निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरूप रूप [ हर प्रकार का रूप ] 'बोभवीति' बार २ या
अतिशय से होता है। यह भी निगम है।
'वाचस्पति' ( १० ) क्या ? वाच् ( वाणी ) का पाता
या पालयिता ( रक्षा करने वाला होता है।
“तस्य०” उस वाचस्पति देव की यह ऋचा है- ॥४॥
व्याख्या।
“अमीवहा०” निगम में “विश्वा रूपाण्या-
विशन्” 'सब रूपों को धारण करने वाला वास्तोष्पति
मध्यम देव है,-यह कहा गया है। इसी की विशेष व्याख्या
करने की इच्छासे क्यों सब रूपों को धारण करता है? कैसे २
रूपों को धारण करता है? इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए
भाष्यकार यास्कमुनि कहते हैं-
“यद्यद् रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति”
अर्थात्-भक्त जिस २ रूप की कामना करता है उस २ रूप
से देवता होता है। प्रयोजन यह कि-भक्त की कामना को
पूर्ण करना ही देवता को नाना रूप धारण करने का कारण
है, और जैसे २ रूप को भक्त चाहता है, वैसे ही वैसे रूप
को वह धारण करता है। स्वयम् भगवान् की प्रतिज्ञा भी
ऐसी ही है “यो यो यांयां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितु-
मिच्छति । तस्यतस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधा-
म्यहम्” (भ० गी० ७, २१)
भाष्यकार कहते हैं कि-यही निगम इस प्रयोजन का
नहीं है, किन्तु और भी निगम है, जो इसी को स्पष्ट अक्षरों
में ही कह रहा है।