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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ४पा० ४ खं०
"अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः"
( ऋ० सं० ६, ३, ४५, ५ य० वा० सं० ३, ६१ )
"धनुष् को फैलाए हुए या उसकी कमान को झुकाए
हुये पिनाक धनुष् को हाथमें लिये हुये चर्म का वस्त्र पहिने
हुये" ये दो निगम हैं ।
व्याख्या ।
इन मन्त्रोंमें देवता अपने भक्तोंके यहां वस्त्र और शस्त्र
धारण करके उनकी रक्षाके निमित्त आते हुए दिखाई देते -
हैं । नये वैदिकों को भी सगुण देवताओंकी उपासना से लाभ
उठाना चाहिए ॥
'श्वघ्नी' (६८) यह अनवगत है । "कितवाभवति"यह अर्थका कथन
है । "श्व हन्ति" यह शब्द की व्युत्पत्ति है, किन्तु स्वहा (धन या अपने
का नाश करने वाला) यह युक्त है ।-
'श्वघ्नी' (६८) कितव (ज्वारिया) होता है । क्योंकि-
यह स्व (अपने का या धन) को हनन करता है । 'स्व' फिर
क्या ? 'आश्रित' क्यों ? स्वामी को अभिमुखता से श्रयण
(धारण) किये हुये होता है ।
"श्वघ्नी" (कितवः) ज्वारिया 'न' (इव) जैसे 'देवने' जूवे
के अड्डे में 'कृतम्' कृत को 'विचिनोति' ढूंढता है कि कैसे
किया हुआ हो, जिससे मैं जीतूँ ।
'कितव' क्यों ? 'किंतवास्ति' (क्या तेरा है ?) इस शब्द
का अनुकरण है । क्योंकि-वह नित्यकाल ही खेलने की इच्छा
करता हुआ अपने सामने खेलने वाले ज्वारियों से पूछता है
कि "किंतवास्ति" इस शब्द के आधार पर यह 'कितव'

शब्द होगया। अथवा ज्वारिए के मित्रगण यह आशिष् मांगते
रहते हैं कि- “किसी प्रकार यह “कृतवान्” (कृतकार्य) सफल
हो” इस आशिष् के निमित्त ( कारण ) से 'कृतवान्' शब्द से
'कितव' नाम होगया ॥
'समम्' ( ६६ ) यह परिग्रह ( सम्पूर्ण ) अर्थ में सर्वनाम
और अनुदात्त है।
( खं० ५ )
(निरु०) “मानः समस्य दूर्ह्यः१ परिद्वेषसो अंहतिः।
ऊर्मिर्न नावमावधीत् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, २५, ४ )
मानः सर्वस्य दुर्धियः पापधियः सर्वतोद्वेषसः
अंहतिः ऊर्मिः इव नावम्-आवधीत ।
'ऊर्मिः' ऊर्णोतेः । 'नौः' प्रणोत्तव्या भवति ।
नमतेर्वा ।
तत् कथम्-अनुदात्तप्रकृति नाम स्यात् ? दृष्ट-
व्ययंतु भवति ।
“उतोसमस्मिन्नाशिशीहि नो वसो” ( ऋ० सं०
६, २, २, ३) इति सप्तम्याम् । शिशीतिर्दानकर्मा ।
“उरुष्याणो अघायतः समस्मात्” ( य० वा० सं०
३, २६) । इति पञ्चम्याम् । उरुष्यतिः-अकर्मकः ।
अथापि प्रथमा बहुवचने- “नभन्तामन्यके समे”
( ऋ० सं० ६, ३, २६, १ ) ॥ ५ ( २३ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६४) ५ अ० ४ पा० ५ खं०
अर्थ:-“मानःसमस्य” यह ऋचा विरूप आङ्गिरस ऋषि
की है। गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । दशरात्र के तीसरे
अहन् (दिन) में प्रातःसवन में आज्य सूक्त में विनियुक्त है ॥
हे भगवन् ! अग्ने ! ‘नः’ हमको 'समस्य' ( सर्वस्य ) सब
‘दुर्घ्यः’ (दुर्धियः) दुष्ट बुद्धिवाले या ( पापधियः) पाप बुद्धि-
वाले ‘परि-द्वेषसः’ ( सर्वतो द्वेषसः = सर्वात्मना द्वेष्टुः ) सब
प्रकार द्वेष करने वाले शत्रु का 'अंहतिः' पाप ‘ऊर्मिः’ भाल
(लहर) नावम्’ नाव को ‘न’ ( इव ) जैसे 'मा’ मत ‘अवधीत्’
मारे ॥ इस प्रकार सभी दृष्टान्तों से वध अनिष्ट होनेके कारण
‘सम’ यह सर्व-नाम है।
‘ऊर्मि’ शब्द आच्छादन (ढांपने) अर्थमें ‘उर्णुञ्’ (अदा०
उ० ) धातु से है। क्योंकि वह तीर को अथवा जो और कुछ
जलके भीतर रहता है, उसे ढँकलेती है ।
‘नौ’ ( नाव ) क्यों ? वह पार जानेके अर्थ ‘प्रणोतव्या’ प्रेरणा
करने योग्य होती है । अथवा झुकने अर्थमें ‘नम्’ (भ्वा०प०)
धातु से है। क्योंकि वह पार जाने के लिये नत ( झुकी हुई
या नम्र ) जैसी रहती है ।
वह ( 'सम' शब्द, जिसका उल्लेख पूर्व खण्ड के अन्त में
हो चुका है ) कैसे अनुदात्त प्रकृति या अनुदात्त स्वभाव या
अनुदात्तस्वरवाला ( होकर ) नाम हो या होसकता है ?
क्योंकि-दृष्टव्यय है = इस में विकार देखागया है ( इससे
यह नाम ही है, किन्तु निपात नहीं ) ।
“उतो समस्मिन्” अर्थात्-‘उतो’ और हे ‘वसो !’
धनवान् इन्द्र ! ‘समस्मिन्’ ( सर्वस्मिन् ) सब (काल) में ‘नः’

हिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ४पा० ६ खं०
इमें 'आशिशीहि' वाञ्छित दे । यहां 'समस्मिन्' सप्तमी में है ।
'शिशीति' धातु दानार्थक है ।
“ उरुष्याणो ” अर्थात्—'नः' हमें'उरुष्य' पास आकर
'समस्मात्' सब 'अघायतः' पाप चाहने वाले से रक्षा कर ।
यहां ' समस्मात् ' यह पञ्चमी में है । ' उरुष्यति ' धातु
अकर्मक है ।
और प्रथमो विभक्ति के बहुवचन में भी है—
“ नभन्तामन्यके समे ” अर्थात्-और सब नहीं
यहां 'समे' यह प्रथमा के बहुवचन का रूप है । ( निरु० अ०
१० पा० १ खंड ५ ) ५ ( २३ ) ॥
( खं० ६ )
[निघ०-] कुटस्य ॥७०॥ चर्षणिः॥७१॥
शंबः ॥ ७२ ॥ केपयः ॥ ७३ ॥
(निरु०-) “हविषा जारो अपां पिपर्त्ति पपुरिर्नरा ॥
पिता कुटस्य चर्षणिः ॥ ” ( ऋ० सं०१,३,३३,४ )
हविषा अपां जरयिता ॥
'पिपर्त्ति' 'पपुरिः'-इति पृणातिनिगमो वा
प्रीणातिनिगमो वा । पिताकृतस्य कर्मणः चायिता
आदित्यः ॥
‘ शम्ब ’ इति वज्रनाम । शमयते र्वा । शात-
यते र्वा ॥
“ उग्रोयः शम्बः पुरुहूततेन ” ( ऋ०सं०७,८,

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
२३, २) इत्यपि निगमो भवति ॥
'केपयः' कपूया भवन्ति । 'कपूयम्'-इति
पुनातिकर्म कुत्सितम् । दुष्पूयं भवति ॥६ (२४) ॥
'कुटस्य' (७०) 'चर्षणिः' (७१) ये दो पद अनवगत हैं। 'कृतम्य'
(किये हुएका) (७० 'चायिता' (द्रष्ट=देखने वाला) (७१) ये उनकी शब्द-
समाधियें हैं। दोनों का एक ही निगम है।—
“हविषा जारो” यह ऋचा प्रस्कण्व ऋषि की है। अश्विनन् देवता
है। प्रातग्नुवाक और आश्विन में शस्त्र है।
अर्थः—'नरा' (नरौ') हे नरों ! अश्विनों ! यह
आदित्य 'पिता' सब जगत् की रक्षा करने वाला है। 'कुटस्य'
(कृतस्य) सब संसार के किये हुये अच्छे बुरे कर्मों का
'चर्षणिः' (चायिता) देखने वाला है। 'अपाम्' सब भूतों के
भीतर विद्यमान जलों का प्राण रूप से अवस्थित हो कर
'जारः' (जरयिता) सुखाने वाला है। 'पपुरिः' समय आने
पर पूरने वाला 'हविषा' (उदकेन) जल से 'पिपर्त्ति' पूरता
है या तृप्त करता है। अर्थात् 'जो तुम दोनों ऐसे गुण वाले
आदित्य देव से पूरे जाते हो या तृप्त किये जाते हो, सो तुम
दोनों हमारी आशिषा (प्रार्थना) को बढ़ाओ या पूरी करो'
ऐसे यहां आशिषा जोड़ लेना होता है। इस प्रकार 'कुट'
शब्द का कृत और 'चर्षणि' का चायिता (द्रष्टा) अर्थ
उपपन्न होता है॥
'पिपर्त्ति' और 'पपुरिः' ये निगम के दोनों शब्द 'पूरयति'
(पूरण करता है) अर्थ में हैं अथवा 'प्रीणायति' (तृप्त या
प्रसन्न करता है) अर्थ में हैं।

