नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( ७५ )
चेटी—(देख कर) राजकुमारी ! प्रसन्नता की बात है; बधाई हो । यह
तो वही आपके हृदयवल्लभ (प्राणप्रिय) हैं ।
नायिका- (देख कर हर्ष तथा घबराहट से साथ) सखी, इसे देखकर
घबराहट के कारण मैं इस जगह नहीं ठहर सकती । कहीं यह
मुझे देख ले ! तो आओ कहीं और चलती हैं। (उत्कण्ठा के
साथ पैर रखकर) सखी, मेरी तो जंघाएं काँप रही हैं ।
चेटी- (हँसकर) अरी भीरू ! यहां ठहरी तुझे कौन देखता है ? क्या
आप सचमुच भूल गईं कि यह लाल अशोक का वृक्ष है ?
अतः यहीं बैठकर (इसी जगह) ठहरती हैं ।
[ वैसा ही करती है ]
विदूषक– (अच्छी तरह देखकर) हे मित्र, यही वह चन्द्रमणिशिला है ।
नायिका– (आँसुओं के साथ, गहरी साँस लेता है)
( ७६ )
भट्टिदारिए ! जाणामि सिविणआलावो विअ,
भर्तृदारिके ! जानामि स्वप्नालाप इव,
तो अवहिदा दाव सुणाम्ह ।
तदवहिते तावत् शृणुवः । [उभे आकर्णयन्तः]
विदूषकः— (हस्तेन चालयन्)
भो वअस्स ! णं भणामि, एसा सा चंदमणिसिलेत्ति ।
भो वयस्य ! ननु भणामि, एषा सा चन्द्रमणिशिलेति ।
नायकः— (सवाष्पं निःश्वस्य) सम्यगुपलक्षितम् । (हस्तेन निर्दिश्य)
शशिमणिशिला सेयं यस्यां विपाण्डुरमाननं
करकिसलये कृत्वा वामे घनश्वसितोद्गमा ।
चिरयति मयि व्यक्ताकूता मनाक्स्फुरितैर्भ्रुवो-
र्विरमितमनोमन्युर्दृष्टा मया रुदती प्रिया ॥६॥
ततस्तस्यामेव चन्द्रमणिशिलायामुपविशावः ।
[उभावुपविशतः]
नायिका. (विचिन्त्य) का उण एसा हुविस्सदि !
का पुनरेषा भविष्यति ?
चेटी- भट्टिदारिए ! जधा अम्हे ओवारिदा दाव एदं पेक्खम्ह,
भर्तृदारिके ! यथावामपवारिते तावदेनं प्रेक्षावहे,
श्लोक नं० ६, अन्वयः—
इयं सा शशिमणिशिला यस्यां वामे करकिसलये विपाण्डुरम् आननं कृत्वा,
घनश्वसितोद्गमा, मयि चिरायति भ्रुवो मनाक् स्फुरितैः व्यक्ताकूता,
विरमितमनोमन्युः रुदती प्रिया मया दृष्टा ॥
( ७७ )
चेटी - राजकुमारी ! मुझे लगता है मानों कोई स्वप्न की बातचीत हो
रही है । तो हम सावधान हो कर सुनें ।
[दोनों सुनती हैं]
विदूषक- (हाथ से हिलाते हुए) अरे मित्र, मैं कहता हूँ यह है वही
चन्द्रमणिशिला ।
नायक - (आँसुओं के साथ, गहरी साँस ले कर) ठीक देखा है । (हाथ
से इशारा करके) - यह वही चन्द्रमणिशिला है जहाँ पल्लव के
समान कोमल बाएँ हाथ पर (अपने) पीले मुख को रखकर
गहरी आहें भरती हुई, मेरे देर करने पर भौहों के थोड़ा
फड़कने से जिसके (मन) का (प्रणय कोप रूपी) अभिप्राय
स्पष्ट था, परन्तु मनोगत क्रोध को रोक कर रोती हुई प्रिया को
मैंने देखा था ।
तब तो इसी चन्द्रमणिशिला पर बैठें । (दोनों बैठते हैं)
नायिका - (सोचकर) यह कौन होगी ?
