निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
स्नाय के पाठ के अनुसार ही की जावेगी, जिसकी समाप्ति
इस अध्यायके अन्तमें होगी। इसी विशेष अधिकारकी सूचना
के लिये “अथातः” ये पद दिये हैं।
“मध्यस्थानाः” ‘मध्यस्थान’ क्यों ? ‘मध्यम् आसां
स्थानम्’ इनका मध्य [ अन्तरिक्ष ] स्थान है। वे कौन हैं ?
अदिति आदि देवस्त्रियें हैं ॥ १ [२२] ॥
[ खं० २ ]
निरु०- “दक्षस्य वाऽदिते जन्मनि व्रते राजा-
ना मित्रावरुणाविवाससि । अतूर्त्त पन्थाःपुरुरथो
अर्य्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु॥ ” (ऋ०सं०
८, २, ५, ६ ] ॥
दक्षस्य वा अदिते ! जन्मनि व्रते कर्मणि राजा
नौ मित्रावरुणौ परिचरसि । ‘विवासतिः’परिचर्या-
याम् । “ हविष्मान् आविवासति”— ऋ०मं० १,
२३, ३ ) इति-आशास्ते वा । ‘अतूर्तपन्थाः’
अत्वरमाणपन्थाः बहुरथः अर्यमा' आदित्यः।
अरीन् नियच्छति ।
‘सप्तहोता’ सप्त अस्मै रश्मयः रसान् अभिसन्नाम-
यन्ति । सप्तएनम्-ऋषयः स्तुवन्ति-इति वा । विषु-
रूपेषु जन्मसु कर्मसु उदयेषु ।
‘आदित्यो’ दक्षः-इति-आहुः । आदित्यमध्ये
च स्तुतः ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४२४ ) ११ अ० ३ पा० २ खं०
‘ अदितिः ’ दाक्षायणी ।
अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि” (ऋ०
सं० ८, ३, १, ४ ) ॥ इति न ।
तत् कथम् उपपद्येत ?
समानजन्मानौ स्यातामिति ।
अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम्
इतरेतरप्रकृती ॥
अग्निरपि ‘ अदितिः ’ उच्यते ।
तस्य एषा भवति— ॥ २ ( २३ ) ॥
अर्थ—‘‘दक्षस्य वादिते०” इस ऋचा का शय
ऋषि है। वैश्वदेव में शस्त्र है। यहां दिन और रात्रि मित्र
वरुण हैं, उनकी सन्धि की वेला अदिति है। यही अवश्याय
रस [ओस] को देती है, इसी सम्बन्ध से इसे मध्यमा अदिति
समझ कर इस मन्त्र में कहा जाता है ।
‘अदिते!’ हे अदिति देवि! [त्वम्] तू ‘दक्षस्य (आदित्यस्य)
[वा] आदित्य के ‘ जन्मनि ’ उदयरूप ‘व्रते’ व्रतमें ‘राजाना’
[राजानौ] राजे ‘मित्रावरुणा’ [मित्रावरुणौ] मित्र वरुण देवोँ
को [रात्रि और दिन को ] ‘बिवाससि’ ( परिचरसि ) सेवन
करती है । अर्थात् — जब सूर्य देव आधे उदय होते हैं । उस
समय वह सन्धिवेला अदिति अपने आधे रूपसे दिनरूप मित्र
को व्यापन करती है, और आधे रूप से रात्रि रूप वरुण को
व्यापन करती है, जो दक्ष आदित्य ‘अर्यमा’ शत्रुओं को दमन
करने वाला ‘विषुरूपेषु’ (विषमरूपेषु) भिन्न २ प्रकाश देशों
हिन्दी निरुक्त ( ४२५ ) ११ अ० ३पा० २खं०
में होने वाले ‘जन्मसु’ ( कर्मसु = उदयेषु ) उदय रूप कर्मोंमें
अतूर्त्तपन्था’ (अत्वरमाणपन्थाः) वेग रहित या विषम गतिसे
रहित या नियत गति है-प्रतिमुहूर्त्त और प्रति दिन एक नियम
से चलने वाला है, पुरूरथः (बहुरथ = बहुंरंहण) बहुत गमन
करने वाला है, और ‘सप्तहोता’ सप्तहोता है-(सप्तअस्मैरश्मयः
रसान् अभिसन्नामयन्ति 'सात रश्मियें इसके लिये रसों को
लाती हैं, (सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा) अथवा सात
ऋषि इसको स्तुति करते हैं।
‘विवासति’ धातु परिचर्या सेवा अर्थ में है । जिसकायह
निगम है ।
“हविष्मान् आविवासति” अर्थात्- हे अग्नि देव !
