निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त (३२०) ९० अ० २५१० ३ खं०
को पराधीन कियेहुये नित्यही बोलते रहो। कैसे—"मण्डूका
इवोदकात्” जैसे जल के विना मेंढुक नित्य अस्त्राधीन
वृत्ति होते हुये निर्वचन (मूक) होजाते हैं, ऐसे ही मेरे विना
तुम्हारी स्थिति न हो। इस प्रकार यहां पहिले स्थान में
'मण्डूकाः' यह शत्रुओ' के वाक् हीन होने में उपमान है।
“मण्डूका उदकात्- इव” और इस दूसरे स्थान में
जिस प्रकार जल के विना मण्डूक (मेंढक) सर्वथा ही नहीं होते
इसी प्रकार तुम मेरे विना मत हो, इस प्रकार यहां अपना
(वक्ता का) उदक उपमान है।
इसी प्रकार पूर्व मन्त्रों में भी विशेष का अनुसन्धान करना
जैसे- कोई मधुमान (मधुवाला) होता है, किन्तु वह निरन्तर
पुनः पुनः मधु (शहद) को चुवाता नहीं, इससे वह 'मधुश्चुत्'
(मधुका चुवाने वाला) नहीं कहा जाता। सुतराम् 'मधुमान्'
और 'मधुश्चुत' शब्द दोनों भिन्न २ अर्थ वाले ही हैं।
यहां जामिता दोष नहीं आता। और ऐसे ही "हिरण्यरूपः
स हिरण्य संदृक्” यहां कोई हिरण्य (सुवर्ण) रूप होता
है, किन्तु वह हिरण्य जैसा दिखाई नहीं देता और न प्रिय
होता है। इससे 'हिरण्यरूप' वह है, जो हिरण्य (सुवर्ण)
ही हो, और 'हिरण्य संदृक्' वह है, जो हिरण्य जैसा दिखाई
देवे और हिरण्य न हो। ऐसे ही अन्यत्र भी मन्त्रों में शब्दों
के भिन्न २ अर्थ अनुसन्धान करके जामिता दोष के अभाव
को देखना। जहां मन्त्रों में ऐसा स्थल आता है, वह पुरुष
की बुद्धि के दोष से ही दोष युक्त प्रतीत होता है; मन्त्र में
सर्वथा ही दोष नहीं होता। यह भाष्यकार का अभिप्राय है॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२१ ) १० अ० २ पा० ३ ख०
'वास्तोष्पति' (१) क्या ? 'वास्तुः' (घर) निवास अर्थ में
'वस्' (भ्वा० प०) धातु का है । क्यों कि—उसमें मनुष्य निवास
करते हैं उसके पति (पाता या पालयिता) को 'वास्तोष्पति'
कहते हैं । सो यह 'वास्तोष्पति' रुद्ररूप मध्यम देवता है ।
क्यों कि- ‘अमीवहा०’ इस मन्त्र में बलकृति ( बलकर्म )
लिङ्ग पाया जाता है ।
“तस्य०” उस (वास्तोष्पति) की यह ऋचा है ॥३(१६)॥
( खं० ४ )
निरु०-“अमीवहा वास्तोष्पते विश्वारूपाण्या-
विशन् । सखा सुशेव एधि नः ॥” ( ऋ०सं० ५,
४, २२, १ ) ॥
अभ्यमनहा वास्तोष्पते ! सर्वाणि रूपाणि आ-
विशन् सखा नः सुसुखो भव ॥
'शेव' इति सुखनाम । शिष्यतेर्वकारो नामकरणः
अन्तस्थान्तरोपलिङ्गी ॥
विभाषितगुणः, 'शिवम्' इत्यपि अस्य भवति ।
यद्-यद्-रूपं कामयते तत् तद् देवता भवति ।
“रूपं रूपं मघवा बोभवीति” इत्यपि निगमो
भवति ।
'वाचस्पतिः' वाचः पाता वा, पालयिता वा ।
तस्य एषा भवति ॥४(१७)॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२२ ) १० अ० २पा० ४ खं०
अर्थः—"अमीवहा०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है।
यह कारिका स्थालीपाक में और यायावर्य की प्रतिपत्ति में
वास्तोष्पतीय होम में विनियोग है।
हे भगवन् ! 'वास्तोष्पते ! देव ! [त्वम्] तू (अस्माकम् )
हमारे 'अमीवहा' (अक्षयमनहा) रोगों का नाश करने वाला
'एधि' (भव) हो। कैसे ? 'विश्वा' (विश्वानि = सर्वाणि)
सब 'रूपाणि' रूपों को 'आविशन्' आवेश करता हुआ-
धारण करता हुआ हमारे दुःखों के उत्पन्न करने वाले जो
सर्पादि उनका प्रतिपक्ष = विरोधी जो नकुल (न्योला) आदि
उन २ के रूपों को धारण करता हुआ उस २ हमारे रोग को
