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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३७० ) १० अ० ४ पा० ४ खं०
बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः ॥ ”
ऋ० सं० ३, ६, १०, ३ ) ॥
ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति, पूर्वीःऋतस्य प्रज्ञा
वर्जनीयानि हन्ति ऋतस्य श्लोको बधिरस्यापि
कर्णौ आतृणक्षि ।
‘बधिरः’ बद्धश्रोत्रः ।
कर्णौ बोधयन् दीप्यमानश्च आयोः = अय-
नस्य = मनुष्यस्य । ज्योतिषो वा । उदकस्य वा ।
‘इन्दुः’ इन्धेः । उनत्तेर्वा ।
तस्य एषा भवति ॥ ४ ( ४१ ) ॥
अर्थः- “ऋतस्य हि शुरुधः०” इस ऋचा का वाम-
देव ऋषि है ।
‘हि’ क्योंकि—‘ऋतस्य’ ऋत मध्यम देव के ‘पूर्वीः’
पहिली या पूर्व अनेक काल की संचित की हुई ‘शुरुधः’
( आपः ) अप् [ जल ] हैं, [ अतः ] इससे ‘ऋतस्य’ ऋत देव
की ‘धीतिः’ [प्रज्ञा] बुद्धि ‘वृजिनानि’ सब लोकों के कष्टों
को ‘हन्ति’ नाश करती है, या ‘वृजिनानि [ वर्जनीयानि =
अयशांसि ] लोकों के अपयशों को ‘हन्ति’ नाश करती है ।
क्योंकि-अकाल में ही भूख प्यास के मारे हुये लोकों की अप-
यश के करने वाले चोरी आदि कामों में प्रवृत्ति होती है,
किन्तु ऋतदेव के यथा समय वृष्टि करने पर नहीं होती ।
इसी से ‘ऋतस्य’ [ ज्योतिषो वा ] ऋतकी ज्योति [ बिजली ]
का [ उदकस्य वा ] अथवा जलका ‘श्लोकः’ श्लोक या शब्द

हिन्दी निरुक्त ( ३७१ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
'बुधानः' (बोधयन् ) जगाता हुआ 'शुचमानः' ( दीप्यमानः)
प्रकाशित होता हुआ 'बधिरा' [ बधिरस्यापि ] बहरे भी
'आयोः' ( अयनस्य = मनुष्यस्य ) मनुष्य के 'कर्णा' [कर्णौ ]
कानों को 'ततर्द' [ आतृणत्ति ] भेदन करदेता है वा फोड़
देता है । बहरे भी उस के यश को जानते हैं, ऐसा ऋतः
देव है ।
'इन्दुः' [ २७ ] कैसे ? दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' ( रु०आ० )
धातु से है । अथवा क्लेदन [ भिगोना ] अर्थ में 'उन्द्' ( रु०
उ० ) धातु से है । क्योंकि—इन्दु ( चन्द्रमा) में प्रकाश करना
और भिगोना दोनों ही क्रियाएं संभव हैं ।
“तस्य०” उस की यह ऋचा है—॥ ४ (४१) ॥
(खं०५)
निरु०—“प्रतद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य
इषवान्मम रेजति रक्षोहा मन्म रेजति । स्वयं सो
अस्मदानिदो वधैरजेत दुर्मतिम् । अवस्रवेदघशं-
सोऽवतरमव क्षुद्रमिवस्रवेत् ॥ ऋ०सं०२,१,१७,१] ।
प्रब्रवीमि तद् भव्याय इन्दवे हवनाई इव य इषवान्
अन्नवान् कामवान् वा मननानि च नोरजयति रक्षो-
हाच बलेन रेजयति स्वयं सो अस्मदभिनिन्दि-
तारम् । “ वधै रजेत दुर्मतिम्” । “ अवस्रवेद-
घशंसः ।” ततश्च अवतरं क्षुद्रमिव अवस्रवेद् ।
“ अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ” यथा- अहो
दर्शनीया-अहो दर्शनीया, इति ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३७२ ) १० अ० ३ पा० ५ ख०
तत् परुच्छेपस्य शीलम् ॥
'परुच्छेपः' ऋषिः । पर्ववच्छेपः । परुषि परुषि
शेपः अस्य — इति वा ॥
इति इमानि सप्तविंशति ( २७ ) दैवतानाम-
धेयानि अनुक्रान्तानि-सूक्तभाञ्जि हविर्भाञ्जि॥
तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः,
ऋतः, इन्दुः ॥
'प्रजापतिः' प्रजानां पाता वा पालयिता वा ॥
तस्य एषा भवति ॥५ (४२) ॥
अर्थः- "प्रतद्वोचेयम्०" यह अतिच्छन्द है । परुच्छेप
ऋषि और षष्ठ अहन् (दिन) में मरुत्वतीय में शस्त्र है।
(यद् यद्-इष्टं तस्य इन्दोः) जो जो उस इन्द्र देव को
प्रिय है, 'तत्' (तत्) सो सो (अहम्) मैं 'भव्याय' उस भव्य
या भवन-योग्य = आत्मवान् = अपने वाञ्छितों के पात्र
'इन्दवे' इन्दु देव के लिये 'प्रवोचेयम्' (प्रब्रवीमि) कहता हूं।
'यः' जो इन्दु 'हव्येान' ( हवनार्ह इव ) हवन के योग्य जैसा
'इषवान्' ( अन्नवान् ) अन्न या उदक = जल वाला है—
यद्यपि उसके लिये यज्ञ में हविः नहीं दिया जाता, तो भी
वह अन्न या हविः वाला है—अर्थात्-अन्न के भी कारण
भूत जल को धारण करने वाला है जिससे कि—हविः उसी
से उत्पन्न होते हैं, इससे हविर्भाग् देवताओं से भी अधिक
महिमा वाला है । अथवा 'इषवान्' (कामवान्) कामनांवाले

