति-
षेधः॥ [त्व' इति] निपातः, इत्येके। तत्कथमनु-
दात्तप्रकृति नाम स्यात्?। द्रष्टव्यं तु भवति।
“उत त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहुः” इति द्वितीया-
याम्। “उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे” इति चतुर्थ्याम्।
अथापि प्रथमा-बहुवचने॥ ३॥
अर्थ—“ऋचां त्वः”० [ऋ० सं० ८, २, २४, ५]॥ यह ऋचा
ऋत्विजोंके कर्मोंके विनियोगको कहती है। इन चार बड़े
ऋत्वजोंमेंसे एक होता ऋत्विज् ऋचाओंकी पुष्टिको करता हुआ
रहता है। [ऋचाओकी यही पुष्टि है, कि—‘उनका देवताओंके
यथार्थ भावके चिन्तन, मर्मस्थानके युक्त रखने और प्रयत्नके साथ
अध्ययन करना।] ऋच् = जिसके द्वारा अर्चन किया जावे] एक
उद्गाता ऋत्विज् गायत्र या सामको गान करता है। [यह
उसका नियत कर्म है।] 'गायत्र शब्द स्तुत्यर्थक 'गै' (भ्वा० प०)