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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) १२ अ० १ पा०, १ खं०

अर्थः-मध्यस्थान के देवताओं का विशेष वचनों और लिङ्गों
के द्वारा व्याख्यान हो चुका, अब उसी समाम्नाय के अनुक्रम
के अनुसार द्युस्थान [उत्तम स्थान] के देवताओं का व्याख्यान
करना चाहिये, इस लिये विशेष रूप से पुनः अधिकार वचन
कहते हैं-,
“अथातो द्युस्थाना देवताः”
अब यहां से द्युस्थान के देवताओं का व्याख्यान किया
जावेगा । उनमें 'अश्विन्' प्रथमागामी (पहिले आने योग्य) हैं।
'अश्विनौ' [१] [अश्विन्] क्यों हैं? 'यद् व्यश्नुवातेसर्वम्'
जिससे कि- वे सब को व्यापन करते हैं, उनमें एक रस
(जल) से, और दूसरा (एक) ज्योति या प्रकाश से ।
अश्वों (घोड़ों) से वे 'अश्विन्' हैं- वे घोड़े वाले होने से
'अश्विन्' हैं । यह और्णवाभ आचार्य मानता है । (यह व्या-
ख्यान ऐतिहासिक पक्ष में घटता है ।)
“तत्०” सो कौन अश्विन् हैं ?
'द्यावापृथिवी हैं- द्युलोक और पृथिवी लोक हैं'
ऐसा कोई मानते हैं ।
'अहोरात्र हैं- दिन और रात्रि हैं' ऐसा कोई आचार्य
मानते हैं ।'
'सूर्य चन्द्रमा हैं -ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।'
'पुण्य कर्म के करने वाले राजा हैं- ऐसा ऐतिहासिक
मानते हैं।'
“तयोः०” उन (अश्विनों)का काल अर्द्धरात्र(आधीरात)
से पीछे है, ज्योति से फाड़ा जाता हुआ अंधेरा- जिस समय

हिन्दी निरुक्त ( ४६६ ) १२ अ० १ पा० १ ख०
अन्धेरे को फाड़ता हुआ प्रकाश उसमें मिलने लगता है, या
जब तक मिलता रहता है, वह काल सूर्योदय से पहिले २
अश्विनों का है ।
“तमोभागोहि मध्यमः” उस प्रकाश और अन्धकार
के मेल में अन्धेरे का भाग मध्यम देव है ।—
“ज्योतिर्भागः आदित्यः” और प्रकाश भाग आदित्य
(उत्तम देव) है। (यह नैरुक्त मत है) ॥
"तयोः०" उन दोनों (अश्विनों) की यह ऋचा है ॥१॥
व्याख्या ।
“द्युस्थाना देवताः ” यद्यपि नैरुक्तों के मत में द्युस्थान
का एक ही आदित्य देवता है, इससे 'देवता' पद में एक वचन
ही चाहिए, तथापि याज्ञिकों के मत में बहुत देवता हैं,
उनके मत में यह बहुवचन चरितार्थ हो जाता है ।
द्युस्थान के देवताओं का भेद । यद्यपि स्वरूप से सभी
द्युस्थान के देवता एक जैसे हैं, तथापि भिन्न २ काल के सम्बन्ध
से वे न्यारे २ समझे जाते हैं । तदनुसार अश्विनों का अन्य
द्युस्थान के देवताओं से भेद बताने के लिये प्रथम व्याख्येय
अश्विनों का “तयोः कालः०” इस पङ्क्ति से काल बता-
या है। इसी प्रकार अन्य २ देवताओं के व्याख्यानों में भी
उनके काल का अनुसन्धान रखना चाहिए ।
दोनों अश्विन भिन्न २ लोक के 'अश्विन्' नाम के दो
जोड़ले जैसे देवता हैं, जहां कहीं भी इनका नाम आता है,
द्विवचन से ही आता है, इसी से इनका अर्चन एक साथ

