नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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प्रजा में आर्यजाति के समाज से सामीप्य रखने वाली जातियाँ या उनसे
सम्बद्ध कुछ अनार्य जातियाँ भी थी। अतः जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों
की क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाएँ रही जिनका प्रयोग संस्कृत या प्राकृतभाषा
की सम्बोध्यविधि के अनुसार रखा जाता था। इन भाषाओं में अपने
प्रजातीय तथा क्षेत्रीय शब्दों का मिश्रण रहता था जो बाद में अधिक विस्तार
पाने पर पृथक् विभाषा के रूप में विकास पा जाता था तथा जिनसे एक पृथक्
भाषा का रूप बन जाता था। इस क्रम ने पूर्वकालिक भाषाव्यवहार का
स्थान धीरे-धीरे ले लिया, जिसमें आर्यभाषा का प्रकृतविधि से व्यवहार
होता था तथा जिसे ये प्रजातियाँ समझती तथा स्वीकार करती थी। परन्तु
अतिशय स्पष्टता के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रजातीय भाषाएँ
अपने तात्कालिक या वास्तविक रूप में (रूपकों में) प्रस्तुत की जाती थी।
यह तथ्य नाट्यशास्त्र के निम्न उद्धरण से स्पष्ट है—
द्विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ॥ (ना० शा० १८।२८)
इस प्रकार स्पष्ट है कि जातिभाषा विभिन्न प्रजातियों की स्थानीय भाषा
थी, जो प्राचीन आर्यभारतीय सम्बोधविधि के अनुसार प्रयोज्य रहती थी
तथा जिसमें प्रजातीय शब्दों का मिश्रण रहता था।
इन भाषाओं पर विचार के पश्चात् हमारा ध्यान उन अब सात भाषाओं
पर भी जाता है जो इसी जातिभाषा के अन्तर्गत क्षेत्रों से सम्बद्ध हैं। ये सात
भाषाएँ पहिले कही जा चुकी हैं जिनमें शौरसेनी, मागधी तथा अर्धमागधी
स्पष्टतः, आर्यभाषा से उद्भूत हैं तथा यही स्थिति आवन्ती, प्राच्या,
बाह्लीकी तथा दाक्षिणात्या के उद्भव के विषय में भी है। यद्यपि आज हमें
अवन्ती या प्राच्या के अंश नाट्यकृति में अधिकता से प्राप्य नहीं है तथा
बाह्लीकी एवं दाक्षिणात्या का भी नाट्यशास्त्रगत विवरणमात्र ही मिलता है
जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनके रूप अतीत के गर्भ में (नमूने के साथ
साथ ही) विलीन हो चुके हैं। इन तथ्यों से एक बात और भी स्पष्ट रूप में
उभर कर आती है कि नाटकादि में अवस्थित प्राकृतभाषाएँ सर्वदा एक
लचीली दशा में ही स्थित रही थी जिनका प्रयोग पात्रों की स्थिति, प्रकृति
तथा देश के अनुरूप रखा जाता था। यहाँ नाट्यप्रयोग के प्रस्तोता को इसी
कारण भरतमुनि ने अपनी सुविधा के अनुरूप भाषाप्रयोग की स्वतन्त्रता दे दी है।
भरतमुनि के इस भाषाविधान का परवर्ती नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों तथा
नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त प्रभाव रहा तथा भरतानुसारी भाषाविधान को लेते
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हुए उनमें नवीन अंश जुड़ते रहे। शारदातनय ने अपने भावप्रकाशन में
प्राकृतभाषा के पैशाची, मागधी तथा शौरसेनी प्रभेदों को ग्राम्य, नागरक
तथा उपनागरक प्रभेदों के विवरण देकर अठारह कर दिया जो भरत के
मत में दिखलाया गया था ( भाषा ४ + सप्तभाषा + सप्तविभाषा = १८) ।
आचार्य विश्वनाथ कविराज ने साहित्यदर्पण में तेरह प्राकृतभाषाओं का नामतः
विवरण देकर उनका प्रयोगविधान दिखलाया भी है। शौरसेनी, मागधी
तथा अर्धमागधी प्राकृतों का संस्कृत नाटकों में व्यवहार (सदा) लोकप्रियता
बनाये भी रहा। प्रायः (महाराष्ट्री तथा) शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग सभी
नाटकों में मिलता है। सर्वाधिक प्राकृतभाषाओं के विधानानुगतप्रयोग के
दर्शन शूद्रक के मृच्छकटिक में हमें मिलते हैं जहाँ चाण्डाली, शाकारी तथा
ढक्की भाषाओं का भी प्रयोग हुआ है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भरतमुनि का
दाय तथा प्रभाव नाट्यशास्त्रीयग्रन्थों तथा नाट्यरचनाओं पर सभी संभव
स्थितियों के साथ पड़ता रहा है यह निर्विवाद है।
नाट्यशास्त्र के उन्नीसवें अध्याय में भाषाविधान के एक अन्य प्रयोगगत
पक्ष को लेकर सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जनादि की विधि निरूपित है। इनमें
सर्वप्रथम सम्बोधन का विवरण है—
सम्बोधन-प्रकार—नाटकों के पात्र अपनी उत्तम, मध्यम तथा हीन
स्थिति में अवस्थादि के अनुसार एक दूसरे को सम्बोधित कर सम्भाषण करते
हैं, जिनका नाट्यशास्त्र में विस्तार से विवरण दिया गया है। इन असंख्य
सम्बोधनों का आधार पात्रों की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक भावना,
आदरअनुराग व्यवसाय तथा सेवादि नियोजित कार्य तो है ही उनका लोक-
प्रचलित व्यवहार भी है। ये सभी सम्बोधन पुरुष तथा नारी पात्रों को एक
विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान कर भारतीय समाज की महनीय स्थिति को संकेतित
करते हैं।
इसके अतिरिक्त भरतमुनि ने इस सम्बोधन-विधान के साथ साथ पात्रों
के विभिन्न जातीय एवं सामाजिक स्तर का ध्यान रखते हुए तदनुसारी