तू नाश कर-हमारे उपद्रवों को हटा। 'नः'(अस्माकम्) हमारा
'सखा' (मित्रम्) मित्र 'सुशेवः' (सुसुखः) सुन्दर सुखरूप हो ।
'शेव' यह सुख का नाम है। 'शिष्' (दि० प०) धातु
से वकार नाम करण (प्रत्यय) होता है, जोकि-अन्तस्थान्तरोप-
लिङ्गी-धातुके अन्त 'ष' के अन्तर या अवकाश स्थान को
उपलिङ्गन = उपगमन करने वाला होता है—'शिष्' का
'शिव' और 'इ' को 'ए' गुण होकर 'शेव' बन जाता है।
[ यहां 'अन्तस्थ' शब्द से यरलव वर्णों की संज्ञा नहीं है।]
इस धातु को यह गुण ('इ' का ए) विभाषित विक-
ल्प से होता है। इस से गुण के न होने पर इसी धातु का
'शिव' यह शब्द भी हो जाता है।
जिस २ रूप की कामना करता है, वह २ देवता हो
जाता है। (क्योंकि-देवता का ऐसा ऐश्वर्य है, जो जो वह
चाहता है। उस २ रूप को करलेता है।)
"रूपं रूपं मघवा बोभवीति" 'मघवा इन्द्रदेव
रूप रूप [ हर प्रकार का रूप ] 'बोभवीति' बार २ या
अतिशय से होता है। यह भी निगम है।
'वाचस्पति' ( १० ) क्या ? वाच् ( वाणी ) का पाता
या पालयिता ( रक्षा करने वाला होता है।
“तस्य०” उस वाचस्पति देव की यह ऋचा है- ॥४॥
व्याख्या।
“अमीवहा०” निगम में “विश्वा रूपाण्या-
विशन्” 'सब रूपों को धारण करने वाला वास्तोष्पति
मध्यम देव है,-यह कहा गया है। इसी की विशेष व्याख्या
करने की इच्छासे क्यों सब रूपों को धारण करता है? कैसे २
रूपों को धारण करता है? इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए
भाष्यकार यास्कमुनि कहते हैं-
“यद्यद् रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति”
अर्थात्-भक्त जिस २ रूप की कामना करता है उस २ रूप
से देवता होता है। प्रयोजन यह कि-भक्त की कामना को
पूर्ण करना ही देवता को नाना रूप धारण करने का कारण
है, और जैसे २ रूप को भक्त चाहता है, वैसे ही वैसे रूप
को वह धारण करता है। स्वयम् भगवान् की प्रतिज्ञा भी
ऐसी ही है “यो यो यांयां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितु-
मिच्छति । तस्यतस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधा-
म्यहम्” (भ० गी० ७, २१)
भाष्यकार कहते हैं कि-यही निगम इस प्रयोजन का
नहीं है, किन्तु और भी निगम है, जो इसी को स्पष्ट अक्षरों
में ही कह रहा है।
हिन्दी निरुक्त ( ३२४ ) १० अ० २ पा० ४ ख०
“रूपं रूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वा
नस्तन्वं १ परिस्वाम् । त्रिर्यद्द्दिवःपरि मुहूर्त्तमागात्
स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋता वा ॥” [ऋ०सं०३,३,२०,३]॥
इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि है।
जिन-जिन रूपोंसे इन्द्र देव होना चाहता है, उन सबसे
वह बिना किसी रुकावटके होजाता है-वार२ होता है। कैसे?
'ऐसा होऊं', 'ऐसा होऊं' इत्यादि इच्छाओं के अनुसार अपने
तनु (शरीर) को करता हुआ = बदलता हुआ। क्या वह
मनुष्य आदि के समान उस २ शरीर को धारण करके मोह
को प्राप्त होता है- उस २शरीर में होने वाले सुख दुःखों को
भोगता है? नहीं “मायाः” वे सब उसकी माया हैं-ऐच्छि-
क शरीर हैं, उसके मोहक नहीं हैं। जैसे बाजीगर या बहु-
रूपिया अपनी इच्छा से नाना रूपों को धारण करता है
और उनसे मोहित होकर उन्हें अपने सच्चे रूप नहीं
मानता, किन्तु अपनी इच्छा के अधीन ही मानता हुआ
उनका कार्य करता है, उसी प्रकार इन्द्र देवके नाना रूपहैं।
जो इन्द्र देव अपने स्तुति के मन्त्रों से- मनन वाक्यों