हिन्दी निरुक्त ( ३७३ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०

होताओं को नित्य ही उनके वाञ्छित फलों के देने में प्रस्तुत
(तैयार) रहता है । इसीसे 'मन्म' (नः मननानि) हमारे मनों
को या प्रजाओं को 'रेजति' (रेजयति) (आकम्पयति) कम्पित
करता है- कैसे हम इसकी नित्य ही स्तुति करें ?- अपने
अनुग्रहों से हमारे मनों को नई नई स्तुतियों के लिये चञ्चल
करता रहता है । "रक्षोहा मन्म रेजति" (रक्षोहा च
बलेन रेजयति) और बल से राक्षसों को मारता हुआ हमारे
मनों को फुलाता है। और 'स्वयम्' अपने आप आदर युक्त
होकर 'सः' वह इन्दु 'अस्मदानिंदः' (अस्मदभिनिन्दिताम्)
हमारी निन्दा करने वाले 'दुर्मतिम्' दुष्टमति या पापमति
पुरुष को 'वधैः वज्र के प्रहारों से 'अजेत' प्राप्त होता है या
जीत लेता है या दूर फेंक देता है । 'अघशंसः' हमारे पापों
को कहने वाला-थोड़े पापों को भी देश में बढ़ाकर फैलानेवाला
'अवस्रवेत्' उस अतिबलवान् इन्दु से हन्यमान होता हुआ
अधोगति को प्राप्त हो । "अवतरम्" - नीचे से भी नीचे
'क्षुद्रम्-इव' अति तुच्छ वस्तु के समान 'अवस्रवेत्' नीचे चला
जावे- जैसे कोई क्षुद्र वस्तु जड़ से नष्ट होजाता है, उसी
प्रकार वह हमारा शत्रु नष्ट होजावे (यह हम चाहते हैं)।
इस मन्त्र में 'रेजति' 'रेजति' 'स्रवेत्' 'स्रवेत्' इस प्रकार एक २
पद फिर २ पढ़ा गया है, उसका क्या प्रयोजन है ? ऐसा प्रश्न
उठाकर भाष्यकार स्वयम् समाधान करते हैं-
"अभ्यासे भूयांसमर्थ मन्यन्ते"
अर्थात् - जहां शब्द के अभ्यास या आवृत्ति में दूसरा
कोई विशेष प्रयोजन नहीं है, वहां मन्त्रोंके अर्थ तत्व के

हिन्दी निरुक्त ( ३७४ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
जानने वाले आचार्य अर्थ के बाहुल्य को ही अभ्यास का
प्रयोजन मानते हैं क्यों कि- अकस्मात् वही शब्द दोहराया
नहीं जाता, अवश्य ही उनके पुनः कथन में कोई प्रयोजन
रहता है। और लोक में भी ऐसा देखागया है-
“यथा-अहो दर्शनीया अहो दर्शनीया”
अर्थात्- जैसे 'अहो (आश्चर्य, यह स्त्री दर्शनीय है अहो
यह स्त्री दर्शनीय है।
यहां स्त्री के गुणों के अतिशय या आधिक्य के बताने के
अर्थ 'दर्शनीय' पद को दोहराया गया है। इससे मन्त्रों में भी
वैसा ही शब्द स्वभाव है।
क्या कुछ और भी ? हाँ, -
“तत् परुच्छेपस्य शीलम्” अर्थात्- वह अभ्यास
मन्त्र के द्रष्टा परुच्छेप ऋषि का स्वभाव है- परुच्छेप ऋषि
का ऐसा ही स्वभाव है कि- वह अपने देवता की स्तुति
में एक २ शब्द को दोहरा २ कर बोलता है।
इससे भाष्यकार ने यह भी दिखाया कि- मन्त्रों के अर्थ
दर्शन काल में शब्दों के स्वभाव तक ही ध्यान नहीं रखना
चाहिये बल्कि मन्त्र के द्रष्टा ऋषि के स्वभाव का भी अनुरोध
करना चाहिये। इसी लिये लोक में भी वाच्य, लक्ष्य और
व्यङ्ग्य अर्थ के अतिरिक्त एक तात्पर्यार्थ भी माना जाता है
जो वक्ता की इच्छा से ज्ञान से प्रतीत होता है।
'परुच्छेप' कौन? ऋषि । सो क्यों? उसका पर्व या ग्रन्थि
वाला महान् शेप (लिङ्ग) है। अथवा 'पर्व्वणि पर्व्वणि शेपः अस्य'
अङ्गों की सन्धि २ में उसका शेप है- इतना लम्बा है कि-
उसका स्पर्श सब अङ्गों पर होजाता है।