नामकरण के विधान भी दिये हैं, जो बड़े व्यापक है तथा जिनसे पात्रों के
कर्मादि के अनुरूप नामकरण की प्रवृत्ति का भी आभास मिलता है। इसका
प्रभाव परवर्ती नाट्यरचनाओं पर पर्याप्त रूप में प्राप्त होता है।
पाठ्य—(गुण तथा उसकी उपयोगिता) :—वाचिक अभिनय का
प्रस्तुतीकरण संवाद या पाठ्य के द्वारा सम्पन्न होने के कारण भरतमुनि ने
पाठ्यतत्व को वाचिकअभिनय का प्राण कहा है। इस सन्दर्भ में मुनि ने
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‘पाठ्य-गुण’ पद का प्रयोग किया था जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि पाठ्य के जो उपकारक या आधार हों उन
( उपकरणों ) का विश्लेषण जिनसे अभिनय का पल्लवन किया जाए ‘पाठ्य-
गुण’ कहलाते हैं। ये उपकारक उपकरण हैं :—सप्तस्वर, तीन स्थान, चार
वर्ण, दो काकु, छः अलङ्कार तथा छः अङ्ग । यहाँ क्रमशः इनका विवरण दे
रहे हैं :—
सप्तस्वर—रसों के सन्दर्भ में गीतादि के स्वरों का विनियोजन ही
पाठ्य का सप्तस्वर गुण कहलाता है। ये सप्तस्वर हैं—षड्ज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम पञ्चम, धैवत तथा निषाद । इनमें हास्य तथा शृङ्गाररस के
योग में मध्यम तथा पञ्चम स्वरों का करुणरस के योग में गान्धार तथा
निषाद स्वरों का तथा भयानक एवं बीभत्स रस के योग में धैवत स्वर का
विधान विहित है।
स्थान—इसके अन्तर्गत शरीर के शिर, कण्ठ तथा उरस् प्रदेश आते हैं
जिनके विशिष्ट क्रम से स्वरों का उत्थान किया जाता है तथा काकु का
प्रयोग। पाठ्य के प्रसंग में पात्रों की दूरस्थ स्थिति में शिर तथा कण्ठ को
किञ्चिद् दूरी में रखते हुए तथा निकटस्थ पात्रों के साथ संवाद की स्थिति में
उरस् का प्रयोग किया जाता है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रसंग में
बतलाया कि दूरस्थ पात्रों को शिर या मूर्धा निष्पन्न स्वर से तार या उच्च-
ध्वनि में बुलाया या संभाषण किया जाता है जब कि अतिदूरी के न होने पर
कण्ठ के मध्य स्वर से संभाषण किया जाता है। इसी प्रकार समीपवर्ती पात्र
से उरस् या वक्षःस्थल के समीपवर्ती मन्द्रस्वर से संभाषण होता है।
वर्ण—नाट्यशास्त्र में चार पाठ्यवर्ण बतलाये हैं—उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित तथा कम्पित जिनका हास्य आदि रसों के योग में प्रयोग ( या
उपयोग ) होता है। स्वरित तथा उदात्त का प्रयोग हास्य तथा शृङ्गार
रस में, उदात्त तथा कम्पित का वीर, रौद्र तथा अद्भुतरस में तथा करुण,
बीभत्स एवं भयानक रसों में अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित वर्णों का प्रयोग
किया जाता है।
काकु—पाठ्यगुण का प्राणभूततत्व काकु होता है, क्योंकि काकु के ही
द्वारा स्वरवैभिन्य से विचित्रता आती है तथा नवीन अर्थ का आधार
विस्तीर्णता को प्राप्त करता है। इस काकु के दो प्रभेद होते हैं—
( १ ) साकाङ्क्ष, ( २ ) निराकाङ्क्ष । प्रकरणादि की अपेक्षा करने वाला
काकुविधान साकाङ्क्ष कहलाता है। इसमें तार से मन्द्र तक स्वर, अनियत
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अर्थ, उदात्त आदि वर्ण तथा उच्चादि अलङ्कार अपरिसमाप्त रहते हैं।
निराकाङ्क्ष-काकु में इसके विपरीत अर्थ नियत, 'उच्च आदि वर्ण तथा
अलङ्कार परिसमाप्त स्थान शिर और मन्द्र से तार तक स्वरों की योजना
रहती है। काकु का जिह्वा के द्वारा सम्पादन होता है तथा उच्च, दीप्त
आदि वर्णों तथा सन्धिविच्छेद आदि के द्वारा पाठ्य में काकु को प्रमुखता दी
जाती है क्योंकि सर्वत्र काकु प्रधान रहता है।
पाठ्यगत अलङ्कार—पाठ्य के छः अलङ्कार माने गये हैं, जिनसे काकु
को पूर्णता प्राप्त होती है। ये हैं—(१) उच्च, (२) दीप्त, (३) मन्द्र,
(४) नीच, (५) द्रुत, तथा (६) विलम्बित। दूरस्थित पात्रों की विस्मय,
त्रास तथा बाधा की दशा में होने वाले संवादों में पाठ को उच्चस्वर में रखा
जाता है। पारस्परिक आक्षेप, क्रोध, तथा कलह आदि की स्थिति में
विलम्बितस्वर में पाठ रखा जाता है। इस प्रकार विभिन्न भावदशाओं के
अनुरूप पात्रों का पाठविधान भी रखा गया है जिससे अभिनय या नाट्यप्रयोग
को प्रभावशाली एवं सफल बनाया जा सके ।
पाठ्याङ्ग—पाठ्य के छः अङ्ग भी होते हैं—(१) विच्छेद, (२) अर्पण,
(३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन। विराम के
कारण पाठ में 'विच्छेद' होता है। यह नाट्यार्थ के अनुरोध पर या उसे
ध्यान में रख कर किया जाता है तथा यह अर्थदर्शक होता है। इसी
कारण नाट्यार्थ को पूर्णतः हृदयंगम करने एवं अर्थानुरोध के लिये विरामों
की योजना रखी जाती है। इन अर्थदर्शक विरामों से युक्त जब पाठ्य होता
है या किया जाता है तो नाट्यप्रयोग को यह समृद्ध कर देता है। गम्भीर
एवं मधुरस्वर में पात्र द्वारा किये जाने वाले पाठ के द्वारा दर्शकों
का अभिनीत भावों में समाहित हो जाना 'अर्पण' कहलाता है। इसमें
अभिनेता कवि या नाट्यकार द्वारा उन्नीत संवेदना को दर्शकों को अर्पण
करता है। वाक्य की समाप्ति होना 'विसर्ग' तथा पाठ्य की शृङ्खला को
बनाए रखना 'अनुबन्ध' कहलाता है। विभिन्न स्थानों से उत्थित स्वर का