हिन्दी निरुक्त ( ४७० ) १२अ० १पा० १खं०
एक मन्त्र से ही होता है, किन्तु ये दोनों भिन्न-२ लोक के देवता
हैं। इनमें एक अन्धकार रूप है और एक प्रकाशरूप । जो
अन्धकार रूप है, वह मध्यम लोक का और जो प्रकाशरूप
है, वह उत्तम लोक का है ।
उत्तम लोक के देवताओं में व्याख्यान क्यों ?
यद्यपि इन में एक देवता मध्यम लोक का है इससे इस
[ अश्विन ] की व्याख्या मध्यम देवताओं में चाहिए, और
एक उत्तम लोक का है, इससे उत्तम लोक के देवताओं में (जैसे
कि-यहां है) चाहिए अथवा मध्यम (तमोरूप) का मध्यमों
में और उत्तम (प्रकाशरूप] का उत्तमों में व्याख्यान होना
चाहिये ? तथापि इनकी स्तुति सर्वत्र एक साथ ही आती है,
किन्तु एक २ की नहीं इससे इनका ऐसा निगम नहीं दिया
जा सकता जो एक देवता को वर्णन करे, इस से इन की
व्याख्या एक ही लोक के देवताओं में होसकती है, और
तथापि उत्तम लोक के देवताओं ही में उचित है। क्योंकि-
उत्तम लोक का जो देवता प्रकाशरूप है, वही अपने प्रकाश
रूप से वर्द्धमान है, और दूसरा जो तमोरूप है, वह सूर्योदय
की ओर जितना चलता है अपने तमोरूप से क्षीण होता जाता
है, प्रयोजन ? उत्तम देवता की बलवत्ता के कारण उसके अधि-
कार में व्याख्या प्राप्त होती है, इस से यहाँ व्याख्या की
गई है ॥
आचार्य का मत । यास्क का मत यह है कि-ये 'अश्विन्'
नाम से मध्यम उत्तम देवता हैं। जिसके समर्थन के लिये यह
उदाहरण देते हैं- ॥१॥

'हिन्दी' निरुक्त ( ४७१ ) १२ अ० १ पा० २ खं०
[ खं० २ ]
निरु०- "वसातिषु स्म चरथोऽसितौ पेत्वा-
विव। कदेदमश्विना युव मभि देवाँ अगच्छतम्॥"
इति सा निगदव्याख्याता ॥
तयोः समानकालयोः समानकर्मणोः संस्तुत-
प्राययोः असंस्तवेन एषोऽर्द्धर्चो भवति- "नासात्यो
अन्य उच्यत उषः पुत्रस्तवान्यः" इति ।
तयोः एषा अपरा भवति- ॥ २ ॥
अर्थः-"वसातिषुस्म-"ऋषि को देवता के दर्शन की
दृष्टि प्राप्तहुई, रात्रि भाग के बीते, दिनकी उगाली (सन्धि)
हुई, ऋषि सहसा ही (एकदम ही) अश्विन देवों को
देखकर कहता है।
हे 'अश्विनौ।' हे अश्विन देबो ! 'युवाम्' तुम दोनों
'असितौ' काले 'पेत्वौ-इव' मेघों के समान 'वसातिषु'
(रात्रिषु) रात्रियों में चरथ'(स्म) विचरते हो-आप के काले २
होने से रात्रिमें मैं आपको न देख सका, अब इस उषाकाल में
किसी प्रकार देख सकाहूं, इसी से कहता हूँ- 'अश्विना'
(अश्विनौ !) हे अश्विन् देवो ! 'कदा' कब 'इदम्' (अस्मत्कर्म
प्रति) इस हमारे कर्म के प्रति (ये देवा आगता) जो देवता
आए हैं, उनके प्रति 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों 'अभिगच्छतम्'
आए ? ॥ .
यह, सो ऋचा पाठ से ही व्याख्या की गई है।

हिन्दी निरुक्त ( ४७२ ) १२ अ० १ पा०, ३ खं० ॥
“तयोः०” उन दोनों समान काल वालों समान कर्म
वालों प्रायः एक साथ स्तुति वाले अश्विनों की पृथक् स्तुति
की यह आधी ऋचा है ।-
“वासात्यो अन्य०” अर्थात्— 'अन्यः' ( एकः ) एक
'वासात्यः' रात्रि को पुत्र है 'अन्यः' एक “तव उषःपुत्रः”
तुझ उषा का पुत्र है । यह ॥
“तयो रेषा०” उन ( अश्विनों ) की यह और ऋचा
है ॥ २ ॥
( खं० ३ )
निरु०- इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३
नामभिः स्वैः । जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरि
र्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ॥” (ऋ०सं० २, ४,
२५, ४ ) ।
इह च इह च जातौ संस्तूयेते पापेन अलिप्य-
मानया तन्वा नामभिश्च स्वैः जिष्णुर्वामन्यः
सुमहतो बलस्य ईरयिता मध्यमः , दिवः अन्यः
सुभगः पुत्रः ऊह्यते आदित्यः ।
तयोः एषा अपरा भवति ॥३॥
अर्थ—“इहेह जाता०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि
और प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है ।
( हे अश्विनौ ! युवाम् ऊह्येथे ) हे अश्विनो ! तुम दोनों

