निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५०२ ) १२अ० २पा० ८ खं०,
अपिवा उपमार्थे स्यात्- समूळ्हमस्य पांसुले
इव पदं न दृश्यते- इति ।
‘पांसवः’ पादैः सूयन्ते- इति वा । पन्नाः
शेरते इति वा । पिंशनीया भवन्ति— इति
वा ॥८ (१९)॥
इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः
पादः ॥१२, २, ॥
अर्थः- “इदं विष्णुः०” इस ऋचा का मेधातिथि
ऋषि और प्रायश्चित्त तथा आज्योसादन (घृत के स्थापन)
में विनियोग है ।
'इदम्' इस नानाविभाग से अवस्थित जगत् को 'विष्णुः'
विष्णु (आदित्य देव ) 'विक्रमते' (अधितिष्ठति) अधिष्ठित
होता है— दबा कर स्थित होता है। कैसे ? ‘त्रेधा पदं
निदधे” (त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधाभावाय) तीन प्रकार से-
पद (पैर) को रखता है- पार्थिव अग्नि होकर पृथिवी में जो
कुछ है, उस पर अधिकार करके रहता है, अन्तरिक्ष में वि-
द्युत्(बिजली)के रूप से और द्युलोक में सूर्य के रूप से अधि-
कृत होता है- ऐसा त्रेधाभाव (तीन रूप) शाकपूणि आचार्य
मानते हैं ।
समारोहण = उदय गिरिमें उदय होता हुआ विष्णु देव
एक पद धरता है, मध्यान्ह काल में विष्णु पद (आकाश) में
दूसरा और सायंकाल में गयशिर (अस्तंगिरि = अस्ताचल)
पर तीसरा पद रखते हैं, यह और्णवाभ आचार्य मानते हैं ।