उत्तरोत्तर दीप्त होना 'दीपन' तथा तार स्वर में उच्चारित स्वर का क्रमशः
मन्द्रस्थिति में आना 'प्रशमन' है।
भरतमुनि ने इन अङ्गों से होने वाले रसाश्रित प्रयोग भी दिखलाये हैं।
तदनुसार हास्य तथा शृङ्गाररस में अर्पण, विच्छेद, दीपन तथा प्रशमन
नामक अङ्गों का, वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, दीपन
और अनुबन्ध का तथा बीभत्स एवं भयानकरस में विसर्ग तथा विच्छेद का
विधान रखा जाता है। इन अङ्गों के विभिन्न रसाश्रित प्रयोगों को तार,
मन्द्र तथा मध्य नामक अलङ्कारों के आधार पर रखा जाता है। तारस्वर
से मन्द्र तथा मन्द्र से तार स्वर पर सहसा पाठ नहीं रखा जाता है; क्योंकि
ऐसा करना नाट्यार्थ का प्रतिरोधक होता है। किन्तु द्रुत, मध्य तथा
विलम्बित का प्रयोग नाट्यार्थ की उद्दीपित करने के कारण सदा इष्ट
होता है।
इस प्रकार भाषाविभेद सम्बोधन विधि, पात्रों के नामकरण तथा काकु,
स्वर, अलङ्कार तथा पाठ्याङ्गों के विवरण के साथ छन्दों की तथा भाषा की
प्रकृत्ति को विस्तार से देकर वाचिक-अभिनय का साङ्ग एवं तात्विक विवरण
नाट्यशास्त्र में इन चार अध्यायों में दिया गया है। इससे पाठ्य के अङ्गों
के ठीक रखने की स्थिति का निर्माण होता है जो नाट्यार्थ की भावना को
व्यवस्थित कर देता है। ऐसा होने पर कवि या नाट्यकार की उद्भावित
संवेदना का दर्शक समाहित दशा में अवबोध करने में समर्थ हो जाता है।
पाठ्यगुणों का व्यवस्थित एवं साङ्ग विवरण सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र में ही
हुआ जो उस समय की प्रयोग-पद्धति का पूर्ण संकेत देता है कि वह कितनी
समृद्ध रही थी। यह विवरण तथा इसमें निदर्शित विधान से यदि अभिनयगत
निपुणता प्राप्त की जाए तो नाट्यप्रयोग सदा ही निश्चित रूप से सफलता
प्राप्त करेंगे। भरतमुनि की प्रयोग विज्ञानगत निपुणता तो इस विवरण से
प्रकट होती ही है साथ ही उनकी दीर्घदृष्टि का भी इससे बोध होता है।
परवर्तीकाल में नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थकारों ने ऐसे विषयों का अधिक विस्तार से
विवरण ही नहीं दिया तथा ऐसे विषयों का व्यवस्थित विश्लेषण भी नाट्य-
शास्त्र के ( सार तत्व के ) आधार पर नहीं लिखा गया। उनने पाठ्यादि के
भरतोक्त विवेचन को ऐसा करते हुए बिना किसी संशोधन के सार्वकालिक
स्वीकृति ही प्रदान की तथा भरतमुनि की प्रतिभा को ही इस सन्दर्भ में
( आदि से लेकर अन्तिम भाग तक ) अक्षुण्ण मान्यता प्रदान करते हुए ऐसा
प्रतीत होता है कि अपना एकमत से इसे समर्थन ही दे दिया था।
**प्रस्तुत खण्ड तथा उसके पाठान्तर—**इस प्रकार इस द्वितीयभाग में
नाट्यशास्त्र के अष्टमअध्याय से एकोनविंश अध्याय तक के विवरण को
उपस्थापित किया गया। विंश अध्याय से षट्त्रिंश अध्याय तक इसी प्रकार
क्रमशः अगले भागों में विवेचन किया जाता रहेगा। यह हम पूर्व में भी
बतला चुके हैं कि नाट्यशास्त्र के प्रस्तुत संस्करण में प्रायः सभी अद्यतन एवं
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उपलब्ध सामग्री का यथाशक्य उपयोग किया गया है तथा प्रायः सभी अद्यतन
सामग्री का प्राप्य तथ्यों के आधार पर अनुशीलन भी। नाट्यशास्त्र के
पाठों के अन्तर्गत जो पाठ नाट्यशास्त्र के प्रामाणिक तथ्य लिये हुए थे उन्हें
मूलपाठ बनाकर तथा अवशिष्ट पाठान्तरों को टिप्पणी में दिखलाया गया है
जिससे नाट्यशास्त्र के सभी उपलब्ध पाठान्तरों का एकत्र संग्रह हो जाए।
कुछ पाठान्तरों के अर्थ भी यथास्थान आवश्यकतानुसार दे दिये गये हैं जिससे
अध्येता एवं अनुशीलनकर्त्ता को सभी विषयों की अभिप्राप्ति हो तथा किसी
महत्वपूर्ण पाठ या पाठान्तर को वे भी अपने विचार का विषय बना सकें।
पाठान्तर सङ्केत—इसमें ‘क’ पाठ के अन्तर्गत गायकवाड ओरि० सीरीज
बड़ौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या के अनुगत पाठ तथा इसी के
साथ रहने वाले पाठान्तरों को भी कोष्ठकान्तर्गत ‘म’ या ‘भ’ देकर दिखलाया
गया है। इसी प्रकार ‘ख’ पाठ के अन्तर्गत काव्यमाला संस्करण बम्बई के
प्रकाशित पाठों को तथा ‘ग’ पाठ के अन्तर्गत प्रथमभाग की तरह ही काशी
संस्कृत ग्रन्थमाला चौखम्बा वाराणसी के पाठों को लिया गया है। इसमें भी
प्रथमभाग की तरह ही मूलपाठ को काशी संस्करण की दीर्घपाठ परम्परा के
अनुसार यथासम्भव रखा गया है किन्तु आवश्यकतानुसार इनमें अनेक स्थानों
पर ( थोड़ा ) परिवर्तन भी हो गया है। नवम अध्याय तथा आगे अध्यायों
में वर्णित हस्ताभिनयादि के रेखाचित्रों को भी इस भाग में यथाशक्य लगाया
गया है, जिससे नाट्यशास्त्रीय विषयों को हृदयंगम करने में सहायता मिलेगी।
यही क्रम अगले भागों में रखा जा रहा है तथा नाट्यशास्त्र के शेष भाग भी
शीघ्र ही प्रस्तुत करने का उद्योग जारी है। आवश्यक विवरण को पूर्ववत्
ध्यान में रख कर प्रस्तुत भाग के परिशिष्ट १ में अतिरिक्त टिप्पणियाँ तथा
परिशिष्ट २ में पद्यार्धानुक्रमणिका लगायी गयी हैं तथा अन्त में शुद्धिपत्र भी
दे दिया गया है। इतना रहने पर भी सुधी पाठकों से प्रमादवश छूटी हुई