० हिन्दी निरुक्त ( ४७३ ) १२अ० १पा० ४खं०
से कहा जाता है- "इह-इह जाता" ( इह च (मध्यस्थाने)
इह च ( द्युस्थाने ) जातौ ) यहां मध्य स्थान में और यहां
द्युस्थान में 'जाता' ( जातौ ) उत्पन्न हुए हुए तुम दोनों
'अरेपसा' ( पापेन अलिप्यमानया ) पाप से न लिपती हुई
( पापरहित ) 'तन्वा' शरीर से—अपने संकल्प के अनुसार
ग्रहण किये हुए देह से 'स्वैः' अपने 'नामभिः' नामों से—
जो दूसरे के आश्रय के बिना अपनी स्तुति के निमित्त से हैं
'समवावशीताम्' ( संस्तूयेते = संस्तूयेथे ) स्तुति किये जाते
हो और वाम्' तुम दोनों में 'अन्यः' एक 'जिष्णुः' नित्य ही
जय लाभ करने वाला 'सुमखस्य' ( सुमहतौ बलस्य ) सुन्दर
महान् बलका 'सूरिः' ( ईरयिता ) प्रेरणा करने वाला है
( मध्यमः ) इससे मध्यम ( वायु या इन्द्र ) है । क्योंकि—
ऐसे गुण वाला मध्यम से अन्य नहीं है । 'अन्यः' और एक
'सुभगः' सुन्दर धन वाला 'दिवः' द्युलोक का 'पुत्रः' पुत्र
'उहे' ( उह्यते वायुना ) वायुके द्वारा वहन किया जाता है—
चलाया जाता है या लेजाया जाता है, वह (आदित्यः) आ-
दित्य है। क्योंकि—वह सूर्य से अन्य नहीं हो सकता । इस
प्रकार वहां परभी ये दोनों अश्विन मध्यम उत्तम देवरूप हैं।
“तयोः०” उन दोनों ( अश्विनों ) की यह और ऋचा
है । [ वह क्यों ? ये दोनों देवते साथ स्तुति वाले समान
काल वाले और समान कर्म वाले हैं, यह कहा है, उसके
दिखाने के अर्थ यह ऋचा है । ] ॥३॥
( खं० ४ )
निरु०—“प्रातर्युजा विबोधयाश्विना वेह गच्छ.

हिन्दी निरुक्त ( ४७४ ) १२अ० ५पा० १ खं०
ताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥” (ऋ०सं० १, २,
४, १)
प्रातर्योगिनौ विबोधय अश्विनौ-आगच्छताम्
अस्य सोमस्य पानाय ॥
तयोः एषा अपरा भवति ॥४॥
अर्थः- “प्रातर्युजा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि
और प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
हे (स्तोतः) स्तुति करने वाले ! ऋत्विज् ! 'प्रातर्युजा'
(प्रातर्योगिनौ) प्रातःकाल मिलने वाले-प्रातःकाल में हविः
से और स्तुति से संयुक्त होने वाले 'अश्विनौ' अश्विन् देवों
को 'विबोधय' जगा-सुन्दर स्पष्ट स्तुतियों से (अस्मदर्थम्)
हमारे लिये जना । और तुमसे जनाये हुए वे दोनों 'इह' इस
हमारे कर्म में 'आ-गच्छताम्' आवें । किस लिये 'अस्य' इस
'सोमस्य' सोम के 'पीतये' (पानाय) पीने के लिये ॥
“तयोः०” उन (अश्विनों) की यह और ऋचा है।
(यह किस लिये है? इन अश्विनों की अन्य कालमें इज्या (पूजा)
है ही नहीं, यदि कोई करे भी, तो वह अनिर्ज्या (अपूजा)
या व्यर्थ पूजा ही है, और इनका संस्तव या सहस्तुति ही
है, किन्तु पृथक् नहीं, यह अगली ऋचासे भली प्रकार दिखा-
या जाता है) ॥४॥
(खं० ५)
निरु०-“प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति
देवया अजुष्टम् । उतान्यो अस्मद्यजते विचावः

पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान् ॥” (ऋ० सं० ४,
४, १८, २) ॥
प्रातः यजध्वम् अश्विनौ प्रहिणुत न सायम्
अस्ति देवेज्या अजुष्टम् एतद् अपि अन्यो अस्मद्
यजते विचावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान्
वनयितृतमः । तयोः कालः सूर्योदयपर्यन्तः,
तस्मिन् अन्या देवता ओप्यन्ते ॥
‘उषाः’ वष्टेः कान्तिकर्मणः । उच्छतेः-इतरा
मध्यमिका ।
तस्या एषा भवति-॥५॥
अर्थ :-“प्रातर्यजध्वम्०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि
और प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो तुम से कहा जाता
है-(यूयम्) तुम सब ‘अश्विना’ (अश्विनौ) अश्विनों को
‘प्रातर्यजध्वम्’ प्रातःकाल ही यजन करो, [इसीसे कहता हूँ]
‘हिनोत’ (प्रहिणुत) बहुतायत से उनके प्रति स्तुतियों और
हवियों को पहुँचाओ । [मैं क्यों कहता हूँ प्रातःकाल यजन
करो ? ] “न सायम् अस्ति देवया” (देवेज्या) इन दो
देवताओं की सायंकाल में इज्या (पूजा) नहीं है। ‘अजुष्टम्’
(अनासेवितम्) यदि किसी प्रकार हो भी जावे, तो वह
उनका अजुष्ट = अस्वीकृत है-सायंकाल में किये हुये यजनको
वे देवता स्वीकार नहीं करते । ‘उत’ (एतदपि) और यह

