निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1144, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंविश्वं भुवनं विचष्टे । तं पाकेन मनसा पश्यमन्त-
स्तस्तं माता रे ळ्हि [ल्हि] स उ रे ळ्हि (ल्हि)
मातरम् ॥” [ऋ०सं०८,६,१६,४] ॥
एकः सुपर्णः स समुद्रम्-आविशति, स इमानि
सर्वाणि भूतानि अभिविपश्यति, तं पाकेन नसा
अपश्यम् अन्तितः, इति ऋषेर्दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति
आख्यानसंयुक्ता, तं माता रेड्ढि वाग्-एषा
मध्यमिका, स उ मातरं रेड्ढि ।
'पुरूरवाः' बहुधा रोरूयते ।
तस्य एषा भवति-॥९'४६)॥
अर्थः-“एकः सुपर्णः” इस ऋचा का सन्नि यौ धर्म
ऋषि है ।
‘एकः’ ( अद्वितीयः ) एक ही या अद्वितीय-जिसके पतनं
( गमन ) में दूसरा यान उपमान नहीं है, ‘सः’ वह ‘सुपर्णः’
सुन्दर उड़ने वाला वायु ‘समुद्रम्’ ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष
को ‘आविवेश’ प्रवेश करता है—सदा ही उस में प्रवेश किये
हुये रहता है । ‘सः’ वह ‘ इदम् ’ [ इमानि ] इन ‘विश्वम्’
[ विश्वानि ] सब ‘भुवनम्’ ( भूतानि ) भूतों को ‘विचष्टे’
( अभिविपश्यति ) भले प्रकार देखता है । ‘तम्’ उस वायुदेव
को ‘पाकेन’ परिपक्व विज्ञान ‘मनसा’ मन से ‘अन्तित ’ पास
में ‘अपश्यम्’ मैंने देखा है । [ यह मन्त्र में देवता तत्त्व को
साक्षात्कार करके जो ऋषि को प्रीति हुई, वही आख्यान के