अशुद्धियों तथा विषयगत विस्तार सम्बन्धी सुझावों को भेजने की अभ्यर्थना
है जिससे उनका उपयोग होकर अगले संस्करणों को और भी परिमार्जित
किया जा सकेगा।
पाठान्तर प्रक्रिया—नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में पाठों को लेकर कुछ
विवरण अल्प मात्रा में ही संकेत रूप में रखा गया था। इसका कारण यही
था कि वहाँ विषय-विवरण ने पर्याप्त स्थान ले लिया था तथा वही बात फिर
इस भाग के समय भी विद्यमान है परन्तु अपेक्षित बात को यहाँ अवश्य रखना
है । जैसा कि हमने प्रथमभाग में कहा था कि श्रीग्रासे को अपने संस्करण
के लिये नाट्यशास्त्र के विभिन्न हस्त लेखों के कारण एक नवीन पद्धति
निर्मित करनी पड़ी थी । उसकी प्रक्रिया तथा पाठ विनिश्चायक सरणि का
अल्पविवरण पुनः यहाँ देना अप्रासङ्गिक नहीं होगा क्योंकि यह नाट्यशास्त्र
के परिशीलन में एक प्रमुख ( पक्ष की ) स्थिति रखता है । वे कहते हैं कि—
'भारतीय नाट्यशास्त्र के हमारे मूलपाठ का स्वरूप अधिकांशतः सभी
ओर से प्राप्य उत्तम या इष्ट को ग्रहण कर लेने की प्रकृति का है, क्योंकि एक
पाठ को स्थिर करने में किसी आग्रह या दबाव का अनुभव नहीं होता, जो
एक सहज प्राथमिकता के अनुरोध पर किसी हस्तलेख को लेने हेतु रहती है ।
हमने कभी कभी तो हस्तलेखों की संख्यागत वृद्धि या आधिक्य का अनुगमन
किया है तो कभी किसी समग्र तथ्य को ध्यान में रखते हुए रुचि को आधार
बना कर पाठों को लिया था । ऐसा करते हुए हम भरतमुनि के मूलपाठ को
शुद्ध या संशोधित करने की अमूलक महत्वाकांक्षा से दूर ही रहे हैं, जिसमें
अनधिकृत संशोधन भी हो जाते हैं । यहाँ तो केवल ऐसे पाठ भी मूल में ले
लिये गये हैं जो किसी उत्तरकालीन संशोधन के कारण किसी एक ही हस्तलेख
में थे । इसमें इतनी बात की सतर्कता अवश्य रखी गयी कि ये बिना किसी
आधार के नहीं लिये गये हों तथा साथ ही उनके पाठान्तर भी यथास्थान
रख दिये गये हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में वे आवश्यक थे ।'
श्री ग्राँसे के इस विवरण से थोड़ी आंशिक भिन्नता रखने पर भी उनके
इस कथन में नाट्यशास्त्र के सम्पादन के ऐसे संकेत विद्यमान हैं जिनके महत्व
से इन्कार नहीं किया जा सकता है परन्तु प्रस्तुत सम्पादक इस विषय में
थोड़ी विचार भिन्नता भी रखता है। नाट्यशास्त्र के अच्छे संशोधित पाठों
को प्रकृतसंस्करण में हमारे द्वारा लिया गया है जबकि उनके अन्य पाठ भी
हस्त लेखों के कारण विद्यमान थे परन्तु सन्तोषजनक रूप में जो स्वीकार्य नहीं
हो सकते थे । अतएव ऐसे पाठों को उपयुक्त विचार के बाद ले लिया गया
जो संशोधन की उपयुक्तता लिए हुए थे परन्तु ऐसी स्थिति में शेष पाठान्तरों
की भी ( अच्छे रूप में रहने पर या तो ) व्याख्या कर दी गयी है या फिर
उन्हें पाठान्तर के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिससे आगे चलकर
उनके औचित्य पर और भी विचार हो सके । प्रकृत सम्पादक अपने आग्रह
१. द्रष्टव्य—ग्रासे संस्करण की प्रस्तावना—पृ० ५, ११-१२ पेरिस
संस्करण ।
( ८१ )
पूर्ण पाठों को थोपने के पक्ष में नहीं है तथा उसने कहीं ऐसी स्वतन्त्रता का
उपयोग भी नहीं किया है। नाट्यशास्त्र के पाठान्तरों के अनुशीलनकर्त्ता
संशोधक विद्वानों से इस सन्दर्भ में यही निवेदन है कि वे अपनी मीमांसा के
समय इस विशिष्ट स्थिति को भी अवश्य ध्यान में रखेंगे जो सम्पादन के
समय प्रायः सभी पूर्व सम्पादकों ने अनुभव की थी तथा उसे अपने-अपने
संस्करणों में वर्णित भी किया था।
यह एक बड़े ही आदर्श की तथा महत्व की भी बात होती यदि हम
हस्तलेखों में तथा नाट्यशास्त्र के संस्करणों में प्राप्य एवं विद्यमान सभी पाठ-
भेदों को पादटिप्पणी में दे देते किन्तु ऐसा करना मुश्किल से व्यावहारिक बन
पाता। अतएव यहाँ पाठान्तर देते समय यह बात भी सर्वदा ध्यान में रखी
गयी है कि दिये गये पाठ या पाठान्तर किन्ही संशोधित संस्करणों में किस
प्रकार रहे हैं। इस प्रकार वर्तमान संशोधित संस्करण में उन संस्करणों के
पाठों को आवश्यक संकेत के साथ पाठान्तर टिप्पणी में दिखलाया गया है।
परन्तु यहाँ इतना अवश्य हुआ है कि ऐसे पाठान्तरों को प्रायः नहीं लिया
गया जो केवल पुनरुक्ति या शाब्दिकभेद मात्र के कारण अधिक महत्व के
नहीं थे, परन्तु ऐसे पाठों में भी जो प्राप्त करवाने योग्य थे तो उन्हें बराबर
रखा ही गया है। इसके प्रथमअध्याय से चौदह अध्याय तक के पाठों का श्री
ग्रासे के संस्करण से भी समीकरण करते हुए उसे 'क' पाठ के अन्तर्गत (या
अन्य वर्ग के अन्तर्गत) रखते हुए संकेत बनाये गये हैं तथा बम्बई काव्यमाला
संस्करण के सामान्यतः 'ख' के संकेत के अन्तर्गत पाठों को इस संस्करण में
दर्शाया गया है जिसका स्पष्टीकरण आवश्यक था।
आभार-प्रदर्शन—
“नाट्यशास्त्र” के इस द्वितीयभाग के लिये भी प्रथमभाग की तरह
ही अनेक सुधीजन, एवं साहित्य-विद्या-निष्णात मनीषियों का सहयोग,
प्रोत्साहन तथा प्रेरणा मिली है, जिनका उपकार सदैव मानते हुए उन्हें
