मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
मतभेद १७
हुआ, जब कि भोजराज के सौतेले छोटे भाई राज्याधिकारी बने।
उपर्युक्त पद के आधार पर मीराँ का संघर्ष भोजराज की जीवित-
अवस्था मे ही प्रारम्भ हो जाता है और वह भी कृष्ण की आराधना
हेतु नही अपितु इसलिये कि “नितप्रति उठि नीच घर जाओ” और
“नाचो दे दे तारी”।
अन्तिम पंक्ति मे वर्णित यह “सदगुरू” भी अब तक एक रहस्य
ही बने हुए है। सम्भव है कि “सदगुरू” कौन थे, यह जान लेने पर मीराँ
के जीवन वृतान्त पर गहरा प्रकाश पड सकेगा।
१७
नहि भावै थारो देसडलो रग रूडो¹।
थारे देसा मे राणा साध नही छै, लोग बसै सब कूड़ो।
गहना गाठी राणा हम सब त्याग्या, त्याग्या कर रो चूड़ो।
काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्या बाधन जूड़ो।
मेवा मिसरी मै सब त्याग्या, त्याग्या छै सक्कर बुरो।
तन की आस कबहु नहि कीनी, ज्यूँ रण माही सूरो।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो मै पूरो ॥१७॥
पाठान्तर १,
नहि भावै थारो देसड़लो जी रूडो रूडो।
हरि की भगति करै नही कोई, लोग बसै सब कूडो।
पाटी माग उतारि धरूंगी, न पहिरू कर चूड़ो।
मीराँ हठीली कह सतन सो, वर पायो छै पूरो।
पाठान्तर २,
राणा जी थारो देसडलो रग रूडो।
थारे मुलक मे भक्ति नहि छै, लोग बसे सब कूड़े।
१ रंगो से भरा सजा हुआ सुन्दर।
२
१८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाट पटम्बर सब ही मै त्यागा, तज दियो कर रो चूडो ।
मेवा मिसरी मै सब ही त्यागा, त्यागा छै सक्कर बुरो ।
तन की मै आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो छै पूरो ।
पाठान्तर ३,
राणा जी थारो देस्ड़लो छै रग रूड़ो ।
राम नाम की भक्ति न भावै, लोग बसै सब कूड़ो ।
मेवा मिठाई मीरा सब ही त्यागे, त्याग्यो छै सान और बुरो ।
गहणो तो गाठो मीरा सब ही त्याग्यो, त्याग्यो छै बैया रो चूड़ो ।
साल दुसाला मीरा सब सोई त्याग्या, सिर पर बांध्यो छै जूडो ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बर पायो छै मीरा रूडो ।
पाठान्तर ४,
देसडलो रूड़ो रूडो, राणा जी थांरो देसडलो ।
भगत न भावै म्हारा राम की, लोग बसै सब छै कूड़ो ।
मेवा मिसरी सब ही त्याग्या, त्याग दियो छै बुरो ।
तन की आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो ।
भाई मात कुटुम्बी त्याग्यो, त्याग दियो छै चूडो ।
घूँघट को पटि दूर कियो, सरि बाध्यौ छै जूड़ो ।
यो ससार भव दुख को सागर, मै हाकीयौ दूरो ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, वर पायो छै पूरो ।
यह पाठ भटनागर जी द्वारा किसी दादू पथी सत के सग्रह से
प्राप्त हुआ ।
१८
राणौ जी मेवाडो म्हांरे दाय न आवै ।
गिरधर मो मर्न भाया भोलि माय ।
मतभेद १९
राणा जी म्हारू रूस रह्यो है,
कडा वचन सुनाय भोली माय।
गुरू कृपा सूं सत पधार्या,
सता स्याम मिलाय भोली माय।
बाधि घूघरा नृत्य करू म्हे,
हरि गुण गाय रिझावा भोली माय।
मीराँ के प्रभु आस पराई,
गिरिधर सेजाँ आया भोली माय ॥१८॥†
पद की प्रथम पंक्ति की अभिव्यक्ति पद स० १७ की अभिव्यक्ति
से मिलती है। परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति संर्वथा विभिन्न पडती है।
पदाभिव्यक्ति मे सगति का भी अभाव है। “भोली माय” जैसा
सम्बोधन पद की हर पंक्ति मे प्रयुक्त हुआ है जो विशेप विचारणीय है।
१९
अब नहि मानूँ राणा थारी, मै बर पायो गिरधारी।
मनि कपूर की एक गति है, कोऊ कहो हजारी।
