निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २०२ ) ५ अ० ४ पा० ६ खंड
अयमपि इतरः कोशः एतस्मादेव । संचयः ।
आचितमात्रो महान् भवति । सिञ्चत नृपाणम् ।
नरपाणं कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते ॥
'काकुदं' तालु इत्याचक्षते । जिह्वा 'कोकुवा'
सा अस्मिन् धीयते । 'जिह्वा' कोकुवा । कोकूय-
माना वर्णान्नुदति-इति वा। कौकूयते वा स्यात्
शब्दकर्मणः ।
'जिह्वा' जोहुवा । 'तालु' तरतेः । तीर्णतमम्
अङ्गम्। लनते र्वा स्यात् लम्बकर्मणो विपरीतात्,
यथा 'तलं'। 'लता'-इति-अविपर्ययः ॥ ६ (२६) ॥
“प्रीणीताश्वान्” ऋचा का सोम का पुत्र बुध ऋषि है।
विश्वेदेव देवता है।-
अर्थः- (हे विश्वेदेवाः !) सब देवताओं ! 'अश्वान्'
इन अपने घोड़ों को 'प्रीणीत' घास दाणा आदि से तृप्त करो
प्रयोजन यह कि-'यह संग्राम उपस्थित है। इन अश्वों को
पुष्ट तथा बलयुक्त करके इनसे 'हितम्' (सुहितम्) सुन्दर हित
रूप 'जयथ' (जयथ) जय प्राप्त करो । 'हित' विशेषण से
प्रयोजन यह है कि-कोई अहित जय भी होता है,जिसमें कि-
सुहृदों (मित्रों) भाइयों और पुत्र आदिकों का वध हो जैसा
कि-कौरव पाण्डवों का महाभारत में हुआ । अर्थात्-(जयनं वः
हितम् अस्तु) तुम्हारा जय हित हो । 'स्वस्तिवाहम्' (स्वस्ति-
वाहनम्) बड़े उत्तम घोड़ों वाला 'रथम्' रथको 'कृणुध्वम्'