हिन्दी निरुक्त ( ३७५ ) १० अ० ४ पा० ६खं०
"इति इमानि०" इस प्रकार ये सताईस (२७) 'वायु'
से आरम्भ कर 'इन्दु' पर्य्यन्त देवताओं के नाम गिनाए गए।
किस प्रयोजन से ? विशेष अर्थ के कहने के लिये ।
वह क्या विशेष है ?
"सूक्तभाजि हविर्भाञ्जि"
अर्थात्-ये सब देवता सूक्त के भजन करने वाले और
हविः के भजन करने वाले हैं- इनकी सूक्तों में प्राधान्य से
स्तुति भी है और यज्ञ में इनकी हविः भी है।
"तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः,
ऋतः इन्दुः ।"
किन्तु उनमें ये चार देवता हविर्भाक् नहीं हैं,-वेन,
असुनीति, ऋत और इन्दु-इनकी सूक्तोंमें स्तुतिमात्र है और
यज्ञमें इन्हें हविः नहीं दीजाती । शेष सब तेईस ( २३ )
देवता वायु आदि हविः और सूक्त दोनों के भागी हैं ।
यह देवताओं के स्वभाव के दिखाने के अर्थ कहा है ।
जिस प्रकार मन्त्रार्थ के ज्ञान में शब्द स्वभाव और ऋषि-
स्वभाव का ज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार देवता का भी
स्वभाव ज्ञातव्य है। जैसे कि- यहां जो वेन आदि देवता
हविः के भजने वाले नहीं हैं, उनके मन्त्रों में जो "घृत" 'अन्न'
आदि शब्द आते हैं, उनका अर्थ मध्यम देवता के स्वभावा-
नुसार जल आदि ही लिया जावेगा । जो ऐसा अनुसन्धान
न रख कर प्रसिद्ध अर्थ के अनुसार घृत आदि ही अर्थ लेगा
वह देवता के प्रतिकूल ही अर्थ करेगा, जो यज्ञ में विगुणता
को उत्पन्न करने वाला है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३७६ ) १० अ० ४ पा० ६ खं०
'प्रजापति' (२८) क्या ? प्रजाओं का पाता या पालयिता
( पालन करने वाला ) ।
"तस्य०" उसे प्रजापति देवकी यह ऋचा है ॥५(४२)॥
( खंड ६ )
निरु०- "प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वाजाता-
नि परिताँ बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु
वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥" (ऋ०सं०८,७,४,५
य०वा०सं० १०,२, २३,६५) ॥
प्रजापते ! नहि त्वद्-एतानि अन्यः सर्वाणि
जातानि तानि परि बभूव । यत्कामाः ते जुहुमः,
तद् नः अस्तु, वयं स्याम पतयो रयीणाम्, इत्याशीः।
'अहिः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति-॥६(४३)॥
अर्थः- "प्रजापते०" इस ऋचाका प्राजापत्य हिरण्य-
गर्भ ऋषि है। पितृयज्ञ में उपस्थान में विनियोग है और
राजसूय में होम में विनियोग है ।
'प्रजापते!' हे प्रजापति देव ! 'त्वत्' तेरे से 'अन्यः' अन्य
कोई भी एतानि इन 'ता' (तानि) उन 'विश्वा' (विश्वानि
= सर्वाणि) सब 'जातानि' (देवतारूपाणि) देवता रूपों को
'न' 'परिबभूव' (परिगृह्य भवति) सब ओर से ग्रहण
करके नहीं रहता है, किन्तु तू ही इन सब रूपोंको सब ओर
से लिये हुये है। 'यत्कामाः' जिस २ कामना को करते हुये