ककर कचन एक गति है, गुंज मिरच इकसारि।
अनड घणी को सरणो लीनो, हाथ सुमिरंनी धारी।
जोग लियो जब क्या दलगीरी, गुरू पाया निज भारा।
साधू संगत मह दिल राजी, भइ कुटुम्ब सूं न्यारी।
क्रोड बार समझाओ मोकूँ, चालूँगी बुद्धि हमारी।
रतन जडित की टोपी सिर पै, हार कठ को भारा।
चरन घूघरू घमस पडत है, म्हे करा स्याम सूं यारी।
लाज सरम सब ही मै हारी, यौ तन चरण अधारी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, झक मारो संसारी ॥१९॥†
२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
अब नहि मानाला म्हे थारी,म्हाने बर मिलि गिरधारी ।
मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहू बार हजारी ।
ककर कचन एक गिणत है, गुज मिरच एक सारी ।
अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी ।
जोग लियो जब बाद तजी री, गुर पाया निज भारी ।
साध सगत मेरो मंन राजी, भई कुटूब सू न्यारी ।
क्रोड बार समझावों मोकू, चालूगी बुद्धि हमारी ।
म्हे राणा के परत¹ न रहस्या, कई बार कह कह हारी ।
सौ बातन की एक बात है, अब तो समझ गवारी ।
रतन जडित की टोपी सिर पर, हार कठ को भारी ।
चरण घूंघरा घमस पडत है, “म्हे” कराँ स्याम सू न्यारी ।
लाज सरम तो सभी गुमाई, यो तन चरणा धारी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।†
उपर्युक्त पद निम्नांकित अन्तर के साथ भी पाया जाता है ।
१ अतिभारी । २. जब बाद तजी री । ३ में भई स्याम की प्यारी ।
पाठान्तर २,
अब तो नही म्हैं थांरी म्हांने, वर मिलिया गिरधारी ।
मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहूं बार हजारी ।
ककर कंचन एक गिणत है, गुज मिरच इकंसारी ।
अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी ।
जोग लियो जब सब ही त्याग्यो, गुरु पाया निज भारी ।
साध संगत मेरो दिल राजी, भई कुटुंब सू न्यारी ।
कोटि बेर समझावो मोकूं, चालूगी बुद्धि हमारी ।
म्हैं राणा के परत न जावा, केईं बेर कह हारी ।
१ लौट कर ।
मतभेद २१
सुवरण राग एक ही गति है, अब तो समझ गवारी१ ।
रतन जटित की टोपी सिर पर, हीरा कठी धारी ।
पाय घूघरा घमस पडत है, करी स्याम सू यारी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।†
उपर्युक्त पद मे अभिव्यक्त भावनाएँ विशेष महत्वपूर्ण है ।
पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि पद की रचना गृह त्याग के बाद
ही हुई है। “जोग लियो कह हारी” जैसी अभिव्यक्ति के
आधार पर ऐसा सम्भव प्रतीत होता है कि इस पद की रचना शायद
मीराँ को लौटा लाने के प्रयास के अवसर पर हुई है। पद की नवी
पक्ति मे प्रयुक्त “गवारी” सम्बोधन किसके प्रति हुआ, यह भी कही
से स्पष्ट नही होता । पद विशेष विचारणीय है ।
२०
अरे राणा पहली क्यो न बरजी, लागी गिरधारिया से प्रीत ।
मार चाहे छाँड राणा, नहीं रहू मै बरजी ।
सगुना साहिब सुमरता रे, मै थारे कोठे खटकी ।
राणा जी भेज्या विष रा प्याला, कर चरणामृत गटकी ।
दीनबन्धु सांवरिया है रे, जाणत है घट घट की ।
म्हांरे हिरदा माहि बसी है, लटकन मोर मुकुट की ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मै छू नागर नटकी ॥२०॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है ।
२१
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी ।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मे चलूगी चाल अनूठी ।
साकली गली मे सतगुरु मिलिया, क्यूकर फिरू अपूठी ।
