निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं०
मात्राएँ आश्रित ( भरी हुईं ) हों ) होता है ।
ऋचाके उत्तरार्द्ध में कूप ( कूएं ) के कर्म से संग्राम को
उपमा देता है ॥
'काकुद्' (७६) यह अनवगत है ।
'काकुद्' को तालु (तालुवा) ऐसा कहते हैं। वह 'काकुद्'
क्यों है ? कोकुवा जिह्वा होती है, वह इसमें धारण की जाती
है । जिह्वा 'कोकुवा' क्यों कहलाती है ? वह कोकूयमान ( कू-
कती हुई ) वर्णों (अक्षरों) को प्रेरित करती है । अथवा शब्द
अर्थ में 'कु' ( यङन्त ) धातु से है ।
'जिह्वा' क्यों ? वह जोहुवा है, या उससे प्राणी आत्मा
में अन्न का होम करते हैं । अथवा उससे दूसरे को आवाहन
करते हैं । इस से वह जिह्वा है ।
'तालु' कैसे ? 'तृ' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्यों कि-
वह अन्य अङ्गोंसे विस्तृत होता है । अथवा लम्बन (लटकने)
अर्थ में 'लत' (भ्वा० प०) धातुके विपरीत (उलटे) रूप से है ।
जैसे 'तल' शब्द । 'लता' शब्द उसी 'लत' धातु के सीधे रूप
से होता है ॥ ८ ( २६ ) ॥
( खं० ६ )
[निघ०-] वीरिंटं ॥ ७७ ॥
(निरु०) " सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः ।
अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥" ( ऋ०
सं० ६, ५, ७, २)
सुदेवः त्वं कल्याणदानः, यस्य तव देव सप्त सि-