निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1250, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४८८ ) १२ अ० १ पा० ११ खं०
अर्थः- "त्वष्टा दुहित्रे०" इस ऋचा का पूर्व ऋचा के
समान ही ऋषि और विनियोग है ।
'त्वष्टा' ( देवो विश्वकर्मा ) त्वष्टा देव जिसे पुराणों के
जानने वाले 'विश्वकर्मा' कहते हैं 'दुहित्रे' (दुहितुः) अपनी
कन्या का 'वहतुम्' (वहनम्) विवाह 'कृणोति' ( करोति )
करता है "इदं विश्वं भुवनं समेति" यह सब संसार (जिसे
देखने के लिये ) आता है । ( यह विवाहों का स्वभाव है । )
"यमस्य माता" यमकी माता- जो यमकी माता
होने वाली है, सो 'पर्युह्यमाना' (पर्युढा ) ( विवस्वान से )
ब्याही गई 'महः' (महतः) महान् 'विवस्वतः' विवस्वान् (आदि-
त्य) की 'जाया' भार्या 'ननाश' नष्ट होगई— यम और यमी
रूप दो मिथुनों को छोड़कर अन्तर्धान होगई ॥
नैरुक्त पक्ष में-त्वष्टा मध्यम देव तमोभाग उषाकी प्रकाश
रूपा दुहिता (बेटी) का वहन ( विवाह ) विवस्वान् के साथ
करता है, या उसे देदेता है "इदं विश्वं भुवनं समेति"
सब भूत (प्राणी) प्रभात हुआ जानकर अपने २ कार्यों में लग
जाते हैं, “ यमस्य माता” मध्य की माता (देव धर्म से )
अथवा द्युस्थान देवकी जो ही भार्या है वही माता (क्योंकि-
जिसमें पुत्र रूप से पति जनमता है, इसी से वह 'जाया' है ।)
"महो विवस्वतो ननाश" महान् विवस्वान् देव के
प्रकाश से हटती हुई नष्ट होती है ।
क्योंकि-"रात्रिः आदित्यस्य आदित्योदये अन्त-
र्धीयते" 'रात्रि या उषा आदित्य की जाया ( पत्नी ) है, सो