सदगुरु जी सू बाता करता, दुरजन लोगा ने दीठी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अँगीठी ॥२१॥
१ कहाँ
२२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
याहीं बदनामी मीठी हो, राणा जी, याही वदनामी मीठी।
रावली ड्योढया म्हाने सतगुरु मिलिया,किस बिध फिरूगी अपूठी।
सत सगति मे ग्यान सुणै छी, दुरजन लोगा मोहि दीठी।
यो मून मेरो हरि मे बसियो, जैसे रंग मजीठी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो ज्यूँ अगीठी।
पाठान्तरपुर २,
राणा जी म्हाने याही बदनामी मीठी ।
साकडली सेरयां जन मिलिया, क्यू कर फिरू अपूठी।
राम जी सू मे तो बात करै छी, दुरजन लोगा ने दीठी।
बुरा जी कहो नै कोई,भला जी कहो नै,नै आनो किस की बसीठी।
जन मीराँ के है निन्दक प्राणी, जल बलि होई अगीठी । †
पाठान्तर ३,
राणा जी मुझे यह बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मै चलूगी चाल अपूठी।
साकली गली मे सतगुरु मिलिया, क्यू कर फिरूं अपूठी।
सतगुरु जी सू बातज करता, दुरजन लोगा ने दीठी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अंगीठी।†
इस पाठ की प्रथम दो पक्तियों पर भाषा की दृष्टि से आधुनिक प्रभाव हे।
प्रभाव हे।
पाठान्तर ४,
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
थे तो राणा जी राजकवर छो, म्हे राठोडा री बेटी।
भलाई कहो म्हांने बुराई कहौ जी, नही माना रे किसी की।
मतभेद २३
साकडी गली मे म्हारा सतगुरु मिलिया, कैसे फिरूगी अपूठी।
खभ फाड मीराँ कने गरज्जा, दुरजन जलाये अगीठी । †
पाठान्तर ५,
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
थारो रमैयो मीरा म्हाने बतावो, नाहि तो भक्ति थारी झूठी ।
म्हारो रमैयो थारे घट मे बिराजे, थांरे हिये की क्यू फूटी ।
प्रेम सहित मै करूगी रसोई, म्हारे गिरधर के भोग लगाई । १
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, रग दियो रग मजीठी' । †
पद की तीसरी पक्ति की अभिव्यक्ति व भाषा शेष पद से सर्वथा
भिन्न पडती है। अन्य पाठान्तरो मे भी ऐसी अभिव्यक्ति नही
मिलती। अत इस पक्ति को तो निश्चित रूपेण प्रक्षिप्त कहा जा
सकता ह।
२२
माई । म्हॉरे साधॉ रो इक्तयार२ है।
साधु ही पीहर, साधु ही सासरो, साँवरिया भरतार ह।
जात पाँत कुल कुटुम्ब कबीला, साधू ही परवार है।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, रमस्याँ साधा री लार३ है ॥२२॥
१ मजीठी। यह रग राजस्थान मे विशेष रूप से बनाया जाता है।
कई विभिन्न वनस्पतियो का रस मिला कर उबाल दिया जाता है। इस खौलते
हुए रस मे ही कपडा भिगो देते हैं । कपडे का रग कुछ कालिमा लिए हुए लाल
हो जाता हैं। साथ ही, बनस्पतियो के कारण, कपडे मे कुछ हल्की सी सुगन्ध
भी हो जाती है। यह रग और सुगन्ध कपडे के चिथडे चिथड़े हो जाने के बाद
भी नही छूटता । अत 'रग दियो रग मजीठी' एक मुहावरा भी बन गया है।
जिस का अर्थ है कि कभी न छूटने वाला रग। २ जोर, दबाव, ३ पीछे।
२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
राणा जी ! अब न रहूगी तोरी हटकी ।
साध-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की ।
पीहर मेडता छोड़ा आपणा, सुरत निरत दोऊ चटकी ।
सतगुरु मुकुर दिखाया घट का, नाचूंगी दे दे चुटकी ।
हार सिगार सभी ल्यौ अपना, चूडी कर की पटकी ।
मेरा सुहाग अब मोकूँ दरसा, और न जाने घट की ।
महल किला राणा मोहि न चाहिये, सारी रेशम पट की ।
