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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1266, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1266

हिन्दी निरुक्त (५०५) १२ अ० ३ पा० २ खं०
अर्थः– “विश्वानरस्य ०” यह ऋचा इन्द्र देव-
ता के “आत्वा रथं यथोतये” इस सूक्त में है, इस
का प्रियमैध ऋषि और निष्केवल्य(शस्त्र)में विनियोग है।प्रयोज-
न— उक्त सूक्त तथा इस प्रस्तुत ऋचा में स्तुति इन्द्र देवता की
है, उसी इन्द्र की प्रशंसा में किसी सम्बन्ध से विश्वानर
आया हुआ है, यही इसका यहां निपात है। क्यों कि- अन्य
देवता की स्तुति में अन्य देवता किसी सम्बन्ध से आवे तो
उसका वहां वह निपातहोता है, यह इस उदाहरण केअनुसार
अन्यत्र भी देखना चाहिये ।
‘विश्वानरस्य’ (आदित्यस्य) आदित्य के ‘अनानतस्य’ अन्य
ज्योतियों से अतिरस्कृत = न दबे हुए ‘शवसः’ (महतो बल-
स्य) महान् ज्योतिर्बल के ‘पतिम्’ पति (इन्द्रम्) इन्द्र को
‘चर्षणीनाम्’ (मनुष्याणाम्) मनुष्यों के ‘एवैः’ (च कामैः) कामों
(अर्थों) के निमित्त (अयनैः) गमन (चलने फिरने) के निमित्त
(अवनै र्वा) अथवा रक्षाके निमित्त ‘रथानाम्’ रथों के ‘ऊती’
(ऊत्या च पथा) मार्ग से ‘हुवे’ (अस्मिन् यज्ञे ह्वयामि) इस
यज्ञ में आवाहन करताहूं = बुलाता हूं ॥
‘वरुणः’ (१३) ‘वरुण’ शब्द व्याख्यान किया जाचुका
है (१०, १, ३)
“तस्य० उस (वरुण) की यह ऋचा है॥२ (२१)॥
[ खं० ३ ]
निरु०-“येनापावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु
त्वं वरुण पश्यसि ॥” (ऋ०सं० १।४।७,५ । सा०
सं०आर०आ० ५ द० ११) ।

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 1266, कुल 1282 में से · SarvaKosh