धन्यवाद देना अपना प्रथम कर्त्तव्य मानता हूँ। इसी प्रकार नाट्यशास्त्र के
पूर्व प्रकाशित संस्करणों के सम्पादकों का भी सामान्यतः अधमर्ण हूँ जिनके
संस्करणों के कारण ही प्रस्तुत संस्करण को संवारने में सहायता मिली है।
इनमें भी सर्व प्रथम गायकवाड ओरियेन्टल सीरीज, बड़ौदा के अभिनवभारती
टीका सहित संस्करण के प्रथितयशस्क सम्पादक म० म० रामकृष्ण 'कवि'
का, काव्यमाला—निर्णयसागर प्रेस बम्बई के सम्पादक श्री पाण्डुरंग परब
६ ना० द्वि० भू०
( ८२ )
तथा द्वितीय संस्करण के सम्पादक श्री पण्डित केदारनाथ साहित्यभूषण का
तथा काशी संस्कृत ग्रन्थमाला, काशी के नाट्यशास्त्र के सम्पादक श्री
बटुकनाथ शर्मा तथा पण्डित बलदेव उपाध्याय के प्रति भी अपनी कृतज्ञता
मानता हूँ जिनके संस्करणों ने प्रस्तुत संस्करण को संवारने में आधार प्रदान
किया। इसी प्रकार एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता से प्रकाशित नाट्यशास्त्र
( श्री मनोमोहन घोष के अंग्रेजी अनुवाद सहित ) के संस्करण से भी पर्याप्त
सहायता मिलने से उसके प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।
इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्रीय वाङ्मय के प्राचीन ग्रन्थकारों के प्रति तथा
अभिनव संशोधकों तथा समालोचकों का भी कृतज्ञ हूँ जिनके ग्रन्थों के
अनुशीलन ने मुझे प्रस्तुत संस्करण में अनेक अभिनव तथ्यों तथा शास्त्रीयप्रमेयों
पर अनेक दृष्टिकोणों से विचार तथा विषय मीमांसा करने में प्रवृत्त
करवाया।
प्रस्तुत ग्रन्थ के लेखन-काल में जिन अनेक ख्यातिप्राप्त विद्वानों, मित्रों
तथा लेखकों का हार्दिक एवं व्यावहारिक सहयोग मिला था तथा जिसका
प्रथम भाग में उल्लेख किया जा चुका है उन महानुभावों के साथ साथ उसी
क्रम में श्री डॉ० प्रभाकर नारायणजी कवठेकर, कुलपति विक्रम विश्वविद्यालय,
उज्जैन का विशेष रूप से आभारी हूँ, जिसने इस नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान
को अपनी गुणग्राहिता तथा उदारता से नाट्यशास्त्र की तात्विक मीमांसा को
प्रश्रय दिया। इसी प्रकार इन्दौर के शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय
के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ० देवेन्द्रकुमारजी जैन का भी नाट्यशास्त्र
की समीक्षा करने ( 'नई दुनिया' दैनिक में ) के कारण आभारी हूँ।
नाट्यशास्त्र के प्रदीप व्याख्यान को प्रोत्साहित कर शीघ्र प्रकाशित करवाने
के आग्रह के साथ साथ उसके अनुशीलन को अनुशंसित करने वाले विद्वानों
में स्व० श्री डॉ० बलदेवप्रसादजी मिश्र ( विधायक तथा सुप्रसिद्ध मानसमर्मज्ञ
एवं समीक्षक—राजनांदगाँव ), श्री सुधाकर पाण्डेय—( प्रधानमन्त्री काशी
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ), प्रो० श्री डॉ० श्यामसुन्दरलाल दीक्षित
अमरावती का भी मैं कृतज्ञ हूँ। इसके अतिरिक्त प्राध्यापक श्री वेङ्कटाचलजी,
अध्यक्ष संस्कृत विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, सुहृद्वर डॉ० रामेश्वर
शर्मा, रीडर नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर, प्रो० गणेशदत्त त्रिपाठी, हिन्दी
विभाग, शास० कला वाणिज्य महा०, इन्दौर, डॉ० लक्ष्मण नारायण शुक्ल,
प्राध्यापक संस्कृत महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो० हर्षदधोलकिया, संस्कृत
महाविद्यालय, इन्दौर, प्रो० डॉ० पुरु दाधीच, भातखण्डे संगीत महाविद्यालय,
( ८३ )
लखनऊ तथा श्री प्रो० कृष्णशास्त्री कानिटकर, शास० कला वाणिज्य महा०
इन्दौर आदि का भी हृदय से आभारी हूँ ।
नाट्यशास्त्र के सभी खण्डों में प्रशस्त सहकार के कारण डॉ० रुद्रदेवजी
त्रिपाठी, लालबहादुर संस्कृत विद्यापीठ, देहली का तथा हिन्दी के परम
सुकवि सुहृद्वर डॉ० शिवमङ्गल सिंह 'सुमन' ( भूतपूर्व कुलपति विक्रम
विश्वविद्यालय, उज्जैन ) का भी इस सन्दर्भ में विशेषतः आभारी हूँ ।
नाट्यशास्त्र के व्याख्यानादि लेखन के समस्त कार्य को मध्यप्रदेश शासन
की सेवा में रहकर करने के कारण मैं मध्यप्रदेश शासन के प्रति भी अपना
विनम्र आभार प्रदर्शन करता हूँ । साथ ही नाट्यशास्त्र जैसे महाग्रन्थ के
लेखन के सुदीर्घ समय में सदा एकनिष्ठ होकर सहयोग देने वाले मेरे
अपने परिवार के सभी सदस्य भी धन्यवाद के अधिकारी हैं ।
इसी प्रसंग में मैं गोलोकवासी श्रेष्ठप्रवर बाबू जयकृष्णदासजी गुप्त का
भी स्मरण आवश्यक मानता हूँ जो ऐसे आकरभूत शास्त्रीय ग्रन्थ के प्रकाशन
में सदा रुचि लेते रहे हैं ।
मैं चौखम्भा संस्कृत संस्थान के संचालक गुप्त बन्धुओं का भी आभारी हूँ
जिनने नाट्यशास्त्र के भागों को अपनी गौरवशाली परम्परा के अनुरूप
प्रस्तुत करने का अतिशय उद्यम किया । इसी परिवार के श्री पं० देवनारायण
झा जी का भी मुद्रण कार्य में सहयोग के कारण आभार व्यक्त करता हूँ ।
किं बहुना—
नाट्याम्नाय-नितान्ततान्तमनासामासेतुशीताचला—
क्षोणीमण्डलमध्यवर्तिविदुषामाभोगिनी चेतसाम् ।
जीयादुक्तिविवेकजालनिकरैः संशोधिता निस्तुलैः
गम्भीरा मधुरा प्रबोधजननी व्याख्या प्रदीपाभिधा ॥