हिन्दी निरुक्त ( ४७६ ) १२ अ० १ पा० ६ खं०
भी है कि-‘अस्मद्’ हम से ‘अन्यः’ दूसरा कोई पुरुष ‘यजते’
इन अश्विनों को यजन करता है या करे, ‘विचावः’ (वि च
अवः) (व्यावयति च) और हविष्यों से तर्पण करता है,
या करे, तो “पूर्वंः पूर्वः यजमानः वनीयान्” (वनयि-
तृतमः) पहिला पहिला यजमान सेवन करने योग्य होता है
या मान्य होता है—क्योंकि—हम पहिले यजन करते हैं, इस
से देवता के निकट उनके प्रसाद के पात्र हमीं बनेंगे ॥
“तयोः०” उन अश्विन देवों का सूर्योदय पर्यन्त काल
है। [ उस से क्या है ? ] उस स्तुति कालमे अश्विनोंके शस्त्र
में और देवता आवाप किये जाते हैं—अन्य देवताओं को
उस काल की स्तुति प्राप्त हो, इस लिये वे वहां भरे जाते
( घाले जाते ) हैं = उनके मन्त्र पढ़े जाते हैं।
‘उषाः’ [२] कैसे ? कान्ति अर्थ में ‘वश’ [ अदा० प० ]
धातु से है। जोकि-कहा है—(१, ६, १) ‘उच्छति’ (उच्छ
भ्वा० प०) कत्र्तृवाच्य धातु का है, वह विकल्प से द्युस्थान
उषा का नाम है। और जो दूसरी ‘उषाः’ मध्यम लोक की
है, उसके लिये विकल्प नहीं है, किन्तु वह ‘उच्छ’ (भ्वा०प०)
धातु से ही है।
“तस्याः०” उस (मध्यम लोक की उषा) की यह ऋचा
है— ॥ ५ ॥
[ खं० ६ ]
निरु०-“उषस्तच्चित्रमाभरास्मभ्यं वाजिनीवती।
येन तोकं च तनयं च धामहे ॥” ( ऋ० सं० १,
६, २६, ३ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४७७ ) १२ अ० १ पा० ७ खं०
उषः ! तत् चित्रं चायनीयं महनीयं धनम् आहर
अस्मभ्यम् अन्नवति !, येन पुत्रांश्च पौत्रांश्च
दधीमहि ॥
तस्या एषा अपरा भवति ॥ ६ ॥
अर्थ :- "उषस्तच्चित्रमाभरा" इस ऋचा का गोतम
ऋषि, और प्रातरनुवाक तथा आश्विन [ शस्त्र ] में विनि-
योग है ।
'उषः!' हे उषः ! 'अस्मभ्यम्' हमारे लिये 'तत्' सो 'चि-
त्रम्' ( चायनीयम् ) चाहने योग्य ( महनीयम् ) मंहणा या
पूजनीय (धनम्) धन 'आहर' ला, 'वाजिनीवति ! ' ( अन्न-
वति ! ) हे अन्नवाली ! अन्नपूर्णे ! 'येन' जिस धनसे 'तोकम्'
'च' ( पुत्रांश्च ) पुत्रों को 'तनयं च' ( पौत्रांश्च ) और पोतों
को 'धामहे' ( दधीमहि ) पालें ॥
"तस्याः०" उस उषा की यह और ऋचा है । सो क्यों ?
पूर्व ऋचा में "चित्रं धनमाहर" 'सुन्दर धन को ला' यह
कहा है, वह उत्तम और मध्यम दोनों उषाओंके लिये समान
है, किन्तु अगली ऋचामें उत्तम उषाका विशेष लिङ्ग है- ,
"पूर्वे अर्द्धे रजसो भानुमञ्जते ।" इससे यह अगली
ऋचा उदाहरण में दीजाती है ॥६॥
(खं० ७)
निरु०- " एताउ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे
अर्द्धे रजसो भानु मञ्जते ॥ निष्कृण्वाना आयु-