हिन्दी निरुक्त ( १९७ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
'शम्ब' (७२) यह वज्र का नाम है । शमयति धातु का
अथवा शातयति धातु का है । (क्यों कि वह जिस पर छोड़ा
जाता है, उसका शमन कर देता है, या शातन (छेदन) कर
देता है) ।
'हे 'पुरुहूत' बहुतों से आवाहन किये जाने वाले! 'उग्रः'
कठोर 'यः' जो 'शम्बः' वज्र है, 'तेन' उस से (शत्रुओं को
मार ) यह भी निगम है ।
यहां मारने के सम्बन्ध से 'शम्ब' नाम वज्र का सिद्ध
होता है । यह वज्र के नामों में पढ़ा हुआ नहीं है, इस से
यह अप्रसिद्ध अर्थ वाला है, उस की इस प्रकार प्रकरण से
अर्थ सिद्धि होती है ।
'केपयः' (७३) यह अनवगत है । 'कपूय' (बुरे कर्म) होते हुए 'केपि'
कहे जाते हैं । -
'केपि' कपूय होते हैं । 'कपूय' क्या ? इस में 'पुनाति'
( क्रया० उ० ) धातु की क्रिया (पवित्र करना ) है । वह
क्या ? कुत्सित । क्यों ? वह दुष्पूय (धोना कठिन ) होता है
अथवा जो कोई पाप करने वाला प्रायश्चित्त करके कुत्सित
(बुरे) कर्म को धोता है, वह कपूय होता है । वही केपि है ।
॥ ६ ( २४ ) ॥
( खं० ७ )
(निघ०) तृतुमाकृषे॥७४॥ असतम्॥७५॥
(निरु०) “पृथक्प्रायन्प्रथमा देवहूतयोऽकृण्वत श्रव-
स्यानिनुष्टरा । नये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहर्ममैव
न्तेप्रविशन्तकेपयः ॥” [ऋ० सं० ७,८,२७,१] ॥

हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं० ५
पृथक् प्रायन् । ‘पृथक्’ प्रथतेः । प्रथमा देव-
हूतयः ये देवान् आह्वयन्त, अकुर्वत श्रवणीयानि
यशांसि दुरुनुकराणि अन्यैः, येऽशक्नुवन् यज्ञियां
नावम्-आरोढुम् । अथ ये न अशक्नुवन् यज्ञियां
नावम्-आरोढुम्, “ईमैवैत न्यविशन्त” इहैव ते
न्यविशन्त । ऋणेहैवते न्यविशन्त । अस्मिन्नेव
लोके इतिवा ॥
‘ईर्म’ इति बाहुनाम । समीरिततरो भवति ॥
“एता विश्वा सवना तूतुमाकृषे स्वयं सूनो
सहसो यानि दधिषे ॥” [ऋ० सं० ८, १, ९, ६]
एतानि सर्वाणि स्थानानि तूर्णमुपाकुरुषे, स्वयं
बलस्य पुत्र यानि धत्स्व ॥
‘अंसत्रम्’ अहमस्त्राणम् । धनुर्वा । कवचंवा ।
‘कवचं’ कुआञ्चितं भवति । काञ्चितं भवति । काये
अञ्चितं भवति, इतिवा ॥ ७ [२५] ॥
“पृथक्प्रायन्” इस ऋचा का कृष्ण आंगिरस ऋषि, जगती छन्द और मा-
ध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियोग है ।
अर्थः- हे इन्द्र ! तेरे प्रसाद से ‘प्रथमाः’ पहिले वाले या
मुख्य ‘देवहूतयः’ देवताओं को कर्मों में बुलाने वाले (यजमान)
‘पृथक्’ अलग ( औरों से ) देवयान या पितृयान ( मार्ग ) से
‘प्रायन्’ गए हैं । और वे ‘अवस्यानि’ ( श्रवणीयानि ) सुनने
योग्य (यशांसि) यशों को जो ‘दुष्टरा’ ( अन्यैः दुरुनुकराणि )

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
औरों को कठिनता से अनुकरण करने योग्य हैं, 'अकुर्वत'
( अकुर्वत ) कर गये हैं । कौन ? 'ये' जो 'यज्ञियाम्' यज्ञकी
'नावम्' नावको 'आरुहम्' (आरोढुम्) चढ़ने में शेकुः' (अश-
क्नुवन्) समर्थ हुये । ( अथ ) और 'ये' जो 'यज्ञियां नावम्-
आरोढुम् न शेकुः (अशक्नुवन्)' यज्ञ की नाव पर (तेरे
प्रसाद के बिना या विषयों में आसक्त होने के कारण) चढ
न सके, “ईर्म-एव ते (केपयः) न्यविशन्त” ( इह एव
ते (कपूयाः) न्यविशन्त ) उन दुराचारियों ने इसी में वास
(प्रवेश) किया है, अर्थात् 'ते' वे (ऋणो हैव न्यविशन्त) तेरे
ऋण में (ऋणी) ही रहे। या (इहैवान्तीके) इसी लोक में रहे,
किन्तु तेरे दिव्यलोक में न जा सके।
'ईर्म' यह बाहु का नाम है । क्यों कि-वह समीरितातर
या अन्य अङ्गों की अपेक्षा कर्मों में बहुत अधिक प्रेरित
होता है ॥
यह शब्द की समानरूपता के कारण दूसरा अर्थ कहा
गया है ॥
ऊपरके मन्त्रमें दिखाया कि-दिव्य लोकोंकी प्राप्ति यज्ञ
से होती है और यज्ञ न करने वाले इस लोक में कूकूर शूकर
होकर पड़े रहते हैं। इसी में लोकान्तर और उनकी उत्तम
कर्म से प्राप्ति भी कही गई होती है ।
'तूतुम्'-'आकृषे' (७४) ये दो अनवगत पद है। 'तूतुम्' की 'तूर्णम्' और
'आकृषे' की 'उपाकुरुषे' शब्द-समधि है।
“एताविश्वा सवना तूतुमाकृषे स्वयं सूनो ! सहसो
यानि दधिषे । वराय ते पात्रं धर्मणे तना यज्जो
मन्त्रो ब्रह्मोद्यतं वचः । [ऋ० सं० ८, १, ९, ६]