या भावना वाक्यों से यजमानोंके यज्ञमें बुलाया हुआ एक मुहूर्त्त
में द्युलोकसेतीनवार आता है-भिन्न २स्थानोंमें भिन्न २ रूपोंसे एक
हीवार आजाता है। प्रयोजन यहकि—देवताका ऐश्वर्य अमित
होता है, उसको नाना रूप धारण करने में कोई कष्ट नहीं
होता, वह सब कामों को अनायास करलेता है, उसके कामों
में अशक्ति से होने वाले प्रश्नों को नहीं उठाना चाहिये।
वह “अनृतुपा” और “ऋता वा” है, उसके सोम
पान को कोई समय नियत नहीं है, सदा ही उसके लिये
यञ्ज होते रहते हैं और सदा ही सोमपान करता रहता है ।
इससे यह ठीक ही कहा है- कि- तू सब रूपों को धारण
करता हुआ हमारे रोगों का नाशक हो ।
“बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा क्षेमायलोक-
स्य चराचरस्य सत्वोपपन्नानि सुखावहानि
सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥” (श्री० भा०
स्कं० १० अ० २ श्लो० २९ )
हे भगवन्! तू ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी चर अचर लोक
के क्षेम के लिये सात्विक रूपों को धारण करता है, जो सत्
पुरुषों के लिये सुख दायक और खलों के लिये सदा ही दुःख
दायक = दण्ड देने वाले हैं यह श्रीमद् भागवत वाक्य भी
रूपान्तर से वही वेद वाक्य प्रतीत होता है ॥४(१७)॥
(खं० ५)
निरु०-“पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह ।
वसोष्पते निरामय मय्येव तन्वं१मम ॥” [ऋ०सं०
१०,६,१३,७] ( अथ०सं० १,१,२)इति सा निगद-
व्याख्याता ।
'अपान्नपात्' तनूनप्ता व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥५[१८]॥
अर्थ :-कोई पापी मनुष्य, जिसने अपने किये हुए पाप
की किसी प्रायश्चित्त आदि से शुद्धि नहीं की हो, अपने
हिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २पा० ६ खं०
प्राणों को अपने से अलग हुये समझ कर उनसे सम्बोधन कर
के कहता है—
हे 'वाचस्पते '! वाणीके स्वामी ! तू 'देवेन' सब इन्द्रियों
की वृत्तियों को प्रकाशित करने वाले 'मनसा-सह' मनके साथ
'पुनः-एहि' फिर आ । हे 'वसोष्पते !' धन अथवा अन्न के
स्वामी ! 'मम' मेरी 'तन्वम्' तनू को = देह को 'मयि-एव'
मुझ में ही 'निरामय' निरन्तर रमा—ऐसा कर जिससे कि
मेरी तनू मुझ में ही रमण करे । यह ऋचा अपने उच्चारण से
ही व्याख्यात है ॥
'अपांनपात्' ( १० ) 'तनूनपात्' शब्द ( ८, २, २ ) से
व्याख्यान किया जाचुका । यह शब्द निर्वचन है— एक शब्द
का दूसरे शब्द के द्वारा निर्वचन किया जाता है, अर्थात्-यह
भी प्रकृत शब्द के निर्वचन के बताने की आचार्य की शैली
है । अप् या जलों से आदित्य होता है। और उससे मध्यम
देव, इससे वह 'अपांनपात्' जलका पोता है। यह शब्द की
व्याख्या है । अर्थ से यह मध्यम देव है ।
“तस्य०” उस ‘अपांनपात्’ की यह ऋचा है ॥५(१८॥
( खं०६ )
निरु०-“यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास
ईलते अध्वरेषु । अपान्नपान्मधुमतीरपो दाया-
भिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥” (ऋ०सं०७,७,२४,२,॥
यः अनिध्मः ‘दीदयद्’ दीप्यसे अभ्यन्तरम्-
अप्सु, यं मेधाविनः स्तुवन्ति यज्ञेषु, सः अपान्न-
हिन्दी निरुक्त ( ३२७ ) १० अ० २ पा० ७ खं०
पात् मधुमतीः अपो देहि अभिषवाय,याभिः इन्द्रो
वर्द्धते 'वीर्याय' वीरकर्मणे ॥
'यमः' यच्छति- इति सतः ।
तस्य एषा भवति ॥६(१९)॥
अर्थ:- “यो अनिध्मो०” इस ऋचा का कवष ऋषि
है । यह सारा ही मन्त्र प्रत्यक्ष है ।