हुई दिवानी मीराँ डोलै, केस लटा सब छिटकी ॥२३॥
पाठान्तर १,
अंब न रहूगी अटकी, मन लाग्यो गिरधर से ।
माणक मोती परत न पहिरू, में तो कब की नटकी ।
गहणे म्हारे माला कंठी, और चनण की कुटकी ।
राजपणा की रीत गुमाई, साधा रे संग भटकी ।
जेठ भऊ की लाज न राखी, घूँघट परै जो पटकी ।
म्हाने गुरू मिलिया अविनासी, दई ज्ञान की गुटकी ।
नित प्रति उठि जाऊं गुरू दरसण, नाचूँ दै दे चुटकी ।
लागी चोट निज नाम धणी की, म्हांरे हिवड़े खटकी ।
परम गुरू के सरणै जाऊ, करू प्रणाम सिर लंटकी ।
साधा के सग करम लिखायो, हर सागर मे लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण से छुटकी । †
उपर्युक्त पाठ के प्राय. सभी क्रिया पद खड़ी बोली मे है ।
मतभेद २५
पाठान्तर २,
अब ना रहूगी स्याम अटकी, अजी म्हारो गिरधर से लाग्यौ
माणक मोती परत न पहिनूँ, मै तो नट गई कब की ।
गहणो म्हारे माला कठी, और चन्दन की कुटकी ।
राजापणा 'की रीति गुमाई, साधन के संग भटकी ।
जेठ भऊ की लाज न राखी , घूँघट परै जो पटकी ।
राज रीति मे करम लिखायो, हरि सागर मे लटकी ।
चोट लगी निज नाम हरि की, सो म्हारे हिवडे खटकी ।
प्रेम गुरा के चरण गहू, परणाम करू सिर लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी ।
उपर्युक्त दोनो पाठो मे “जेठ भऊ की लाज न राखी” अभिव्यक्ति
विशेष महत्व पूर्ण है । प्रथम पाठ मे “राणा” को सम्बोधित किया गया
है । यद्यपि अन्य पाठो से यह नही मालूम पडता कि पद किसी विशेष
व्यक्ति को सम्बोधित करके कहा गया है। क्या यह “राणा” मीराँ
के जेठ है ? जैसा कि उपर्युक्त दोनो पाठान्तरो से प्रतीत होता है। तब
मीराँ किस की स्त्री थी ? अद्यावधि मान्य इतिहासानुसार मीराँ के
पति भोजराज ही पाटवी के कुमार थे ।
पाठान्तर ३,
अब न रहूगी अटकी, म्हारो मन लाग्यो गिरधर से ।
म्हाने गुरु मिलिया अविनासी , दई ज्ञान की गुटकी ।
लगी चोट निज नाम धणी की, म्हारे हिवड़े खटकी ।
माणक मोती मे न पहिनूँ, मै तो कब न नटकी ।
गहना म्हारे दोवड़ो, और चनणां की कुटकी ।
राजकुल की लाज गमाई, साधा के सग भटकी ।
नित प्रति उठि जाऊ गुरू दरसन, नाचूँ दै दै चुटकी ।
परम गुरा के सरणे जाऊ, करू प्रणाम सिर लटकी ।
जेठ बहू की काण न माना, पडो घूँघट पर पटकी ।
२६ मीराँ-वृहद्-पद-सग्रह
करम लिखायो साध सगत मे, हर सागर मे लटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भव सागर से छटकी ।†
उपर्युक्त पाठ प्रथम पाठ के विशेष निकट पडता हे ।
पाठान्तर ४,
मेरो मन लाग्यो हरि जूं सूं, अब न रहूंगी अटकी ।
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी ।
चोट लगी निज नाम́ हरि की, म्हारे हिवडे खटकी ।
माणक मोती परत न पहिरू, मै कब की नटकी ।
गेणो तो म्हारे माला दोवडी, और चन्दन की कुटकी ।
राजकुल की लांज गमाई, साधा के सग भटकी ।
नित उठि हरि के मंदिर जास्या, नाचा दे दे चुटकी ।
भाग खुल्यो म्हारो साध संगत सूं, सांवरिया की बटकी ।
जेठ बहू की काण न मानूं, घूंघट पड गई पटकी ।
परम गुरा के सरण मै रहस्या, परणाम करा लुटकी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी ।†
पाठान्तर ५,
रूप देख अटकी, तेरो रूप देख अटकी ।
देह ते बिदेह भई, दुरि परि सिर मटकी ।
मात पिता भ्रात बधु, सब ही मिल हटकी ।
हिरदा ते टरत नाहि मूरति नागर नटकी ।
प्रगट भयो पूरन नेह लोक जानें भटकी ।
मीराँ प्रभु गिरिधर बिन, कौन लहे घटकी ।†