हिन्दी निरुक्त ( ३७७ ) १० अ० ४ पा० ७ खं०
(हम) 'ते' तेरे लिये 'जुहुमः' होम करते हैं, 'तत्' सो २
'नः' (अस्माकम्) हमारा 'अस्तु' होवे और (हम) 'रयीणां (धना-
नाम्) पतयः' स्वामी 'स्याम' होवें। यह आशीः या प्रार्थना है।
'अहि' (२९) शब्द व्याख्यान [२.५.३] किया जाचुका ।
“तस्य०” उस (अहि) की यह ऋचा है ॥६(४२)॥
व्याख्या ।
आशीः। “प्रजापते” इस मन्त्र में दो आशिषाएं हैं
पहिली- “यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु” जिस २
कामना से हम तेरे लिये होम करते हैं वो र हमें हो, और दूसरी
“वयं स्याम पतयो रयीणाम्” हम धनों के स्वामी
होवें। अथवा “आशीः” इस निर्देश से भाष्यकार यह
दिखाते है कि- यह आशिषा मन्त्र ही में है, किन्तु जहां मन्त्र
में आशिषा न भी हो, तो भी वहाँ अध्याहार कर लेना चा-
हिए । क्यों कि- स्तुति और आशिषा का नित्य सम्बन्ध
है- किसी प्रार्थना के बिना कभी कोई स्तुति प्रवृत्त नही
होती ॥
अहि । पहिले इस शब्द का निर्वचन मात्र किया गया
है-'अहि' क्यों ? 'अयनात्' गमन करने से, किन्तु यहाँ उसका
अभिधेय (अर्थ) बताया गया है कि-वह मध्यमदेव है॥६(४३)॥
(खं० ७)
निरु०-“अब्जा मुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां
रजः सु सीदन् ॥” [ऋ० सं० ५, ३, २६, ६] ॥
अब्जम् उक्थैः अहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां बद्ध्वा

हिन्दी निरुक्त ( ३७८ ) १० अ० ४पा० ७ खं०

अस्मिन् धृताः आपः इति वा ।
इदमपि इतरद् 'बुध्नम्' एतस्मादेव । बद्धा
अस्मिन् धृताः प्राणा इति ।
योऽहिः स बुध्न्यः । 'बुध्नम्' अन्तरिक्षं तन्नि-
वासात् ।
तस्य एषा भवति-॥७(४४)॥
अर्थः- "अब्जामुक्थैः०" इस ऋचा का वाशिष्ठ
पाराशर ऋषि है। दशरात्र के चतुर्थ अहन् में वैश्वदेव में
विनियोग है।
( हे स्तोतः ! ) हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विक् ! (त्वम्)
तू 'रजःसु' (उदकेषु) जलों के निमित्त 'सीदन्' स्थित होता
हुआ 'नदीनाम्' (नदमानाम्) नाद (शब्द) स्वभाव जलों के
'बुध्ने' (बन्धने) बन्धनरूप अन्तरिक्ष में (वर्त्तमानम्) विद्य-
मान 'अब्जाम्' (अप्सुजम्) जल में जन्मने वाले 'अहिम्'
अहि (मेघ) देव को 'उक्थैः' स्तोत्रों से 'गृणीषे' स्तुति
करता है।
'बुध्न' क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? 'बद्धा अस्मिन् धृताः
आपः इति वा' इसमें जल बंधे हुए हैं, या धरे हुए हैं।
यह भी दूसरा 'बुध्न' (शरीर का वाचक) इसी व्याख्यान
से है। कैसे ? इसमे प्राण बंधे हुए हैं या धारण किये हुए हैं।
'अहिर्बुध्न्यः' (३०) शब्द । क्या अर्थ ? जो अहि सो
बुध्न्य । 'अहिः' 'बुध्न्यः' ये दो प्रथमान्त समानाधिकरण
(विशेषण विशेष्य) पद हैं । यथास्थित मिल कर ही एक
नाम का कार्य करते हैं। 'बुध्न्य' क्या ? 'बुध्न' अन्तरिक्ष का

हिन्दी निरुक्त ( ३७६ ) १० अ० ४ पा० ६ ख०
नाम है, और उस में रहने से अहि 'बुध्न्य' है । 'बुध्न' शब्द
में 'य' तद्धित प्रत्यय होने से 'बुध्न्य' होजाता है ।
"तस्य०" उस 'अहिर्बुध्न्य'की यह ऋचा है ॥७(४४)॥
( खं० ८ )
निरु०—"मानो॑ऽहि॒ र्बुध्न्यो॑ रि॒षे धान्मा॑ य॒ज्ञो
अ॒स्य स्रिध॑दृता॒योः ॥” [ऋ०सं०५,३,२६,७] ॥
मा च नः अहिर्बुध्न्यो रिषणाय धात् । मा अस्य
यज्ञा खा च स्रिधद् यज्ञकामस्य ।
'सुपर्णो॑' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥८(४५)॥
अर्थ—"मानोऽहिर्बुध्न्यो०" इस ऋचाका ऋषि आदि
पूर्व ऋचा के समान हैं ॥
'मा' मत 'नः' (अस्मान् ) हमें 'अहिर्बुध्न्यः' अहिर्बुध्न्य
देव 'रिषे' (हिंसनाय ) हिंसा के लिये 'धात्' धारण करे ।
और 'मा' मत 'अस्य' इस 'ऋतायोः' (यज्ञकामस्य ) यज्ञ
की कामना वाले यजमान का 'यज्ञः' यज्ञ 'स्रिधत्' मत हो,
किन्तु सदा ही अविनाशी बना रहे ।
'सुपर्णः [३१] शब्द का निर्वचन [ ३,२,६ ] होचुका,—
'सुपतनः' सुन्दर पतन करने वालो । यहां मध्यम ज्योति
अभिधेय या अर्थ तत्व है ।
"तस्य०" उस 'सुपर्ण' की यह ऋचा है—॥८(४५)॥
( खं०६ )
निरु०"ए॒कः सु॑प॒र्णः स स॑मु॒द्रमावि॑वेश॒ स इ॒दं

