निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1099, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) १० अ० २पा० ८ खं०
ग्ध या चिकना कर देता है । यहां भी ‘मिद्’ धातु से ‘भि’
लेकर ‘मित्र’ शब्द की सृष्टि होती है ।
“तस्य०” उस (मित्र) की यह ऋचा होती है-॥८(२१)॥
व्याख्या
दशमाध्याय के आरम्भ से वायु आदि मध्यम लोक के
देवताओं के नामों की व्याख्या होरही है । उन्हीमें यह ‘यम’
(१२) शब्द है । इसके मध्यमवाचकत्व में “परेयिवांसम्”
यह निगम देकर प्रसंग से इसमें पार्थिव अग्नि की वाचकता
भी दिखाने के लिये “अग्निरपि यम उच्यते” “तम्-
एता ऋचोऽनुप्रवदन्ति” अर्थात्-‘अग्निभी यम कहाता
है, उसको ये ऋचाएं अनुवाद करती हैं,' यह आरम्भ किया
है । फिर जो उदाहरण दिये हैं उनमें पार्थिव अग्निमें यमत्व
के साधक इस प्रकार हैं-(१) “जारः कनीनाम्” कन्याओं
के कन्यापने को मिटाने वाला । यह “यमो ह जातः”
मन्त्रमें यम का विशेषण है । क्योंकि-कन्याओं का विवाह
संस्कार मध्यम या उत्तम ज्योति से नहीं होता इसीसे पार्थिव
अग्नि ही ‘यम’ होता है । (२) “पतिर्जनीनाम्” ‘भार्याओं
का पति’ । यह भी उक्त प्रकार से अन्य ज्योतियों में सम्भव
नही किन्तु पार्थिव ही में है । (३) “तं वश्चराथा”
“वस्त्या” स्थावर और जङ्गम आहुति का सम्बन्ध ।
(४) “यमोह जातः इन्द्रेण सह संगतः” उत्पन्न हो
कर मध्यम ज्योतिसे मिलना । (५) “यमाविहेह” सूर्य के