उज्जयिनी, \ सुधीजनकृपाकाङ्क्षी
विजयादशमी, सं० २०३५ } बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री
इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित या हस्तलिखित पाठ उपलब्ध नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ है)।
ग्रन्थ सङ्केत
अभि० द० : अभिनय-दर्पण
अभि० भा० : अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र व्याख्या ) ।
अ० भा० : अभिनवभारती ( नाट्यशास्त्र व्याख्या ) ।
का० प्र० : काव्यप्रकाश ।
काव्या० सू० : काव्यालङ्कारसूत्र ।
द० रू० : दशरूपक ।
ना० चं० : नाटकचन्द्रिका
ना० द० सू० : नाट्यदर्पणसूत्र ।
ना० शा० : नाट्यशास्त्र
ना० शा० सं० : नाट्यशास्त्र-सङ्ग्रह ।
ना० ल० र० को० : नाटकलक्षणरत्नकोश ।
भ० को० : भरतकोश ।
र० गं० : रसगङ्गाधर ।
रसा० सु० : रसार्णवसुधाकर ।
शृ० प्र० : शृङ्गारप्रकाश ।
सर० क० : सरस्वती-कण्ठाभरण ।
सा० द० : साहित्यदर्पण ।
सं० र० : सङ्गीतरत्नाकर ।
सामान्य सङ्केत
अ० : अध्याय ।
अं० : अङ्क ।
का० सं० : काशी संस्करण ।
चौ० सं० : चौखम्बा संस्करण ।
द्र० : द्रष्टव्य
नि० सा० : निर्णय-सागर संस्करण ।
गा० ओ० सी० : गायकवाड ओरियेन्टल सीरीज, बडौदा ।
श्लो० सं० : श्लोक संख्या ।
सं० : संख्या ।
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तृतीय खण्ड
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ५६
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ५८-५९
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ६१
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ६३
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ६६
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ६८
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ७०-७१
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ७४
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ७६
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ७८
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ८०-८१
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ८३
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ८५
चतुर्थ खण्ड
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ८८
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ९१
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ९३-९४
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ९६
[अस्पष्ट विषय] · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · · ९८
विषयानुक्रमणिका
अष्टम अध्याय
( उपाङ्गविधान ) ( श्लोक १-१७६ )
मुनिजन द्वारा अभिनय विषयक
प्रश्न तथा भरतमुनि का उत्तर
( श्लोक १-५ ) ३
अभिनय शब्द व्याख्या ( ६-७ ) ४
अभिनय के प्रकार ( ८-१० ) ५
अङ्गाभिनय उसके प्रभेद तथा
अङ्गादि ( ११-१३ ) ५
अभिनय की वस्तु ( १४-१५ ) ६
मस्तकाभिनय-भेद तथा लक्षण
( १६-१८ ) ६
आकम्पित तथा कम्पित-स्वरूप एवं
योजना ( १९-२१ ) ७
धुत तथा विधुत—स्वरूप एवं
योजना ( २२-२४ ) ८
परिवाहित तथा आधूत—स्वरूप
एवं योजना ( २५-२७ ) ८
अवधूत तथा अञ्चित—स्वरूप एवं
योजना ( २८-२९ ) ८
निहञ्चित तथा परावृत्त-स्वरूप एवं
योजना ( ३०-३२ ) ९
उत्क्षिप्त-स्वरूप एवं योजना ( ३३ ) १०
अधोगत- ,, ,, ( ३४ ) १०
लोलित ,, ,, ( ३५-३६ ) १०
दृष्टि-स्वरूप तथा प्रकार ( ३७-४३ ) ११
रसद्रष्टि-लक्षण तथा प्रयोग ( ४४-५२ )
कान्ता ( दृष्टि )—स्वरूप ( ४४ ) ११
भयान
( ८८ )
दृष्टियों की रसादि में योजना
( ८२-९३ ) १९-२०
पुतलियों के भ्रमणादि कार्य
( ९४-९६ ) २१
भ्रमणादि लक्षण ( ९७-९९ ) २२
अभिनय योजना ( १००-१०३ ) २२
दर्शन के विविध प्रकार (१०४-१०८) २३
पुटकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १०९-११२ ) २४
पुटकर्म-अभिनय योजना
( ११३-११६ ) २४
भ्रुकुटीकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( ११७-१२१ ) २५
भ्रुकुटीकर्म-अभिनय योजना
( १२२-१२७ ) २६
नासाकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १२८-१३० ) २७
नासाकर्म-अभिनययोजना
( १३१-१३४ ) २८
कपोलकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १३४-१३६ ) २८
कपोलकर्म-अभिनययोजना
( १३७-१३९ ) २९
अधरोष्ठकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १३९-१४२ ) २९
अधरोष्ठकर्म-अभिनययोजना
( १४२-१४४ ) ३०
चिबुककर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १४५-१४८ ) ३०
चिबुककर्म-अभिनययोजना
( १४८-१५१ ) ३१
मुखजकर्म-प्रभेद तथा लक्षण
( १५१-१५३ ) ३२
मुखजकर्म-अभिनययोजना
( १५३-१५९ ) ३२
मुखराग-प्रभेद तथा लक्षण
( १५९-१६० ) ३३
मुखराग-अभिनययोजना
( १६०-१६७ ) ३३
ग्रीवाकर्म-प्रभेद, लक्षण तथा
योजना ( १६८-१७६ ) ३४
नवम अध्याय
( हस्ताभिनय ) ( श्लोक १-२१४ )
असंयुक्तहस्त-संख्या तथा नाम
( १-७ ) ३७
संयुक्तहस्त-संख्या तथा नाम
( ८-१० ) ३८
नृत्तहस्त-संख्या तथा नाम ( ११-१६ ) ४०
असंयुक्त हस्तमुद्राओं के लक्षण-
विवरण ( १७ ) ४१
