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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ४८८ ) १२ अ० १ पा० ११ खं०
अर्थः- "त्वष्टा दुहित्रे०" इस ऋचा का पूर्व ऋचा के
समान ही ऋषि और विनियोग है ।
'त्वष्टा' ( देवो विश्वकर्मा ) त्वष्टा देव जिसे पुराणों के
जानने वाले 'विश्वकर्मा' कहते हैं 'दुहित्रे' (दुहितुः) अपनी
कन्या का 'वहतुम्' (वहनम्) विवाह 'कृणोति' ( करोति )
करता है "इदं विश्वं भुवनं समेति" यह सब संसार (जिसे
देखने के लिये ) आता है । ( यह विवाहों का स्वभाव है । )
"यमस्य माता" यमकी माता- जो यमकी माता
होने वाली है, सो 'पर्युह्यमाना' (पर्युढा ) ( विवस्वान से )
ब्याही गई 'महः' (महतः) महान् 'विवस्वतः' विवस्वान् (आदि-
त्य) की 'जाया' भार्या 'ननाश' नष्ट होगई— यम और यमी
रूप दो मिथुनों को छोड़कर अन्तर्धान होगई ॥
नैरुक्त पक्ष में-त्वष्टा मध्यम देव तमोभाग उषाकी प्रकाश
रूपा दुहिता (बेटी) का वहन ( विवाह ) विवस्वान् के साथ
करता है, या उसे देदेता है "इदं विश्वं भुवनं समेति"
सब भूत (प्राणी) प्रभात हुआ जानकर अपने २ कार्यों में लग
जाते हैं, “ यमस्य माता” मध्य की माता (देव धर्म से )
अथवा द्युस्थान देवकी जो ही भार्या है वही माता (क्योंकि-
जिसमें पुत्र रूप से पति जनमता है, इसी से वह 'जाया' है ।)
"महो विवस्वतो ननाश" महान् विवस्वान् देव के
प्रकाश से हटती हुई नष्ट होती है ।
क्योंकि-"रात्रिः आदित्यस्य आदित्योदये अन्त-
र्धीयते" 'रात्रि या उषा आदित्य की जाया ( पत्नी ) है, सो

  • हिन्दी निरुक्त ( ४८६ ) १२ अ० २ पा० २ खं०
    आदित्यके उदय में अन्तर्धान हो जाती है।" [यह भाष्यकार
    ने संक्षिप्त व्याख्यान किया है । ॥ ११ ॥
    इति हिन्दीनिरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१२,१॥
    द्वितीयः पादः ।
    (खं० १)
    निघ०-सविता ॥७॥ भगः ॥८॥ सूर्यः
    ॥९॥ पूषा ॥१०॥ विष्णुः ॥११॥
    निरु०-‘सविता’ व्याख्यातः, तस्य कालो-यदा
    द्यौः आहततमस्का कीर्णरश्मिर्भवति ।
    तस्य एषा भवति-॥ १ (१२) ॥
    अर्थः- ‘सविता’ (७) व्याख्यान किया गया (अभिधान
    या निर्वचन से) [ १०, ३, ९ ] उसका काल-जब द्यौ अन्ध-
    कार रहित फैली हुई किरणों वाली होती है-जिस काल में
    आकाश देश में ही प्रकाश होता है, किन्तु पृथिवी में नहीं
    अर्थात्- उदय होते हुए सूर्य की किरणें पहिले आकाश में
    जाती हैं, इससे वहीं प्रकाश रहता है और पृथिवी में अंधेरा
    ही रहता है, वह सविता का काल है, उस काल में आदित्य
    सविता कहा जाता है ।
    “तस्य०” उस सविता की यह ऋचा है-॥१(१२)॥
    ( खं० २ )
    निरु०-“विश्वारूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासा-
    वीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । विनाकमख्यत् सविता

हिन्दी निरुक्त ( ४६० ) १२अ० १पा० २ खं०
वरेण्योऽनुप्रयाणमुषसो विराजति ॥” [ ऋ० सं०
४, ४, २४, २ । य०वा०सं० १२, ३ ]
सर्वाणि प्रज्ञानानि प्रतिमुञ्चते मेधावी 'कविः'
क्रान्तदर्शनो भवति । कवेर्वा ।
प्रसुवति भद्रं द्विपाद्भ्यश्च चतुष्पाद्भ्यश्च ।
व्यचिरुचपत् नाकं सविता वरणीयः ।
प्रयाणमनु उषसो विराजति ।
“अधो रामः सावित्रः”- इति पशुसमाम्नाये
विज्ञायते । कस्मात् सामान्यात् ? इति, अध-
स्तात् तद्वेलायां तमो भवति, एतस्मात् सामान्यात्।
‘अधस्ताद्रामः’ अधस्तात् कृष्णः । कस्मात् सा-
मान्यात् ? इति । “अग्निं चित्वा न रामामुपे-
यात्” ॥
रामा रमणाय उपेयते न धर्माय कृष्णजातीया।
एतस्मात् सामान्यात् ।
“कृकवाकुः सावित्रः” इति पशुसमाम्नाये विज्ञायते
कस्मात् सामान्यात् ? इति । कालानुवादं परीत्य
कृकवाकोः पूर्वं शब्दानुकरणं वचेः उत्तरम् ।
‘भगः’ व्याख्यातः । तस्य कालः प्राग्-उत्सर्पणात् ।
तस्य एषा भवति-॥ २ (१३) ॥

