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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

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DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1258

ॱ हिन्दी निरुक्त ( ४९७ ) १२अ० २पा० ५ खं० ॱ
"कम् अन्यम्०" आदित्य से अन्य किसको ऐसा कहता
इससे यहां 'सूर्य' आदित्य ही है । ^
"तस्य एषा०" उस (सूर्य) की यह और ऋचा है । सो
क्यों ? पूर्व मन्त्र में "जातवेदसम्" और "सूर्यम्" इन
दोनों पदों का श्रवण है, इससे उस में यह सन्देह होसकता है
कि-यह ऋचा जातवेदस् देवता की है, या सूर्य की ? किन्तु
यह अगली ऋचा असन्देह सूर्य देवता की ही है, इससे यह
और ऋचा पढी है ॥४(१५)॥
(खं० ५)
निरु०- "चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य
वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥” (ऋ० सं० १,
८, ७, १ । य० वा० सं० ७, ४२) ॥
चायनीयं देवानाम् उदगमद् अनीकं ख्यानं
मित्रस्य वरुणस्य अग्नेश्च अपूपुरद् द्यावापृथिव्यौ
च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन तेन सूर्य आत्मा जङ्गम-
स्य च स्थावरस्य च ।
अथ यद् रश्मिपोषं पुष्यति तत्-
'पूषा' भवति ।
तस्य एषा भवति ॥५ (१६) ॥ ॥
अर्थः- "चित्रं देवानाम्०" इस ऋचाका कुत्स ऋषि
और आश्विन में विनियोग है ।