विश्वं भुवनं विचष्टे । तं पाकेन मनसा पश्यमन्त-
स्तस्तं माता रे ळ्हि [ल्हि] स उ रे ळ्हि (ल्हि)
मातरम् ॥” [ऋ०सं०८,६,१६,४] ॥
एकः सुपर्णः स समुद्रम्-आविशति, स इमानि
सर्वाणि भूतानि अभिविपश्यति, तं पाकेन नसा
अपश्यम् अन्तितः, इति ऋषेर्दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति
आख्यानसंयुक्ता, तं माता रेड्ढि वाग्-एषा
मध्यमिका, स उ मातरं रेड्ढि ।
'पुरूरवाः' बहुधा रोरूयते ।
तस्य एषा भवति-॥९'४६)॥
अर्थः-“एकः सुपर्णः” इस ऋचा का सन्नि यौ धर्म
ऋषि है ।
‘एकः’ ( अद्वितीयः ) एक ही या अद्वितीय-जिसके पतनं
( गमन ) में दूसरा यान उपमान नहीं है, ‘सः’ वह ‘सुपर्णः’
सुन्दर उड़ने वाला वायु ‘समुद्रम्’ ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष
को ‘आविवेश’ प्रवेश करता है—सदा ही उस में प्रवेश किये
हुये रहता है । ‘सः’ वह ‘ इदम् ’ [ इमानि ] इन ‘विश्वम्’
[ विश्वानि ] सब ‘भुवनम्’ ( भूतानि ) भूतों को ‘विचष्टे’
( अभिविपश्यति ) भले प्रकार देखता है । ‘तम्’ उस वायुदेव
को ‘पाकेन’ परिपक्व विज्ञान ‘मनसा’ मन से ‘अन्तित ’ पास
में ‘अपश्यम्’ मैंने देखा है । [ यह मन्त्र में देवता तत्त्व को
साक्षात्कार करके जो ऋषि को प्रीति हुई, वही आख्यान के

हिन्दी निरुक्त ( ३८१ ) १० अ० ४ पा० १० खं०
रूप में वर्णन की हुई है । ] [ ऋषि देवता के दर्शन करके
किसी से कहता है । ]
‘तम्’ उस वायुदेव को ‘माता’ [ एषा माध्यमिका वाक् ]
यह मध्यम लोक की वाणी रूप माता ‘रेढि’ [लेढि] चाटती
है । ‘सः उ’ और वह भी ‘मातरम्’ माता को ‘रेढि’ चाटता
है । अर्थात्—दोनों परस्पर के आश्रय होने के कारण
अध्यात्म के समान हैं । अध्यात्म मन्त्र में स्तोता और स्तुत्य
दोनों भाव एक ही में आजाते हैं, वैसे ही यहां एक ही देवता
कर्त्ता और कर्म का काम कर रही है ।
‘पुरूरवाः’ [३२] क्या ? बहुधा रोने वाला ।
“तस्य०” उस पुरूरवस् देवता की यह ऋचा है—॥६(४६)
(खं० १०)
“निरु०- समास्मिञ्जायमान आसत ग्ना
उतेमवर्द्धन्नद्यः १ स्वगूर्त्ताः । महे यत्त्वा पुरूरवो
रणाय वर्द्धयन्दस्युहत्याय देवाः ॥”( ऋ० सं०
८, १, ३, २ )॥
समासत अस्मिन् जायमाने ग्नाः गमनात् आपः
देवपत्न्यो वा । अपि च एनम् अवर्द्धयन् नद्यः
‘स्वगूर्त्ताः’स्वयंगामिन्यः। महते च यत्त्वा पुरूरवो
‘रणाय’रमणीयाय संग्रामाय अवर्द्धयन् दस्यु-
हत्याय च देवा देवाः ॥१०(४७)॥
इति दशमाध्यायस्य चतुर्थ पादः ॥ १०, ४॥