हिन्दी निरुक्त ( २०० ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
“इन्द्रवैकुण्ठ ऋषि, इन्द्रदेवता के सूक्त में निविद्धानीय महाव्रत
महदुक्थ शस्त्र में शस्त्र है।
‘सहसः’ ( बलस्य ) ‘सूनो’ हे बलकेपुत्र ! तू ‘यानि’
जिन को ‘दधिषे’ ( धत्स्व = धत्से ) धारण करता है, ‘एता’
( एतानि ) इन ‘विश्वा’ (विश्वानि.) सब ‘सवना’ ( सव-
नानि = स्थानानि ) स्थानों को ‘स्वयम्’ आप ‘तूतुम्’ (तूर्णम्)
शीघ्र ‘आकृषे’ (उपाकुरुषे) उस २ रूप से वहां प्राप्त होकर बना
लेताहै। इससे ‘ते’तुझ ‘वराय’ श्रेष्ठ‘धर्मणे’ धारण करनेवालेकेलिये
‘पात्रम्’ यह सोमरसका भराहुआ पात्र है। ‘तना (धनम्) धन
सब तेरा ही है। ‘यज्ञः सब यज्ञ तेरा ही है। ‘मन्त्रः’ कर्म
का साधन मन्त्र तेरा ही है। ‘ब्रह्म’ अन्न सब तेरा ही है।
‘उद्यतम्’ जो कुछ इस समय प्रस्तुत ( तैयार ) है, सब तेरा ही
है। ‘वचः’ स्तुति रूप वाणी तेरी ही है। ( इसका स्पष्ट रस
“ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम् ”
इस पुराण वाक्य में बहुत सरलता से अनुभूत हो जाता है ।)
यहा पर “तुतुम्” शब्द समान रूपताके कारण ‘तूर्णम्’
का ही सिद्ध होता है। और करनेके सम्बन्ध से भी । क्योंकि
जो कर्त्तव्य होता है, उसका शीघ्र ही करना इष्ट होता है।
“आकृषे” पद में भी जो किया जाता है, वह पास जाकर
ही किया जाता है, इस लिये भाष्यकार ने ‘उप’शब्द ( समी-
पवाचक ) अध्याहार किया है।
कोई आचार्य इस मन्त्र को अग्नि देवता का मानकर
व्याख्यान करते हैं किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि-यह मन्त्र
.“प्रवोमहे” सूक्त का है, और वह सूक्त इन्द्र का ही है, इस
लिये अग्नि का मानने से प्रकरण विरोध होगा।

हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) ५ अ० ४ पा० ८ खं०
'अंसत्रम्' (७५) यह अनवगत है । विकल्प से अनेकार्थ है । "अंहसः
त्राणम्” ( पाप से रक्षा करने वाला ) यह शब्द समाधि है । “धनुर्वा कवचं
वा” (धनुष अथवा कवच) यह अर्थ-कथन है । क्यों कि-उन दोनों से योद्धा
साम्ग्रामिक (सग्राम के) अंहस् (कष्ट) मे अपनी रक्षा करते हैं ।
अंसत्र ( ७५ ) क्या ? अंहस् ( कष्ट) से त्राण ( रक्षा )
करने का साधन । वह क्या ? अथवा धनुष् अथवा कवच ।
'कवच' क्यों ? वह 'कु' (कुटिल) 'अञ्चित' (खिँचा हुआ)
रहता है, अथवा कुछ कुटिल खिंचा हुआ रहता है । अथवा
शरीर में अञ्चित पूजित या गया हुआ होता है ॥ ७ (२५) ॥
( खं० ८ )
(निघ०-) काकुदम् ॥ ७६ ॥
(निरु०-) “प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं
रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवत मश्मचक्र मंसत्र
कोशंसिञ्चता नृपाणम् ॥” ( ऋ० सं० ८, ५, १९, १ ]
प्रीणीत अश्वान् सुहितं जयथ, जयनं वो
हितमस्तु, स्वस्तिवाहनं रथं कुरुध्वं, द्रोणाहावम् ।
'द्रोणं' द्रुममयं भवति ।
'आहावः' आहानात् । 'आवहः' आवहनात्
'अवतः' अवातितो महान् भवति । 'अश्मचक्रम्'
अशनचक्रम् । असनचक्रमितिवा । 'अंसत्रकोशम्'
"अंसत्राणि" वः कोशस्थानीयानि सन्तु । 'कोशः'
कुष्णातेः । विकुषितो भवति ॥