॰ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) १२ अ० २ पा० २ खं०
अर्थः-“विश्वा रूपाणि०” इस ऋचा का श्योवाश्व
ऋषि और आभिप्लविक प्रथम अहन् में विनियोग है, और
यजमान के द्वारा अग्नि में शिक्यपाश ( छींका ) के छोड़ने में
विनियोग है ।
'कविः' ( क्रान्तदर्शनः ) व्याप्त हुई या फैली हुई दृष्टि
वाला ( सविता ) देव 'विश्वा' ( सर्वाणि ) सब 'रूपाणि'
( प्रज्ञानानि ) प्रज्ञानों को 'प्रतिमुञ्चते' छोड़ता है-तम को
नाश करता हुआ अपने प्रकाश से रूप वाली वस्तुओं के रूपों
को दिखाता है । 'द्विपदे' ( द्विपाद्भ्यश्च ) दो पैर वालों के
लिये ' चतुष्पदे ' ( चतुष्पाद्भ्यश्च ) और चौपायों के लिये
'भद्रम्' भद्र ( कल्याण ) को 'प्रासावीत्' (प्रसुवति) जनता है।
'वरेण्यः' ( वरणीयः ) चाहने योग्य 'सविता' सविता देव
'नाकम्' ( द्याम् ) द्यौ को ' वि-अख्यत् ' ( व्यचिख्यपत् )
( विख्यापयति ) दिखाता है-क्योंकि द्यौ ( आकाश ) में उस
समय किरणें फैली हुई होती हैं । 'उषसः' उषा के 'प्रयाणम्-
अनु' प्रयाण (चले जाने) के पश्चात् 'विराजति' प्रकाशता है ।
इस ऋचा में जैसा वर्णन किया गया है, उससे सविता
का उक्त काल स्पष्टरूप से प्रतीत हो जाता है । मन्त्र में
कहता है-सब रूप वाली वस्तुएं अच्छे प्रकार से भासने
लगती हैं, दोपायों और चौपायों को अपने कर्म करने की
योग्यता होती है, द्यौ में प्रकाश होजाता है, उषा बीत लेती
है और उसके पीछे सविता प्रकाश करता है ॥
दूसरे प्रमाण से सविता के काल का निर्णय-
“अघोररामः सावित्रः” 'नीचे से काला सविता का

पशु होता है' यह पशु के समाम्नाय (विधायक श्रुति) में
जाना गया है। किस समानता से ? उस (सविता) की वेला
में नीचे (पृथ्वीलोक) में तम होता है, इस समानता से
सविता का पशु नीचे से काला और ऊपर सफेद होता है।
'अधस्ताद्रामः' क्या ? 'अधस्तात् कृष्णः' नीचे से काला।
किस सामान्य से ?- 'राम' शब्द का 'काला' अर्थ कैसे
हुआ ?
"अग्निं चित्वा न रामाम् उपेयात्" 'अग्नि का
आधान करके शूद्रा को गमन न करे' इस निषेध वाक्य में
'रामा' शब्द से शूद्रा का ग्रहण है।
'रामा' क्यों? वह रमण के लिये प्राप्त कीजाती है धर्म
के लिये नहीं, और वह काली जाति की होती है, इस सा-
मान्य से—'रामा' और 'कृष्णजातीया' ये दोनों शब्द एक
अर्थ में हैं। इसीसे 'राम' शब्द 'प्रवीता' आदि शब्दों के समान
'कृष्ण' गुण के सामान्य से पशु में आ गया है।
और प्रमाण से सविता के काल का निर्णय—
"कृकवाकुः सावित्रः" 'कृकवाकु' (मुरगा) सविता
देव का पशु है यह पशु समाम्नाय में जाना जाता है।
"कस्मात् सामान्यात्" किस समानता से ?
कालानुवादं परीत्य" 'काल के अनुवाद को जान कर'
वह सविता के समय को कहता है-सविता के काल में शब्द
करता है, यह जान कर समाम्नाय में कृकवाकु सविता का
पशु कहा गया है। क्योंकि मुरगा सवेरे ही बोलता है, जो
उषा के बाद सूर्योदय के समीप काल होता है, जिस में नीचे

हिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) १२ अ० २ पा० ३ रु०

से पृथ्वी काली और ऊपर से आकाश धौला होता है। इस
प्रकार यह पशुसमाम्नाय भी सविता के काल का बोधक
होता है।
‘कृकवाकु’ कैसे ? ‘कृकवाकु’ का पूर्व भाग (कृक) शब्द
का अनुकरण है-जैसा कि वह शब्द करता है, उस के सदृश
शब्द को जनाने वाला है, और दूसरा भाग (वाकु) बोलना
अर्थ में ‘वच’ (अदा० प०) धातु से है। ‘कृंकू’ ऐसा शब्द
बकता है, इससे ‘कृकवाकु’ है।
“भगः” ‘भग’ (८) शब्द व्याख्यान किया जाचुका
(३, ३, ४)
“तस्य०” उसका काल उत्सर्पण (ऊपर आकाश देश में
चढ़ने) से पहिले है— उस सविता के काल के पश्चात् यह
‘भग’ नाम उत्तम ज्योतिः होता है।
“तस्य०” उस (भग) की यह ऋचा है- ॥२[१३]॥
(खं० ३)
निरु०-“प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदि-
तेर्यो विधर्त्ता। आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा
चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥” [ऋ०सं० ५,४,८,२]
प्रातर्जितम् भगम् उग्रं ह्वयेम वयं पुत्रम् अदितेः।
यो विधारयिता सर्वस्य । आध्रश्चिद्यं मन्यमानः
आध्यालुः दरिद्रः । तुरश्चिद् ‘तुरः’-इति यमनाम
तरतेर्वा । त्वरतेर्वा । त्वरया तूर्णगतिः । यमः ।
राजा चिद् यं भगं भक्षि-इति आह ॥

“अन्धः भगः” इत्याहुः । अनुत्सृप्तो न दृश्यते ।
“प्राशित्रमस्याक्षिणी निर्जघान” इति च ब्राह्मणम्
जनं भगो गच्छति इति विज्ञायते । जनं
गच्छति आदित्यः उदयेन ।
‘सूर्यः’ सर्त्तेर्वा । सुवतेर्वा । स्वीर्य्यतेर्वा ।
तस्य एषा भवति ॥३(१४)॥
अर्थः—“प्रातर्जितं भगम्०” इस ऋचा का वसिष्ठ
ऋषि है ।
‘वयम्’ हम ‘प्रातर्जितम्’ प्रातः प्रातः [ सवेरे सवेरे ]
अन्धेरों को जीतने वाले ‘उग्रम्’ ( उद्गूर्णम्) उदय के लिये
उद्यत, ‘अदितेः पुत्रम्’ अदिति के पुत्र ‘भगम्’ भग देव को
‘हुवेम’ (ह्वयेम बुलाते हैं । ‘यः’ जो ‘विधर्त्ता(सर्वस्य विधार-
यिता) अपने अनुग्रह से सब जगत् का धारण करने वाला है
कैसे ? ‘आध्रः (चित्)’(आढ्यालुः दरिद्रः) धन वालों की इच्छा
करने वाला दरिद्र पुरुष‘यं’जिसभग को‘मन्यमानः’मान करता
हुआ रहता है- दिन दिन आकाङ्क्षा से पूजा करता हुआ
रहता है- कब भग (सूर्य) देव उदय हो और कब मैं अन्न
के अर्थ पर्यटन करूं । ‘तुरः’ (चित्) [ तूर्णगतिः यमः ] शीघ्र
गति यमराज [यं मन्यमानः] जिस [ भग ] को मान करता
है—सूर्य के उदय अस्त से ही काल चक्र फिरता है और उसी
से प्राणियों की आयु क्षीण होती है तथा उसी से फिर
प्रेतराज प्राणियों का संहार करने के लिये उद्यत होता है,
अतः वह भी भग देव की आकाङ्क्षा करता है । ‘राजा-

