निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२८ ) १० अ० २ पा० ७ खं०
परेयिवांसं पर्यागतवन्तं प्रवतः उद्वतो निवतः-
इति । अवतिर्गतिकर्मा । बहुभ्यः पन्थानमनु
पस्पशयानं “वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं
राजानं ॰हविषा दुवस्य”- इति । ‘दुवस्यतिः’
राध्नोतिकर्मा ॥
अग्निरपि ‘यमः’ उच्यते ।
तम् एता ऋचः अनुप्रवदन्ति ॥७(२०)॥
अर्थ:-“परेयिवांसम्०” इस ऋचा का हविर्धान ऋषि
है । यम के पशुमें वपा में विनियोग है ।
हे यजमान ! ‘प्रवतः’ (मनुष्यान्,उद्वतः = देवान्,निवतः =
तिरश्चः) मनुष्यों को, देवताओं को, और पशु पक्षी आदि
तिर्यक् योतिके प्राणियों को ‘परेयिवांसम् (पर्यागतवन्तम् =
सर्वतः प्राप्तवन्तम् ) सब ओर से व्यापन करने वाले ‘महीः’
( महती भूतजातीः ) इन बड़ी २ प्राणियों की जातियों को
व्योपन करने वाले “बहुभ्यः (पुण्यकृद्भ्यः पापकृद्-
भ्यश्च ) पन्थाम् [ पन्थानम् ] अनुपस्पशानम्
( अनुपस्पशायमानम्) बहुत पुण्यात्माओं और पापि-
ओं के लिये कर्मों के अनुसार मार्ग देने वाले-इस मार्ग से यह
प्राणी जीवनसे छुड़ाना है, यह जानकर उसको चोर के समान
बांधकर सर्प ज्वर आदि का रूप धारण करके जीवित से
छुड़ाने वाले ‘वैवस्वतम्’ (विवस्वतः पुत्रम् ) सूर्यके पुत्र
‘जनानां संगमनम्’ अपनी सम दृष्टि करके सब प्राणियों को