पताकहस्त-लक्षण तथा योजना
( १८-२६ ) ४१
त्रिपताकहस्त-लक्षण तथा योजना
( २७-२६ ) ४३
कर्तरीमुखहस्त-लक्षण तथा योजना
( ३८-४१ ) ४४
अर्धचन्द्रहस्त-लक्षण तथा योजना
( ४२-४४ ) ४६
अरालहस्त-लक्षण तथा योजना
( ४५-५१ ) ४७
शुकतुण्डहस्त लक्षण तथा योजना
( ५२-५३ ) ४९
मुष्टिहस्त-लक्षण तथा योजना
( ५४-५५ ) ४९
शिखरहस्त-लक्षण तथा योजना
( ५६-५७ ) ५०
कपित्थहस्त-लक्षण तथा योजना
( ५८-५९ ) ५०
कटकामुखहस्त-
( ८६ )
सर्पशीर्षहस्त-लक्षण तथा योजना
( ८२-८३ ) ५५
मृगशीर्षहस्त-लक्षण तथा योजना
( ८४-८५ ) ५६
कङ्गुलहस्त-लक्षण तथा योजना
( ८६-८७ ) ५६
अलपद्महस्त-लक्षण तथा योजना
( ८८-८९ ) ५७
चतुरहस्त-लक्षण तथा योजना
( ९०-९८ ) ५७
भ्रमरहस्त-लक्षण तथा योजना
( ९९-१०१ ) ५९
हंसास्यहस्त-लक्षण तथा योजना
( १०२-१०३ ) ६०
हंसपक्षहस्त-लक्षण तथा योजना
( १०४-१०७ ) ६०
सन्दंशहस्त-लक्षण तथा योजना
( १०८-११४ ) ६१
मुकुलहस्त-लक्षण तथा योजना
( ११५-११७ ) ६२
ऊर्णनाभहस्त-लक्षण तथा योजना
[
( ६० )
पक्षप्रद्योतक तथा गरुडपक्ष-लक्षण | नत-लक्षण ( १२ ) ८६
( १४३ ) ७९ | समुन्नत-लक्षण ( १३ ) ८६
दण्डपक्ष-लक्षण ( १९४ ) ७९ | प्रसारित तथा निवर्तित-लक्षण
ऊर्ध्वमण्डली तथा पार्श्वमण्डली- | तथा योजना ( १४ ) ८६
लक्षण ( १९५ ) ७९ | अपसृत लक्षण ( १५ ) ८५
उरोमण्डली तथा पार्श्वमण्डली | योजना ( १६-१७ ) ८७
लक्षण ( १९६ ) ७९ | उदर-प्रभेद तथा लक्षण ( १८ ) ८७
उरःपार्श्वमण्डल तथा पार्श्वमण्डली- | योजना ( १९-२० ) ८७
लक्षण ( १९७ ) ७९ | कटिप्रभेद ( २१ ) ८८
मुष्टिक-स्वस्तिक तथा पार्श्वमण्डली- | छिन्ना तथा निवृत्ता-लक्षण ( २२ ) ८८
लक्षण ( १९८ ) ८० | रेचिता तथा प्रकम्पिता-लक्षण
नलिनीपद्मकोश तथा पार्श्वमण्डली- | ( २३ ) ८८
लक्षण ( १९९ ) ८० | उद्वाहिता-लक्षण ( २४ ) ८८
अलपल्लवे तथा उल्बल तथा | योजना ( २४-२६ ) ८८
पार्श्वमण्डली-लक्षण ( २०० ) ८० | ऊरू प्रभेद ( २७ ) ८९
ललित, वलित तथा | कम्पित तथा वलित-लक्षण ( २८ ) ८९
पार्श्वमण्डली-लक्षण ( २०१ ) ८० | स्तम्भन तथा उद्वर्तन-लक्षण ( २९ ) ८९
हस्तकरणों के चार प्रकार | निवर्तन-लक्षण ( २९ ) ८९
( २०५-२०६ ) ८१ | योजनाएँ ( ३०-३२ ) ८९
आवेष्टित-लक्षण ( २०७ ) ८१ | जङ्घा-प्रभेद ( ३३-३४ ) ९०
उद्वेष्टित लक्षण ( २०८ ) ८१ | आवर्तित-लक्षण ( ३४-३५ ) ९०
व्यावर्तित लक्षण ( २०९ ) ८२ | नत-लक्षण ( ३५ ) ९०
परिवर्तित लक्षण ( २१० ) ८२ | क्षिप्त तथा उद्वाहित-लक्षण ( ३६ ) ९०
बाहुओं के दस प्रकार (२१२-२१४) ८२ | परिवृत्त-लक्षण ( ३७ ) ९०
| योजनाएँ ( ३७-३९ ) ९०
दशम अध्याय | पाद प्रभेद ( ४०-४१ ) ९१
( शारीराभिनय ) (श्लोक १-५७) | उद्घट्टितपाद-लक्षण तथा योजना
वक्षः के प्रभेद ( १ ) ८४ | ( ४१-४३ ) ९१
आभुग्न-लक्षण तथा योजना | समपाद-लक्षण योजना ( ४४-४७ ) ९२
( २-३ ) ८४ | त्र्यस्रपाद-योजना ९२
निभुंग्न-लक्षण तथा योजना | अग्रतलसंचरपाद-लक्षण योजना
( ४-५ ) ८४ | ( ४८-५० ) ९२
प्रकम्पित-लक्षण तथा योजना | अञ्चितपाद-लक्षण योजना
( ६-७ ) ८५ | ( ५१-५२ ) ९३
उद्वाहित-लक्षण तथा योजना ( ८ ) ८५ | कुञ्चितपाद-लक्षण तथा योजना
सम-लक्षण तथा योजना ( ९ ) ८५ | ( ५३-५४ ) ९३
पार्श्व के प्रभेद ( १०-११ ) ८६ | सूचीपाद लक्षण ९३
( ६१ )
पादचारी-स्वरूप ( ५५-५६ ) ९४ | आविद्धा चारी लक्षण ( ३८ ) १०२
एकादश अध्याय | उद्वृत्ता चारी लक्षण ( ३९ ) १०२
( चारीविधान ) ( श्लोक १-१०४ ) | विद्युद्भ्रान्ता चारी लक्षण ( ४० ) १०२
अलाता चारी लक्षण ( ४१ ) १०३
चारी-लक्षण ( १ ) ९५ | भुजङ्गत्रासिता चारी लक्षण ( ४२ ) १०३
व्यायाम-लक्षण ( २ ) ९६ | हरिणप्लुता चारी लक्षण ( ४३ ) १०३
चारी तथा करण-लक्षण ( ३ ) ९६ | दण्डपादा चारी लक्षण ( ४४ ) १०३
खण्ड तथा मण्डल-लक्षण ( ४ ) ९६ | भ्रमरी चारी लक्षण ( ४५ ) १०३
चारी-उपयोगिता ( ५-७ ) ९६ | चारी विधि ( ४६-५० ) १०४
भौमीचारी नाम ( ८-१० ) ९७ | स्थान नाम ( ५१ ) १०५
आकाशिकी चारी नाम ( १०-१३ ) ९७ | वैष्णवस्थान-लक्षण तथा योजना
चारी लक्षण | ( ५२-५८ ) १०५-१०६
समपादा लक्षण ( १४ ) ९८ | समपादस्थान-लक्षण योजना
स्थितावर्ता लक्षण ( १५ ) ९८ | ( ५८-६१ ) १०६
शकटास्या लक्षण ( १६ ) ९८ | वैशाखस्थान-लक्षण योजना
अध्यर्धिका लक्षण ( १७ ) ९८ | ( ६१-६५ ) १०७
चाषगति लक्षण ( १८ ) ९८ | मण्डलस्थान-लक्षण योजना
विच्यवा लक्षण ( १९ ) ९९ | ( ६५-६७ ) १०७
एलकाक्रीडिता लक्षण ( २० ) ९९ | आलीढस्थान-लक्षण योजना
बद्धा लक्षण ( २१ ) ९९ | ( ६७-७० ) १०८
ऊरुद्वृत्ता लक्षण ( २२ ) ९९ | प्रत्यालीढस्थान-लक्षण योजना
अड्गिता लक्षण ( २३ ) ९९ | ( ७०-७२ ) १०८
उत्स्पन्दिता लक्षण ( २४ ) ९९ | न्याय-नाम तथा उद्देश्य
जनिता लक्षण ( २५ ) ९९ | ( ७२-७६ ) १०९
स्यन्दिता लक्षण ( २६ ) १०० | भारतन्याय लक्षण
अपस्यन्दिता लक्षण ( २७ ) १०० | ( ७६-८० ) १०९-११०
समोत्सारितमत्तल्ली लक्षण ( २८ ) १०० | सात्वतन्याय लक्षण ( ८१-८२ ) ११०
मत्तल्ली लक्षण ( २९ ) १०० | वार्षगण्यन्याय लक्षण ( ८२-८४ ) ११०
आकाशिकी चारी | कैशिकन्याय लक्षण
अतिक्रान्ता चारी लक्षण ( ३० ) १०१ | ( ८४-८५ ) ११०-१११