प्रति जाता है, यह प्रसिद्ध ही है— आदित्य उदय हो २ कर
जनों के प्रति जाता है ॥
'सूर्य' (६) कैसे ? 'सरति' गति अर्थ में 'सृ' (भ्वा० प०)
धातु से है। अथवा 'सुवति' जनने अर्थ में 'सू' (तु०प०) धातु से
है। अथवा 'सु' [उप०] 'ईर' [अदा०आ०] धातु से है, क्यों कि—
वायु से सुन्दरप्रेरण किया जाता है ।
“तस्य०” उस सूर्य] की यह ऋचा है ॥ ३(१४)॥
(खं० ४)
निरु० “उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः ।
दृशे विश्वाय सूर्य्यम् ॥” [ऋ० सं० १, ४, ७, १ ।
य० वा० सं० ७,४१।सा०सं० छ०आ०१,१,३,१०] ॥
उद्वहन्ति तं जातवेदसं रश्मयः केतवः सर्वेषां
भूतानां दर्शनाय सूर्य्यम् इति कम् अन्यम् आदि-
त्याद् एवम् अवक्ष्यत् ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥४ (१५) ॥
अर्थः- “उदुत्यं जातवेदसम्०” इस ऋचा का प्रस्क-
ण्व ऋषि और आश्विन में विनियोग है ।
'केतवः' [रश्मयः] रश्मिएं 'विश्वाय' [सर्वेषाम् भूतानाम्]
सब प्राणियों के 'दृशे' [दर्शनाय] दर्शन [दृष्टि फैलने के] लिये
[उ] 'त्यम्' [ तम् ] उस 'जातवेदसम्' हुये २ को जानने वाले
'देवम्' देव 'सूर्य्यम्' सूर्य को 'उद्-वहन्ति' [ उदय' नयन्ति ]
उदय को प्राप्त करते हैं [उद्वहन्ति] उठाते हैं । (उस सूर्य को
अपने वाञ्छित की सिद्धि के अर्थ हम स्तुति करते हैं

ॱ हिन्दी निरुक्त ( ४९७ ) १२अ० २पा० ५ खं० ॱ
"कम् अन्यम्०" आदित्य से अन्य किसको ऐसा कहता
इससे यहां 'सूर्य' आदित्य ही है । ^
"तस्य एषा०" उस (सूर्य) की यह और ऋचा है । सो
क्यों ? पूर्व मन्त्र में "जातवेदसम्" और "सूर्यम्" इन
दोनों पदों का श्रवण है, इससे उस में यह सन्देह होसकता है
कि-यह ऋचा जातवेदस् देवता की है, या सूर्य की ? किन्तु
यह अगली ऋचा असन्देह सूर्य देवता की ही है, इससे यह
और ऋचा पढी है ॥४(१५)॥
(खं० ५)
निरु०- "चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य
वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥” (ऋ० सं० १,
८, ७, १ । य० वा० सं० ७, ४२) ॥
चायनीयं देवानाम् उदगमद् अनीकं ख्यानं
मित्रस्य वरुणस्य अग्नेश्च अपूपुरद् द्यावापृथिव्यौ
च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन तेन सूर्य आत्मा जङ्गम-
स्य च स्थावरस्य च ।
अथ यद् रश्मिपोषं पुष्यति तत्-
'पूषा' भवति ।
तस्य एषा भवति ॥५ (१६) ॥ ॥
अर्थः- "चित्रं देवानाम्०" इस ऋचाका कुत्स ऋषि
और आश्विन में विनियोग है ।

हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) १२अ० २पा० ६खं०
'चित्रम्' ( चायनीयं = पूजनीयं ) पूजनीय 'देवानाम्'
रश्मियों का 'अनीकम्' समूह रूप 'मित्रस्य' मित्र का 'वरु-
णस्य' वरुण का 'अग्नेः' अग्नि का 'चक्षुः' नेत्र, ( रूपानम् )
जिस में मित्र आदि देवता अन्तर्गत दिखाई देते हैं, भेदपक्ष
( याज्ञिक मत ) में मित्र आदि देवताओं का जो चक्षु है, या
वे उसके द्वारा देखते हैं, वह सूर्य ' उदगात् ' उदय हुआ ।
'द्यावापृथिवी' ( द्यावापृथिव्यौ ) द्युलोक, पृथिवीलोक और
अन्तरिक्ष लोकको ( तीनों लोकोंको ) 'आप्राः' ( आपूरयत् =
आपूरयति ) ( महत्त्वेन ) महान् होने के कारण पूरता है, या
व्यापन करता है । ( तेन ) तिससे 'सूर्यः' सूर्य देव 'जगतः'
जङ्गम का ' तस्थुषश्च ' और स्थावर का ( सब जगत् का )
'आत्मा' अन्तर्यामी या स्वरूपभूत है ।
“अथ यद् ०” अनन्तर जब सूर्य तेजसे पूर्ण होकर रश्मि-
ओं को धारण करता है, उस समय 'पूषा' (१०) हो जाता है।
“तस्य०” उस ( पूषा ) की यह ऋचा है-॥५(१६)॥
( खं० ६ )
निरु०-“शुक्रन्ते अन्यद्यजतन्ते अन्यद्विषुरूपे
अहनीं द्यौरिवासि । विश्वाहि माया अवसि
स्वधा वो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥” [ऋ०सं०
४, ८, २४, १ । सा०सं०छ०आ० १, २, ३, ३] ॥
शुक्रं ते अन्यद्, लोहितं ते अन्यद्, यजतं ते
अन्यद्, याज्ञियं ते अन्यत्, विषमरूपे ते अहनी
कर्म । द्यौरिव च असि । सर्वाणि प्रज्ञानानि