हिन्दी निरुक्त ( २०२ ) ५ अ० ४ पा० ६ खंड
अयमपि इतरः कोशः एतस्मादेव । संचयः ।
आचितमात्रो महान् भवति । सिञ्चत नृपाणम् ।
नरपाणं कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते ॥
'काकुदं' तालु इत्याचक्षते । जिह्वा 'कोकुवा'
सा अस्मिन् धीयते । 'जिह्वा' कोकुवा । कोकूय-
माना वर्णान्नुदति-इति वा। कौकूयते वा स्यात्
शब्दकर्मणः ।
'जिह्वा' जोहुवा । 'तालु' तरतेः । तीर्णतमम्
अङ्गम्। लनते र्वा स्यात् लम्बकर्मणो विपरीतात्,
यथा 'तलं'। 'लता'-इति-अविपर्ययः ॥ ६ (२६) ॥
“प्रीणीताश्वान्” ऋचा का सोम का पुत्र बुध ऋषि है।
विश्वेदेव देवता है।-
अर्थः- (हे विश्वेदेवाः !) सब देवताओं ! 'अश्वान्'
इन अपने घोड़ों को 'प्रीणीत' घास दाणा आदि से तृप्त करो
प्रयोजन यह कि-'यह संग्राम उपस्थित है। इन अश्वों को
पुष्ट तथा बलयुक्त करके इनसे 'हितम्' (सुहितम्) सुन्दर हित
रूप 'जयथ' (जयथ) जय प्राप्त करो । 'हित' विशेषण से
प्रयोजन यह है कि-कोई अहित जय भी होता है,जिसमें कि-
सुहृदों (मित्रों) भाइयों और पुत्र आदिकों का वध हो जैसा
कि-कौरव पाण्डवों का महाभारत में हुआ । अर्थात्-(जयनं वः
हितम् अस्तु) तुम्हारा जय हित हो । 'स्वस्तिवाहम्' (स्वस्ति-
वाहनम्) बड़े उत्तम घोड़ों वाला 'रथम्' रथको 'कृणुध्वम्'

हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) पृ० ४ पा० ८ खं०
( कुरुध्वम् ) करो । 'द्रोणावहम्' ( द्रोणं द्रुमयं भवति ) द्रोण
यं काठके बने हुए इस रथको 'आवह' युद्ध के योग्य बनाकर
'अवतम्' इस संग्राम रूप कूप को 'अंसत्र कोशम्' अंसत्र
नाम धनुषों का अथवा कवचों का कोश ( खजाना ) हो, ऐसे
'सिञ्चत' सींचो । जो संग्राम कूप 'नरपाणम्' नर-पाण है, या
जिस में नर ( मनुष्य ) ही जलके समान भरे आते हैं, जो
'अश्म चक्रम्' अश्मचक्र है, या जिसमें चक्र व्याप्त रहते हैं,
अथवा फेंके जाते हैं ॥
'आवह' (युद्ध) आवाहनसे है । क्योंकि-उसमें एक योद्धा
प्रतियोद्धा को आवाहन करता है । 'आवह' ( वाहन ) आव-
हन ( ले चलने ) से है, क्योंकि-वह अपने स्वामी को अपने
ऊपर चढाकर स्थानान्तर में ले जाता है ।
'अवत' ( कूप ) क्यों ? वह 'अवातित' या खोदा जाता
हुआ (अव) नीचे को ही ( अतित ) गया हुआ महान् होता
है । 'अश्मचक्र (युद्ध) क्यों ? वह अशनचक्र होता है, या उस
में फेंके हुए अस्त्र व्याप्त रहते हैं । अथवा वह असन चक्र होता
है, या उसमें चक्र फेंके जाते हैं । प्रायः 'अश्मचक्र' यह अवत
(कूप) का विशेषण भी हो सकता है । क्योंकि-वह अश्म
( पत्थर ) का चक्र (गोल) जैसा बना हुआ होता है । 'अंसत्र-
कोशम्' अंसत्र (धनुष् या कवच) तुम्हारे कोश के स्थान में
हों । 'कोश' (म्यान) कोषणा ( गोदने ) अर्थ में 'कुष' ( क्रया०
प० ) धातुसे है । क्योंकि-वह अनेक प्रकार से गुदाहुआ होता
है । चर्म का सिला हुआ होता है ॥
यह भी दूसरा कोश ( द्रव्य का घर ) इसी 'कुष्' धातु से
है । वह 'संचय'-या महान् ( बड़ा ) 'आचित मात्र' ( जिसमें

