निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३६ ) १० अ० २ पा० ६ खं०
‘कृष्टयः’—इति मनुष्यनाम । कर्म॑वन्तो भवन्ति ।
विकृष्टदेहा वा॑ ।
‘मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत” इति व्याख्यातम् ।
‘जुहोतिः’ दानकर्मा ।
‘कः’ कमनो वा । क्रमणो वा । सुखो वा ।
तस्य—एषा भवति ॥१९(२२)॥
अर्थः— “मित्रो जनान्०” इस ऋचा का विश्वामित्र
ऋषि है । अववृष्ट होम में प्रायश्चित्त है । अग्निहोत्र में
पहिली आहुति में विनियोग है ।
‘मित्रः’ मित्र देव ‘ब्रुवाणः’ (शब्दं कुर्वन्) गरजता हुआ
‘जनान्’ मनुष्यों को ‘यातयति’(प्रवर्त्तयति कृषि आदि कर्म
में प्रवृत्त करता है । ‘मित्रः (एव)’ मित्र ही ‘पृथिवीं (च)’
पृथिवी को ‘उत—द्याम्’ दिवं (च)और द्युलोक को ‘दाधार’
(धारयति) धारण करता है । ‘मित्रः’ मित्र ही ‘अनिमिषा’
(अन्निमिषन्) पलक न झिपाता हुआ (सदा जाग्रत रहता
हुआ) ‘कृष्टीः’ (मनुष्यान्)मनुष्यों को ‘अभिचष्टे’ (अभिविपश्यति
देखता है । ‘मित्राय’ ऐसे मित्र देव के लिये (हे मनुष्याः)
हे मनुष्यो ! तुम ‘घृतवत्’ घृतयुक्त ‘हव्यम्’ हविः को ‘जुहोत’
होम करो, (यह पहिले व्याख्यान किया जाचुका है) ॥
‘कृष्टयः’ यह मनुष्य का नाम है । क्यों कि— वे नित्य ही
कर्म वाले होते हैं । अथवा वे विकृष्टदेह होते हैं उनके अङ्ग
इच्छानुसार फैल सकते हैं, किन्तु अन्य गो आदि पशुओं के
नहीं, वे संसृष्ट देह = जुड़े हुये देह वाले होते हैं ।