हे अपान्नपात्! 'यः'(त्वम्)जोतू 'अनिध्मः'इन्धन के विना
'अप्सु'— 'अन्तः' जलों के मध्यमें 'दीदयत्' (दीप्यसे)'जलता
है, 'यम्' जिसे (जिस तुझको) 'अध्वरेषु' ( यज्ञेषु) यज्ञों में
'विप्रासः' (मेधाविनः) मेधावी ब्राह्मण 'ईळते' ( स्तुवन्ति )
स्तुति करते हैं (सः) सो तू 'मधुमतीः' मीठे (अपः) जलों को
'अभिषवाय'सोम के निचोड़ने के अर्थ 'दाः'(देहि) दे 'याभिः'
जिनसे 'इन्द्रः' तू इन्द्र देव 'वीर्याय' (वीरकर्मणे) वीर कर्म के
लिये 'वावृधे' (वर्द्धेयाः) बढता है । अथवा (वर्द्धते) इन्द्र देव
जिससे बढता है । [इस व्याख्या में इतना अंश प्रथम पुरुष
के योग से परोक्ष हो जाता है] ।
'यम'(१२) क्यों? 'यच्छति' वह सब प्राणियों को जीवन
से निवृत्त करता है । इसी बल कर्म से वह मध्यम है ।
“तस्य०” उस (यम) की यह ऋचा है ॥६(१६)॥
( खं० ७ )
निरु०-“परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यःपन्था-
मनुपस्पशानम् । वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं
राजानं हविषा दुवस्य ॥”[ऋ०सं०८,६,३४,१]॥
हिन्दी निरुक्त ( ३२८ ) १० अ० २ पा० ७ खं०
परेयिवांसं पर्यागतवन्तं प्रवतः उद्वतो निवतः-
इति । अवतिर्गतिकर्मा । बहुभ्यः पन्थानमनु
पस्पशयानं “वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं
राजानं ॰हविषा दुवस्य”- इति । ‘दुवस्यतिः’
राध्नोतिकर्मा ॥
अग्निरपि ‘यमः’ उच्यते ।
तम् एता ऋचः अनुप्रवदन्ति ॥७(२०)॥
अर्थ:-“परेयिवांसम्०” इस ऋचा का हविर्धान ऋषि
है । यम के पशुमें वपा में विनियोग है ।
हे यजमान ! ‘प्रवतः’ (मनुष्यान्,उद्वतः = देवान्,निवतः =
तिरश्चः) मनुष्यों को, देवताओं को, और पशु पक्षी आदि
तिर्यक् योतिके प्राणियों को ‘परेयिवांसम् (पर्यागतवन्तम् =
सर्वतः प्राप्तवन्तम् ) सब ओर से व्यापन करने वाले ‘महीः’
( महती भूतजातीः ) इन बड़ी २ प्राणियों की जातियों को
व्योपन करने वाले “बहुभ्यः (पुण्यकृद्भ्यः पापकृद्-
भ्यश्च ) पन्थाम् [ पन्थानम् ] अनुपस्पशानम्
( अनुपस्पशायमानम्) बहुत पुण्यात्माओं और पापि-
ओं के लिये कर्मों के अनुसार मार्ग देने वाले-इस मार्ग से यह
प्राणी जीवनसे छुड़ाना है, यह जानकर उसको चोर के समान
बांधकर सर्प ज्वर आदि का रूप धारण करके जीवित से
छुड़ाने वाले ‘वैवस्वतम्’ (विवस्वतः पुत्रम् ) सूर्यके पुत्र
‘जनानां संगमनम्’ अपनी सम दृष्टि करके सब प्राणियों को
हिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २ पा० ८ खंड
कर्मों के अनुसार इस लोक से पर लोक को लेजाने वाले
“यमंराजानम्” यम राजा को ‘हविषा’ पशुरूप हविसे
‘दुवस्य’ (राध्नुहि) आराधन कर ।
‘दुवस्यति’ धातु ‘राध्’ (स्वा० प०) धातु के अर्थ में है
आराधन वा सेवा अर्थ में है ।
अग्नि भी ‘यम’ कहा जाता है । (यह प्रसंग से वा
शब्द की समानता से निर्वचन है। इस से भी विचार का
क्रम-विशेष दिखाया गया है) ।
उस यम अग्नि को ये ऋचाएँ अनुप्रवचन करती हैं,
उसके गुणों को बखानती हैं—॥ ७ (२०) ॥
व्याख्या ।
उपर्युक्त “परेयिवांसम्०” इस मन्त्र में “गरुड़
पुराण” के प्रेतकल्प का संक्षेप है । जैसी वहां जीवों की
कर्म गतिए यमराज के अधिकार में वर्णन की हैं, वेही यहां
सामान्य रूपसे कही गई हैं। शब्दों की समानता भी पूर्ण
रूप से है ॥ ७ (२०) ॥
(खं० ८)
निरु० “सेनेव सृष्टामं दधात्येस्तुर्न दिद्युत् त्वेष
प्रतीका ॥”(ऋ० सं० १, ५, १०, ७) ॥
