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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1152

हिन्दी निरुक्त ( ३८६ ) ११ अ० १ पा० ५ खं०
है, वे सोमपा (सोम पीने वाले) नहीं हैं और वह सोम
भी नहीं है। बल्कि वह सोम है, जिसे ब्राह्मण सोम के रूप
में चन्द्रमा जानते हैं। उसका कोई देदों से अतिरिक्त पान
नहीं कर सकता। क्योंकि 'चन्द्रमा ही देवताओं के भोजन के
अर्थ परिणत होकर (बदल कर) सोम हो गया है, यह देवतो-
ओं का अन्न है, यह ब्राह्मण में कहा है।
प्रयोजन यह हुआ कि—जिस प्रकार पूर्व अर्थ में यज्ञ के
सोम की अपेक्षा रासायनिकों (वैद्यों) का सोम असोम है
उसी प्रकार अधिदैव सोम (चन्द्रमा) की अपेक्षा यज्ञ का
सोम असोम है। अर्थात् यज्ञ में भी जो इस सोम के निदान
के जानने वाले हैं कि-यह सोम रूपान्तर में चन्द्रमा ही है,
वे ही उस सोमपान के फलभागी होते हैं। किन्तु वे नहीं जो
उसे साधारण भौतिक ओषधि ही जानते हैं।
यह दोनों पक्षों में सोम की स्वप्रधाना स्तुति है, इस में
सोमकी स्तुतिके द्वारा किसी दूसरे देवता की स्तुति नहीं है।
"अथ एषा" और यह दूसरी ऋचा है, जो अथवा
चन्द्रमा की है, अथवा इस सोम की है ॥४
( खं० ५ )
निरु०-“यत्वा देव प्रपिबन्ति तत आप्यायसे
पुनः। वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास
आकृतिः ॥” (ऋ०सं०८,३,२०,५) ।
“यत् त्वा देव प्रपिबन्ति, तत आप्यायसे पुनः”
इति नाराशंसान् अभिप्रेत्य पूर्वपक्षापरपक्षौ-इति