सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 612

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
२३, २) इत्यपि निगमो भवति ॥
'केपयः' कपूया भवन्ति । 'कपूयम्'-इति
पुनातिकर्म कुत्सितम् । दुष्पूयं भवति ॥६ (२४) ॥
'कुटस्य' (७०) 'चर्षणिः' (७१) ये दो पद अनवगत हैं। 'कृतम्य'
(किये हुएका) (७० 'चायिता' (द्रष्ट=देखने वाला) (७१) ये उनकी शब्द-
समाधियें हैं। दोनों का एक ही निगम है।—
“हविषा जारो” यह ऋचा प्रस्कण्व ऋषि की है। अश्विनन् देवता
है। प्रातग्नुवाक और आश्विन में शस्त्र है।
अर्थः—'नरा' (नरौ') हे नरों ! अश्विनों ! यह
आदित्य 'पिता' सब जगत् की रक्षा करने वाला है। 'कुटस्य'
(कृतस्य) सब संसार के किये हुये अच्छे बुरे कर्मों का
'चर्षणिः' (चायिता) देखने वाला है। 'अपाम्' सब भूतों के
भीतर विद्यमान जलों का प्राण रूप से अवस्थित हो कर
'जारः' (जरयिता) सुखाने वाला है। 'पपुरिः' समय आने
पर पूरने वाला 'हविषा' (उदकेन) जल से 'पिपर्त्ति' पूरता
है या तृप्त करता है। अर्थात् 'जो तुम दोनों ऐसे गुण वाले
आदित्य देव से पूरे जाते हो या तृप्त किये जाते हो, सो तुम
दोनों हमारी आशिषा (प्रार्थना) को बढ़ाओ या पूरी करो'
ऐसे यहां आशिषा जोड़ लेना होता है। इस प्रकार 'कुट'
शब्द का कृत और 'चर्षणि' का चायिता (द्रष्टा) अर्थ
उपपन्न होता है॥
'पिपर्त्ति' और 'पपुरिः' ये निगम के दोनों शब्द 'पूरयति'
(पूरण करता है) अर्थ में हैं अथवा 'प्रीणायति' (तृप्त या
प्रसन्न करता है) अर्थ में हैं।