यमो हजातो यमो जनित्वं जारः कनीनां पतिर्ज-
नीनाम् । तं वश्चराथाँ वयं वसत्या स्तन्म गावो
नक्षन्त इद्धम् ॥” [ऋ० सं० १, ५, १०, ८]
इति द्विपदाः ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३३० ) १० अ० २ पा० ८खं०
सेना-इव सृष्टा भयं वा बलं वा दधाति, अस्तुः-
इव दिद्युत 'त्वेष प्रतीका' भयप्रतीका, बलप्रतीका,
यशः प्रतीका, महाप्रतीका, दीप्तप्रतीका वा ॥
“यमोह जात इन्द्रेण सह सङ्गतः । यमा विहेह
मातरा ॥” ( ऋ०सं० ४,८, २५, १ ) ॥
इत्यपि निगमो भवति ॥
यम इव जातो यमो जनिष्यमाणो जारःकनीनां
जरयिता कन्यानां पतिर्जनीनां पालयिता जा-
यानाम् ।
तत्प्रधाना हि यज्जसंयोगेन भवन्ति- ॥
“तृतीयोअग्निष्ट पतिः” ( ऋ० सं० ८, ३,
२७, ५ ) । इत्यपि निगमो भवति ॥
“तं वश्चराथा०” ( ऋ० सं० १, ५, १०, ८ ]
चरन्त्या पश्चाहुत्या वसत्या च निवसन्त्या
औषधाहुत्यास्तं यथा गावः आप्नुवन्ति तथा
आप्नुयाम इच्छ समिद्धं भोगैः ।
‘मित्रः’ प्रमीतेः त्रायते । सम्मिन्वानो द्रवति-
इति वा । मेदयते र्वा ।
तस्य एषा भवति- ॥ ८ [ २१ ] ॥
अर्थः-“सेनेव सृष्टा०” इत्यादि ऋचाओं का पराशय
हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ६ सं०
ऋषि है। ये द्विपदा विराट् छन्द हैं। प्रातरनुवाक और
आश्विन में विनियोग है।
अग्नि देव की अर्चिष् या किरण 'सेना-इव' सेना के
समान 'सृष्टा' निश्चित की हुई या सेनापति से प्रेरित हुई
सेनाके समान 'भयम्' ( भयं वा ) शत्रुओं के लिये भयको
'दधाति' धारण करती है ( बलंवा ) अथवा भक्तों के लिये
बलको धारण करती है। 'अस्तुः-न' ( क्षेप्तुः ) फेंकने वाले
के जिस 'दिद्युत्-इव' आयुध के समान 'त्वेष-प्रतीका' शत्रुओं
के लिये भयप्रतीका या भयरूप है- दर्शन से ही भयानक
है। अथवा अपने भक्तोंके लिये (बलप्रतीका) बलरूप है अथवा
(यशः प्रतीका ) यश रूप है अथवा ( महाप्रतीका ) महती बड़ी
या पूजनीया दिखाई देती है अथवा (दीप्तदर्शना ) देदीप्य-
मान = बहुत प्रकाश रूप दिखाई देती है।
“यमो ह जातो यमो जनित्वम्०” । जिसका अर्चिष्
या किरण ऐसे चमत्कार वाला है, वह 'यमः' (यमइव ) यम
या जोड़ला जैसा अग्नि 'जातः' भूत है 'यमः' यम 'जनित्वं'
( च ) और भविष्यत् जगत् रूप है-जो कुछ अब तक संसार
में हुआ और जो कुछ होने वाला है सब वही यम अग्नि है
उससे अन्य कुछ नहीं है, किन्तु सब उसी का स्वरूप है।
'कनीनाम्' (कन्यानाम् ) कन्याओ' का 'जारः' ( जरयिता)
जरणकरने वाला है वही यम अग्नि कन्याओंकेः कन्योभाव को
मिटाने वाला है। क्योंकि-जब अग्नि के समीप कन्याओं का
विवाह हो जाता है, तभी उनका कन्यापन मिटजाता है और
वे भार्या हो जाती हैं। 'जनीनां' ( जायानाम् ) जायाओं यह
भार्याओं का 'पतिः' पति है-पालन करने वाला है। क्योंकि-
विवाह के अनन्तर उनका पति के संगसे यज्ञ में अधिकार हो
हिन्दी निरुक्त ( ३३२) १० अ० २ पा० ८ खं०
जाता है, और गृह में वे तत्प्रधान ( अग्निप्रधान ) होती हैं,
विशेष रूप से अग्नि की रक्षा के लिये उसी की सेवा में रहती
हैं। और अग्नि के समीप ही वे व्रत का ग्रहण करती हैं और
व्रत के त्यागसे पूर्व अग्नि के ही परतन्त्र (पराधीन) रहती हैं।
“तृतीयो अग्निष्टे पतिः ” अर्थात्-हे कन्ये ! तीसरा
तेरा पति अग्नि है, यह भी निगम है।
'तम्' उस 'वा' ( अनर्थक ) 'ऋद्धम्' ( सन्निद्धं भोगैः )
भोगों से सम्पन्न या भोगों के ईश्वर यम अग्नि को 'चराथा'