‘हविष् के प्रदान से युक्त जो यजमान तेरी सेवा करता है ।
उसकी तू रक्षा कर’—यहहम आशा करतेहैं या चाहतेहैं-इस
आशिषा (आशास्ति) से ‘विवास’ धातु परिचर्या अर्थ में है ।
‘अर्यमा’ क्या ? आदित्य क्यों ? ‘अरीन् नियच्छति’ वह
शत्रुओं को वश करता है ।
यहां ‘दक्ष’आदित्यहै ऐसादेवतापदार्थ के जानने वालेकहते
हैं । क्यों कि- वह आदित्य के मध्य में स्तुति किया गया है
अर्थात्-उनके मत में देवता रूप वस्तु के निर्णय के लियेस्तुति
ही प्रमाण है-जिसकी स्तुति जिस देवता के मध्य में है, वह
वही देवता है । दक्ष भी आदित्य के मध्य में स्तुत है, इससे
यह आदित्य ही है । कहां ? “इमा गिरः” यहां से आरम्भ
कर तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः [ऋ०सं०२,७,६,१]
यहां पर आदित्य के मध्य में ‘दक्ष’ की स्तुति है ।
‘अदिति’ दाक्षायणी (दक्षकी पुत्री) है ।
हिन्दी निरुक्त (४२६) ११ अ० २पा० ३ खं०
क्यों कि—
“अदिते र्दक्षो अजायतः दक्षाददितिः परि”
[ऋ०सं० ८, ३, १, ४] अर्थात्-अदिति;से दक्ष प्रकट हुआ
और दक्ष से अदिति।
सो कैसे उपपन्न होगा (घटेगा) ? ।
“समान जन्मानौ स्याताम्” समान जन्मा यासमनन्तर
जन्मा होसकते हैं। अर्थात् एक के पीछे एक का जन्म होता है,
इससे ऐसा कहा गयो है।
“अपिवा देवधर्मेण०” अथवा देव धर्म से वे दोनों पर-
स्पर से उत्पन्न होते हैं। (क्योंकि- देवता अपने माहाभाग्य
मे ऐसा कर सकता है—उसी का उत्पन्न करने वाला होकर
भी उसी से उत्पन्न होता है।)
अग्नि भी अदिति कहा जाता है।
“तस्य०” उस अग्नि अदिति की यह ऋचा है॥२(२३)॥
(खं० ३)
निरु०-“यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्व-
मदिते सर्वताता। यम्भद्रेण शवसा चोदयासि
प्रजावता राधसा ते स्याम ॥” [ऋ० सं० १, ६,
३२, ५] ॥
यस्मै त्वं सुद्रविणो ! ददासि । अनागाः त्वम् ।
अनपराध ! त्वम् अदिते ! सर्वासु कर्मततिषु ।
‘आगः’ आङ्पूर्वाद् गमेः।
हिन्दी निरुक्त ( ४२७ ) ११ अ० ३ पा० ३ खं०
'एनः' एतेः ।
'किल्बिषम्' किल्भिदम् । सुकृतकर्मणो भयम् ।
कीर्त्तिम् अस्य भिनत्ति इति वा ।
यं भद्रेण शवसा बलेन चोदयसि प्रजावता च
राधसा अनेन ते वयम्-इह स्याम इति ।
'सरमा' सरणात् ।
तस्या एषा भवति-॥ ३ (२९) ॥
अर्थ :-"यस्मै त्वं सुद्रविणो०" इस ऋचा का कुत्स
ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
'सुद्रविणः !' हे सुन्दर धन वाले ! 'अदिते !' अग्निदेव !
