निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1091, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२६ ) १० अ० २पा० ६ खं०
प्राणों को अपने से अलग हुये समझ कर उनसे सम्बोधन कर
के कहता है—
हे 'वाचस्पते '! वाणीके स्वामी ! तू 'देवेन' सब इन्द्रियों
की वृत्तियों को प्रकाशित करने वाले 'मनसा-सह' मनके साथ
'पुनः-एहि' फिर आ । हे 'वसोष्पते !' धन अथवा अन्न के
स्वामी ! 'मम' मेरी 'तन्वम्' तनू को = देह को 'मयि-एव'
मुझ में ही 'निरामय' निरन्तर रमा—ऐसा कर जिससे कि
मेरी तनू मुझ में ही रमण करे । यह ऋचा अपने उच्चारण से
ही व्याख्यात है ॥
'अपांनपात्' ( १० ) 'तनूनपात्' शब्द ( ८, २, २ ) से
व्याख्यान किया जाचुका । यह शब्द निर्वचन है— एक शब्द
का दूसरे शब्द के द्वारा निर्वचन किया जाता है, अर्थात्-यह
भी प्रकृत शब्द के निर्वचन के बताने की आचार्य की शैली
है । अप् या जलों से आदित्य होता है। और उससे मध्यम
देव, इससे वह 'अपांनपात्' जलका पोता है। यह शब्द की
व्याख्या है । अर्थ से यह मध्यम देव है ।
“तस्य०” उस ‘अपांनपात्’ की यह ऋचा है ॥५(१८॥
( खं०६ )
निरु०-“यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास
ईलते अध्वरेषु । अपान्नपान्मधुमतीरपो दाया-
भिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥” (ऋ०सं०७,७,२४,२,॥
यः अनिध्मः ‘दीदयद्’ दीप्यसे अभ्यन्तरम्-
अप्सु, यं मेधाविनः स्तुवन्ति यज्ञेषु, सः अपान्न-