  • हिन्दी निरुक्त ( ४७८ ) १२ अ० १पा० ७खं०
    धानीव धृष्णवः प्रति गावोऽरुषीर्यन्ति मातरः ॥"
    [ऋ० सं० १, ६, २४, १ । सा० सं० उ० आ० ८,
    ३, १६, १ ] ॥
    एतास्ता०उषसः केतुमकृषत प्रज्ञानम्, एकस्या
    एव पूजनार्थं बहुवचनं स्यात् ।
    पूर्वे अर्द्धे अन्तरिक्षलोकस्य समञ्जते भानुना
    निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः ।
    'निर्' इत्येष 'सम्' इत्येतस्य स्थाने ।
    "एमीदेषां निष्कृतं जारिणी वा ॥” [ऋ०
    सं० ७, ८, ३, ५] इत्यपि निगमो भवति ।
    प्रति यन्ति 'गावः' गमनात् । 'अरुषीः'आरोच-
    नात् । 'मातरः' भासो निर्मात्र्यः ॥
    'सूर्या' सूर्यस्य पत्नी। एषैव अभिसृष्टकालतमा।
    तस्या एषा भवति ॥७॥
    अर्थः- "एताउत्या० " इस ऋचा का पूर्व ऋचा के
    समान ऋषि और विनियोग है ।
    'याः' जो (उषाएं) 'रजसः' (अन्तरिक्षलोकस्य) अन्तरिक्ष
    लोक के 'पूर्वेअर्द्धे' पूर्व आधे भाग में 'भानुम्' (भानुना)प्रकाश
    से 'अञ्जते' (समञ्जते) अपने आप को प्रकट करती हैं, 'एताः
    त्याः' (ताः) ये वे 'उषसः' उषाएं 'केतुम्' (प्रज्ञानम्) उज्ज्वल
    ज्ञान को 'अक्रत' (अकृषत) करती हैं, या देती हैं। एक ही

उषा में पूजा (प्रशंसा) अर्थ में बहुवचन है। किस प्रकार उषाएं
लोक के प्रज्ञान को करती हैं ? निष्कृण्वाना आयुधानि
इव धृष्णवः” धृष्णु आयुधारी जिस प्रकार अपने आयुधों
को मांजते हुये उन्हें चमकाते हैं, उसी प्रकार उषाएं भी अपने
प्रकाश से लोक के प्रज्ञान को मांजदेती हैं या प्रकट कर
देती हैं। फिर 'गावः' गमन स्वभाव वाली 'अरुषीः' चारों
ओर रोचन (प्रकाश) करने वालीं 'मातरः' [भासो निर्मात्र्यः]
प्रकाश की माताएं (निर्माण करने वाली) उषाएं प्रति यन्ति
लौट जाती हैं- जिससे उदय हुई हैं, उसी सूर्य के प्रति चली
जाती हैं या उसमें लय होजाती हैं ।
“निष्कृन्वाना “ इस पद में 'निर्' यह पद 'सम्' इस
के स्थान में है। जिससे उस पदका 'संस्कुर्वाणाः (मांजने वाले)
अर्थ होजाता है। इसपे-
एमीदेषास्०” अर्थात्- (अहम्) मैं 'एषाम्' इन (उषा-
रियों के निष्कृतम् (संस्कृतं) [स्थानम् ] सुधारे हुए स्थान को 'एमि
इत्' आता ही हूं 'जारिणी इव' जैसे कोई जारिणी स्त्री अपने
चरित्र को न गिनती हुई पुनः उपपत्तियों के पास जाती हैं
यह भी निगम है ।
'गावः' (गो) क्यों ? गमन (चलने) से ।
'अरुषीः' क्यों ? आरोचन [चारों ओर प्रकाश) से ।
'मातरः' (मातृ) क्यों ? भास् (प्रकाश) की निर्मात्रीएं
होने से ॥
'सूर्या' (३) क्या ? सूर्य की पत्नी। जैसे? सूर्य के उदय के प्रति
अधिक गई हुई होती है यही उषा 'सूर्या' होजाती है।
“तस्याः०” उस (सूर्या) की यह ऋचा है ॥७॥

[ हिन्दी निरुक्त ( ४८० ) १२अ० १पा० ८खं०
व्याख्या ।
‘उषसः’ (उषाएं)। क्यों कि—सूर्य कीही किरणों से अंधेरा
हट या जाने पर प्रकाश होता है, वे ही उषाएं कही जाती हैं
वह परमार्थतः ( वास्तवमें ) स्त्रीलिङ्ग विशिष्ट सूर्य ही है।
प्रकाश रूप कार्य सूर्य का ही है ॥७॥
( खं० ८ )
निरु० “सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं
सुवृतं सुचक्रम्। आरोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं
पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥”(ऋ० सं० ८, ३, १३,५) ॥
सुकाशनं शन्नमलं सर्वरूपम् ।
अपिवा उपमार्थे स्यात्। सुकिंशुकमिव शल्मलि-
म्- इति ।
‘किंशुकं’ कंशतेः प्रकाशयतिकर्मणः ।
‘शल्मलिः’ सुशरो भवति । शरवान् वा ।
आरोह सूर्ये ! अमृतस्य लोकम्- उदकस्य ।
सुखं पत्ये वहतुं कृणुष्व ।
“सविता सूर्यां प्रायच्छत् सोमाय राज्ञे प्रजा-
पतये वा” इति च ब्राह्मणम् ।
‘वृषाकपायी’ वृषाकपेः पत्नी । एषा एव अभि-
सृष्टकालतमा ।
तस्या एषा भवति ॥८॥

