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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1142

हिन्दी निरुक्त ( ३७८ ) १० अ० ४पा० ७ खं०

अस्मिन् धृताः आपः इति वा ।
इदमपि इतरद् 'बुध्नम्' एतस्मादेव । बद्धा
अस्मिन् धृताः प्राणा इति ।
योऽहिः स बुध्न्यः । 'बुध्नम्' अन्तरिक्षं तन्नि-
वासात् ।
तस्य एषा भवति-॥७(४४)॥
अर्थः- "अब्जामुक्थैः०" इस ऋचा का वाशिष्ठ
पाराशर ऋषि है। दशरात्र के चतुर्थ अहन् में वैश्वदेव में
विनियोग है।
( हे स्तोतः ! ) हे स्तुति करने वाले ! ऋत्विक् ! (त्वम्)
तू 'रजःसु' (उदकेषु) जलों के निमित्त 'सीदन्' स्थित होता
हुआ 'नदीनाम्' (नदमानाम्) नाद (शब्द) स्वभाव जलों के
'बुध्ने' (बन्धने) बन्धनरूप अन्तरिक्ष में (वर्त्तमानम्) विद्य-
मान 'अब्जाम्' (अप्सुजम्) जल में जन्मने वाले 'अहिम्'
अहि (मेघ) देव को 'उक्थैः' स्तोत्रों से 'गृणीषे' स्तुति
करता है।
'बुध्न' क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? 'बद्धा अस्मिन् धृताः
आपः इति वा' इसमें जल बंधे हुए हैं, या धरे हुए हैं।
यह भी दूसरा 'बुध्न' (शरीर का वाचक) इसी व्याख्यान
से है। कैसे ? इसमे प्राण बंधे हुए हैं या धारण किये हुए हैं।
'अहिर्बुध्न्यः' (३०) शब्द । क्या अर्थ ? जो अहि सो
बुध्न्य । 'अहिः' 'बुध्न्यः' ये दो प्रथमान्त समानाधिकरण
(विशेषण विशेष्य) पद हैं । यथास्थित मिल कर ही एक
नाम का कार्य करते हैं। 'बुध्न्य' क्या ? 'बुध्न' अन्तरिक्ष का