अवसि। अन्नवन् ! भाजनवती ते पूषन् ! इह
दत्तिः अस्तु ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥६(१७)॥
अर्थः- "शुक्रन्ते०" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि और
चातुर्मास्य में पूषा के हविः में विनियोग है ।
'पूषन् !' हे पूषन् ! देव ! "शुक्रं (शुक्लं) ते अन्यत्"
तेरा सुपेद रूप न्यारा है (लोहितं ते अन्यत्) और लाल
रूप तेरा न्यारा है । "यजतं ते अन्यत्" (यज्ञियं ते
अन्यत्) यज्ञ में पूजने का रूप तेरा अलग है, जो यज्ञ के
अयोग्य है, वह तेरा रूप अलग है । "विषुरूपे अहनी"
(विषमरूपे ते अहनी कर्म) परस्पर में भिन्न रूप वाले सुपेद
और काले रात्रि और दिन दोनों तेरे कर्मरूप हैं-उदय रूप
कर्म से तू सुपेद दिन को करता है, और अस्तमय कर्म से
काली रात्रि को करता है । "द्यौः इव ( च ) असि"
और तू द्यौ के समान है- जिस प्रकार द्यौ (आकाश) सब
जगत् को आवरण (ढांप) कर के वर्त्तमान है, उसी प्रकार
तू भी है । "विश्वा हि माया अवसि" (सर्वाणि प्रज्ञा-
नानि अवसि) और बुद्धि वाले सब प्राणियों की बुद्धियों
को तू पालन करता है । 'स्वधावः !' (अन्नवन् !) हे अन्न
वाले ! 'पूषन् !' पूषन् देव ! 'ते' तेरी 'भद्रा' (भाजनवती =
वन्दनीया) स्तुति करने योग्य 'रातिः' दातृत्ता (दान) 'इह'
इस हमारे कर्म में 'अस्तु' हो-यह हम चाहते हैं ॥
"तस्य०" इस (पूषा) की यह और ऋचा है-॥६[१७]॥

• हिन्दी निरुक्त ( ५०० ) १२ अ० २ पा० ७ ख० •
( खं० ७ )
निरु० "पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो
अभ्यानडर्कम् । सनो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा। धि-
यन्धिषं सीषधाति प्रपूषा ॥" [ ऋ०सं० ७,१,८,८
य०वा०सं० ३४,४२ ]
पथस्पथः अधिपतिं वचनेन कामेन कृतः अभ्या-
नङ् अर्कम्, अभ्यापन्नः अर्कम्-इतिवा । स नो
ददातु चायनीयाग्राणि धनानि । कर्म कर्म च नः
प्रसाधयतु पूषा-इति ॥
अथ यद्विषितो भवति तद्-
'विष्णुः' । विशतेर्वा । व्यश्नोतेर्वा ।
तस्य एषा भवति ॥ ७ (१८) ॥
अर्थः- "पथस्पथः" इस ऋचा का ऋजिश्वन् ऋषि
और पूषा के हविः में पञ्च अहन् में व्यूढ में विनियोग है ।
'वचस्या' (वचनेन) स्तुतिरूप वचन से 'कामेन' और
कामना से 'कृतः' किया हुआ या प्रेरित हुआ (अहम्) मैं
'पथस्पथः' [सर्वेषां मार्गाणाम्] पथ पथ के या सब मार्गों के
'परिपतिम्' (अधिपतिम्) अधिपति 'अर्कम्' सूर्य (पूषा)
को 'अभ्यानट् [अभ्यापन्नः] प्राप्त हुआ हूं या शरणागत
हुआ हूं । 'सः' वह 'पूषा' पूषा देव 'नः' हमें 'चन्द्राग्राः'
(चायनीयाग्राणि) धर्म से प्राप्त हुये हुये 'शुरुधः' (धनानि)
धनों को 'रासत् (ददातु) देवे । 'धिय' धियम् (कर्म कर्म