इस पाठ की चतुर्थ पक्ति के उत्तराद्ध "मूरति नागर नटकी'
'पाठ के बदले "सूरति वा नटकी" पाठ भी मिलता है ।
मतभेद २७
पाठान्तर ६,
माई ! मै तो गोविन्द सो अटकी ।
चकित भए मै दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी ।
शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला लटकी ।
मोर मुकुट कटि किकनि राजे, दुति दामिनी पटकी ।
रमित भई हो सावरे के सग, लोग कहै भटकी ।
छुटि लाज कानि लोग, डर रह्यो न घर हटकी ।
बिना गोपाल लाल बिन सजनी, को जाने घटकी ।
मीराँ प्रभु के सग फिरेगी, कुज कुज भटकी ।†
पाठान्तर ५ और ६ की भाषा स्पष्ट रूपेण ब्रज भाषा है। भाषा
के इस अतर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति मे भी कितना गहरा
अन्तर आ गया है। यह पहलू अत्यन्त विचारणीय ह। खडी बोली
से प्रभावित राजस्थानी भाषा मे प्राप्त सम्पूर्ण पाठो से सतमत का प्रभाव
स्पष्ट हो उठता है, जब कि ब्रजभाषा के पदो से वैष्णव प्रभाव ही
स्पष्ट होता है।
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
बरजी मै काहू की नाहि रहू ।
सुनो री सखी तुम सो, या मन की साची बात कहू ।
साधु सगति करि हरि सुख लेऊ, जगतै हौ दूरि रहू ।
तन मन धन मेरो सब ही जावो, भल मेरो सीस लहू ।
मन मम लाग्यो सुमरन सेती, सब का मै बोल सहू ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सद्गुरू शरण गहू । ॥२४॥
उपर्युक्त पाठ की प्रथम पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाए
जाता है —
सुनो री सखी तुम चेतंन होइ के, मन की बात कहू ।
२८ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
२
बरजी नाही रहूगी, म्हारो स्याम सुंदर भरतार।
इक बार बरजी, दोय बार बरजी, बरजी सो सो बार।
सासू बरजी ननदी बरजी, राणो जी दावदार।
मीराँ के प्रभु अविनासी, पूरण ब्रह्म अपार। ॥२५॥
पद की तीसरी पंक्ति का उत्तरार्द्ध विचारणीय है। "राणो जी
'दावदारा'' संकेत किस ओर है ? राणा पद के दावेदार कुंवर पाटवी
या दबदबेदार "रोबीले व्यक्तित्व वाले" राणा स्वयं, दोनो ही तरफ
इसको घटाया जा सकता है। इतिहास और मान्यताएं भी दुविधा-
जनक ही हैं। अतः उस आधार पर भी निर्णय नहीं किया जा
सकता।
३
काहू की मै बरजी नाही रहू।
जौ कोई मोकूँ एक कहै, मै एक की लाख कहू।
सास की जाइ मेरी ननद हठीली, यह दुख किन से कहू।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जग उपाहस सहू ॥२६॥†
पदाभिव्यक्ति में असंगति है। साथ ही मीराँ जैसी भक्तिमती
नारी द्वारा ऐसी छोटी वृत्तियों का वर्णन, वह भी गृह त्याग के बाद
असम्भव ही प्रतीत होता है। पद की शुद्ध ब्रजभाषा को देखते हुए
ऐसा ही प्रतीत होता है कि वृन्दावन पहुंचने पर ही ऐसे पदों की रचना
हुई होगी।
पाठान्तर १,
मेरो मन लाग्यो सखी सांवरिया सो,
काहू की बरजी नाहि रहोंगी।
जो कोऊ मोको एक कहेगो,
एक कीं लाख कहोंगी।
मतभेद २९
सासु बुरी है, ननद हठीली,
यह दुख कोह बहोगी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर के कारण,
जग उपाह़ास सहोगी।†
इस पाठ की भाषा भी अशुद्ध है। “सहोगी, बह्रोगी” आदि न
तो राजस्थानी मे ही होता है और न ब्रजभाषा मे ही। खडी बोली
मे भी “सहूंगी” आदि होगा। अस्तु, ऐसे पद और उसके गेय रूपान्तरो
को प्रक्षिप्त कहा जा सकता है।
लगभग एक ही भाव को व्यक्त करने वाले इन पदो पर विभिन्न
भाषाओ का प्रभाव विचारणीय है। भाषा के अन्तर के साथ ही साथ