चेटी - राजकुमारी, जैसे हम छिप कर उसे देख रही हैं, कहीं तू ही इस
- सति सप्तमी ।
- आकूत = भाव, अभिप्राय ।
- मनाक् = थोड़ा, धीरे से
( ७८ )
मा णाम तुमम्पि एव्वं दिट्ठा ।
मा नाम त्वमप्येवं दृष्टा ।
नायिका — जुज्जइ एदं । किं उण पणअकुविदं पिअअणं
युज्यते एतत् । किं पुनः प्रणयकुपितं प्रियजनं
हिअए करित्र मंतयदि ।
हृदये कृत्वा मन्त्रयति ।
चेटी — भद्दिदारिए ! मा ईरिसिं सङ्क करेहि । पुणोवि
भर्तृदारिके ! मा ईदृशां शङ्कां कुरुष्व । पुनरपि
दाव सुणाह ।
तावच्छृणुवः ।
विदूषकः — (आत्मगतम्)
अभिरमदि एसो एदाए कधाए, भोदु एदं जेव्व वड्ढाइस्सं ।
अभिरमते एष एतया कथया, भवतु एतामेव वर्धयिष्यामि ।
(प्रकाशम्) भो वअस्स ! तदा सा तुए रुदती किं भणिदा ?
भो वयस्य ! तदा सा त्वया रुदती किं भणिता ?
नायकः — वयस्य ! इदमुक्ता -
निष्यन्दत इवानेन मुखचन्द्रोदयेन ते ।
एतद् वाष्पाम्बुना सिक्तं चन्द्रकान्तशिलातलम् ॥७॥
नायिका—(सरोषम्) चतुरिए ! अत्थि किं अदो वि अवरं सोदव्वं ?
चतुरिके ! अस्ति ¹किमतोऽप्यपरं श्रोतव्यम् ?
श्लोक न० ७, अन्वयः—(तव) वाष्पाम्बुना सिक्तम् एतत् चन्द्रकान्त-
शिलातलम अनेन ते मुखचन्द्रोदयेन निष्यन्दते इव ॥
( ७६ )
तरह न देखी गई हो !
नायिका — यह ठीक है । फिर यह किस प्रणय-कुपित प्रियजन को मन
में रख कर इस तरह बातें कर रहे हैं ?
चेटी — राजकुमारी ! ऐसी शङ्का मत करो। अच्छा तो फिर (और)
सुनती हैं ।
विदूषक — (मन ही मन) यह इस प्रसङ्ग से प्रसन्न है । अच्छा, इसे ही
(आगे) बढ़ाता हूँ । (प्रकट) हे मित्र, तब आप ने उस रोती हुई
(अपनी प्रिया) को क्या कहा ?
नायक — मित्र, यह कहा कि—
(तुम्हारे) आंसुओं के जल से गीला हुआ हुआ यह चन्द्रमणि-
शिलातल तुम्हारे मुख रूपी चन्द्रमा के उदय होने से मानों
(पिघल कर) चूने लग पड़ा है ।
नायिका—(क्रोध से) चतुरिका ! क्या इस¹ से भी अधिक कुछ और
सुनना बाकी है ?
