निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 608, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ४पा० ४ खं०
"अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः"
( ऋ० सं० ६, ३, ४५, ५ य० वा० सं० ३, ६१ )
"धनुष् को फैलाए हुए या उसकी कमान को झुकाए
हुये पिनाक धनुष् को हाथमें लिये हुये चर्म का वस्त्र पहिने
हुये" ये दो निगम हैं ।
व्याख्या ।
इन मन्त्रोंमें देवता अपने भक्तोंके यहां वस्त्र और शस्त्र
धारण करके उनकी रक्षाके निमित्त आते हुए दिखाई देते -
हैं । नये वैदिकों को भी सगुण देवताओंकी उपासना से लाभ
उठाना चाहिए ॥
'श्वघ्नी' (६८) यह अनवगत है । "कितवाभवति"यह अर्थका कथन
है । "श्व हन्ति" यह शब्द की व्युत्पत्ति है, किन्तु स्वहा (धन या अपने
का नाश करने वाला) यह युक्त है ।-
'श्वघ्नी' (६८) कितव (ज्वारिया) होता है । क्योंकि-
यह स्व (अपने का या धन) को हनन करता है । 'स्व' फिर
क्या ? 'आश्रित' क्यों ? स्वामी को अभिमुखता से श्रयण
(धारण) किये हुये होता है ।
"श्वघ्नी" (कितवः) ज्वारिया 'न' (इव) जैसे 'देवने' जूवे
के अड्डे में 'कृतम्' कृत को 'विचिनोति' ढूंढता है कि कैसे
किया हुआ हो, जिससे मैं जीतूँ ।
'कितव' क्यों ? 'किंतवास्ति' (क्या तेरा है ?) इस शब्द
का अनुकरण है । क्योंकि-वह नित्यकाल ही खेलने की इच्छा
करता हुआ अपने सामने खेलने वाले ज्वारियों से पूछता है
कि "किंतवास्ति" इस शब्द के आधार पर यह 'कितव'