निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) ५ अ० ४ पा० ८ खं०
'अंसत्रम्' (७५) यह अनवगत है । विकल्प से अनेकार्थ है । "अंहसः
त्राणम्” ( पाप से रक्षा करने वाला ) यह शब्द समाधि है । “धनुर्वा कवचं
वा” (धनुष अथवा कवच) यह अर्थ-कथन है । क्यों कि-उन दोनों से योद्धा
साम्ग्रामिक (सग्राम के) अंहस् (कष्ट) मे अपनी रक्षा करते हैं ।
अंसत्र ( ७५ ) क्या ? अंहस् ( कष्ट) से त्राण ( रक्षा )
करने का साधन । वह क्या ? अथवा धनुष् अथवा कवच ।
'कवच' क्यों ? वह 'कु' (कुटिल) 'अञ्चित' (खिँचा हुआ)
रहता है, अथवा कुछ कुटिल खिंचा हुआ रहता है । अथवा
शरीर में अञ्चित पूजित या गया हुआ होता है ॥ ७ (२५) ॥
( खं० ८ )
(निघ०-) काकुदम् ॥ ७६ ॥
(निरु०-) “प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं
रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवत मश्मचक्र मंसत्र
कोशंसिञ्चता नृपाणम् ॥” ( ऋ० सं० ८, ५, १९, १ ]
प्रीणीत अश्वान् सुहितं जयथ, जयनं वो
हितमस्तु, स्वस्तिवाहनं रथं कुरुध्वं, द्रोणाहावम् ।
'द्रोणं' द्रुममयं भवति ।
'आहावः' आहानात् । 'आवहः' आवहनात्
'अवतः' अवातितो महान् भवति । 'अश्मचक्रम्'
अशनचक्रम् । असनचक्रमितिवा । 'अंसत्रकोशम्'
"अंसत्राणि" वः कोशस्थानीयानि सन्तु । 'कोशः'
कुष्णातेः । विकुषितो भवति ॥