भावाभिव्यक्ति मे भी अन्तर पड गया है। बहुत सम्भव है कि इसी
तरह से मीराँ के अन्य पदो मे भी भाषा परिवर्त्तन के साथ ही साथ
भाव परिवर्तन भी हुआ हो। यह एक अत्यन्त गम्भीर विचारणीय
प्रश्न है।
४
नैना लोभी रे बहुरि सके नहि आय।
रोम रोम नख शिख सब निरखत, ललकि रहे ललचाय।
मै ठाढ़ी गृह आपने री, मोहन निकले आय।
बदन चन्द परकासत हेली, मन्द मन्द मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजही, मानत पर हाथ गए बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मै सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरिधरन लाल बिनु, पल भर रह्यो न जाय॥ २७॥†
पद की अन्तिम पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाया जाता है।
“मीराँ के प्रभु गिरिधर के बिनि, पल भर रह्यो न जाय।”
कही कही पद की तीसरी पंक्ति “मै ठाढी . ललचाय” के
बाद निम्नांकित एक पंक्ति और भी मिलती है।
३० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
“सरँग ओट तजे कुल अंकुस, बदन दिये मुसकाय ।”
उपर्युक्त पद मे आए ‘गिरिधरन लाल’ का प्रयोग विशेष
विचारणीय हे ।
५
नयन लागे तब घूँघट कैसो, लोक लाज तिनका ज्यूँ तोर्यो ।
नेकी बदी हूं सिर पर धारी, मन हाथी आंकुस दे मार्यो ।
प्रगट निसान बजाय चली, राणा राव सकल जग छोऱ्यो ।
मीराँ सबल धणी के सरणे, का भयो भूपति मुख मोर्यो ।।२८।।
पद की तृतीय पंक्ति विशेष महत्वपूर्ण ह। मीरा सिर्फ राणा
परिवार “श्वसुर कुल” का ही परित्याग नही कर रही हे, अपितु “राव
परिवार” “पितृ कुल” का भी त्याग कर रही हे। ऐसी ही अभिव्यक्ति
सघर्ष द्योतक एक और पद मै भी हे, जिसका प्रारम्भ होता हे “अब
नाहि बिसरू म्हारे हिरदे लिख्यो हरि नाम। ” सदेश वाहक द्वारा
लौट जाने का आग्रह किए जाने पर मीराँ का उत्तर है, “कर सूरापण¹
नीसरी, म्हारे कुण राणे कुण राव ।” इन दोनो ही पदो मे प्रयुक्त यह
“राव” शब्द विशेष विचारणीय है ।
इसी पंक्ति के पूर्वार्द्ध से व्यक्त होने वाली भावना “प्रगट निसान
बजाय चली” भी विरोधाभिव्यक्ति के राजस्थानी पद स० ५ म मिलती
हैं। माता के प्रति मीराँ का कथन “देर नगारो² मीराँ चढ़ गयी, माता
हियो मत हारी जी” यद्यपि मीराँ की दृढ भक्ति भावना अन्य पदों से भी
व्यक्त होती है, तथापि इस तरह की भावना अन्य पदों म नही मिलती ।
१ भीष्म प्रतिज्ञा, २ ताल ठोककर ।
वियोगाभिव्यक्ति
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
छोड मत जाज्यो जी महाराज,
मै अबला बल नाहि गुसांई, तुम ही मेरे सिरताज ।
मै गुणहीन गुण नाहि गुसाँई, तुम समरथ महाराज ।
थॉरी होइ के किणरे¹ जाऊँ, तुम ही हिवडा² री साज³
मीराँ के प्रभु और न कोई, राखो अब के लाज । ॥२९॥
२
प्रभु जी थे कहाँ गया नेहडी लगाय,
छोड गया बिस्वास सघाती,⁴ प्रेम की बाती⁵ बराय⁶ ।
बिरह समद⁷ मे छोड गया हो, नेह की नाव चलाय ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय । ॥३०॥
पाठान्तर १,
पिया ते कहाँ गयो नेहरा लगाय ।
छाँडि गयो अब कहाँ बिसोसी, प्रेम की बाती बराय ।
बिरह समुद्र मे छाडि गयो पिव, नेह की नाव चलाय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम बिनि रह्यो न जाय ।
१ कहाँ, २ हृदय का, ३ शृंगार ४ विश्वासघात करके, ५ दीप,
६ जलाकर, ७ समुद्र।
३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
३
हो जी हरि कित गये नेह लगाय ।
नेह लगाय मेरो मन हर लियो, रस भरि टेर सुनाय ।
मेरे मन मे ऐसी आवै, म॒रुँ जहर विप खाय ।