हिन्दी निरुक्त ( ५०१ ) १२ अ० २ पा० ८ खं०
च, और कर्म कर्म को या सब कर्मों को 'प्रसीपधाति' (प्रसा-
धयतु ) सिद्ध करे, - यह हम चाहते हैं ॥
“अथ यद्०” अब जो 'विषित' व्याप्त होता है, यह
विष्णु' [११] होता है- व्याप्ति अर्थ में 'विषु' (जु०उ०)
धातु से है। अथवा प्रवेश अर्थ में 'विश' (तु०प०) धातु से है
क्योंकि-वह विभु होने से सर्वत्र प्रवेश किया हुआ होता है
अथवा व्याप्ति अर्थ में 'वि-अश' (स्वा०आ०) धातु से है।
“ तस्य० ” उस 'विष्णु' [११] की यह ऋचा है
॥ ७ ( १८) ॥
(खं० ८)
निरु०- “ इदं विष्णु र्विचक्रमे त्रेधा निदधे
पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥” ऋ० सं० १, २,
७, २ । य० वा० सं० ५, १५ । सा० सं० छ० आ०
८, २, ५, २ । अथ० सं० ७, २६, ४ ॥
यद् इदं किञ्च तद् विक्रमते विष्णुः त्रिधा
निधत्ते पदं त्रेधा भावाय,-पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे
दिवि, - इति शाकपूणिः ।
समारोहणे, विष्णुपदे, गयशिरसि- इति
और्णवाभः ।
समूळ्व् हमस्य 'पांसुरे' प्यायने अन्तरिक्षे ।
पदं न दृश्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ५०२ ) १२अ० २पा० ८ खं०,
अपिवा उपमार्थे स्यात्- समूळ्हमस्य पांसुले
इव पदं न दृश्यते- इति ।
‘पांसवः’ पादैः सूयन्ते- इति वा । पन्नाः
शेरते इति वा । पिंशनीया भवन्ति— इति
वा ॥८ (१९)॥
इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः
पादः ॥१२, २, ॥
अर्थः- “इदं विष्णुः०” इस ऋचा का मेधातिथि
ऋषि और प्रायश्चित्त तथा आज्योसादन (घृत के स्थापन)
में विनियोग है ।
'इदम्' इस नानाविभाग से अवस्थित जगत् को 'विष्णुः'
विष्णु (आदित्य देव ) 'विक्रमते' (अधितिष्ठति) अधिष्ठित
होता है— दबा कर स्थित होता है। कैसे ? ‘त्रेधा पदं
निदधे” (त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधाभावाय) तीन प्रकार से-
पद (पैर) को रखता है- पार्थिव अग्नि होकर पृथिवी में जो
कुछ है, उस पर अधिकार करके रहता है, अन्तरिक्ष में वि-
द्युत्(बिजली)के रूप से और द्युलोक में सूर्य के रूप से अधि-
कृत होता है- ऐसा त्रेधाभाव (तीन रूप) शाकपूणि आचार्य
मानते हैं ।
समारोहण = उदय गिरिमें उदय होता हुआ विष्णु देव
एक पद धरता है, मध्यान्ह काल में विष्णु पद (आकाश) में
दूसरा और सायंकाल में गयशिर (अस्तंगिरि = अस्ताचल)
पर तीसरा पद रखते हैं, यह और्णवाभ आचार्य मानते हैं ।

हिन्दी निरुक्त (५०३) १२ अ० २ पा० ८ खं०
"समूढम् अस्य पांसुरे प्यायने = अन्तरिक्षे
पदं न दृश्यते" पांसुर = प्यायन = सब भूतों की वृद्धि
के कारण = अन्तरिक्ष में इसका पद 'समूढ' गुप्त है- अन्तरिक्ष
लोक में जो विष्णु देव का विद्युत् रूप पद है, वह स्थायिरूप
से नहीं दिखाई देता, किन्तु शीघ्र ही अन्तर्धान होजाता है।
"अपिवा" अथवा उपमा अर्थ में होसकता है- "समूह-
म् अस्य पांसुले इव पदं न दृश्यते" मध्यम लोक में
रखा हुआ इसका पद रेतीले स्थान में रखे हुये पैर के समान
नहीं दिखाई देता-रेतीले स्थान से पैर उठाते हैं, उस स्थान में
झट पट रेत भरजाने से पैर का चिन्ह शीघ्र मिट जाता है,
ऐसे ही विष्णु देव का विद्युत् रूप पद भी शीघ्र अन्तर्धान
होजाने से फिर नहीं दिखाई देता ।
'पांसु' (धूलिये) क्यों ? 'पादैः सूयन्ते' पैरों से पैदा होती
हैं-पैरों के पृथिवी में आघात या रगड़ से पैदा होजाती हैं
इससे 'पांसु' हैं। अथवा वे प्रोप्त होकर सोती हैं- उत्पन्न
होकर पड़ी रहती हैं। अथवा वे पिशनीय या ध्वंसनीय होने
से 'पांसु' हैं। क्यों कि- वे जिस पर गिर जाती हैं, वह
अच्छी तरह दिखाई नहीं देता, अतः वे हिसनीय या हटा
देने योग्य होती हैं ॥८(१६) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१२,२॥
तृतीयः पादः ॥
निघ०-विश्वानरः ॥१२॥ वरुणः १३
केशी ॥१४॥ केशिनः ॥१५॥ वृषाकपिः