'त्वम्' तू 'यस्मै' जिसके लिये 'ददाशः' ( ददासि ) देता है,
'यं' (च) और जिसको 'भद्रेण' शुभ 'शवसा' ( बलेन ) बल से
'प्रजावता' ( च ) और प्रजासंयुक्त 'राधसा' ( धनेन ) धन से
'चोदयसि' ( अनुगृह्णासि ) अनुग्रह करता है, "अनागाः
त्वं सर्वताता" ( अनपराध (:) त्वं सर्वासु कर्मसन्ततिषु ) तू
उसके सब कर्मों में अनपराध = निरपराध होता है- उससे
तेरा कोई अपराध नहीं बनता इसी से उसके सब कर्मों को
तू निर्दोष कर देता है। "ते स्याम" ऐसे प्रभाव वाले के
तेरे हम ' इह ' यहां यज्ञकर्म में अनुग्रह-पात्र हों ( यह हम
चाहते हैं) ।
'आगः' (पाप) कैसे ? 'आङ् (उप०) पूर्वक 'गम्' ( भ्वा०
प० ) धातु से है ।
हिन्दी निरुक्त ( ४२८ ) ११अ० ३पा० ४ खं०
'एनः' (पाप) कैसे ? 'इन्' ( अदा०प० ) धातुसे है ।
'किल्बिष' (पाप) क्यों ? 'सुकृतकर्मणो भयम्' उस में
सुकृत कर्म वाले से भय होता है । 'कीर्तिम् अस्य भिनत्ति
इति वा' अथवा इस पापकारी की कीर्त्ति को वह भेदन
करता है ।
'सरमा' (१७) ( ऐतिहासिक पक्षसे देवशुनी और नैरुक्त
पक्ष से (माध्यमिका वाक्) क्यों ? सरणा (गमन) से ।
“तस्या०” उस (सरमा) की यह ऋचा है—॥३(२४)॥
(खं० ४)
निरु०-“किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड् दूरे
ह्यध्वा जगुरिः पराचैः । कास्मे हितिः का परित-
क्म्या ऽसीत् कथं रसाया अतरः पयांसि ॥” (ऋ०
सं० ८, ६, ५, १) ।
किम् इच्छन्ती सरमा इदं प्रानड् दूरेहि अध्वा ॥
'जगुरिः' जङ्गम्यतेः ।
पराञ्चनैः अञ्चितः ।
का तव अस्मासु अर्थहितिः आसीत् ! किं
परितकनम् ?
'परितक्म्या रात्रिः' परितः एनां तक्म ।
'तक्म'-इति उष्णनाम । 'तकते'-इति सतः ॥
“कथं रसाया अतरः पयांसि” इति ।
'रसा' नदी । रसतेः शब्दकर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त ( ४२६ ) ११ अ० ३पा० ४ खं०
कथं रसानि तानि उदकानि-इति वा ।
देवशुनी इन्द्रेण प्रहिता पणिभिः असुरैः समूदे-
इत्याख्यानम् ।
‘सरस्वती’ व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति- ॥ ४ (२५) ॥
अर्थ:-“किमिच्छन्ती०” । ऐसा सुना गया है कि—
देवपणि असुरोंने देवताओं की गौओं को हर लिया था, फिर
इन्द्रने उनके ढूंढनेके अर्थ उनके स्थान में सरमा (देव-कुत्ती)
को भेजा। और उन देव पणिओं ने उसे देख कर इस ऋचा
से पूछा-किमिच्छन्ती०” हम से किस वस्तु की इच्छा
करती हुई ‘इदम्’ यहां ‘प्रानट्’ आई है, “दूरे हिअध्वा”
क्यों कि-- दूर मार्ग है— इतने दूर मार्ग से बिना प्रयोजन
कोई सहज में आनहीं सकता, ‘जगुरिः’ जो ही शीघ्र चलने
वाला हो, वही आसकता है। ‘पराचैः’ (पराङ्मुखैः अञ्चितः)
पराङ्मुख गमनों से गया हुआ है- यह मार्ग अरुचि यह शि-
थिल संकल्प से पार करना दुष्कर है- देवताओं के स्थान से
बहुत दूर है। इससे हम कहते हैं- हे सरमे ! “का अस्मै
हितिः” ( का तव अस्मासु अर्थहितिः आसीत् ) क्या तेरी
हम में अर्थ हिति = अर्थ की प्रार्थना है-क्या अर्थ तैनें
हम से प्राप्त करने योग्य विचारा है, जिसके कारण यह बड़ा
लम्बा मार्ग आना विचारा । और “का परितक्म्या
आसीत्” (कि परितकनम्) कौन या कैसी रात्रि हुई- क्या
हिन्दी निरुक्त ( ४३० ) ११ अ० ३ पा० ५ खं०
तुझे पिछली रात्रि सुख से बीती ? और कथं रसायाः
पयांसि अतरः", कैसे तैने नदी के जलों को तैरा ? —
आधे योजन से अधिक विस्तार वाली रसा नाम नदी है, उस
के दुस्तर जलों को तैने कैसे पार किया । (कथं रसानि तानि
उदकानि- इति वा ) वे कैसे मीठे जल हैं? क्या तुझे थका-
वट के समय कुछ विश्राम स्थानों में वे स्वादु जल मिले ?