( चरन्त्या पश्वाहुत्या ) चलती हुई (जङ्गम) पशुरूप आहुति
से 'वसतया' ( निवसन्त्या औषधाहुत्या ) स्थावर या न चलने
वाली औषधरूप आहुति से 'गावः' गोएं 'शस्तम्' (गृहम् )
घरको ' न ' ( इव ) जैसे 'नक्षन्ते' प्राप्त होती हैं, वैसे ही
'वयम्' हम ( प्राप्त होवें ] ये ऋचाएं द्विपदा (विराट्-
छन्द ) हैं ।
यहां 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि लिया गया है, उसका
निगम-
“यमो ह जात इन्द्रेण सह संगतः ”
अर्थात्- यम उत्पन्न होकर इन्द्र के साथ मिला ।
क्योंकि- पार्थिव अग्नि उत्पन्न होकर ऊपर को चलता
है, और अन्तरिक्ष के ज्योति के साथ मिल जाता है, इस से
यहां ' यम ' शब्द से पार्थिव अग्नि ही ग्रहण किया जा
सकता है।
दूसरा स्पष्ट निगम—
(“बलिन्था महिषानामिन्द्राग्नी पणिह आ ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) १० अ० २ पा० ८ खं०
समानो वां जनिता भ्रातरा युवं ) यमा विहेह
मातरा ॥ ” (ऋ०सं ४, ८, २५,२)॥
इस ऋचाका भारद्वाज ऋषि है । बृहती छन्द है । 'बत्'
(बट्) यह सत्य का नाम है। हे 'इन्द्राग्नी !' इन्द्र अग्नि
देवो ! 'बट्' सत्यही 'इत्था' इस प्रकार की 'महिमा' तुम्हारी
बड़ाई है, [ जैसी कि इस सूक्त में वर्णन कीगई है । ] 'आ-
पनिष्ठः' सबसे अधिक स्तुति करने योग्य है । 'वाम्' (युवयोः)
तुम दोनों का 'समानः' समान ही (एक सूर्य देव) 'जनिता'
पिता है। इससे 'युवम्' तुम दोनों 'यमौ' जोड़ले 'भ्रातरौ'
भाई हो 'इह-इह' यहां (पृथिवी लोक में) यहां (अन्तरिक्ष
लोक में) 'मातरा' (मातरौ = निर्माणतारौ) सब लोक के
निर्माण करने वाले तुम्हीं दोनों हो । यहां पर सूर्य के दो पुत्र
यम (जोड़ले) अग्नि और इन्द्र ही होसकते हैं, क्योंकि-तीसरी
द्युलोक की ज्योति से अतिरिक्त ये ही दो ज्योतिषिएँ हैं, इस
कारण इस लोक का यम पार्थिव अग्नि ही हुआ, तथा
“यमोह जातः” इस मन्त्र में 'यम' शब्द से पार्थिव अग्नि
का ग्रहण ठीक ही है ।
'मित्र' (१३) क्यों ? 'प्रमीतेः त्रायते' वर्षा करके सबका
प्रमीति (मृत्यु) से त्राण करता है, इससे मित्र है । 'प्रमीति'
शब्द से 'मि' और 'त्रायते' शब्द से 'त्र' लेकर 'मित्र' शब्द
बनता है । अथवा 'संमिन्वानो द्रवति' जलसे गीला करता
हुआ चलता है, इससे 'मित्र' है । यहाँ पहिले पद से 'मि'
लेकर 'मित्र' शब्द बना है । अथवा स्नेहन अर्थ में 'मिद्'
(भ्वा० आ०) धातु से है। क्योंकि-वह सबको जलसे स्नि-
हिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) १० अ० २पा० ८ खं०
ग्ध या चिकना कर देता है । यहां भी ‘मिद्’ धातु से ‘भि’
लेकर ‘मित्र’ शब्द की सृष्टि होती है ।
“तस्य०” उस (मित्र) की यह ऋचा होती है-॥८(२१)॥
व्याख्या
दशमाध्याय के आरम्भ से वायु आदि मध्यम लोक के
देवताओं के नामों की व्याख्या होरही है । उन्हीमें यह ‘यम’
(१२) शब्द है । इसके मध्यमवाचकत्व में “परेयिवांसम्”
यह निगम देकर प्रसंग से इसमें पार्थिव अग्नि की वाचकता
भी दिखाने के लिये “अग्निरपि यम उच्यते” “तम्-
एता ऋचोऽनुप्रवदन्ति” अर्थात्-‘अग्निभी यम कहाता
है, उसको ये ऋचाएं अनुवाद करती हैं,' यह आरम्भ किया
है । फिर जो उदाहरण दिये हैं उनमें पार्थिव अग्निमें यमत्व
के साधक इस प्रकार हैं-(१) “जारः कनीनाम्” कन्याओं
के कन्यापने को मिटाने वाला । यह “यमो ह जातः”
मन्त्रमें यम का विशेषण है । क्योंकि-कन्याओं का विवाह