हिन्दी निरुक्त ( ५०४ ) १२अ० ३पा० २ खं०
॥१६॥ यमः ॥१७॥ अजएकपात् ॥१८॥
पृथिवी ॥१९॥ समुद्रः ॥२०॥ दध्यङ्
॥२१॥ अथर्वा ॥२२॥ मनुः ॥२३॥
( खं० १ )
निरु०- 'विश्वानरो' व्याख्यातः।
तस्य एष निपातो भवति ऐन्द्रयाम्-ऋचि१(२०)
अर्थ:- 'विश्वानर' (१२) शब्द व्याख्यान किया जा-
चुका है (७, ६, १) ।
“तस्य०” उस (विश्वानर) का यह इन्द्र देवता की
ऋचा में निपात है ॥१ (२०)॥
(खं० २)
निरु-० “विश्वानरस्य वस्पति मनानतस्य
शवसः। एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥”
(ऋ० सं० ६, ५, १, ४ । सा० सं० छ० आ० ४,
२ ३, ५) ॥
विश्वानरस्य आदित्यस्य अनानतस्य शवसो
महतो बलस्य एवैश्च कामैः अयनैः अवनैः र्वा
चर्षणीनां मनुष्याणाम्, ऊत्या च पथा रथानाम्
इन्द्रम् अस्मिन् यज्ञे ह्वयामि ॥
'वरुणः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥२ (२१) ॥

हिन्दी निरुक्त (५०५) १२ अ० ३ पा० २ खं०
अर्थः– “विश्वानरस्य ०” यह ऋचा इन्द्र देव-
ता के “आत्वा रथं यथोतये” इस सूक्त में है, इस
का प्रियमैध ऋषि और निष्केवल्य(शस्त्र)में विनियोग है।प्रयोज-
न— उक्त सूक्त तथा इस प्रस्तुत ऋचा में स्तुति इन्द्र देवता की
है, उसी इन्द्र की प्रशंसा में किसी सम्बन्ध से विश्वानर
आया हुआ है, यही इसका यहां निपात है। क्यों कि- अन्य
देवता की स्तुति में अन्य देवता किसी सम्बन्ध से आवे तो
उसका वहां वह निपातहोता है, यह इस उदाहरण केअनुसार
अन्यत्र भी देखना चाहिये ।
‘विश्वानरस्य’ (आदित्यस्य) आदित्य के ‘अनानतस्य’ अन्य
ज्योतियों से अतिरस्कृत = न दबे हुए ‘शवसः’ (महतो बल-
स्य) महान् ज्योतिर्बल के ‘पतिम्’ पति (इन्द्रम्) इन्द्र को
‘चर्षणीनाम्’ (मनुष्याणाम्) मनुष्यों के ‘एवैः’ (च कामैः) कामों
(अर्थों) के निमित्त (अयनैः) गमन (चलने फिरने) के निमित्त
(अवनै र्वा) अथवा रक्षाके निमित्त ‘रथानाम्’ रथों के ‘ऊती’
(ऊत्या च पथा) मार्ग से ‘हुवे’ (अस्मिन् यज्ञे ह्वयामि) इस
यज्ञ में आवाहन करताहूं = बुलाता हूं ॥
‘वरुणः’ (१३) ‘वरुण’ शब्द व्याख्यान किया जाचुका
है (१०, १, ३)
“तस्य० उस (वरुण) की यह ऋचा है॥२ (२१)॥
[ खं० ३ ]
निरु०-“येनापावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु
त्वं वरुण पश्यसि ॥” (ऋ०सं० १।४।७,५ । सा०
सं०आर०आ० ५ द० ११) ।