- किम् + अतः + अपि + अपरम् ।
( ८० )
(सास्रम्) ता एहि गच्छम्ह ।
तदेहि, गच्छावः ।
चेटी-(हस्ते गृहीत्वा)
भद्दिदारिए ! एव्वं मा भण, तुमं एव्व सिविणए दिट्ठा,
भर्तृदारिके ! एवं मा भण, त्वमेव स्वप्ने दृष्टा,
ण एदस्स अण्णस्सिं दिट्ठी अहिरमदि ।
नैतस्यान्यस्यां दृष्टिरभिरमति ।
नायका — ण मे हिअञ्जं पतिआअदि, ता कहावसाणं
न मे हृदयं प्रत्येति, तत्कथावसानं
जाव पडिवालेम्ह ।
यावत्प्रतिपालयावः¹ ।
नायकः- वयस्य ! जाने तामेवास्यां शिलायामालिख्य² तया
चित्रगतयात्मानं विनोदयामीति । तदित एव
गिरितटान्मनःशिलाशकलान्यादाय गच्छ ।
विदूषकः—जं भवं आणवेदि । (परिक्रम्य, गृहीत्वोपसृत्य)
यद्भावानाज्ञापयति ।
भो वअस्स, तुए एक्को वण्णओ आणत्तो । मए उण इधः
भो वयस्य, त्वयैको वर्णक आज्ञप्तः । मया ³पुनरिह
सुलहा पञ्चवण्णआ आणीदा । ता आलिहदु भवं ।
सुलभाः पञ्चवर्णका आनीताः । तदालिखतु भवान् ।
[⁴उपनयति]
( ८१ )
(आँसुओं के साथ) अतः आओ चलें ।
चेटी — (हाथ से पकड़ कर) राजकुमारी ! ऐसा मत कहो । तुम्हीं स्वप्न
में देखी गई हो । इस की दृष्टि (तुम्हें छोड़) किसी और में
आसक्त नहीं है ।
नायिका — मेरे मन को विश्वास तो नहीं होता । (फिर भी) अच्छा
इस प्रसङ्ग की समाप्ति तक प्रतीक्षा करती हूँ ।
नायक — मित्र ! मेरा विचार है कि उसी (प्रिया) की तस्वीर इस
शिला पर बनाकर मैं उसके चित्र से ही अपने मन को बहलाऊँ ।
अतः इसी पर्वतपार्श्व से लाल गैरिकादि धातु के टुकड़े ले आओ ।
विदूषक — जैसी आपकी आज्ञा । (घूमकर, लेकर, पास आकर) हे मित्र,
आप ने तो (केवल) एक ही रंग की आज्ञा दी थी, परन्तु मैं
यहां आसानी से प्राप्त होने वाले पांच रंग (के पत्थर) लाया
हूं । सो आप चित्र बनाएँ । [देता है ।]
- प्रतीक्षा करती हूँ ।
- आ + लिख् + ल्यप् ।
- यहां 'पुनः' का प्रयोग 'परन्तु' के अर्थ में है ।
- उप + ढौ = पास ले जाना, भेंट करना, देना ।
( ८२ )
नायकः- वयस्य ! साधु कृतम् (गृहीत्वा शिलायामलिखन् सरोमाञ्चम्)-
सखे ! पश्य —
^1 अक्लिष्टविभ्रमशोभाधरस्य नयनोत्सवस्य ^2 शशिन इव ।
दयितामुखस्य सुखयति रेखाऽपि ^3 प्रथमदृष्टेयम् ॥ ८ ॥
[आलिखति]
विदूषकः- (सकौतुकं निर्वर्ण्य) भो वयस्स ! अपच्चक्खे वि
भो वयस्य ! अप्रत्यक्षेऽपि
णाम रूअं लिहिअदि । अहो अच्छरिअं !
नाम रूपं लिख्यते । अहो आश्चर्यम् !
नायकः- (सस्मितम् ) वयस्य !
प्रिया सन्निहितैवेयं सङ्कल्पस्थापिता पुरः ।
दृष्ट्वा दृष्ट्वा लिखाम्येनां यदि तत्कोऽत्र विस्मयः ॥६॥
नायिका-(सास्रम् ) चदुरिए! जाणिदं क्खु कहावसाणं । ता एहि,
चतुरिके ! ज्ञातं खलु कथावसानम् । तदेहि ,
मित्तावसुं पेक्खह्म ।
मित्रावसुं प्रेक्षावहे ।
श्लोक नं० ८, अन्वयः -
अक्लिष्टविभ्रमशोभाधरस्य नयनोत्सवस्य शशिनः प्रथमदृष्टा (रेखा)
इव दयितामुखस्य इयं रेखाऽपि (मां) सुखयति ।
श्लोक नं० ६, अन्वयः -
सङ्कल्पस्थापिता इयं प्रिया पुरः सन्निहिता इव ।
यदि एनां दृष्ट्वा दृष्ट्वा लिखामि, तत् अत्र को विस्मयः ?