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
मात्राएँ आश्रित ( भरी हुईं ) हों ) होता है ।
ऋचाके उत्तरार्द्ध में कूप ( कूएं ) के कर्म से संग्राम को
उपमा देता है ॥
'काकुद्' (७६) यह अनवगत है ।
'काकुद्' को तालु (तालुवा) ऐसा कहते हैं। वह 'काकुद्'
क्यों है ? कोकुवा जिह्वा होती है, वह इसमें धारण की जाती
है । जिह्वा 'कोकुवा' क्यों कहलाती है ? वह कोकूयमान ( कू-
कती हुई ) वर्णों (अक्षरों) को प्रेरित करती है । अथवा शब्द
अर्थ में 'कु' ( यङन्त ) धातु से है ।
'जिह्वा' क्यों ? वह जोहुवा है, या उससे प्राणी आत्मा
में अन्न का होम करते हैं । अथवा उससे दूसरे को आवाहन
करते हैं । इस से वह जिह्वा है ।
'तालु' कैसे ? 'तृ' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्यों कि-
वह अन्य अङ्गोंसे विस्तृत होता है । अथवा लम्बन (लटकने)
अर्थ में 'लत' (भ्वा० प०) धातुके विपरीत (उलटे) रूप से है ।
जैसे 'तल' शब्द । 'लता' शब्द उसी 'लत' धातु के सीधे रूप
से होता है ॥ ८ ( २६ ) ॥
( खं० ६ )
[निघ०-] वीरिंटं ॥ ७७ ॥
(निरु०) " सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः ।
अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥" ( ऋ०
सं० ६, ५, ७, २)
सुदेवः त्वं कल्याणदानः, यस्य तव देव सप्त सि-

हिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
न्धवः प्राणाय अनुक्षरन्ति काकुदं सूर्म्यं सुषिरा-
मिव इत्यपि निगमो भवति ।
सुदेवस्त्वं कल्याणदेवः, कमनीयदेवो वा भवसि।
वरुण, यस्य ते सप्त सिन्धवः ।
‘सिन्धुः’ स्रवणात् । यस्य ते सप्त स्रोतांसि, तानि
ते काकुदम्-अनुक्षरन्ति ।
‘सूर्मि’ कल्याणीर्मि स्रोतः, सुषिरमनु यथा ।
‘बीरिटं’ “तैटीकिः” अन्तरिक्षमेवमाह-पूर्वं
वयतेः, उत्तरम्-इरतेः । वयांसि इरन्ति-अस्मिन्,
भांसि वा ।
तदेतस्याम् - ऋचि - उदाहरन्ति अपि निगमो
भवति ॥ ९ ( २७ ) ॥
“सुदेवोअसि”यह ऋचा प्रियमेधा ऋषि की है । अनुष्टुप छन्द और मन्त्रोक्त
(वरुण) देवता है ।
हे 'वरुण' देव ! 'त्वं' तू सुदेवः (कल्याणदानः) शुभ दान
वाला अथवा 'सुदेवः' (कल्याणदेवः, कमनीयदेवो वा) शोभन
देव या कल्याण करनेवाला देव या वाञ्छनीय देव'असि'(भवसि)
है । क्योंकि-'यस्य' जिसके 'ते' तेरे 'काकुदम्'तालु को'प्राणाय'
प्राण (जीवन) के 'सप्त' सात अर्थ 'सिन्धवः' (स्रोतांसि)
आकाश की नदियें (बहुला (१) अश्वा (२) तितुत्रा (३)
अभ्रपत्नी (४) मेघपत्नी (५) वर्षयन्ती (६) और अरुन्धा (७)
अथवा सातों समुद्र 'अनुक्षरन्ति' सब ओर से गीला करते हैं

हिन्दी निरुक्त (२०६) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
(भरते हैं), 'इव' (यथा) जैसे 'सूर्म्यम्' (सूर्म्मि = कल्याणीर्म्मि
स्रोतः) अच्छी लहरों वाला ग्राम का जल सुषिरराम्' (सुषि-
रम्-अनुक्षरति) उसके बाहरके प्रदेश (गोरखा) में सब ओर
व्यापन करता है ॥ यह भी निगम होता है। इस प्रकार यहां
पर सिन्धुओं के अनुक्षरण (बहने) के सम्बन्ध से 'काकुद्'
तालु है, यह सिद्ध होता है।
इस मन्त्र के पूरे पढ़ने का प्रयोजन मन्त्र के अर्थ की
गम्भीरता है। क्योंकि-और ऋचाएं जो इस प्रकरण में पूरी
पढ़ी गई हैं, उन में समाम्नाय के शब्दों के अतिरिक्त भी
अनवगत संस्कार पद हैं, उनकी व्याख्या दिखाने के लिये पूरी
पढ़ी गई हैं, किन्तु इस ऋचा में कोई अनवगत पद भी नहीं
है, इस लिये अर्थगम्भीरता ही इस के पूरे पढ़ने का कारण
है। अथवा 'काकुद्' शब्द का ही अर्थ प्रयत्न से ढूंढा जा
सकता है, इस लिये यह पूरी पढ़ी गई है ॥
'सिन्धु' क्यों ? स्रवण या बहने से या झरने से ॥
'बीरिट' (७७) यह अनवगत और पद्म से अनेकार्थ है। 'बीरिट' क्यों ?
यह 'भीततन' या इसमें भी (भय) तनन (फैला हुआ) है। क्यों कि-यह
(आकाश) बिना किसी आधार के ऊपर टिका हुआ है, इसी से इससे सब
डरत है।
बीरिट को तैटीकि आचार्य अन्तरिक्ष इस रीति से कहता
है पहिला भाग (बी) 'वी' (भ्वा० प०) धातु का और दूसरा
भाग (ईरिट) 'ईर्' (भ्वा०प०) धातु का है, अर्थात् 'वयांसि
पक्षी इसमें 'ईरन्ति' उड़ते हैं। 'वि'- ईर्' को मिलकर बीरिट
हुआ। अथवा 'भांसि' नक्षत्र इसमें 'ईरन्ति' फिरते हैं, इससे