  • हिन्दी निरुक्त ( ४८१ ) १२प्र० १पा० ८खं०
    अर्थ:-"सुकिंशुकम्०" इस ऋचा की सूर्या ऋषि है।
    विवाह में विनियोग है।
    'सूर्ये !' [ हे सूर्ये !] सूर्य की पत्नि ! 'सुकिंशुकम्' [सुका-
    शनम् ) लोकों को सुन्दर प्रकाश देने वाले 'शल्मलिम्' [शन्म-
    मलम्] निर्मल अथवा उपमा अर्थ में हो सकता है- "सुकिं-
    शुकमिव शल्मलिम् " सुन्दर लाल फूलों वाले शल्मलि
    वृक्ष के समान लाल वर्ण [ 'किंशुक' नाम ढाक के पुष्प का है,
    यहां लाल पुष्पों के सादृश्य से 'किंशुक' शब्द पुष्पयुक्त शल्मलि
    वृक्ष में गौणरूप से आगया है । ] 'विश्वरूपम्' [( सर्वरूपम् )
    सर्वरूप 'हिरण्यवर्णम्' सुवर्ण के समान वर्णवाले अथवा सुवर्ण
    के समान वरणीय (ग्रहण करने योग्य) 'सुवृतम्' सुन्दर बर्त्तने
    वाले या सुन्दरता से रहने वाले या रश्मिओं से भले प्रकार
    ढंपेहुये 'सुचक्रम्' सुन्दर प्रकाश करने वाले या सुन्दर चक्र
    [ मण्डल ] वाले 'अमृतस्य' [ उदकस्य ] जलके 'लोकम्' (स्था-
    नम् ] स्थान [ सूर्यमण्डल ] को 'आरोह' आरोहण कर-उस
    पर चढजा । क्यों ? "पत्ये स्योनं (सुखं) वहतुं कृणुष्व"
    इस मण्डल के अधिष्ठाता सूर्य देव के लिये सुख प्राप्त कर ॥
    'किंशुक' कैसे ? प्रकाश करने अर्थ में 'क्रंश' ( भ्वा०प० ]
    धातु से है।
    'शल्मलि' क्यों ? वह सुशर [ सुन्दर बाण वाला) होता
    है । अथवा शरवान् होनेसे 'शल्मलि' है । अर्थात् 'शॄ हिंसा-
    याम् [ क्र्या०प० ] धातु से है । वह कोमल होने के कारण
    सहज में हिंसा किया जाता है या काटा जाता है । अथवा

· हिन्दी निरुक्त (४८२) १२अ० १पा० ६ खं०
'शरवान्' क्या ? कांटों वाला होता है, जो उससे लगता है,
उसी की वह हिंसा करता है।
“सविता सूर्या०” सविता ने सूर्या को सोम राजा
के लिये दिया अथवा प्रजापति के लिये दिया। और यह
ब्राह्मण है।
निरुक्त पक्षमें सूर्य चन्द्रमा के लिये प्रकाश देता है, वही
सूर्या है। अथवा मध्यस्थान प्रजापति देवता के लिये उषाको
देता है, वही सूर्या है। कोई इसे ऐतिहासिक पक्षमें भी
लगाते हैं-उसमें 'सूर्य अपनी सूर्या नाम बेटी को सोम राजा
के लिये या प्रजापति के लिये देता है।' ऐसा प्रयोजन है।
'वृषाकपायी' [४] क्या ? वृषाकपि की पत्नी।
वृषाकपि नाम आदित्य का है, उसकी पत्नी (विभूति)
वृषाकपायी है। वह उषःकाल में ओस बरसाती है अथवा
उन्हें [ओसोंको] कपाती है, इससे 'वृषाकपायी' कहलाती
है। और फिर वह यही सूर्या है, जब आदित्य के उदयकाल
के अधिक निकट में आजाती है, 'वृषाकपायी' कही जाती है।
“तस्याः०” उस (वृषाकपायी)की यह ऋचा है॥८॥
(खं० ६)
निरु०- “वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आहु
सुस्नुषे। घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हवि
र्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥” (ऋ० सं० ८,४,३,३) ॥
वृषाकपायि ! रेवति ! सुपुत्रे ! मध्यमेन, सुस्नुषे !
माध्यमिकया वाचा ।