( ८३ )
नायक—मित्र ठीक किया है (लेकर, शिला पर चित्र खींचते हुए,
रोमाञ्चित होकर) मित्र, देखो—
मेघादि से अनावृत्त मुख की शोभा को धारण करने वाले
तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा को पहिली बार
देखी गई रेखा के समान, पके हुए बिम्बफल की तरह
शोभायमान अधरोष्ठ वाले तथा नयनों को आनन्दित करने
वाले प्रियतमा के मुख की रेखा भी (चित्र में) पहिली बार
देखी गई (मुझे) सुख देती है। [ चित्र बनाता है ]
विदूषक—(उत्सुकता के साथ देखकर) हे मित्र, (प्रिया का) रूप सामने
न होने पर भी (उसका) (इतना पूर्ण तथा सुन्दर) चित्र बनाया
जा रहा है ? आह, बड़े आश्चर्य की बात है !
नायक—(मुस्कराते हुए) मित्र, मेरे सङ्कल्पों में सामने ठहरी हुई वह
प्रिया मानों समीप ही है। यदि उसे देख देख कर मैं (उसका)
चित्र बना रहा हूँ तो इसमें कौनसी आश्चर्य की बात है ?
नायिका—(आंसुओं के साथ) चतुरिके ! प्रसङ्ग का अन्त जान लिया।
तो आओ, मित्रावसु को देखें।
- इसके दो अर्थ हैं। चन्द्रमा के साथ—चन्द्रबिम्ब के मेघादि से
आच्छादित न होने के कारण शोभा धारण करने वाला।
दयितामुख के साथ—पके हुए बिम्बफल के समान शोभायमान
अधरोष्ठ वाले। - तथा 3. भी दोनो तरफ लगते हैं।
( ८४ )
चेटी-(सविषादमात्मगतम्)कहं जीवदणिरवेक्खो विअ से आला वो ।
कथं जीवितनिरपेक्ष¹ इवास्या आलापः ।
(प्रकाशम् )
भट्टिदारिए ! णं गदा एव्व तहिं मणोहरिआ; ता कदावि
भर्तृदारिके ! ननु गतैव तत्र मनोहरिका ; तत्कदापि
भट्टा मित्तावसू इध एव्व आअच्छदि
भर्ता मित्रावसुरिहैवागच्छति ।
[ततः प्रविशति मित्रावसुः]
मित्रावसुः- आज्ञापितोऽस्मि तातेन, यथा-'वत्स मित्रावसो !
कुमारजीमूतवाहनोऽस्माभिरिहासनवासात्सुपरीक्षितः ।
कुतोऽस्माद्योग्यो वरः ? तदस्मै वत्सा मलयवती
प्रतिपाद्यताम्²' इति । अहन्तु स्नेहपराधीनतयाऽन्य-
देव किमप्यवस्थान्तरमनुभवामि । कुतः ?
यद्विद्याधरराजवंशतिलकः³ प्राज्ञः सतां सम्मतो
रूपेणाप्रतिमः पराक्रमधरो विद्वान् विनीतो युवा ।
यच्चासूनपि संत्यजेत्करुणया सत्त्वार्थमभ्युद्यत⁴-
स्तेनास्मै ददतः स्वसारमतुला⁵ तुष्टिर्विषादश्च मे ॥१०॥
श्लोक न०: १० अन्वयः-
अस्मै स्वसारं ददतः मे, यत् विद्याधरराजवंश तिलकः,
प्राज्ञः, सतां सम्मतः रूपेण अप्रतिमः, पराक्रमधरः, विद्वान् युवा-
तेन अतुला तुष्टिः ; यत् च करुणया सत्त्वार्थम् अभ्युद्यतः
असून्अपि सन्त्यजेत्, (तेन) विषादश्च ॥
( ८५ )
चेटी—(दुःख के साथ, मन ही मन) इस की (यह) बात मानों जीवन से
कितनी अपेक्षा-रहित (अनादर-युक्त है)¹। (प्रकट) राजकुमारी,
वहां तो मनोहारिका गई है । तो शायद राजकुमारी मित्रावसु
यहीं आते हों ।
[ मित्रावसु का प्रवेश ]
मित्रावसु– पिता जी ने मुझे आज्ञा दी है कि “पुत्र, मित्रावसु, कुमार
जीमूतवाहन को हमने यहां समीप रहने के कारण अच्छी तरह
देख भाल लिया है । इस से बढ़कर योग्य वर कहां (मिलेगा) ?