छाँड़ि गयो विश्वासघात करि, नेह केरि नाव चलाय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रहै मधुपुरी छाय ॥३१॥
पाठान्तर १,
कितहूँ गये नेह लगायै ।
प्रीति लगाई मेरी मन हर लीनो, रस भरि टेर सुनाई ।
हम से बैर प्रीति कुब्जा से, हमै न कहूँ सुहाई ।
मेरे तो मन मे ऐसी आवे, मरुँगी जहर विष खाई ।
हमकूं छाँडि गये विस्वासी, बिरह की नाव चढाई ।
मीराँ के प्रभु हरि'अबिनासी, रहे मधुपुरी छाई ।
उपर्युक्त तीनो पदों का गहरा साम्य विशेष विचारणीय है
इस पद व इसके पाठान्तर पर ब्रज भाषा का प्रभाव सुस्पष्ट है।
भाषा के इस अन्तर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति पर भी पौराणिक
गाथाओ का प्रभाव विचारणीय है।
उपर्युक्त पद और उसके सभी पाठान्तरो मे विश्वासघात करने
की भावना बहुत ही स्पष्ट हो उठती है, यह एक विचारणीय पहलू है।
४
जावो हरि निरमोहिडा, जाणी थॉरी प्रीत ।
लगन लगी जब प्रीत और ही, अब कुछ अँवली १ रीत ।
अमृत प्याय के विष क्यूँ दीजै, कूण गाँव की रीत ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, आप गरज के मीत ॥३२॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है।
१ उलटी ।
वियोगाभिव्यक्ति ३३
५
थाँने काँई काँई १ कह समझावूँ, म्हाँरा बाल्हा गिरधारी ।
पूरब जनम की प्रीति हमारी, अब नही जात निवारी २ ।
सुन्दर बदन जोवते सजनी, प्रीत भई छै भारी ।
म्हाँरे घर पधारो गिरधारी, मगल गावै नारी ।
मोती चोक पुराऊँ बाल्हा ३, तन मन तो पर वारी ।
म्हाँरा सगपण ४ तोसूँ साँवलिया, जुग सो नही बिचारी ।
मीराँ कहै गोपिन को बाल्हो, हमसूँ भयो ब्रह्मचारी ।
चरन सरन है दासी तुम्हारी, पलक न कीजै न्यारी । ॥३३॥
पद मे व्यक्त की गयी भावना विशेष ध्यान देने योग्य है। इस भाव
को प्रदर्शित करने वाला यह पद अपनी तरह का एक ही है। मीराँ के
पदो मे प्राय प्राप्त टेक परम्परा (मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर) भी
इसमे नही है।
सम्पूर्ण पद की राजस्थानी भाषा को देखत हुए अन्तिम पक्ति
मे प्रयुक्त "तुम्हारी" शब्द के बदले "थॉरी" शब्द का होना अधिक
युक्ति युक्त प्रतीत होता है।
६
गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल ।
गिरिधर म्हाँरे मै गिरिधर की, कहो तो बजाऊँ ढोल ।
आप तो जाय विदेसाँ छाये, हमको पड गयो झोल ५ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम के कोल ६ । ॥३४॥
पाठान्तर १,
गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल ७ ।
दुनियों क्यो दे बोल, ये करमन के भोग ।
१ क्या-क्या, २ हटाई, ३ बालम, ४. ब्याह द्वारा हुए सबध
५ अनिश्चित परिस्थिति, ६ बचन, ७ ताने ।
३
३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
आप तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ लिख दिया जोग ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम का कोल ।
इस पाठ पर ब्रज भाषा का प्रभाव स्पष्ट है ।
पाठान्तर २,
गिरिधर, दुनियाँ दे छै बोल ।
गिरिधर मेरा मै गिरिधर की, कहो तो बजाऊ ढोल ।
आप तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ लिख दियो जोग ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पिछले जनम का कोल ।
उपर्युक्त तीनो पदो पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि
इन प्रथम दोनो पाठो का सम्मिश्रण ही इस पाठ विशेष का आधार है ।
७