हिन्दी निरुक्त ( ४८३ ) १२अ० १पा० ६ख०
'स्नुषा' साधुसादिनी-इति वा । साधुसानि-
नी-इति वा । स्वपत्यं, तत् सनोति इति वा ।
प्राश्नातु ते इन्द्रः उक्षणः एतान् माध्यमिकान्
संस्त्यायान् ।
'उक्षणः' उक्षनेर्वृद्धिकर्मणः । उक्षन्ति उदकेन
इति वा ।
प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः, सुखकरं हविः ।
सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः
आदित्यम् ॥
'सरण्यूः' सरणात् ।
तस्या एषा भवति—॥९॥
अर्थः—"वृषाकपायिरेवति०" इस ऋचा का इन्द्र
ऋषि षष्ठ ( छठे ) पृष्ठ्य अहन् में वृषाकपि में विनियोग है ।
'वृषाकपायि !' हे वृषाकपि ( आदित्य ) की पत्नी !
'रेवति !' हे धनवाली ! 'सुपुत्रे !' ( मध्यमेन ) हे मध्यदेव से
सुन्दर पुत्र वाली ! ( मध्य देव तेरा सुन्दर पुत्र है ) 'सुस्नुषे'
( माध्यमिकाया वाचा ) हे मध्यम लोक की वाक् से सुन्दर
पुत्रवधू वाली ( बहू वाली ! = पुतहू वाली ! ) ( मध्यम लोक
की वाणी तेरी सुन्दर पुतहू है ) 'इन्द्रः' इन्द्रदेव आदित्य
'ते तेरे 'उक्षणः' ( एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायान् ) (अव-
स्थाथसंस्त्यायान् ) इन ओसों के समूहोंको 'घसत्' (प्राश्नातु)
खावे [ क्योंकि-वह उदय होता हुआ उन्हें पीता है।

हिन्दी निरुक्त ( ४८४ ) १२ अ० १ पा० १० खंड०
‘प्रियम्’ (इष्टम्) वाञ्छित ‘काञ्चित्करम्’ (सुखाद्यकरम्) सुखकी
वृद्धि को करने वाले ‘हविः’ (उदकम्) जल को (कुरुष्व) कर ।
किस लिये ? (विश्वस्मात्) सबसे ‘उत्तरः’ ऊँचा ‘इन्द्रः’ (आ-
दित्यः) जो आदित्य देव है । (उसके अर्थ) उस आदित्य को
हम यह कहते हैं ॥
‘स्नुषा’ ( पुत्रवधू ) क्यों ? ‘साधुसादिनी’ सुन्दर कर्म में
में बैठती है— श्वशुर के सन्तान रूप सुन्दर अर्थ में उसके
अङ्गभाव को प्राप्त होती है—उसकी सम्पत्ति के एक भाग में
स्थित होती है। अथवा साधुसानिनी होती है—शुभ सन्तान
को भले प्रकार भजती है । अथवा सुन्दर अपत्य ‘सन्तान’
को सनती है = प्राप्त होती है, इससे स्नुषा है ।
‘उक्षने’ कैसे ? वृद्धि अर्थ में ‘उक्ष’ (भ्वा०प०) धातु से है
‘सरण्यूः’ (५) क्यों ? सरण गमन करने से । वही उषा जब
सूर्य के प्रति अधिभाग से ‘अभेद से’ गई हुई होती है, तब
वह सरण (गमन) से ‘सरण्यू’ कहाती है ।
“तस्याः०” उस (सरण्यू) की यह ऋचा होती है ॥६॥
( खं० १० )
निरु०- “ अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वी
सवर्णा मददु विवस्वते । उताश्विना बभरद्यत्तदा
सीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः ॥ ” ( ऋ० सं०
७, ६, २३, २ ) ॥
अपि अगूहन् अमृतां मर्त्येभ्यः, कृत्वी सवर्णा-
म् अददुः विवस्वते’ अपि अश्विनौ अभरद्, यत्

हिन्दी निरुक्त ( ४८५ ) १२अ० १पा० १०खं०
तद् आसीद् अजहाद् द्वौ मिथुनौ सरण्यू, ‘मध्य-
मं च माध्यमिकां च वाचम्’ इति नैरुक्ताः । ‘यमं
च यमीं च’ इति ऐतिहासिकाः ॥
तत्र इतिहासम् आचक्षते-
त्वाष्ट्री सरण्यूः विवस्वतः आदित्याद् यमौ मिथुनौ
जनयाञ्चकार, सा सवर्णाम् अन्यां प्रतिनिधिधाय
आश्वरूपं कृत्वा प्रदुद्राव, स विवस्वान् आदित्य
आश्वमेव रूपं कृत्वा ताम् अनुसृत्य संबभूव, ततः
अश्विनौ जज्ञाते सवर्णायां मनुः ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥१०॥ -
अर्थः- “अपागूहन्०” इस ऋचा का देवश्रवस्
ऋषि है ।
“अपागूहन् अमृत्तां मर्त्येभ्यः” आदित्य की रश्मि
यों ने वृषाकपायी के रूप में अमर उषाको मनुष्यों के लिये
उत्पन्न किया । “कृत्वी सवर्णाम् अददुः विवस्वते”
उसे सवर्णा बनाकर- सूर्य के समान रूप वाली वा सरण्यू
बना कर विवस्वान् [सूर्य] के लिये देदी (देदिया) “उत
अश्विनौ अभरत्” और उषाने अश्विनोंको स्तुतियों से
पोषण किया, क्यों कि - वह अश्विनों की स्तुतिका समय है
अथवा सरण्यूने अश्विनों को हविः से भरण (पालन)
किया, क्यों कि- वह उनके याग (यज्ञ) का समय है।

