निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७१ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
'बुधानः' (बोधयन् ) जगाता हुआ 'शुचमानः' ( दीप्यमानः)
प्रकाशित होता हुआ 'बधिरा' [ बधिरस्यापि ] बहरे भी
'आयोः' ( अयनस्य = मनुष्यस्य ) मनुष्य के 'कर्णा' [कर्णौ ]
कानों को 'ततर्द' [ आतृणत्ति ] भेदन करदेता है वा फोड़
देता है । बहरे भी उस के यश को जानते हैं, ऐसा ऋतः
देव है ।
'इन्दुः' [ २७ ] कैसे ? दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' ( रु०आ० )
धातु से है । अथवा क्लेदन [ भिगोना ] अर्थ में 'उन्द्' ( रु०
उ० ) धातु से है । क्योंकि—इन्दु ( चन्द्रमा) में प्रकाश करना
और भिगोना दोनों ही क्रियाएं संभव हैं ।
“तस्य०” उस की यह ऋचा है—॥ ४ (४१) ॥
(खं०५)
निरु०—“प्रतद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य
इषवान्मम रेजति रक्षोहा मन्म रेजति । स्वयं सो
अस्मदानिदो वधैरजेत दुर्मतिम् । अवस्रवेदघशं-
सोऽवतरमव क्षुद्रमिवस्रवेत् ॥ ऋ०सं०२,१,१७,१] ।
प्रब्रवीमि तद् भव्याय इन्दवे हवनाई इव य इषवान्
अन्नवान् कामवान् वा मननानि च नोरजयति रक्षो-
हाच बलेन रेजयति स्वयं सो अस्मदभिनिन्दि-
तारम् । “ वधै रजेत दुर्मतिम्” । “ अवस्रवेद-
घशंसः ।” ततश्च अवतरं क्षुद्रमिव अवस्रवेद् ।
“ अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ” यथा- अहो
दर्शनीया-अहो दर्शनीया, इति ॥