अपने करम को छै दोस, काकूँ दीजै उधो ।
सुणियो मेरी भैण¹ पडोसण, गैले² चालत लागी चोट ।
पहली मै ग्यान मान नही कीनो, मै ममता की बाँधी पोट ।
मे जाणूं हरि नाहि तजैंगे, करम लिख्यो भलि पोच ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, परो निवारोनी सोच ॥३५॥†
पद की द्वितीय पक्ति मे प्रयुक्त "भैण" शब्द के बदले "बग्गड'
शब्द का ही प्रयोग मिलता है ।
पदाभिव्यक्ति से पश्चाताप ही प्रकट होता है । इस भावना का
द्योतक पद यही एक है ।
पाठान्तर १,
अपणां करम ही का खोट, दोष काँई दीजै री आली ।
सुणजो री मेरी सग की सहेली, बाट चलत लागी चोट ।
१ बहन, २ रास्ता।
वियोगाभिव्यक्ति ३५
मै ताँ सूं बूझूँ कोई न बतावे, सब ही बटाऊँ लोग।
अपणाँ दरद कूँ सब कोई जाणै, पर दुख को नाहि कोई।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, बची चरण की ओट।
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है।†
पाठान्तर २,
सबी आपणाँ स्याम षोटा, दोष नही कुबज्या मे।
आपन हाथि लिख न भेजे, काँई कागद का टोटा।
खारी बेल के कडा फल लागा, कहा छोटा कहा मोटा।
कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्दजी का ढोटा।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरँणाँ का वोटा।†
भाषा पर ब्रज का और भाव पर पौराणिक गाथाओ का प्रभाव है।
पाठान्तर ३,
कछु दोष नही कुबज्या ने, बिरी अपना स्याम खोटा।
आप न आवे, पतिया न भेजे, कागज का काँई टोटा।
नौ लख धेनु नन्द घर दूधे, माखन का नाई टोटा।
आपही जाय द्वारिका छाये, ले समुँदर की ओट।
कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्द जी का ढोटा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कुबज्या बड़ी हरि छोटा।†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का अभाव है। कुछ पक्तियो,
(पक्ति स० २ और ४) के आधारपर इस पाठ को पाठ स० २ का ही
विस्तृत रूप कहा जा सकता है।
इस पाठ की अन्तिम पक्ति है, "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर"।
परन्तु प्रथम तीनो पाठ की अन्तिम पक्ति है "मीराँ के प्रभु हरि अविनासी"
यह भी एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू है।
३६ मीराँ-बृहद-पद-संग्रह
८
निरमोहिडा नेह न जोडे छै।
यो मन कह्यो न माने, अमृत मे बिष घोरे छै,
आप'तो जाय द्वारिका छाये, हम कूँ बिरहा झोरे१ छै।
कुबज्या दासी कंसराई की, सरब२ सुख लोरे छै।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, लागी प्रीत क्यूँ तोडे छै। ॥३६॥
९
माई, मेरा पिया बिन अलूणो३ देस।
राग रग सिणगार४ न भावै, खुलि रहे सिर के केस।
सावण आयो साहिब दूरे, जाइ रहे परदेस।
सेज५ अलूणी भवन अकेली, रैण भयकर भेस।
आव सलूणे प्रीतम प्यारे, बीते जोबन बेस६।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तन मन करूँ सब पेस७। ॥३७॥
१०
नातो हरि नाँव को माई, मोसूँ तनक न बिसर्यो जाई।
पाना८ ज्यूँ पीली भई, लोग कहै पिड रोग।
छाने९ लांघण१० मै किया जी, राम मिलण के जोग११।
बाबल१२ बैद बुलाइया, पकडि दिखाई (म्हाँरी) बाहि।
मूरखि वेद न जानहि, (म्हाँरे) करक कलेजा माँहि।
वैद जावो घर आपणै, (म्हाँरो) नाव न लेई।
मै तो दाधी१४ हरि नांव की, मोहि काहे को दुष देई।
१ झकझोरना, २ सर्व, ३ नमक बिना, भावार्थ, रसहीन,
४ शृंगार, ५ सेज, ६ वयस, ७ समर्पण, ८ पत्ते, ६ छिपा कर,
-१० उपवास, ११ हेतु। १२ बाबुल; पिता, १३ नाम, १४ जली हुई,