निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५०८ ) १२अ० ३पा० ५ खं०
अपिवा पूर्वस्याम् ॥४(२३॥
अर्थः-“येना पावक ” ! हे पावक ! वरुण ! जिस
दृष्टि से पूर्व सुकृति जनों के पीछे जाते हुए अग्नि-पूजक जन
को तू देखता है, उसी दृष्टि से युक्त होकर तू द्याम्' द्युलोक
को 'वि-एषि' विविध प्रकार से या अतिशय से जाता है,
'पृथु रज:' [ महान्तं लोकम् अन्तरिक्षम् ] और बड़े लोक =
अन्तरिक्ष को 'अक्तुभिः' [ रात्रिभिः सह ] रात्रियों के सहित
'अहा' [ अहानि च ] दिनों को 'मिमान' ( कुर्वन् ) करता
हुआ 'जन्मानि' [ जातानि ] तथा उत्पन्न हुई वस्तुओं को
'पश्यन्' देखता हुआ 'सूर्य'! हे सूर्य ! तू जाता है ।
“अपिवा०" अथवा उत्तरा (अगली) ऋचा में एक
वाक्यता हो सकती है, अथवा तो पूर्व ऋचामें भी एक वाक्यता
होसकती है- जिस प्रकार पूर्वोक्त रीति से अध्याहार के द्वारा
प्रस्तुत ऋचा का अर्थ पूरा होसकता है, और उत्तर ऋचा के
साथ उसे मिला देने से उसका पूर्ण अर्थ होजाता है, उसी
प्रकार इस ऋचा को पूर्व ऋचा में भी मिला देने से वह
कार्य हो सकता है, जैसा कि- आचार्य आगे पढ़ता है-
॥ ४ ( २३ ) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“येना पावक चक्षषा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान्
प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे ॥”