अतः इस के साथ प्यारी मलयवती का विवाह कर देन
चाहिए । मैं तो स्नेह के वश में होने के कारण किसी और ही
अवस्था का अनुभव कर रहा हूँ । क्योंकि—
इस (जीमूतवाहन) को अपनी बहिन देते हुए मुझे इस विचार
से कि यह विद्याधरों के राजवंश का आभूषण है, बुद्धिमान् ,
सज्जनों में सम्मानित, रूप में अद्वितीय, पराक्रमी, विद्वान् ,
नम्र स्वभाव वाला युवक है— अत्यन्त हर्ष हो रहा है; परन्तु
दया से जीवों के उपकार के लिए उद्यत वह अपने प्राणों को
भी छोड़ सकता है, इस विचार से (मुझे) दुःख भी है ।
- जीवन से अपेक्षारहित, उपेक्षायुक्त; अर्थात् जीवन की परवाह नहीं
करती; अथवा जीना ही नहीं चाहती । मानों आत्महत्या करना
चाहती हो । - दी जानी चाहिए । (विवाह में)। अर्थात् उसका विवाह कर देना
चाहिए । - शिरोमणि, श्रेष्ठ, आभूषण । 4. उद्यत, तैयार ।
- अद्वितीय, अपूर्व, बहुत, अत्यन्त । यदि पाठ “अतुलां” हो तो
वह “स्वसारं” का विशेषण होगा ।
( ८६ )
श्रुतश्च मया - 'असौ जीमूतवाहनोऽत्रैव गौर्याश्रमसम्बद्धे
चन्दनलतागृहे वर्तते' इति । तदेतच्चन्दनलतागृहम् ।
यावत्प्रविशामि । [प्रविशति]
विदूषकः — (ससम्भ्रममवलोक्य) भो वअस्स ! पच्छादेहि
भो वयस्य ! प्रच्छादया-
इमिणा कअलिवत्तेण इमं चित्तगदं कण्णअं । एसो क्खु
ऽनेन कदलीपत्रेणेमां चित्रगतां कन्यकाम् । एष खलु
सिद्धजुवराओ मित्तावसू इध इव आअदो । कदावि (एसो)
सिद्धयुवराजो मित्रावसुरीहैवागतः । कदापि¹ (एष)
पेक्खिस्सदि ।
प्रेक्षिष्यते ।
नायकः— (कदलीपत्रेण प्रच्छादयति)
मित्रावसुः-(उपसृत्य) कुमार ! मित्रावसुः प्रणमति ।
नायकः-(दृष्ट्वा) मित्रावसो ! स्वागतम् । इहोपविश्यताम् ।
चेटी—भट्टिदारिए ! आअदो भट्टा मित्तावसू ।
भर्तृदारिके ! आगतो भर्त्ता मित्रावसुः ।
नायिका- हज्जे ! पिअं मे ।
हञ्जे ! प्रियं मे ।
नायकः — मित्रावसो ! अपि कुशली सिद्धराजो विश्वावसुः ?
मित्रावसुः-कुशली तातः। तदादेशेनैवास्मि त्वत्सकाशमागतः ।
नायकः — किमाह तत्रभवान् ?
