निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३८७ ) ११ अ० १ पा० ४ ख०
अर्थः- "स्वादिष्ठया" इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि है ।
ग्रावस्तोत्र में विनियोग है ॥
'सोम !' हे सोम !(त्वम्) तू 'स्वादिष्ठया' बहुत ही स्वादु
'मदिष्ठया' बहुत ही मद के देने वाली 'धारया' धारा से 'सुतः'
निचोड़ा हुआ 'इन्द्राय' इन्द्र के 'पातवे' पान के अर्थ 'पवस्व'
झर । यह उच्चारण से व्याख्या की हुई है ! 'यहां इन्द्र के
लिये झर' ऐसा कहने से ही यहां सोम की स्तुति परार्थ
या गौण जानी जाती है ।
" अथ०" और यह दूसरी ऋचा है, जो अथवा चन्द्रमा
की है, अथवा इस (सोम) की है ॥३॥
( सं० ४ )
निरु०- "सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिषन्त्यो-
षधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति ॥"
कश्चन" ऋ० सं० ८, ३, २०, ३) ॥
सोमं मन्यते पपिवान् यत् सम्पिषन्ति ओषधिम्
इति वृथा सुतं असोमम् आह, सोमं यं ब्रह्माणो
विदुः- इतिः न तस्य अश्नाति कश्चन अयज्वा
इति अधियज्ञम् ।
अथाधिदैवतम् - सोमं मन्यते पपिवान् यत्
सम्पिषन्ति ओषधिम्-इति यज्ञुः सुतम्- असोमम्
आह, सोमं यं ब्रह्माणो विदुः चन्द्रमसं, न तस्य
अश्नाति कश्चन अदेव इति ।