इन्द्र की भेजी हुई देवशुनी (सरमा) ने पणि असुरों के
साथ संवाद किया-यह आख्यान (इतिहास) है ॥
'जगुरिः (शीघ्रगामी) कैसे ? 'जङ्गम्यतेः' यङन्त 'गम्'
धातु से है। क्योंकि-वह अतिशय गमन करने वाला है।
'परितक्म्या क्या ? रात्रि क्यों ? 'परितः एना तक्म' दोनों
ओर इसके तक्म (दिन) है। 'तक्म' यह उष्ण (गरम) का नाम
है । कैसे ? 'तकते' इस धातु से है। क्यों कि-प्राणियों को
वह कष्ट से ओसता है।
'रसा' क्या ? नदी किस धातु से ? 'रसतेः शब्द कर्मणः'
शब्द अर्थ में 'रस' (भ्वा० प०) धातु से है।
'सरस्वती (१८) की व्याख्या हो चुकी [२,७,१)
“तस्या०”उस (सरस्वती)की यह ऋचा है ॥४(२५)॥
( खं० ५ )
निरु०- पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनी-
वती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥” [ऋ० सं० १, १,
६, ४ । य० वा० सं० २०, ८४ ) ॥
पावका नः सरस्वती अन्नैः अन्नवती यज्ञं वष्टु
धियावसुः, कर्मवसुः
हिन्दी निरुक्त ( ४३१ ) ११ अ० ३ पा० ६ खं०
तस्य एषा अपरा भवति ॥५ (२६) ॥
अर्थः— "पावका नः सरस्वती०" इस ऋचा का
मधुच्छन्दस् ऋषि है, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में
विनियोग है ।
'पावका' जलको झारने वाली "वाजेभिः वाजिनीवती
(अन्नैः अन्नवती) अन्नों से अन्नवाली 'धियावसुः' (कर्मवसुः
कर्मधना) कर्म रूपधनवाली 'सरस्वती' मध्यम लोककी वाणी 'नः'
हमारे 'यज्ञम्' यज्ञ को 'वष्टु' (कामयताम्) चाहे = इच्छा करे ।
अथवा अन्न वाली मध्यमवाक् हमारे यज्ञ के अन्नों से युक्त
करे यां करने की कामना करे ॥
"तस्याः०" उस सरस्वती की यह और ऋचा है ॥५(२६)॥
[ खं० ६ ]
निरु०— "महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति के-
तुना । धियो विश्वा विराजति ॥" [ ऋ० सं०
१, १, ६, ६] ॥
महत् अर्णः सरस्वती 'प्रचेतयति' प्रज्ञापयति
'केतुना' कर्मणा प्रज्ञया वा, इमानि च सर्वाणि
प्रज्ञानानि अभि विराजति ।
'वाक्' अर्थेषु विधीयते तस्माद् माध्यमिकां
वाचं मन्यन्ते ॥
'वाग्' व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति— ६ ( २७ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४३२ ) ११ अ० ३पा० ७खं०
अर्थ:- “महो अर्णः सरस्वती०” इस ऋचा का
मधुच्छन्दम् ऋषि, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में
विनियोग है।
‘सरस्वती’ मध्यमा वाक् देवी ‘केतुना’ (कर्मणा) कर्म
से (प्रज्ञया वा) अथवा प्रज्ञान से ‘महः’ [महत्] बड़े या
बहुत ‘अर्णः’ (जलम्) जलको ‘प्रचेतयति’ (प्रज्ञापयति =
आविष्करोति) प्रकट करती है। (इमानिच) और इन
‘विश्वा’ [विश्वानि = सर्वाणि] सब ‘धियः’ (प्रज्ञानानि)
प्रज्ञानोंको ‘विराजति’ (अभिविराजति) आभिमुख्य = सम्मु-
खतासे विराजती है। क्योंकि—जलसे अन्न और अन्नसे सब
प्रज्ञान होते हैं, इस प्रकार वह सब प्रज्ञानों की ईश्वरी है॥
“वाग्-अर्थेषु०” क्योंकि-वाक् देवी मन्त्रों में उदक
कर्मों में विधान की गई है—उसके उदक वर्षण आदिकर्म कहे
गए हैं, इससे नैरुक्त आचार्य वाक् को मध्यम लोक की
मानते हैं॥
‘वाक्’ (१६) का व्याख्यान किया गया [२,७,१]।
“तस्याः०” उस वाक् की यह ऋचा है-॥ ६ (२७)॥
(खं० ७)
निरु०- “यद्वाग्वदन्त्यवि चेतनानि राष्ट्री दे
वानां निषसाद मन्द्रा। चतस्र ऊर्जन्दुदुहे पयांसि
