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सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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वियोगाभिव्यक्ति ३५
मै ताँ सूं बूझूँ कोई न बतावे, सब ही बटाऊँ लोग।
अपणाँ दरद कूँ सब कोई जाणै, पर दुख को नाहि कोई।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, बची चरण की ओट।
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है।†
पाठान्तर २,
सबी आपणाँ स्याम षोटा, दोष नही कुबज्या मे।
आपन हाथि लिख न भेजे, काँई कागद का टोटा।
खारी बेल के कडा फल लागा, कहा छोटा कहा मोटा।
कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्दजी का ढोटा।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरँणाँ का वोटा।†
भाषा पर ब्रज का और भाव पर पौराणिक गाथाओ का प्रभाव है।
पाठान्तर ३,
कछु दोष नही कुबज्या ने, बिरी अपना स्याम खोटा।
आप न आवे, पतिया न भेजे, कागज का काँई टोटा।
नौ लख धेनु नन्द घर दूधे, माखन का नाई टोटा।
आपही जाय द्वारिका छाये, ले समुँदर की ओट।
कुबज्या दासी कसराय की, वे नन्द जी का ढोटा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कुबज्या बड़ी हरि छोटा।†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का अभाव है। कुछ पक्तियो,
(पक्ति स० २ और ४) के आधारपर इस पाठ को पाठ स० २ का ही
विस्तृत रूप कहा जा सकता है।
इस पाठ की अन्तिम पक्ति है, "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर"।
परन्तु प्रथम तीनो पाठ की अन्तिम पक्ति है "मीराँ के प्रभु हरि अविनासी"
यह भी एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू है।