हिन्दी निरुक्त ( ३८३ ) १० अ० ४पा० १०खं०
निरुक्त के दशम अध्याय का खण्डसूत्र-
[१म पा०-] अथातो मध्यस्थानाः (१) वन्द्यो (२) आंस-
खाणासः [३] नीचीनवारम् (४) तमूषु (५) इमा रुद्राय [६] या ते
दिद्युत् (७) जराबोध (८ अदर्शत् [९] योजासैण्व [१०] विवृश्चान्
[११] अश्नापिनद्धम् (१२) अश्मास्यम् (१३] (द्वि०पा०) क्षेत्रस्य
पतिः (१४) क्षेत्रस्यपतिना [१५] क्षेत्रस्यपते [१६] अमीवहा
[१७] पुनरेहि [१८] यो अनिध्मः (१९) परियिवांसम् (२०)
सेनेव (२१) मित्रः (२२) हिरण्यगर्भः (२३) येतै (२४) (३र्य
पा०-) विश्वकर्मा सर्वस्य (२५) विश्वकर्मा विमना (२६)
विश्वकर्मन् (२७) त्यमूषु (२८) सद्यश्चिद्यः (२९) तक्ष्यामन्थो
(३०) आदधिकाः [३१] सविनायन्त्रैः [ ३२ ] हिरण्यस्तूप
[३३] देवस्त्वष्टा (३४) वातमावातु (३५) पलितयम् (३६)
अभित्वा (३७) [४र्थ पा-] वेनो वेनतेः (३८) अयंवेनः (३९)
असुनीते (४०) ऋतस्यहि (४१) मतद्द्रोचेयम् (४२) प्रजापते (४३)
अह्ला मुच्यैः (४४) मानेोहिः (४५) एकः सुपर्णः (४६) सप्तस्मिनन्
(४७) सप्तचत्वारिंशत् ॥
इतिनिरुक्तं (उत्तरषट्के) दशमोऽध्यायः समाप्त ॥१०, ४॥
इति हिन्दीनिरुक्ते उत्तरषट्के दशमोऽध्यायः समाप्तः॥१०,४॥

अथ एकादशाध्यायः ।
प्रथमः पादः ।
( खं० १ )
⸪ ( अथ षट्त्रिंशत्पदानि )
निघ०-श्येनः ॥१॥ सोमः ॥२॥ चन्द्र-
माः ॥ ३ ॥ मृत्युः ॥४॥ विश्वानरः ॥५॥
धाता ॥ ६ ॥ विधाता ॥ ७ ॥
निरु० 'श्येनो' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति- ॥१॥
अर्थः- 'श्येन' ( १ ) शब्द की व्याख्या अ० ४ पा० ४
खं० ३ शब्द ५१ पर होचुकी है- "शंसनीयं गच्छति"
'बहुत अच्छा जाता है'। किन्तु यहा मध्यम देव उसका अभि-
धेय ( अर्थ ) कहा जाता है ॥
"तस्य०" उस 'श्येन' की यह ऋचा है- ॥ १ ॥
( खं० २ )
निरु०- " आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं
सवां अयुतं च साकम् । अत्रा पुरन्धिर जहादरा-
तीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः ॥" [ ऋ० सं० ३,
६, १५, ७ ) ॥
आदाय श्येनः अहरत् सोमं, सहस्रं सवान्,

अयुतं च सह । सहस्रं सहस्रसाध्यम्-अभिप्रेत्य,
तत्र अयुतं सोमभक्षाः, तत्सम्बन्धेन अयुतं दक्षि-
णा इति वा । तत्र पुरन्धिः अजहात् अमित्रान्
अदानान्-इति वा । "मदे सोमस्य मूरा अमूरः"
ऐन्द्रे च सूक्ते सोमपानेन च स्तुतः, तस्माद्-
इन्द्रं मन्यन्ते ॥
ओषधिः 'सोमः' । सुनोतेः । यद्-एनम् अभि-
षुण्वन्ति ।
बहुलम्-अस्य नैघण्टुकं वृत्तम्, आश्चर्यमिव
प्राधान्येन । तस्य पावमानीषु निदर्शनाय उदा-
हरिष्यामः ॥ २ ॥
अर्थ:- "आदाय श्येनो०" इस ऋचा का वामदेव
ऋषि है । श्येन अजिरादि में मरुत्वतीय में शस्त्र है ।
'श्येनः' (इन्द्रः) इन्द्रने (ऋत्विग्भिःप्रत्तं) ऋत्विजों के
दिये हुए 'सोमम्' सोम को 'आदाय' लेकर 'अभरत्' (अहरत्)
लेलिया या पान करलिया । कहां ? "सहस्रं सवान्
अयुतं च साकम् (सह)" जहां हजार (१०००)
सवों या सुत्याओं को करते हैं और साथ ही अयुत या दश
हजार (१०-०००) दक्षिणाओं को प्राप्त होते हैं । अथवा जहां
सहस्र सवों (सहस्रसाध्य सत्र) में अयुत (दशहजार) सोम भक्षण
होते हैं, तथा उनके सम्बन्ध से अयुत दक्षिणा होती हैं।
'अत्र' (तत्र) उस सहस्र साध्य सत्रमें-हजार सोमके सवनों