क्व स्विदस्र्याः परमञ्जगाम॥” [ऋ०सं० ६,७,
५, ४]॥
यद् वाग् वदन्ती ‘अविचेतनानि’ अविज्ञा-
हिन्दी निरुक्त ( ४३३ ) ११ अ० ३पा० ७ ख०
तानि राष्ट्री देवानां निषसाद 'मन्द्रा'मदना 'चतस्रः'
अनुदिशः ऊर्जं दुदुहे पयांसि, क्व स्विद् अस्याः
परमं जगाम-इति यत् पृथिवीं गच्छति इति वा,
यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा०॥
तस्या एषा अपरा भवति—॥ ७ ( २८ ) ॥
अर्थः-“ यद्वाग्वदन्ती० ”इस ऋचा का नेम ऋषि
और सारस्वत पशु में विनियोग है ।
'यत्' ( यदा ) जब 'अविचेतनानि' [ अविज्ञाताथानि ]
अर्थ—शून्य गर्जना शब्दों को 'वदन्ती' बोलती हुई ' देवानां
राष्ट्री'माध्यमिक देवताओं की ईश्वरी 'मन्द्रा' [मदना] लोक
को हर्ष देने वाली 'वाक्' मध्यम लोक की वाणी 'निषसाद'
[ निषीदति = व्यापृणोति ] व्यापार युक्त होती है—वृष्टि
कर्म में लगती है, [ तदा ] तब 'चतस्रः' ( दिशः अनु ) चारों
दिशाओं के प्रति 'ऊर्जम्' ( अन्नम् ) अन्नको 'पयांसि' और
जलोंको ' दुदुहे ' दुहती है = भरती है । 'क्व—स्वित् ' कहां
'अस्याः ( वाचः ) इस वाक् देवी के 'परमम्' उत्कृष्ट ( बड़े )
स्थान को 'जगाम' (गच्छन्ति ) जाते हैं-यह नहीं जाना जाता
कि-इस वाक् देवी के बरसाए हुये जल ओषधियों को
उत्पन्न करके कहां जाते हैं और प्रतिवर्ष फिर कहां से आते
हैं. [ यत् पृथिवीं गच्छति (न्ति) ] जो पृथिवी में रहते हैं
( यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा ) और जिनको आ-
दित्य की रश्मिएं हर लेजाती हैं । [ सुतराम् वाग् देवी के
अपरिमित जल हैं, वे कभी क्षीण नहीं होते ।
हिन्दी निरुक्त ( ४३४ ) ११ अ० ३पा० ८खं०
“तस्या०” उस वाक् की यह और ऋचा है- जिसका
प्रयोजन 'यही वाक् सब प्राणियों के भीतर प्रविष्ट है और
यही सब अर्थों को कथन करती है'- इस प्रकार की विभूति
दिखाना है ॥७(२८)॥
( खं० ४ )
निरु०-“देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरू-
पाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना
धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥” (ऋ० सं० ६,७,५,५)
देवीं वाचम् अजनयन्त देवाः, तां सर्वरूपाः
पशवो वदन्ति व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च सा
नो मदना अन्नं च रसं च दुहाना धेनुः वाग्
अस्मान् उपैतु सुष्टुता ।
'अनुमतिः' 'राका' इति देवपत्न्यौ-इति
नैरुक्ताः ।
पौर्णमास्यौ-इति याज्ञिकाः । पूर्वा पौर्णमासी
सा अनुमतिः, या उत्तरा सा राका इति विज्ञायते ।
'अनुमतिः' अनुमननात् ।
तस्या एषा भवति-॥८(२९)॥
अर्थः- “देवींवाच०” इस ऋचा का नेम ऋषि और
सारस्वत पशु में विनियोग है ।
'देवाः' मध्यम लोक के देवताओं ने 'देवीम्' ( उद्कामां
हिन्दी निरुक्त ( ४३५ ) ११ अ० ३पा० ६ ख०
दात्रीम्) जलों को देने वाली [याम्] जिस ' वाचम् ' वाक् को
'अजनयन्त' जना (उत्पन्न किया) था, 'ताम्' उसी को 'विश्व-
रूपाः' (सर्वरूपाः व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च ) सब प्रकार
के = व्यक्तवाणी वाले मनुष्य आदि और अव्यक्त वाणी वाले
गौ आदि 'पशवः पशु 'वदन्ति' बोलते हैं,'सा' जो इस प्रकार
सब पशुओं से बोली जाती है, वह 'नः' [ अस्माकम् ] हमें
'मन्द्रा (मदना) हर्ष देने वाली 'इषम्' ( अन्नं च ) अन्न को
'ऊर्जम्' (रसं च) और रस को 'दुहाना' (प्रक्षरन्ती) झरतीहुई
