निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ अ० १ पा० ३ खं० ६ ।
(मं० ३)
“सुविदुरिव” । “सुविज्ञायेते इव । अथापि
'न' इत्येषः, 'इत्' इत्येतेन संप्रयुज्यते परिभये ।
“हविर्भिरिके स्वरितः सचन्ते सुन्वन्त एके सवनेषु
सोमान् । शचीर्मदन्त उत दक्षिणाभिर्नेज्जिह्मा-
यन्त्यो नरकं पताम” इति । नरकं = न्यरकं =
नीचैर्गमनम् । नास्मिन् रमणं स्थानमल्पमप्यस्ति,
इति वा । अथापि 'न च' इत्येषः 'इत्' इत्येतेन
संप्रयुज्यते अनुपृष्टे । “नचेत् सुरां पिबन्ति” इति ।
सुरा सुनोतेः । एवम् उच्चावचेषु अर्थेषु निपतन्ति,
ते उपेक्षितव्याः ॥ ६ ॥
इति तृतीयः पादः ।
अर्थ—ब्राह्मण यज्ञको अच्छे प्रकार जानते हैं। ब्राह्मणोंसे
यज्ञ और नक्षत्र भले प्रकार जाने गये हैं। यहांसे [निपात समा-
हार है।] 'न' यह 'इत्—इसके साथ सब ओरसे भय अर्थमें बोला
जाता है। [जैसे] “हविर्भिः”—कोई मनुष्य इस लोकसे हवि-
योंके दानसे स्वर्गको जाते हैं, कोई मनुष्य यज्ञोंमें सोमोके अभि-
षवण कर्मको करते हुये, कोई स्तुतियोंसे देवताओंको प्रसन्न करते
हुये और कोई दक्षिणाओंसे स्वर्गको जाते हैं। [यदि हम पति-
योंसे भी धोका करें, जिस अवस्थामें कि स्त्रियोंको यज्ञ आदि
कर्मका अधिकार नहीं है तो निरुपाय होकर, नरकमें गिरें ]
'नरक' नाम न्यरक अर्थात् नीचेको जाना या अधोगतिका है।