निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६४) ५ अ० ४ पा० ५ खं०
अर्थ:-“मानःसमस्य” यह ऋचा विरूप आङ्गिरस ऋषि
की है। गायत्री छन्द और अग्नि देवता है । दशरात्र के तीसरे
अहन् (दिन) में प्रातःसवन में आज्य सूक्त में विनियुक्त है ॥
हे भगवन् ! अग्ने ! ‘नः’ हमको 'समस्य' ( सर्वस्य ) सब
‘दुर्घ्यः’ (दुर्धियः) दुष्ट बुद्धिवाले या ( पापधियः) पाप बुद्धि-
वाले ‘परि-द्वेषसः’ ( सर्वतो द्वेषसः = सर्वात्मना द्वेष्टुः ) सब
प्रकार द्वेष करने वाले शत्रु का 'अंहतिः' पाप ‘ऊर्मिः’ भाल
(लहर) नावम्’ नाव को ‘न’ ( इव ) जैसे 'मा’ मत ‘अवधीत्’
मारे ॥ इस प्रकार सभी दृष्टान्तों से वध अनिष्ट होनेके कारण
‘सम’ यह सर्व-नाम है।
‘ऊर्मि’ शब्द आच्छादन (ढांपने) अर्थमें ‘उर्णुञ्’ (अदा०
उ० ) धातु से है। क्योंकि वह तीर को अथवा जो और कुछ
जलके भीतर रहता है, उसे ढँकलेती है ।
‘नौ’ ( नाव ) क्यों ? वह पार जानेके अर्थ ‘प्रणोतव्या’ प्रेरणा
करने योग्य होती है । अथवा झुकने अर्थमें ‘नम्’ (भ्वा०प०)
धातु से है। क्योंकि वह पार जाने के लिये नत ( झुकी हुई
या नम्र ) जैसी रहती है ।
वह ( 'सम' शब्द, जिसका उल्लेख पूर्व खण्ड के अन्त में
हो चुका है ) कैसे अनुदात्त प्रकृति या अनुदात्त स्वभाव या
अनुदात्तस्वरवाला ( होकर ) नाम हो या होसकता है ?
क्योंकि-दृष्टव्यय है = इस में विकार देखागया है ( इससे
यह नाम ही है, किन्तु निपात नहीं ) ।
“उतो समस्मिन्” अर्थात्-‘उतो’ और हे ‘वसो !’
धनवान् इन्द्र ! ‘समस्मिन्’ ( सर्वस्मिन् ) सब (काल) में ‘नः’