हिन्दी निरुक्त ( ३८६ ) ११ अ० १ पा० ३ खं०
वाले सत्र में 'पुरन्धिः' बहुत धनके देने वाले 'अमूरः' (अमूढः)
अमूढ या सावधान श्येन ( इन्द्र ) ने 'मूराः' मूढ 'अरातीः'
(अमित्रान् अदानान्) न दान करने वाले शत्रुओंको 'अजहात्'
( अभ्यजयत् ) जीता । कब ? "सोमस्य मदे " सोमके मद
को प्राप्त होने पर ॥
इस मन्त्र में सोम के पान और शत्रुओं के जय रूप
लक्षण से 'श्येन' मध्यम इन्द्र ही है, और इन्द्र के सूक्त में भी
सोम के पान से इस की स्तुति हुई है इस से भी इसे इन्द्र
मानते हैं ।
'सोम' (२) क्या ? ओषधि । किस धातु से ? सुनोति
( 'सु' स्वा० उ० ) धातु से । क्यों ? ' यद् एनम् अभिषुण्वन्ति'
जिससे कि इसे निचोड़ते हैं ।
इसका बहुत करके नैघण्टुक वृत्त है-प्रायः दूसरे की
प्रधान स्तुति में गौण या विशेष रूप से प्रयोग आता है ।
कहीं इस की प्राधान्य स्तुति भी आती है, जो कि-आश्चर्य
जैसी होती है । उसके दोनों प्रकार दिखाने के लिये "पाव-
मानी " ऋचाओं में उदाहरण देंगे ॥ २ ॥
( खं० ३ )
निरु०- “ स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम-
धारया । इन्द्राय पातवे सुतः ॥ ” ( ऋ०सं० ६,
७, १६, १ । सा० सं० छ० आ० ५, २, ४, २) ॥
इति सा निगदव्याख्याता ॥
अथ एषा अपरा भवति चन्द्रमसो वा एतस्य
वा- ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३८७ ) ११ अ० १ पा० ४ ख०
अर्थः- "स्वादिष्ठया" इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि है ।
ग्रावस्तोत्र में विनियोग है ॥
'सोम !' हे सोम !(त्वम्) तू 'स्वादिष्ठया' बहुत ही स्वादु
'मदिष्ठया' बहुत ही मद के देने वाली 'धारया' धारा से 'सुतः'
निचोड़ा हुआ 'इन्द्राय' इन्द्र के 'पातवे' पान के अर्थ 'पवस्व'
झर । यह उच्चारण से व्याख्या की हुई है ! 'यहां इन्द्र के
लिये झर' ऐसा कहने से ही यहां सोम की स्तुति परार्थ
या गौण जानी जाती है ।
" अथ०" और यह दूसरी ऋचा है, जो अथवा चन्द्रमा
की है, अथवा इस (सोम) की है ॥३॥
( सं० ४ )
निरु०- "सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिषन्त्यो-
षधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति ॥"
कश्चन" ऋ० सं० ८, ३, २०, ३) ॥
सोमं मन्यते पपिवान् यत् सम्पिषन्ति ओषधिम्
इति वृथा सुतं असोमम् आह, सोमं यं ब्रह्माणो
विदुः- इतिः न तस्य अश्नाति कश्चन अयज्वा
इति अधियज्ञम् ।
अथाधिदैवतम् - सोमं मन्यते पपिवान् यत्
सम्पिषन्ति ओषधिम्-इति यज्ञुः सुतम्- असोमम्
आह, सोमं यं ब्रह्माणो विदुः चन्द्रमसं, न तस्य
अश्नाति कश्चन अदेव इति ।

हिन्दी निरुक्त ( ३८८ ) ११ अ० १ पा० ४ खं०
अथ एषा अपरा भवति चन्द्रमसो वा एतस्य
वा- ॥ ४ ॥
अर्थः—"सोमं मन्यते०" इस ऋचा का सूर्या (सूर्य-
की पत्नी) ऋषि है विवाह में विनियोग है ।
'यत्' जो कि- रासायनिक लोग 'सोमम्' 'ओषधिम्'
सोम ओषधिको 'सम्पिषन्ति' पीसते हैं, 'पपिवान्' और
पीते हैं, तथा पीकर 'मन्यते' मानते हैं कि- 'सोमंपपिवान्'
हमने सोम पान किया है (वे सोम के पान करने वाले नही
हैं और वह सोम भी वृथा हैं)। (इस प्रकार यह आधी ऋचा
विधिविहीन निचोड़े हुए सोम को असोम कहती है )।
कहो ! कौन सोम है ? और कौन सोमपा हैं ? इसके उत्तर
में आधी ऋचा कहती है- सोमं यं ब्रह्माणो विदुः"
जिसे ब्राह्मण लोग विधि के अनुसार यज्ञ में उपयुक्त हुए
को सोम जानते हैं या मानते हैं (वह सोम है और उसके
पान करने वाले सोमपी हैं)। "न तस्य अश्नाति
कश्चन अयज्वा" किन्तु यजमान के रूप में यज्ञ में अधि-
कारी न होकर उसे कोई पुरुष अशन नहीं करसकता = पी
नहीं सकता यह मन्त्र का अधियज्ञ व्याख्यान है ।
अब अधिदैवत व्याख्यान है-पहिले कहा है कि-अथवा
यह चन्द्रमा की है, उसी के दिखाने के लिये कहते है-
"सोमं०-० ओषधिम्०" (यह यजुः है) अर्थात्
: जो यजन करनेवाले यज्ञमें सोम ओषधिको निचोड़ते हैं और
उसे पान करते हैं, तथा मानते हैं कि हमने सोमपान किया