'धेनुः' [तर्पयित्री] तृप्त करने वाली 'वाक् ' 'सुष्टुता' सुन्दर
स्तुति की गई 'उप ऐतु' हमारे यहां आवे- यह हम प्रार्थना
करते हैं ॥
'अनुमति (२०) और 'राका [२१] ये देवपत्निये' (देव
स्त्रिये') हैं- ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं ।
पौर्णमासी हैं, यह याज्ञिक (मीमांसक) मानते हैं ।
क्यों कि- "जो पहिली पौर्णमासी है,वह 'अनुमति'
है और जो पिछली पौर्णमासी है,वह 'राका'है"
यह ब्राह्मण में जाना जाता है ।
'अनुमति' ( २० ) क्यों अनुगमन से- ऋषियों ने और
देवताओं ने चौदह (१४)दिन के पक्ष में 'यह पौर्णमासी हो'
ऐसा माना है ।
"तस्या०" उस अनुमति की यह ऋचा है ॥८ (२९) ॥
( सं० १ )
निरु०- “ अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च
नस्कृधि । क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्रण आयूंषि
तारिषः ॥” (य० वा० सं० ३४, ८ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४३६ ) ११ अ० ३ पा० १० खं०
अनुमन्यस्व अनुमते त्वं सुखं च नः कुर्वन्, अन्नं
च नः अपत्याय घेहि, प्रवर्द्धय च नः आयुः ।
'राका' राते र्दानकर्मणः ।
तस्या एषा भवति ॥९ (३०) ॥
अर्थ:-“अन्विदनुमते०” इस ऋचाका वामदेवऋषि
और देविकाओं में विनियोग है ।
' अनुमते। ' हे अनुमति देवि 'त्वम्' तू 'अनु मन्यासे '
( अनुमन्यस्व ) अनुमति कर- जैसा कि- तुझे चाहिये ।
“शं च नः कृधि” और हमारे लिये सुख कर ।[ सुखं च
नः कुर्वन्]और हमारे लिये सुखकरते हुये “क्रत्वे दक्षायं नो
हिंनु” (अन्नं च नः अपत्याय घेहि) हमारे अपत्य(सन्तान)के
लिये अन्न धारण कर । 'नः' हमारी 'आयूंषि' ( आयुः )
आयु को 'प्र तारिषः' (प्रवर्द्धय)बढा ।
'राका' (२१) दान अर्थ में 'रा'(अदा० प०)धातु से है ।
“तस्या०” उस 'राका' की यह ऋचा है ॥६ [३०]॥
[ खं० १० ]
निरु०- “ राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु
नः सुभगा बोधतुत्मना । सीव्यत्वपः सूच्याच्छि-
द्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥ ” (ऋ०
सं० २, ३, १०, ४ )
राकाम् अहं सुह्वानां सुष्टुत्या आह्वये,शृणोतु
हिन्दी निरुक्त ( ४३७ ) ११अ० ३पा० १०खं०
नः सुभगा बोधतु आत्मना, सीव्यतु अपः प्रजनन-
कर्म सूच्या अच्छिद्यमानया ।
'सूची' सीव्यतेः ।
ददातु वीरं शतप्रदम् उक्थपवक्तव्यप्रशंसम् ॥
'सिनीवाली' 'कुहूः'-इति देवपत्न्यौ इति
नैरुक्ताः॥
अमावास्ये इति याज्ञिकाः ।
या पूर्वा अमावास्या सा सिनीवाली, या उत्तरा
सा कुहूः- इति विज्ञायते ।
'सिनीवाली' 'सिनम्' अन्नं भवति, सिनाति
भूतानि । 'वालं' पर्व । वृणोतेः । तस्मिन् अन्न-
वती । वालिनी-इति वा । वालेनेव अस्याम्
अणुत्वाच्चन्द्रमाः सेवितव्यो भवति-इति वा ।
तस्या एषा भवति ॥ १० ( ३१ ) ॥
अर्थः- "राकामहम्०" इस ऋचा का गृत्समद
ऋषि और देविकाओं में विनियोग है ।
'अहम्' मैं 'सुहवाम्' (सुह्वानाम् [ शुभ आवाहन वाली
राकाको 'सुष्टुती' (सुष्टुत्या] सुन्दर स्तुतिसे 'हुवे' (आह्वये)
बुलाता हूं । 'नः' हमें 'शृणोतु' सुने - हमारी पुकार सुने ।
'सुभगा' सुन्दर धनवाली 'त्मना' (आत्मना) अपने आपसे
'बोधतु' जाने 'अपः' (प्रजननकर्म ) सन्तान के उत्पत्ति के
कर्मको 'सीव्यतु [सन्तनोतु] बढावे । इतनाही नही-'अच्छिद्यमा-
नया अच्छिद्यमान (न टूटने वाली) 'सूच्या' (प्रजासंतत्या) प्रजा