हिन्दी निरुक्त (१०७) ५ अ० ४ पा० १० खं०
'बीरिट' है। उसे इस ऋचा में उदाहरण करते हैं, निगम भी
है-॥ ६ (२७) ॥
(खं० १०)
[निघ०-] अच्छ ॥७८॥ परि ॥ ७६ ॥
ईम् ॥८०॥ सीम् ॥८१॥ एनम् ॥ ८२ ॥
एनाम् ॥८३॥ मृशः ॥८४॥ इति चतुर-
शीतिः पदानि ॥
(निरु०-) " प्रवावृजे सुप्रया बर्हिरेशा मा विश-
तीव बीरिटइयातं । विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ
वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥” (ऋ० सं० ५,
४, ६, २, )
प्रवृज्यते सुप्रायणं बर्हिः-एषाम्, एयाते सर्वस्य
पातारौ वा पालयितारौ वा । 'बीरिटम्' अन्तरि-
क्षम् । भियो वा भासो वा ततिः । अपि वा उपमार्थे
स्यात्- सर्वपती इव राजानौ बीरिटे गणे मनुष्या-
णां । रात्र्या विवासे पूर्वस्यामभिहूतौ वायुश्च नियु-
त्त्वान्, पूषा च स्वस्त्ययनाय ॥
'नियुत्वान्' नियुत' अस्य अश्वाः । 'नियुतः'
नियमनाद्वा । नियोजनाद् वा ॥
'अच्छ' अभेः । आप्तुम्-इति शाकपूणिः ॥

हिन्दी निरुक्त (२०८) ५ अ० ४ पा० १० खं०
'परि' 'ईम्' 'सीम्'-इति व्याख्याताः ॥
'एनम्' 'एनाम्' "अस्याः-अस्य"-इत्येतेन
व्याख्यातम् ॥
'सृणिः' अङ्कुशो भवति । सरणात् ॥
'अङ्कुशः' अञ्चतेः । आकुञ्चितो भवति-
इति वा ॥
"नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्" (य० वा०
सं० १२, ६८,) । इत्यपि निगमो भवति ॥
'अन्तिकतमम्-अङ्कुशादायात् पक्वम्-औषधम्
आगच्छतु'-इति आगच्छतु-इति ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ५, ४ ॥
"प्रवावृजे" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । -
'सुप्रयाः' (सुप्रयाणम्) जिसपर अच्छे प्रकार देवता
आसकते हों, ऐसे भले प्रकार 'बर्हिः' कुशा (डाभ) 'प्रवावृजे'
(प्रवृज्यते) बिछाई जाती है । 'विशपती' सर्वस्य जगतःपती)
सब जगत् के स्वामी 'आ-इयाते' (आगच्छतः) आते हैं । कहां
फिर अवस्थित होकर आते हैं ? 'बीरिंटे' (अन्तरिक्षे)
आकाश में । 'इव' (पाद पूरण है ।) । अथवा 'बीरिंटे' (गणे
मनुष्याणाम् ) मनुष्योंके समूह में अवस्थित हुए हुए 'विशपति'
सब के पति राजाओं के 'इव' समान 'आ-इयाते' आते हैं ।
किसके यहां आते हैं ? किस काल में आते हैं ? कौन आते हैं
किस प्रयोजन से आते हैं ? 'एषाम्' इन 'विशाम्' (मनुष्या-

हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ५ अ० ४ पा० १० खं०
षाम् ) मनुष्यों के हर एक क्रियामें बुलाये हुये 'अक्तोः' (रात्र्याः)
( विवासे अपगमे ) रात्रिके बीत जाने पर 'उषसः' 'च' ( आ-
गमनकाले ) और उषा के आगमन काल में 'पूर्वहूत्तौ' ( पूर्व-
स्यामेव अभिहूतौ ) पहिले ही बुलावे में 'नियुत्वान्' नियुत्
घोड़ों वाला 'वायुः' वायु 'पूषा' (च) और पूषा दोनों 'स्वस्तये'
यजमान के कल्याण के लिये 'एयाते' आते हैं ॥
क्योंकि-देवता अन्तरिक्ष से ही आते हैं इस कारण
'बीरिट' नाम आकाश का ही हो सकता है । और जिस पक्ष
में 'बीरिट' नाम गण ( समूह ) का है, उस पक्ष में भी राजा
लोग गण के मध्य में हो कर ही चलते हैं, यह उपपन्न
होता है ।
निरुक्तार्थः-इन देवताओं के अच्छे आगमन योग्य कुशा
बिछाई जाती है आते हैं, सबके पाता या पालयिता (पालन
करने वाले ) । ( धातु दो हैं, और अर्थ एक है ) । 'बीरिट'
नाम अन्तरिक्ष का है । क्यों कि-उस में भय का विस्तार है,
या ज्योति ( ताराग्रह आदि ) का विस्तार है । अथवा 'इव'
उपमा अर्थ में है । सब के पतियों जैसे राजा, बीरिट नाम
मनुष्यों के समूह में ( अवस्थित ) । रात्रि के चले जाने पर
पहिली अभिहूति ( बुलावे ) में नियुत्वान् वायु और पूषा स्व-
स्त्ययन ( कल्याण ) के लिये ॥
'नियुत्वान्' क्यों ? नियुत् इसके घोड़े हैं । 'नियुत्' क्यों?
नियमन (शासन किये जाने) से । अथवा नियोजन (जोड़ने) से ।
'अच्छ' (९८) शब्द 'अभि' (अव्यय) शब्द से है, या उस
के अर्थमें है । शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि-'आप्तुम्' (प्राप्त
होने को ) पद के अर्थ में है ।
२७

हिन्दी निरुक्त ( २१० ) ५ अ० ४ पा० १० खं०
'परि' (७६) 'ईम्' (८०) 'सीम्' (८१) ये प्रथम अध्याय
में निपात और उपसर्गों के प्रकरण में व्याख्यान किये जा चुके
हैं। ('परि' १, १, ५, 'ईम्' १, ३, ५, 'सीम्' १, ३, २)
'एनम्' ( ८२ ) 'एनाम्' ( ८३ ) ये दोनों पद 'अस्याः'
'अस्य' इन दोनों पदों से चतुर्थ अध्याय में (४, ४, ४) व्या-
ख्यान किये जा चुके हैं ।
'सृणिः' (८४) यह अङ्कुश का नाम है । क्योंकि-वह
हाथी के शिर पर सरण (गमन) करता है ।
'अङ्कुश' शब्द कैसे ? 'अञ्च' ( भ्वा०प० ) धातु से हैं।
अथवा आकुंचित या मुड़ा हुआ होता है । अतः आकुंचित
होता हुआ 'अङ्कुश' होता है ।
“नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्” (य०वा०सं०१२,६८)
हे कर्षको ! 'सृण्यः' सृणि (अङ्कुश) जितनी दूरी पर टिक
कर सस्य को खींच सकता है, उससे 'इत्' भी 'नेदीयः' (अन्तिक-
तमम्) बहुत निकट पक्व (पकी हुई) औषधि 'एयात्' हमारे
प्रति आवे । ऐसा गहरा बोओ ॥
कोई कहते हैं, हे कर्षको ! ऐसे बीज बोओ, जैसे-दात्र
(दरांत) के द्वारा खींचने से पहिले हमारी मुट्ठी सस्य (धान्य)
से भरजावे इस पक्ष में अङ्कुश नाम दात्र का ही है । उस से
खींचे हुए सस्य के 'अङ्कुशादायात्' दात्र से खींचने से पहिले
'नेदीयः' (अन्तिकतमम्) बहुत निकट हुआ हुआ 'पक्वम्' पका
हुआ 'औषधम्' औषध 'आगच्छतु' आवे 'आगच्छतु' आवे ।
अध्याय की समाप्ति दिखाने के अर्थ 'आगच्छतु' पद को
दो बार पढ़ा है ॥ इस प्रकार यहां 'नेदीयः' शब्द के सम्बन्ध
से 'सृणि' अङ्कुश अथवा दात्र ( दरांत ) है ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः

हिन्दी निरुक्त ( २११ ) ५ अ० ४ पा० २० खं०
निरुक्त के पञ्चमाध्याय का खण्डसूत्र—
[प्र०पा०-] सस्मिन् (१) असश्चन्ती (२) न यस्य (३) वरा-
हो (स्वसराणि) (४) गायन्ति त्वा (५) [द्वि०पा०-] पवित्र ६)
पुरुत्वा (७) किमित्ते (८) प्रतक्षे (९) अग्निनरः (१०) एकया
(अभिगुः) (११) अपान्तमन्युः १२) [तृ०पा०-] उर्वेश्यप्सुराः
(१३) उतासि (१४) अहम् (१५) नियत् (१६) कदामर्श (१७)
पत्नीवन्तः (१८) सुषुरदत् (१६) [च०पा०-] वृकश्चन्द्रमाः (२०)
अरुषो मा (आजडयीत्) (२१) य इन्द्राग्नी (२२) मानः समस्य
(२३) हविषाजारः (२४) पृथक्प्रायन् (२५) प्रीयीता (२६
सुदेवः (२७) प्रवावृजे (२८) अष्टाविंशतिः (२६) ॥
इति निरुक्ते पूर्व षट्के पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इति हिन्दीनिरुक्त के पूर्व षट्के पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥५॥