संस्कार मध्यम या उत्तम ज्योति से नहीं होता इसीसे पार्थिव
अग्नि ही ‘यम’ होता है । (२) “पतिर्जनीनाम्” ‘भार्याओं
का पति’ । यह भी उक्त प्रकार से अन्य ज्योतियों में सम्भव
नही किन्तु पार्थिव ही में है । (३) “तं वश्चराथा”
“वस्त्या” स्थावर और जङ्गम आहुति का सम्बन्ध ।
(४) “यमोह जातः इन्द्रेण सह संगतः” उत्पन्न हो
कर मध्यम ज्योतिसे मिलना । (५) “यमाविहेह” सूर्य के
हिन्दी निरुक्त ( ३३५ ) १० अ० २ पा० ९ खं०
दो पुत्र यम । इन में भी एक यम पार्थिव अग्नि ही होता है
और इसी मन्त्रमें “इह” यह इस लोक का वाचक पद भी
और पुष्ट करदेता है । और (६) “तृतीयोऽग्निष्टे पतिः”
अर्थात्—हे कन्ये ! तीसरा तेरा पति अग्नि है। यह निगम
“पतिर्जनीनां” के साथ संबाद करके अत्यन्त ही यम
शब्द की अग्निवाचकता को सिद्ध कर देता है । इसी प्रकार
शब्द के अर्थ को निश्चय करने में अनेक निगमों की सहायता
लेनी चाहिये। यह भाष्यकार ने प्रदर्शन किया है ।
“जारः कनीनाम्” निगम पर ध्यान देने से निश्चय
होता है कि-एक बार अग्नि के संनिधान में कन्याओं का
विवाहसंस्कार होने के पश्चात् फिर विवाह संस्कार नहीं हो
सकता । क्योंकि- जो कन्याभाव जीर्ण होचुका वह फिर नया
नहीं होसकता । पुनर्विवाह वेद में ढूंढने वालों को इस निगम
पर दृष्टि डालना चाहिये ॥ ८ (२१) ॥
[ खं० ६ ]
निरु०- “मित्रोजनान्पातयति ब्रुवाणो मित्रो
दाधार पृथिवी मुतद्याम् । मित्रः कृष्टी रनिमिषा-
भिचष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत ॥” ( ऋ० सं०
३, ४, ५, १ )
मित्रः जनान् आयातयति प्रब्रुवाणः शब्दं कुर्वन्
मित्रएव धारयति पृथिवीं च दिवं च, मित्रः कृष्टीः
अनिमिषन् अभिविपश्यति-इति ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३६ ) १० अ० २ पा० ६ खं०
‘कृष्टयः’—इति मनुष्यनाम । कर्म॑वन्तो भवन्ति ।
विकृष्टदेहा वा॑ ।
‘मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत” इति व्याख्यातम् ।
‘जुहोतिः’ दानकर्मा ।
‘कः’ कमनो वा । क्रमणो वा । सुखो वा ।
तस्य—एषा भवति ॥१९(२२)॥
अर्थः— “मित्रो जनान्०” इस ऋचा का विश्वामित्र
ऋषि है । अववृष्ट होम में प्रायश्चित्त है । अग्निहोत्र में
पहिली आहुति में विनियोग है ।
‘मित्रः’ मित्र देव ‘ब्रुवाणः’ (शब्दं कुर्वन्) गरजता हुआ
‘जनान्’ मनुष्यों को ‘यातयति’(प्रवर्त्तयति कृषि आदि कर्म
में प्रवृत्त करता है । ‘मित्रः (एव)’ मित्र ही ‘पृथिवीं (च)’
पृथिवी को ‘उत—द्याम्’ दिवं (च)और द्युलोक को ‘दाधार’
(धारयति) धारण करता है । ‘मित्रः’ मित्र ही ‘अनिमिषा’
(अन्निमिषन्) पलक न झिपाता हुआ (सदा जाग्रत रहता
हुआ) ‘कृष्टीः’ (मनुष्यान्)मनुष्यों को ‘अभिचष्टे’ (अभिविपश्यति
देखता है । ‘मित्राय’ ऐसे मित्र देव के लिये (हे मनुष्याः)
हे मनुष्यो ! तुम ‘घृतवत्’ घृतयुक्त ‘हव्यम्’ हविः को ‘जुहोत’
होम करो, (यह पहिले व्याख्यान किया जाचुका है) ॥
‘कृष्टयः’ यह मनुष्य का नाम है । क्यों कि— वे नित्य ही
कर्म वाले होते हैं । अथवा वे विकृष्टदेह होते हैं उनके अङ्ग
इच्छानुसार फैल सकते हैं, किन्तु अन्य गो आदि पशुओं के
नहीं, वे संसृष्ट देह = जुड़े हुये देह वाले होते हैं ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ९ खंड
'जुहोति' (जु० प०) धातु दानार्थक है ।
'क' (१४)- यह वक्तव्य है। सो यह महान् आत्मा =
सर्वात्मा (सबका अन्तर्यामी) ज्ञान स्वरूप देव है । क्यों ?
