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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 616

हिन्दी निरुक्त ( २०० ) ५ अ० ४ पा० ७ खं०
“इन्द्रवैकुण्ठ ऋषि, इन्द्रदेवता के सूक्त में निविद्धानीय महाव्रत
महदुक्थ शस्त्र में शस्त्र है।
‘सहसः’ ( बलस्य ) ‘सूनो’ हे बलकेपुत्र ! तू ‘यानि’
जिन को ‘दधिषे’ ( धत्स्व = धत्से ) धारण करता है, ‘एता’
( एतानि ) इन ‘विश्वा’ (विश्वानि.) सब ‘सवना’ ( सव-
नानि = स्थानानि ) स्थानों को ‘स्वयम्’ आप ‘तूतुम्’ (तूर्णम्)
शीघ्र ‘आकृषे’ (उपाकुरुषे) उस २ रूप से वहां प्राप्त होकर बना
लेताहै। इससे ‘ते’तुझ ‘वराय’ श्रेष्ठ‘धर्मणे’ धारण करनेवालेकेलिये
‘पात्रम्’ यह सोमरसका भराहुआ पात्र है। ‘तना (धनम्) धन
सब तेरा ही है। ‘यज्ञः सब यज्ञ तेरा ही है। ‘मन्त्रः’ कर्म
का साधन मन्त्र तेरा ही है। ‘ब्रह्म’ अन्न सब तेरा ही है।
‘उद्यतम्’ जो कुछ इस समय प्रस्तुत ( तैयार ) है, सब तेरा ही
है। ‘वचः’ स्तुति रूप वाणी तेरी ही है। ( इसका स्पष्ट रस
“ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम् ”
इस पुराण वाक्य में बहुत सरलता से अनुभूत हो जाता है ।)
यहा पर “तुतुम्” शब्द समान रूपताके कारण ‘तूर्णम्’
का ही सिद्ध होता है। और करनेके सम्बन्ध से भी । क्योंकि
जो कर्त्तव्य होता है, उसका शीघ्र ही करना इष्ट होता है।
“आकृषे” पद में भी जो किया जाता है, वह पास जाकर
ही किया जाता है, इस लिये भाष्यकार ने ‘उप’शब्द ( समी-
पवाचक ) अध्याहार किया है।
कोई आचार्य इस मन्त्र को अग्नि देवता का मानकर
व्याख्यान करते हैं किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि-यह मन्त्र
.“प्रवोमहे” सूक्त का है, और वह सूक्त इन्द्र का ही है, इस
लिये अग्नि का मानने से प्रकरण विरोध होगा।