( ८७ )
और मैं ने सुना है कि वह जीमूतवाहन यहीं गौरी के मन्दिर
के साथ लगे हुए चन्दनलतागृह में है । वह चन्दनलतागृह यही
है । तो (इसमें) प्रवेश करता हूं । [भीतर जाता है]
विदूषक — (घबराहट के साथ देखकर) — हे मित्र ! उस कन्या के इस
चित्र को इस केले के पत्ते से ढक दो । (क्योंकि) यह सिद्धों का
युवराज मित्रावसु इधर ही आ पहुंचा है । शायद (यह) देख
लेगा ।
नायक — (केले के पत्ते से ढक देता है)
मित्रावसु — (समीप जाकर) कुमार ! मित्रावसु (आपको) प्रणाम करता
है ।
नायक — (देखकर) मित्रावसु ! तुम्हारा स्वागत है । (आओ) यहां बैठो ।
चेटी — राजकुमारी ! स्वामी मित्रावसु आगए ।
नायिका — सखी, मुझे खुशी है ।
नायक — मित्रावसु ! क्या सिद्धराज विश्वावसु सकुशल हैं ?
मित्रावसु — (जी हां) पिता जी कुशलपूर्वक हैं । उन्हीं की आज्ञा से मैं
आप के पास आया हूँ ।
नायक — श्रीमान् ने क्या कहा है ?
- कभी, कहीं, शायद ।
( ८८ )
नायिका-- सुणिस्सं दाव, किं तादेण संदिट्ठं त्ति ।
श्रोष्यामि तावत्, किं तातेन सन्दिष्टमिति ।
मित्रावसुः-इदमाह तातः-अस्ति मे मलयवती नाम कन्या
जीवितमिवास्य सर्वस्यैव सिद्धराजान्वयस्य । सा मया
तुभ्यं प्रतिपाद्यते । प्रतिगृह्यताम्'' इति ।
चेटी- (विहस्य) - भट्टिदारिए ! किं ण कुप्पसि दाणीं ?
भर्तृदारिके ! किं न कुप्यसीदानीम् ?
नायिका - (सस्मितं सलज्जं चाधोमुखी स्थित्वा) हज्जे !
हञ्जे !
मा हस । किं विसुमरिदं दे एदस्स अण्णहिअअत्तणं ?
मा हस । किं विस्मृतं त एतस्यान्यहृदयत्वम् ?
नायकः- (अपवार्य) वयस्य सङ्कटे पतिताः स्मः ।
विदूषकः- (अपवार्य) भो वअस्स ! जाणामि ण तं वज्जिअ
भो वयस्य ! जानामि न तां वर्जयित्वा-
अण्णहिं चित्तं दे अहिरमदि, ता जधा तथा जं किम्पि
ऽन्यत्र, चित्तं तेऽभिरमते । तयथा तथा यत्किमपि
भणिअ विसज्जीअदु एसो ।
भणित्वा विसृज्यतामेषः ।
नायिका- (सरोपमात्मगतम्) हदास ! को वो एदं न जाणादि ?
हताश¹ ! को चैतन्न जानाति ?
( ८६ )
नायिका— मैं भी सुनना चाहती हूँ कि पिता जी ने क्या सन्देश भेजा
है ।
मित्रावसु — पिता जी ने यह कहा है कि "मलयवती नाम की मेरी
कन्या है जो सम्पूर्ण सिद्धराज वंश की मानों जान है । उसे मैं
तुम्हें (विवाह में) देता हूं । (उसे) स्वीकार कीजिए ।”
चेटी— (हंसकर) राजकुमारी ! अब क्रोध क्यों नहीं करती ?
नायिका—(मुस्कराहट तथा लज्जा के साथ नीचे मुख करके) सखी, मत
हँस । क्या तू भूल गई कि इनका मन किसी और (स्त्री) में है ?
नायक— (अलग) मित्र, (बड़े) संकट में पड़ गए ।
विदूषक— (अलग) हे मित्र, मैं जानता हूँ कि उसे छोड़ कर आपका
मन और कहीं नहीं लग सकता । अतः जैसे तैसे जो कुछ भी
कह कर इसे विदा करो ।
नायिका—(क्रोध के साथ, मन ही मन) दुष्ट ! यह कौन नहीं जानता ?
