निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1136, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३७२ ) १० अ० ३ पा० ५ ख०
तत् परुच्छेपस्य शीलम् ॥
'परुच्छेपः' ऋषिः । पर्ववच्छेपः । परुषि परुषि
शेपः अस्य — इति वा ॥
इति इमानि सप्तविंशति ( २७ ) दैवतानाम-
धेयानि अनुक्रान्तानि-सूक्तभाञ्जि हविर्भाञ्जि॥
तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः,
ऋतः, इन्दुः ॥
'प्रजापतिः' प्रजानां पाता वा पालयिता वा ॥
तस्य एषा भवति ॥५ (४२) ॥
अर्थः- "प्रतद्वोचेयम्०" यह अतिच्छन्द है । परुच्छेप
ऋषि और षष्ठ अहन् (दिन) में मरुत्वतीय में शस्त्र है।
(यद् यद्-इष्टं तस्य इन्दोः) जो जो उस इन्द्र देव को
प्रिय है, 'तत्' (तत्) सो सो (अहम्) मैं 'भव्याय' उस भव्य
या भवन-योग्य = आत्मवान् = अपने वाञ्छितों के पात्र
'इन्दवे' इन्दु देव के लिये 'प्रवोचेयम्' (प्रब्रवीमि) कहता हूं।
'यः' जो इन्दु 'हव्येान' ( हवनार्ह इव ) हवन के योग्य जैसा
'इषवान्' ( अन्नवान् ) अन्न या उदक = जल वाला है—
यद्यपि उसके लिये यज्ञ में हविः नहीं दिया जाता, तो भी
वह अन्न या हविः वाला है—अर्थात्-अन्न के भी कारण
भूत जल को धारण करने वाला है जिससे कि—हविः उसी
से उत्पन्न होते हैं, इससे हविर्भाग् देवताओं से भी अधिक
महिमा वाला है । अथवा 'इषवान्' (कामवान्) कामनांवाले