अपक्रान्ता चारी लक्षण ( ३१ ) १०१ |
पार्श्वक्रान्ता चारी लक्षण ( ३२ ) १०१ | शस्त्रों की मोक्ष विधि ( ८५-८८ ) १११
ऊर्ध्वजानु चारी लक्षण ( ३३ ) १०१ | सौष्ठव लक्षण ( ८८-९२ ) १११
सूची चारी लक्षण ( ३४ ) १०१ | चतुरस्र लक्षण ( ९२-९३ ) ११२
नूपुरपादिका चारी लक्षण ( ३५ ) १०१ | करण ( ९३-९४ ) ११२
डोलपादा चारी लक्षण ( ३६ ) १०२ | करण के कार्य ( ९४-९५ ) ११३
आक्षिप्ता चारी लक्षण ( ३७ ) १०२ | व्यायामविधि ( ९५-१०२ ) ११३-११४
( ६२ )
द्वादश अध्याय
( मण्डलप्रचार ) ( श्लोक १–६८ )
आकाशिक तथा भौमिकमण्डलों के नाम ( १–६ ) ११५
अतिक्रान्तमण्डल लक्षण ( ७–१० ) ११६
विचित्रमण्डल लक्षण ( १०–१४ ) ११६
ललितसञ्चारमण्डल लक्षण ( १४–१७ ) ११७
सूचीविद्धमण्डल लक्षण ( १८–१९ ) ११८
दण्डपादमण्डल लक्षण ( २०–२२ ) ११८
विहृतमण्डल लक्षण ( २३–२६ ) ११९
अलातमण्डल लक्षण ( २७–२९ ) ११९
वामविद्ध (वामबन्ध) मण्डल लक्षण ( ३०–३३ ) १२०
ललितमण्डल लक्षण ( ३४–३७ ) १२१
क्रान्तमण्डल लक्षण ( ३८–४० ) १२१
भौमिकमण्डल लक्षण ( ४१ ) १२२
भ्रमरमण्डल लक्षण ( ४२–४४ ) १२२
आस्यन्दि(स्यन्दि)तमण्डल लक्षण ( ४५–४७ ) १२२
आवर्त(आस्यन्दि)तमण्डल लक्षण ( ४८–५० ) १२३
समोत्सारित(स्यन्दि)तमण्डल लक्षण ( ५१–५३ ) १२३
एलकाक्रीडितमण्डल लक्षण ( ५४–५५ ) १२४
अड्डितमण्डल लक्षण ( ५६–५८ ) १२४
शकटास्यमण्डल लक्षण ( ५९–६० ) १२५
अध्यर्धमण्डल लक्षण ( ६१–६२ ) १२५
पिष्टकुट्टमण्डल लक्षण ( ६३–६४ ) १२५
चाषगतमण्डल लक्षण ( ६५ ) १२६
सममण्डल लक्षण ( ६६ ) १२६
मण्डल प्रयोग विधि ( ६७–६८ ) १२६
त्रयोदश अध्याय
( गतिप्रचार ) ( श्लोक १–२२८ )
उपवहनविधि के पश्चात् पात्रप्रवेश-विधान ( १–३ ) १२७
उत्तम तथा मध्यम पात्रगत शारीर-भङ्गिमा ( ४–७ ) १२८
पादों की ताल, कला एवं लय का विधान ( ८–१४ ) १२९
पात्रों की स्वाभाविक गति ( १५–२४ ) १३०
पात्रानुसारी गति (विधान) ( २५–३४ ) १३२
गति लय विधान ( ३५–४० ) १३४
शृङ्गार रस में गति ( ४१–४८ ) १३६
रौद्ररस गति ( ४८–५४ ) १३७
बीभत्स रस गति ( ५५–५७ ) १३८
वीररस गति ( ५७–५९ ) १३९
अद्भुत तथा हास्य गति ( ६०–६१ ) १३९
करुणरस गति ( ६१–६७ ) १४०
शीतार्त्तपात्र गति ( ६७–७० ) १४१
भयानक रस गति ( ७०–७६ ) १४२
वणिक् तथा मन्त्रि गति ( ७६–७९ ) १४३
यति तथा श्रमण गति ( ७९–८६ ) १४४
अन्धपात्र गति ( ८७ ) १४५
रथावरोही पात्र गति ( ८८–९० ) १४५
विमानावरोहण गति ( ९१–९२ ) १४६
आकाशगमन गति ( ९३–९४ ) १४६
आकाशावतरण गति ( ९५ ) १४७
उन्नतप्रदेशारोहण गति ( ९६–१०० ) १४७
अवतरण-गति ( १०१–१०४ ) १४८
नौ-यात्रा गति ( १०५–१०७ ) १४९
अश्वाधिरोहण गति ( १०८ ) १५०
सर्पगति ( १०९ ) १५०
विटगति ( ११०–१११ ) १५१
कञ्चुकीगति ( ११२–११४ ) १५१
कृश, व्याधिग्रस्त तथा शान्त की गति ( ११५–११७ ) १५२
( ६३ )
पथिक गति ( ११८ ) १५३ | शोकावस्था में उपवेशनविधि
स्थूलगति ( ११९-१३० ) १५४ | ( १९९ ) १७०
मत्तगति ( १२१-१२२ ) १५४ | मूर्च्छा आदि दशा में उपवेशन-
उन्मत्तगति ( १२३-१३० ) १५६ | विधि ( २०० ) १७०
खञ्ज आदि गति ( १३१-१३७ ) १५६ | लज्जा में उपवेशनविधि ( २०१ ) १७१
विदूषक गति ( १३७-१४६ ) १५७ | धार्मिकविधि में उपवेशनविधि
दासादि गति ( १४६-१४८ ) १५९ | ( २०२ ) १७१
शकार गति ( १४८-१५० ) १५९ | प्रियाप्रसादन में उपवेशनविधि
नीचगति ( १५०-१५१ ) १६० | ( २०३ ) १७२
म्लेच्छ गति ( १५१-१५२ ) १६० | देववन्दन में उपवेशनविधि
पशुपक्षी गति ( १५२-१५९ ) १६० | ( २०४-२०६ ) १७२
गति में स्त्रियों के ( तीन ) स्थिति | विविधपात्रों के निर्धारित आसन
स्थान ( १६० ) १६१ | ( २०६-२०७ ) १७३
आयत स्थान-लक्षण ( १६१ ) १६२ | पुरुष पात्रों के आसन ( २०८-२१० ) १७३
आयतस्थान योजना ( १६२-१६४ ) १६२ | स्त्रीपात्रों के आसन ( २१०-२१४ ) १७४
अवहित्थस्थान लक्षण ( १६५ ) १६३ | मुनि तथा संन्यासी के आसन
अवहित्थस्थान योजना | ( २१५-२१६ ) १७४
( १६६-१६७ ) १६३ | आसन-सामान्यविधान
अश्वक्रान्तस्थान लक्षण ( १६८ ) १६४ | ( २१७-२२० ) १७५
अश्वक्रान्तस्थान योजना | शयन में शरीर-स्थिति ( २२१ ) १७५
( १६९-१७१ ) १६४ | आकुञ्चित लक्षण ( २२२ ) १७६
युवती ( स्त्री ) गति ( १७१-१७९ ) १६४ | सम लक्षण ( २२३ ) १७६
प्रौढ़ ( स्त्री ) गति ( १८०-१८१ ) १६५ | प्रसारित लक्षण ( २२४ ) १७६
दासी-गति ( १८२-१८३ ) १६६ | विवर्तित लक्षण ( २२५ ) १७६
नपुंसकगति ( १८४-१८६ ) १६७ | उद्वाहित लक्षण ( २२६ ) १७७
बालगति ( १८७ ) १६७ | नत लक्षण ( २२७ ) १७७
तृतीया प्रकृति गति ( १८८ ) १६७ |
भूमिकापरिवर्तन में पात्रगति | चतुर्दश अध्याय
( १८९-१९२ ) १६८ | ( कक्ष्यापरिधि तथा लोकधर्मी-
नीच स्त्री गति ( १९३ ) १६८ | निरूपण ) ( श्लोक १-८४ )
तपस्विनी ( स्त्री ) गति | नाट्यमण्डप में वाद्यस्थापन
( १९४-१९५ ) १६९ | ( १-२ ) १७८
आसनविधान ( १९६ ) १६९ | कक्ष्यागत विभाग ( ३ ) १७९
स्वस्थदशा में उपवेशनविधि | कक्ष्याविभाग-उपयोगिता ( ४-७ ) १७९
( १९७ ) १६९ | रंगमञ्च पर नियत प्रदेश-संकेत
विचारदशा में उपवेशनविधि | ( ८-१० ) १८०
( १९८ ) १७० | रंग की पूर्वदिशा ( ११ ) १८०