सन्तति से 'शतदायम्' ( शतपदम् ) बहुत दान करने वाले
'उक्थ्यम्' ( वक्तव्यप्रशंसम् ) प्रशंसा करने योग्य 'वीरम्' (पुत्रम्)
वीर पुत्र को 'ददातु' दे ।
'सूची' कैसे ? सीव्यति [सिव् दिवा०प०] धातु से है ।
'सिनीवाली' [२२] और 'कुहू' (२३) ये दो देवपत्निएं
हैं-ऐसा नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।
अमावास्याएं हैं-ऐसा याज्ञिक (कर्मठ) लोग मानते हैं।
क्योंकि- "जो पूर्वा अमावास्या है वह 'सिनीवाली'
और जो पिछली अमावास्या है, वह 'कुहू' है"
ऐसा ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है ।
'सिनीवाली' क्यों ? 'सिन' अन्न होता है । सो क्यों
'सिनाति भूतानि' वह रस आदि धातुओं से प्राणियों को
बांधता है ।
'वाल' क्या ? पर्व । कैसे ? 'वृणोति' ('वृ' स्वा० उ० )
धातु से है । क्यों ? 'वृण्वन्ति देवाः तत्र हवींषि' उसमें देवता
हविओं को वरण (स्वीकार) करते हैं । 'तस्मिन् पर्वणि
असौ सिनीनी (अन्नवती) इति सिनीवाली' उस पर्व में
वह सिमिनी (अन्न वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है।
अथवा वह सिमिनी (अन्नवाली) और वालिनी (वालों
वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है । अथवा बाल के समान
अणु (छोटा) होने से चन्द्रमा इस में सेवितव्य या जानने
योग्य होता है ।
"तस्याः०"उस 'सिनीवाली' की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥
हिन्दी निरुक्त (४३६) ११ अ० ३ पा० ११ खं०
व्याख्या ।
'सिनीवाली' । "सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा
नष्टेन्दुकला कुहूः।" [कां० १ व० ४ श्लो० ९] इत्यमरः
अर्थात्-जिस में चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो, वह अमावास्या
सिनीवाली है, और जिस में चन्द्रमा की कला सर्वथा नष्ट हो
जावे वह अमावास्या 'कुहू' है ।
"चतुर्दशी का अन्तिम प्रहर और अमावास्या के
आठ प्रहर, इस प्रकार चन्द्रमा का क्षयकाल नव
प्रहर का शास्त्र में प्रसिद्ध है । उन में पहिले दो
प्रहरों में चन्द्रमा की सूक्ष्मता रहती है और
अन्त के दो प्रहरों में सम्पूर्ण चन्द्रमा का क्षय
होजाता है । अतः प्रथम दो प्रहरों की सिनीवाली
संज्ञा, अन्त के दो प्रहरों की कुहू संज्ञा और
बीच के पांच प्रहरों की दर्श संज्ञा है।" (अमर
विवेक टीका) ॥ १० (३१) ॥
(खं० ११)
निरु०- "सिनीवालि पृथुष्टुके या दे॒वानाम-
सि स्वसा । जुषस्व॑ ह॒व्यमाहुतं प्र॒जां देवि दिदि-
ड्ढि नः ॥" [ऋ० सं० २, ७, १५, ६ । य० वा०
सं० ३४, १० । आ० गृ० १, १०।]
सिनीवालि ! पृथुजघने ! ।
हिन्दी निरुक्त ( ४४० ) ११अ० ३पा० ११खं०
'स्तुकः' स्त्यायतेः । संघातः ।
पृथु केशस्तुके ! पृथुष्टुते ! वा, या त्वं देवानाम्
असि स्वसा ।
'स्वसा' सुअसा । स्वेषु सीदति इति वा ।
जुषस्व 'हव्यम् अदनं, प्रजां च देवि दिशनः ।
'कुहूः' गूहतेः । क्व अभूत्-इति वा, क्व सती
हूयते इति वा, क्व आहुतं हविः जुहोति इति वा ।
तस्या एषा भवति— ११ ( ३२ ) ॥
अर्थः-“ सिनीवालि पृथुष्टुके०” इस ऋचा का
गृत्समद् ऋषि और देविकाओं में विनियोग है ।
'सिनीवालि ! हेसिनीवालि ! 'पृथुष्टुके !' (पृथु जघने ?)
हे मोटी साथलों वाली ! अथवा 'स्तुक' 'स्त्यै' [भ्वा० प० ]
धातु से संघात [समूह ] का नाम है । इससे हे पृथुकेशस्तुके ?