| हिन्दी निरुक्त (५०६) १२ अ० ३ पा० ३ खं०
'भुरण्युः' इति क्षिप्रनाम । भुरण्युः शकुनिः ।
भूरिम् अध्वानं नयति स्वर्गस्य लोकस्यापि वोढा
तत्सम्पाती भुरण्युः अनेन पावक ! ख्यानेन ।
भुरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि । तत्ते
वयं स्तुमः इति वाक्यशेषः ।
अपिवा उत्तरस्याम् ॥ ३ (२२) ॥
अर्थ:-"येना पावक चक्षसा०" ये सब ऋचाएं
प्रस्कण्व ऋषि की हैं और अश्विनों के शस्त्र में इनका विनि-
योग है।
हे 'पावक '! 'वरुण '! 'येन' जिस 'चक्षसा' (ख्यानेन)
दृष्टि (दर्शन) से 'जनान्-अनु' (पूर्वान् पुण्यकृतः जनान्
अनु) पूर्व पुण्यवानों के पीछे 'भुरण्यन्तम्' जल्दी २ देवमार्ग
से स्वर्ग को जाते हुए अग्नि को आधान करने वाले जन को
'त्वं' तू 'पश्यसि' देखता है (तत् ते वयं स्तुम) उस तेरे
दर्शन (देखने) को हम स्तुति करते हैं। यह वाक्यशेष है-
भाष्यकार ने "येन" पद के जोड़ के लिये या उसकी अपेक्षा
को पूर्ण करने के लिये "तत् ते वयं स्तुमः" यह "तत्"
पद वाला वाक्य अध्याहार किया है। इस प्रकार जहां मन्त्रों
मे अधूरा वाक्य रह जाये, वहां उस २ मन्त्रार्थ के अनुकूल
अध्याहार कर लेना चाहिये, यह भाष्यकार ने दिखाया है।
"भुरण्युः०" 'भुरण्यु' यह शीघ्र का नाम है। 'भुरण्यु'
शकुनि = पक्षी होता है। क्यों ? "भूरिम् अध्वानं नयति"

बहुत मार्ग को लेजाता है चला जाता है । ‘स्वर्गस्य लोक-
स्यापि वोढा’ तथा स्वर्ग लोक को लेजाने वाला अग्नि भी
‘भुरण्यु’ है! “स्वर्गाय लोकाय अग्निश्चीयते” ‘स्वर्ग
लोक के लिये अग्नि चयन (स्थापन) किया जाता है’- यह
श्रुति है। ‘तत्संपाती’ उसके साथ जाने वाला - अग्नि को
चयन करने वाला अग्नि से युक्त जन कर्म के अनुष्ठान से
उत्पन्न हुए अदृष्ट को लेकर स्वर्ग लोक के प्रति जाता है, वह
“भुरण्यति” (शीघ्र जाता है) कहा जाता है, उसी
“भुरण्यति” पद से ‘भुरण्यत्’ शब्द बनता है, जिस का
रूप मन्त्र में ‘भुरण्यन्तम्’ है । सुतराम् यह ‘भुरण्यत्’
शब्द ‘भुरण्यु’ शब्द से नामधातु के संस्कार द्वारा बना है ॥
“अपिवा०” ऐसा भी है, जैसा कि—यह कहा गया,
और ऐसा भी दूसरे प्रकार से [व्याख्यान] है, जैसा कि—
उत्तरा = अगली ऋचामें इस पूर्व ऋचा को मिला देने से होता
है-॥ ३ [ २२ ] ॥
( सं० ४ )
निरु०-“येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्व वरुण पश्यसि ॥
विद्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः ।
पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥”
व्येषि द्यां रजश्च पृथु महान्तं लोकम् अहानि
च मिमानः अक्तुभिः रात्रिभिः सह पश्यन् जन्मानि
जातानि सूर्य ! ।

हिन्दी निरुक्त ( ५०८ ) १२अ० ३पा० ५ खं०
अपिवा पूर्वस्याम् ॥४(२३॥
अर्थः-“येना पावक ” ! हे पावक ! वरुण ! जिस
दृष्टि से पूर्व सुकृति जनों के पीछे जाते हुए अग्नि-पूजक जन
को तू देखता है, उसी दृष्टि से युक्त होकर तू द्याम्' द्युलोक
को 'वि-एषि' विविध प्रकार से या अतिशय से जाता है,
'पृथु रज:' [ महान्तं लोकम् अन्तरिक्षम् ] और बड़े लोक =
अन्तरिक्ष को 'अक्तुभिः' [ रात्रिभिः सह ] रात्रियों के सहित
'अहा' [ अहानि च ] दिनों को 'मिमान' ( कुर्वन् ) करता
हुआ 'जन्मानि' [ जातानि ] तथा उत्पन्न हुई वस्तुओं को
'पश्यन्' देखता हुआ 'सूर्य'! हे सूर्य ! तू जाता है ।
“अपिवा०" अथवा उत्तरा (अगली) ऋचा में एक
वाक्यता हो सकती है, अथवा तो पूर्व ऋचामें भी एक वाक्यता
होसकती है- जिस प्रकार पूर्वोक्त रीति से अध्याहार के द्वारा
प्रस्तुत ऋचा का अर्थ पूरा होसकता है, और उत्तर ऋचा के
साथ उसे मिला देने से उसका पूर्ण अर्थ होजाता है, उसी
प्रकार इस ऋचा को पूर्व ऋचा में भी मिला देने से वह
कार्य हो सकता है, जैसा कि- आचार्य आगे पढ़ता है-
॥ ४ ( २३ ) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“येना पावक चक्षषा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्
प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे ॥”