हिन्दी निरुक्त (४८६) १२ अ० १ पा० १० खं०
“यत् तत् आसीत् अजहात्” उषा या सरण्यू का जो
रूप था, उसे छोड़ा। “द्वौ मिथुनौ सरण्यूः” सरण्यू ने
दोनों मिथुनों को (मध्यम ज्योति और मध्यम लोककी वाक्
को) छोड़ा। क्योंकि- जब सरण्यू आदित्य के मण्डल में
प्रवेश कर जाती है, तब आदित्य के उदय होते ही मध्यम
का और माध्यमिक वाक् का काल विच्छिन्न हो जाता है-
कट जाता है, यही उनका त्याग है। यह नैरुक्त आचार्य
मानते हैं।
“यमं च यमीं च इति ऐतिहासिकाः” ‘यम और
यमी रूप मिथुन को छोड़ा’ ऐसा ऐतिहासिक लोग मानते हैं।
“तत्र०” उस में ऐसा इतिहास कहते हैं।-
त्वष्टा की बेटी सरण्यू ने विवस्वान् आदित्य से यम
(जोड़ले) मिथुन उत्पन्न किये, वह अपने सरीखी दूसरी स्त्री
को अपने स्थान में छोड़ कर घोड़ी का रूप बना कर भगी,
और वह विवस्वान् आदित्य भी घोड़े का ही रूप बना कर
उस के पीछे चल कर उससे मिला। उस से दो अश्विन् देवता
उत्पन्न हुए और जो सवर्णा स्त्री, जिसे सरण्यू अपना दूसरा
रूप बना कर छोड़ गई थी, उस में मनु उत्पन्न हुआ [इसी
को वैवस्वत (विवस्वान् का पुत्र) मनु कहते हैं]॥
व्याख्या ।
ऐतिहासिक पक्ष में “अपागूहन्०” मन्त्र का अर्थ-
उनके मतमें रश्मियों के दो रूप हैं, एक भौतिक जिसे
हम देखते हैं और दूसरा प्राणाधि देवता रूप। प्राणों के

ऽ हिन्दी निरुक्त ( ४८७ ) १२ अ० १ पा० ११ खं० ऽ
अधि देवता रूप रश्मियों ने त्वष्टा की पुत्री सरण्यू को घोड़ी
बनाकर, कि- इससे अश्विनों का जन्म होगा, समझ कर
लोक हित के लिये अमर देवी को (सरण्यू को) छिपा दिया,
और उसे उत्तर (कुरु) देश में पहुंचा दिया । और फिर उस
(सरण्यू) की छाया से वैसी ही दूसरी स्त्री बनाकर, उसे वि-
वस्वान् को देदिया । जो उसको अश्वा (घोड़ी) रूप था,
उससे सरण्यूने विवस्वान् के वीर्यसे दो अश्विन पुत्र जने और
उन्हें उत्तर देश में पोषण किया । और जो उसको सरण्यू
रूप था, उससे दो मिथुन (यम और यमी) उत्पन्न किये,
[ इसीसे यम वैवस्वत और यमी वैवस्वती कही जाती है ]
तथा उन्हें छोड़ कर स्वयम् नष्ट होगई ॥
“तदभिवादिनी०” इस अर्थको कहने वाली यह ऋचा
है-जिस प्रकार त्वष्टाकी पुत्री सरण्यू विवस्वान् से व्याही गई
और नष्ट होगई, इस अर्थको यह आगेकी ऋचा कहती है १०॥
( खं० ११ )
निरु०- “त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीदं विश्व-
भुवनं समेति । यमस्य माता पर्युह्यमाना महो
जाया विवस्वतो ननाश ॥” [ऋ० सं० ८, ६, १३, १] ।
त्वष्टा दुहितुः वहनं करोति, इदं विश्वं भुवनं
समेति, इमानि च सर्वाणि भूतानि अभिसमाग-
च्छन्ति यमस्य माता पर्युह्यमाना महतो जाया
विवस्वतो ननाश, रात्रिः आदित्यस्य आदित्यो-
दये अन्तर्धीयते ॥११॥
इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ।१२,[१]।