पृथुकेशकलापेः = मोटे चोटेवाली! अथवा 'पृथुष्टुके' बहुत स्तुति
कीगई ! 'या' जो [ त्वम् ] तू 'देवानाम्' देवताओंकी 'स्वसा'
बहिन 'असि' है ( सा ) सो तू 'आहुतम्' विधिसे होम किये
हुये 'हव्यम्' ( अदनम् ) अन्न यो हविः को ' जुषस्व ' सेवन
कर । 'देवि !' हे देवि ! [च] और 'नः' हमें 'प्रजाम्' सन्तान
'दिदिङ्ढि' [ दिश ] दे ॥
'स्वसा' क्यों ? 'सु असा'वह सुन्दर धनको असन (क्षेपण)
करती है- पिता के घर से धन को फेंकती है = ले जाती है ।
अथवा 'स्वेषु सीदति' वह पर कुल में चली जानेपर भी अपने
भ्राता आदि में ही बैठती है-उन्हीं का पक्ष रखती है ।
हिन्दी निरुक्त (४४१) ११ अ०३पा०१२खंड०
'कुहू' (२३) कैसे ? 'गुह्' (भ्वा०उ०)धातु से है। क्योंकि-
वह चन्द्रमा को गूहन करती है-लुकालेती है। अथवा- 'क्व
अभूत्' कहां था इससे 'कुहू' है-क्यों कि उसमें चन्द्रमाऽप्र-
त्यक्ष (गुप्त) रहता है, इससे उसके पश्चात् उसे देखकर लोग
कहते हैं, यह कहां था। अथवा 'क्वसती हूयते' कहीं होती
हुई आवाहन की जाती है-वह अपने देवता रूपसे अप्रत्यक्ष
होने के कारण नहीं जानी जाती-वह कहां है, किन्तु कहीं
भी रहती हुई यज्ञ में आवाहन की जाती है, इससे 'कुहू'
है। अथवा 'क्व आहुतं हविः जुहोति' कहां होम किये हुये
हवि को लेती है, इससे 'कुहू' है।
"तस्या०" उस (कुहू) की यह ऋचा है ॥११ (३२)॥
(खं० १२)
"निरु०- कुहूमहं सुवृतं विद्मनापसमस्मिन्यज्ञे
सुहवां जोहवीमि। सा नो ददातु श्रवणं पितॄणां
तस्यै ते देवि हविषा विधेम ॥" (तै० ब्रा०३अष्ट ३
प्र० ११ अनु०, अथ०सं०७,१०,५,आ०गृ०१, १०]
कुहूम अहं सुकृतं विदितकर्माणम् अस्मिन्
यज्ञे सुह्वानाम् आह्वये, सा नो ददातु श्रवणं
पितॄणां पित्र्यं धनम्,- इति वा । पित्र्यं यशः
इति वा । तस्य ते देवि हविषा विधेम- इति ।
व्याख्यातम् ॥
'यमी' व्याख्याता ।
तस्य एषा भवति ॥१२ [३३) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४४२ ) ११अ० ३पा० २३खं०
अर्थः- “कुहुमहं सुवृतम्०” इस ऋचाका देविकाओं में
विनियोग है ।
‘अहम्’ मैं ‘सुवृतम्’ ( सुकृतम् विदितकर्माणाम्) सुन्दर
कर्मवाली अथवा विदितकर्मवाली ‘सुहवाम्’ ( सुहानाम् )
सुन्दर आवाहनवाली ‘कुहूम्’ कुहू को “अस्मिन् यज्ञे”
इस यज्ञ में ‘जोहवीमि’ ( आह्वये ) बुलाता हूं । “सा नो
ददातु श्रवणं पितॄणाम् ” [ पित्र्यं धनम् इति वा, पि-
त्र्यं यशः इति वा ) वह हमें पितरों का धन या यश दे ।
“तस्यै ते देवि ! हविषा विधेम ” ऐसे प्रभाववाली
तुझ को हे देवि ! हम हविः से सेवन करते हैं—हविः देते हैं
यह पहिलेँ व्याख्यान किया जाचुका है ।
‘यमी’ ( २४ ) शब्द की ‘यम’ शब्द से व्याख्या की
जाचुकी ( १०, २, ६ ) ।
“तस्या०” उस यमी की यह ऋचा है- १२ ( ३३ ) ॥
( खं० १३ )
निरु०-“अन्यमूषुतवं यम्यन्य उ त्वां परिष्वजाते
लिबुजेव वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा
तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥” [ऋ०सं० ७,
६, ७८, ४] ॥
अन्यमेव हि त्वं यमि !, अन्यः त्वां परिष्वङ्-
क्ष्यते लिबुजा-इव वृक्षम्, तस्य वा त्वं मनःइच्छ,
स वा तव, अधा अनेन कुरुष्व संविदं सुभद्राम्।