निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४२७ ) ११ अ० ३ पा० ३ खं०
'एनः' एतेः ।
'किल्बिषम्' किल्भिदम् । सुकृतकर्मणो भयम् ।
कीर्त्तिम् अस्य भिनत्ति इति वा ।
यं भद्रेण शवसा बलेन चोदयसि प्रजावता च
राधसा अनेन ते वयम्-इह स्याम इति ।
'सरमा' सरणात् ।
तस्या एषा भवति-॥ ३ (२९) ॥
अर्थ :-"यस्मै त्वं सुद्रविणो०" इस ऋचा का कुत्स
ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
'सुद्रविणः !' हे सुन्दर धन वाले ! 'अदिते !' अग्निदेव !
'त्वम्' तू 'यस्मै' जिसके लिये 'ददाशः' ( ददासि ) देता है,
'यं' (च) और जिसको 'भद्रेण' शुभ 'शवसा' ( बलेन ) बल से
'प्रजावता' ( च ) और प्रजासंयुक्त 'राधसा' ( धनेन ) धन से
'चोदयसि' ( अनुगृह्णासि ) अनुग्रह करता है, "अनागाः
त्वं सर्वताता" ( अनपराध (:) त्वं सर्वासु कर्मसन्ततिषु ) तू
उसके सब कर्मों में अनपराध = निरपराध होता है- उससे
तेरा कोई अपराध नहीं बनता इसी से उसके सब कर्मों को
तू निर्दोष कर देता है। "ते स्याम" ऐसे प्रभाव वाले के
तेरे हम ' इह ' यहां यज्ञकर्म में अनुग्रह-पात्र हों ( यह हम
चाहते हैं) ।
'आगः' (पाप) कैसे ? 'आङ् (उप०) पूर्वक 'गम्' ( भ्वा०
प० ) धातु से है ।