- जिसकी आस टूट चुकी हो ; जिसने आस तोड़ दी हो ; निर्दय;
अभागा; दुष्ट ।
( ६० )
[ना]यकः--मित्रावसो ! क इह नेच्छेद भवद्भिः सह श्लाघ्य-
मीदृशं सम्बन्धम् ? किन्तु न शक्यते चित्तमन्यतः
प्रवृत्तमन्यतो प्रवर्त्तयितुम् । अतो नाहमेनां प्रतिग्रही-
तुमुत्सहे ।
नायिका - (मूर्च्छां नाटयति)
चेटी - समस्ससदु समस्ससदु भट्टिदारिआ !
समाश्वसितु समाश्वसितु भर्तृदारिका !
विदूषकः-भो ! पराधीणो क्खु एसो, किं एदिणा अब्भत्थिदेण ?
भो ! पराधीनः खल्वेषः , किमनेनाभ्यर्थितेन ?
ता गुरुअणं से गदुअ अब्भड्ढेहि ।
तद्गुरुजनमस्य गत्वाभ्यर्थय ।
मित्रावसुः - (आत्मगतम् ) साधूक्तं, नायं गुरुजनवचन-
मतिक्रामति । अस्य गुरुरप्यस्मिन्नेव गौर्याश्रमे प्रति-
वसति । तद्यावद्गत्वाऽस्य पित्रा मलयवतीं प्रति-
ग्राहयामि ।
नायिका - (समाश्वसिति)
मित्रावसुः - (प्रकाशम् ) एवं निवेदितात्मनोऽस्मान् प्रत्या-
चक्षाणः कुमार एव बहुतरं जानाति ।
नायिका - (सरोषं विहस्य)
कहं पच्चाक्खाणलहू मित्तावसू पुणो वि मन्तेदि ?
कथं ^1प्रत्याख्यानलघुर्मित्रावसुः पुनरपि मन्त्रयते ?
( ६१ )
नायक — मित्रावसु ! आप लोगों के साथ ऐसा प्रशंसनीय सम्बन्ध कौन
नहीं चाहेगा ? परन्तु कहीं और लगे हुए मन को अन्यत्र नहीं
लगाया जा सकता । अतः मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता ।
नायिका— (मूर्च्छित हो जाती है)
चेटी—धीरज धरो, राजकुमारी, धीरज धरो ।
विदूषक—अजी, यह पराधीन है। इस से प्रार्थना करने से क्या लाभ ?
अतः इसके माता पिता के पास जाकर प्रार्थना कीजिए ।
मित्रावसु–(मन ही मन) इसने ठीक कहा है । यह अपने माता पिता के
कहने का उल्लंघन नहीं करेगा । इस के पिता जी भी इसी
गौरी आश्रम में ही रहते हैं अतः जाकर इनके पिता से
मलयवती को स्वीकार करने को कहता हूँ ।
नायिका— (होश में आती है)
मित्रावसु—(प्रकट) इस प्रकार अपनी बात कहने पर हमें ‘न’ में उत्तर
देने वाले कुमार स्वयं अधिक जानते हैं ।
नायिका—(क्रोध के साथ, हँसकर) क्या अस्वीकृति से अपमानित
मित्रावसु फिर भी बातें कर रहा है ?
