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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1141, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1141

हिन्दी निरुक्त ( ३७७ ) १० अ० ४ पा० ७ खं०
(हम) 'ते' तेरे लिये 'जुहुमः' होम करते हैं, 'तत्' सो २
'नः' (अस्माकम्) हमारा 'अस्तु' होवे और (हम) 'रयीणां (धना-
नाम्) पतयः' स्वामी 'स्याम' होवें। यह आशीः या प्रार्थना है।
'अहि' (२९) शब्द व्याख्यान [२.५.३] किया जाचुका ।
“तस्य०” उस (अहि) की यह ऋचा है ॥६(४२)॥
व्याख्या ।
आशीः। “प्रजापते” इस मन्त्र में दो आशिषाएं हैं
पहिली- “यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु” जिस २
कामना से हम तेरे लिये होम करते हैं वो र हमें हो, और दूसरी
“वयं स्याम पतयो रयीणाम्” हम धनों के स्वामी
होवें। अथवा “आशीः” इस निर्देश से भाष्यकार यह
दिखाते है कि- यह आशिषा मन्त्र ही में है, किन्तु जहां मन्त्र
में आशिषा न भी हो, तो भी वहाँ अध्याहार कर लेना चा-
हिए । क्यों कि- स्तुति और आशिषा का नित्य सम्बन्ध
है- किसी प्रार्थना के बिना कभी कोई स्तुति प्रवृत्त नही
होती ॥
अहि । पहिले इस शब्द का निर्वचन मात्र किया गया
है-'अहि' क्यों ? 'अयनात्' गमन करने से, किन्तु यहाँ उसका
अभिधेय (अर्थ) बताया गया है कि-वह मध्यमदेव है॥६(४३)॥
(खं० ७)
निरु०-“अब्जा मुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां
रजः सु सीदन् ॥” [ऋ० सं० ५, ३, २६, ६] ॥
अब्जम् उक्थैः अहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां बद्ध्वा