हिन्दी निरुक्त ( ३८६ ) ११ अ० १ पा० ५ खं०
है, वे सोमपा (सोम पीने वाले) नहीं हैं और वह सोम
भी नहीं है। बल्कि वह सोम है, जिसे ब्राह्मण सोम के रूप
में चन्द्रमा जानते हैं। उसका कोई देदों से अतिरिक्त पान
नहीं कर सकता। क्योंकि 'चन्द्रमा ही देवताओं के भोजन के
अर्थ परिणत होकर (बदल कर) सोम हो गया है, यह देवतो-
ओं का अन्न है, यह ब्राह्मण में कहा है।
प्रयोजन यह हुआ कि—जिस प्रकार पूर्व अर्थ में यज्ञ के
सोम की अपेक्षा रासायनिकों (वैद्यों) का सोम असोम है
उसी प्रकार अधिदैव सोम (चन्द्रमा) की अपेक्षा यज्ञ का
सोम असोम है। अर्थात् यज्ञ में भी जो इस सोम के निदान
के जानने वाले हैं कि-यह सोम रूपान्तर में चन्द्रमा ही है,
वे ही उस सोमपान के फलभागी होते हैं। किन्तु वे नहीं जो
उसे साधारण भौतिक ओषधि ही जानते हैं।
यह दोनों पक्षों में सोम की स्वप्रधाना स्तुति है, इस में
सोमकी स्तुतिके द्वारा किसी दूसरे देवता की स्तुति नहीं है।
"अथ एषा" और यह दूसरी ऋचा है, जो अथवा
चन्द्रमा की है, अथवा इस सोम की है ॥४
( खं० ५ )
निरु०-“यत्वा देव प्रपिबन्ति तत आप्यायसे
पुनः। वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास
आकृतिः ॥” (ऋ०सं०८,३,२०,५) ।
“यत् त्वा देव प्रपिबन्ति, तत आप्यायसे पुनः”
इति नाराशंसान् अभिप्रेत्य पूर्वपक्षापरपक्षौ-इति

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ११ अ० १ पा० ५ खं०
वा “वायुः सोमस्य रक्षिता”, वायुम्-अस्य रक्षि-
तारम्-आह साहचर्याद् रसाहरणाद्वा । 'समानां'
संवत्सराणां “मास आकृतिः” सोमो रूपविशेषः
ओषधिः, चन्द्रमा वा ।
‘चन्द्रमाः’ चायन् द्रमति । चन्द्रो माता, चान्द्रं
मानम्, अस्य-इति वा ।
‘चन्द्रः’ चन्दतेः कान्तिकर्मणः ।
‘चन्दम्’ इत्यपि अस्य भवति । चारु द्रमति ।
चिरं द्रमति । चमेर्वा पूर्वम् ।
‘चारु’ रुचेर्विपरीतस्य ।
तस्य एषा भवति—॥५॥
अर्थ :-“यत्त्वा देव ! प्रपिबन्ति तत आप्या-
यसे पुनः०” हे देव ! सोम ! जो तुझे तीनों मुख्य २ सबनों
में ऋत्विज् और यजमान पान करते हैं-पीना आरम्भ करते
हैं, तब फिर तू बढ़ता है । ( यह व्याख्या नाराशंसों के
अभिप्राय से है-इस में सोम को मनुष्य पीते हैं और वह
बढ़ता है, इस लिये मनुष्यों के संबन्ध से यह व्याख्या है । )
अथवा ये पूर्वपक्ष [ शुक्लपक्ष ] और अपरपक्ष (कृष्णपक्ष) हैं-
हे देव ! सोम ! ( चन्द्र ! ) जब अपरपक्ष या कृष्णपक्ष में तुझे
रश्मिएं पान कर जाती हैं, तो फिर तू पूर्वपक्षमें [शुक्लपक्षमें]
कलाओं से बढ़ जाता है । [ यह अधिदैवत पक्ष है । ]
“वायुः सोमस्य रक्षिता” वायु सोमका रक्षा करनेवाला