- इनकार से जो हलका अथवा तिरस्कृत हुआ है ।
( ६२ )
[मित्रावसुः निष्क्रान्तः]
नायिका—(सास्रमात्मानं पश्यन्ती, आत्मगतम् )
किं मम एदिणा दोब्भग्गकलङ्कमइलेण अच्चंतदुक्खभाइणा
किं ममैतेन दौर्भाग्यकलङ्कमलिनेन अत्यन्तदुःखभागिनाऽ
अज्जवि सरीरेण धारिदेण ? त इध ज्जेव असोअ-
द्यापि शरीरेण धारितेन ? तदिहैवाऽशोक-
पाअव्वे इमाए अदिमुत्तलदाए उव्वंधिअ अत्ताणं वावादिस्सं।
पादपेऽनयाऽतिमुक्तलतयोद्बध्यात्मानं व्यापायिष्यामि ।
ता एव्वं दाव। (प्रकाशं विलक्षस्मितेन) हज्जे ! पेक्ख
तदेवं तावत् । हञ्जे ! प्रेक्षस्व
दाव मित्तावसु दूरं गदो ण वेत्ति जेण अहम्पि इदो
तावत् , मित्रावसुर्दूरं गतो न वेति, येनाहमपि इतो
गमिस्सं ।
गमिष्यामि ।
चेटी—(कतिचित्पदानि गत्वा, अवलोक्यात्मगतम् )
अण्णारिसं से हिअअं पेक्खामि, ता ण गमिस्सं । २५
अन्यादृशमस्या हृदयं प्रेक्षे। तन्न गमिष्यामि।
ज्जेव ओवारिदा पेक्खामि किं एसा पडिवज्जदि त्ति ।
इहैवाऽपवारिता प्रेक्षे किमेषा प्रतिपद्यत इति।
[इति स्थिता]
नायिका-[दिशोऽवलोक्य पाशं गृहीत्वा सास्रम् ]
भअवदि गोरि ! इध तुए ण किदो पसादो,
भगवति गौरि ! इह त्वया न कृतः प्रसादः ;
( ६३ )
[ मित्रावसु का प्रस्थान ]
नायिका—(आंसुओं के साथ, अपने आप को देखती हुई मन ही मन):
दुर्भाग्य रूपी कलङ्क से मलिन, अत्यन्त दुःख के भागी इस
शरीर को धारण करने से अब क्या लाभ ? अतः इसी अशोक-
वृक्ष के नीचे इस अतिमुक्त लता से गले में फांसी डाल कर
मैं अपने आप को मार डालूंगी । तो ऐसा ही सहो । (प्रकट,
विचित्र हंसी के साथ) सखी, देखो तो मित्रावसु दूर चले गए
कि नहीं, जिससे मै भी यहाँ से चलूँ ।
चेटी—(कुछ कदम चलकर, देखकर, मन ही मन) इस का मन कुछ
और प्रकार का देख रही हूँ । अतः मैं नहीं जाऊँगी । यहीं
छिपकर देखूँ यह क्या करती है । (यह कह कर ठहर जाती
है)
नायिका- (चारों ओर देखकर, फन्दा लेकर, आंसुओं के साथ)
हे भगवती गौरी ? यहां (इस जन्म में) तो आप ने कृपा नहीं
- उद्बध्य = फांसी लेकर ।
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'ता जम्मन्तरे जहा ण ईरिसी दुक्खभाइणी होमि, तथा करेसि
तज्जन्मान्तरे यथा नेदृशी दुःखभागिनी भवामि तथा करिष्यसि।
(कण्ठेपाश मपर्यति)
चेटी — (दृष्ट्वा ससम्भ्रममुपेत्य) पलित्ताअदु पलित्ताअदु
परित्रायतां परित्रायताम् ।
एसा भट्टिदारिआ उव्वन्धित्र अत्ताणं वावादेदि ।
एषा भर्तृदारिकोद्वध्य आत्मानं व्यापादयति ।
नायकः — (ससम्भ्रममुपसृत्य) क्वासौ ? क्वासौ ?
चेटी — अअं असोअपादवे ।
इयमशोकपादपे ।
नायकः — (सहर्षमवलोक्य) कथं सैवेयमस्मन्मनोरथभूमिः¹ ?
(नायिकां पाणौ गृहीत्वा लतापाशमाक्षिपन्)—
न खलु न खलु मुग्धे² ! साहसं कार्यमीदृक्
व्यपनय करमेतं पल्लवाभं लतायाः ।
कुसुममपि विचेतुं यो न मन्ये समर्थः
कलयति³ स कथं ते पाशमुद्वन्धनाय ॥ ११ ॥
नायिका — (ससाध्वसम्)हज्जे ! को उण एसो ?
हञ्जे ! कः पुनरेषः ?
श्लोक नं०: ११, अन्वयः—
मुग्धे ! न खलु न खलु ईदृक् साहसं कार्य्यम् ।
पल्लवाभम् एतं करं लतायाः व्यपनय । मन्ये,
य ते (करः) कुसुमम् अपि विचेतुं न समर्थः
स उद्वन्धनाय पाशं कथं कलयति ?