कमन या कामियों के काम्य [ बाञ्छनीय ] अर्थों में साधन
होता है। अथवा कमण या स्वयमेव कमण करने वाला
होने से 'क' है। अथवा 'क' सुख स्वरूप होने से 'क' है ।
"तस्य०" उस 'क' देव की यह ऋचा है ॥६[२२]॥
( खं० १० )
निरु०- हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः
पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥* (ऋ० सं० ८, ७, ३,
व० १, १०, १०, ९ सू० १)॥
हिरण्यगर्भो हिरण्यमयो गर्भः । हिरण्यमयो
गर्भोऽस्य- इति वा ।
'गर्भो' गृभेः गृणात्यर्थे । गिरति अनर्थान्-
इति वा ।
यदा हि स्त्री गुणान् गृह्णाति गुणाश्च अस्या
गृह्यन्ते अथ गर्भो भवति, समभवद्-अग्रे भूतस्य
जातः पतिः एको बभूव, सः धारयति पृथिवीं
च दिवं च, "कस्मै देवाय हविषा विधेम" इति
व्याख्यातम् ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) १० अ० २ पा० १० खंड०
‘विदधतिः’ दानकर्मा ॥
‘सरस्वान्’ व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥१० (२३)॥
अर्थः-“हिरण्यगर्भः” इस ऋचा का हिरण्यगर्भ ही
ऋषि है । क्यों कि- वह सर्वात्मक या सर्व रूप है, इससे
उसके ऋषि होने पर भी प्रथम पुरुष का योग (समवर्त्तत)
विरुद्ध नहीं होता । यदि सर्वात्मकता उनकी न होती तो
उत्तम पुरुष होता और यह ऋचा परोक्षकृत न होकर आध्या-
त्मिकी ही होती तथा इसमें उत्तम पुरुष की क्रिया होती ।
अथवा परब्रह्म की जो हिरण्यगर्भ की अवस्था है, जो प्रति-
कल्प में आविर्भूत [प्रकट] और तिरोभूत (अन्तर्धान) होती
रहती है,और जो बुद्धिपूर्वक- जिससे ईश्वर अपनी इच्छा
से ज्ञान पूर्वक रचता है , तथा जो नित्य है, उस नित्य
हिरण्यगर्भावस्था में नित्य मन्त्र आश्रयमात्र से अभिधाता
या वक्ता [ऋषि] को लेकर प्रवृत्त होता हुआ अनुवाद करता
है, वास्तव में नित्य मन्त्र का कोई वक्ता नहीं है, इससे उस
मे पुरुष का योग विवक्षित नहीं होता है, अर्थात् उत्तम
पुरुष होने पर भी वह ऋचा वैसी ही है, जैसी प्रथम पुरुष
के योग में । यदि मन्त्रकृतक = किसी का किया हुआहोता
तो नियम से ही यहां उत्तम पुरुष होता ॥
‘हिरण्यगर्भः’[एव] हिरण्यगर्भ ही ‘भूतस्य’[अस्य उत्पन्न-
स्य स्थावरजङ्गमस्य जगतः] इस स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत्
के ‘अग्रे’ पहिले ‘जातः’ उत्पन्न हुआ ‘समवर्त्तत’ भले प्रकार
वर्त्तमान था । और वह पहिले हुआ हुआ, उस पीछे से
हिन्दी निरुक्त (३३६) १० अ० २पा० १०खं०
उत्पन्न हुये जगत् का 'एकः' (असपत्नः) अशत्रु या विरोधी
से रहित 'पतिः' पालन करने वाला ईश्वर = स्वतन्त्र स्वामी
(बभूव) हुआ था। इसी से 'सः' वह 'पृथिवीं' (च) पृथिवी
को 'उत' और 'इमाम्' इस 'द्याम्' [दिवम्-च] द्युलोक को
'दाधार' (धारयति) धारण करता है। जिससे कि—वह देवता
ऐसे प्रभाव वाला महानुभाव है, इससे उस 'कस्मै' (काय)
क देवता के लिये [ वयम् ] हम 'हविषा' (हविः) हविः को
विधेम' (दद्मः) देते हैं, या हवि के द्वारा उसकी परिचर्या
करते हैं।
'हिरण्यगर्भ' क्यों ? वह सब प्राणियों का हिरण्यमय
या विज्ञानमय गर्भ है। क्योंकि-वही सब भूतों के अन्तः-
करण में ज्ञान रूप प्रकाश को फैलाता है। इस पक्ष में-
“हिरण्यमयश्चासौगर्भश्च” अर्थात्- हिरण्यमय
जो गर्भ ।
ऐसा समानाधिकरण (कर्मधारय) समास होता है।
अथवा इसका हिरण्यमय (विज्ञानमय) गर्भ है। इस पक्ष
में बहुव्रीहि समास होता है।
'गर्भ' कैसे ? गृणाति के अर्थ में 'गृभ' (ह) (क्र्या०स०)
धातु से है। क्यों कि- वह सबसे स्तुति किया जाता है।
अथवा 'गिरति अनर्थान्' वह सब अनर्थों को नाश करता है
इससे 'गर्भ' है।
अथ स्त्री का 'गर्भ' कैसे ? “यदा हि०” जब स्त्री पुरुष
के गुणों को ग्रहण करती है, और इसके गुणों को पुरुष ग्रहण
करता है, तब गर्भ होता है- स्त्री का रक्त या रज पुरुष के