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सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
३
हो जी हरि कित गये नेह लगाय ।
नेह लगाय मेरो मन हर लियो, रस भरि टेर सुनाय ।
मेरे मन मे ऐसी आवै, म॒रुँ जहर विप खाय ।
छाँड़ि गयो विश्वासघात करि, नेह केरि नाव चलाय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रहै मधुपुरी छाय ॥३१॥
पाठान्तर १,
कितहूँ गये नेह लगायै ।
प्रीति लगाई मेरी मन हर लीनो, रस भरि टेर सुनाई ।
हम से बैर प्रीति कुब्जा से, हमै न कहूँ सुहाई ।
मेरे तो मन मे ऐसी आवे, मरुँगी जहर विष खाई ।
हमकूं छाँडि गये विस्वासी, बिरह की नाव चढाई ।
मीराँ के प्रभु हरि'अबिनासी, रहे मधुपुरी छाई ।
उपर्युक्त तीनो पदों का गहरा साम्य विशेष विचारणीय है
इस पद व इसके पाठान्तर पर ब्रज भाषा का प्रभाव सुस्पष्ट है।
भाषा के इस अन्तर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति पर भी पौराणिक
गाथाओ का प्रभाव विचारणीय है।
उपर्युक्त पद और उसके सभी पाठान्तरो मे विश्वासघात करने
की भावना बहुत ही स्पष्ट हो उठती है, यह एक विचारणीय पहलू है।
४
जावो हरि निरमोहिडा, जाणी थॉरी प्रीत ।
लगन लगी जब प्रीत और ही, अब कुछ अँवली १ रीत ।
अमृत प्याय के विष क्यूँ दीजै, कूण गाँव की रीत ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, आप गरज के मीत ॥३२॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है।
१ उलटी ।