केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
पद-भाष्य
कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये—
अनुभूतिका उल्लेख
नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥
मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और
न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ
और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता-
विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥
पद-भाष्य
न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ—
| ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको
मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी
| मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब
विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं
| हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता
| है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात
नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद
| च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं
चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये ।
वाक्य-भाष्य
परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय
| समान ही है—यह दिखलानेके लिये
प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित
| किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा
तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'—
| ऐसा कहकर वह उसका हेतु
मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।
- यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता'
सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ'
इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे
कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता
मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं
सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और
तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है
इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो
वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि
त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे
वाक्य-भाष्य
अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात
नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा
परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे
सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये
स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
पद-भाष्य
नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय
र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी
प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं ।
एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित
मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे
'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी
दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए
सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति
बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य
| विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म-
दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते
| हुए गर्जने लगा । किस प्रकार
वाक्य-भाष्य
यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा
स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा-
प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके
| विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह
मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं।
यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं
| जानता-ऐसा भी नहीं मानता
मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध
| किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस
ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी
| अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि
मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?'
| शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च'
| शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात्
चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य
कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं—
नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें
तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको
स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस
| ब्रह्मको जानता है।'
किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ?
| ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता
नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी
| नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात
यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य
अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है'
| इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु-
वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे
वाक्य-भाष्य
विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित
| और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है।
तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता
इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है।
अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह
| अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म-
ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता'
| —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता
चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई
| विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान
विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही
स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये
वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
पद-भाष्य
संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी
नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् | बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने
आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि- | और मन्दबुद्धियोंकी बुद्धिकी पहुँचसे
ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च | बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे
गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- | 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है
द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ | जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा
| होनेपर ही 'हममेंसे जो इस [वाक्यके
| मर्म ] को जानता है वही जानता
| है' यह गर्जना उचित हो सकती
| है ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- | 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम
निरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानु- | उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके
वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स | कारण इससे अन्य पक्षोंका निषेध
एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्य- | करनेके लिये है । हममेंसे जो
ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं | उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित-
वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता
वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- | है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा
वसीयत इत्युच्यते । उक्तार्थानुवा- | मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने-
दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही
वेद चेति ॥ २ ॥ | जाननेवाला है । 'वेद च' इस पदसे
| अन्य पक्षवालेमें ब्रह्मवित्त्वका निरास
| किया जाता है । किस कारण यह
| निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते
| हैं । ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद
| करनेके कारण; क्योंकि यहाँ 'नो न
| वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका
| ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य | अब शिष्य और आचार्यके
स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- | संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त
निर्वृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- | संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको
मतमित्यादिना- | ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही
रूपसे बतलाती है—
ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥
ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है
वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालोंका बिना जाना हुआ
है और न जाननेवालोंका जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओंके समान
दृश्य न होनेसे वह विषयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
यस्य ब्रह्मविदः अमतम् | जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत—
अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति | अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि
मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य | ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी
मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः। | अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक
यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं | मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा
इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे
ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो
वाक्य-भाष्य
यस्यामतम् इति श्रौतम् | 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन
आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् । | इस आख्यायिकाका उपसंहार करनेके
शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया | लिये है। शिष्य और आचार्यकी
अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- | उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है
कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान
आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
पद-भाष्य
मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह
| जानता ही नहीं—उसे ब्रह्मका
सः-न ब्रह्म विजानाति सः । | ज्ञान नहीं है ।
विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ | अत्र 'अविज्ञातं विजानताम्'
| ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्-
अवधारयति—अविज्ञातं विजान- | के उपर्युक्त पक्षोंका अवधारण
| ( निश्चय ) करते हैं—जाननेवालों
तामिति, अविज्ञातम् अमतम् | अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों-
| को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत
अविदितमेव ब्रह्म विजानतां | यानी अविदित ( अज्ञेय ) ही है;
सम्यग्विदितवतामित्येतत् । |
वाक्य-भाष्य
वचनेनागमप्रधानेन निगमन- | वह सबका उपसंहार करनेवाले इस
| शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे संक्षेपमें कहा
स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोंका
| अविषय होनेके कारण जाने हुए
विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- | पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा
| अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी
त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही
पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । | जानना चाहिये ।
कस्मात् ? यस्यामतं यस्य | किस कारणसे ? [ सो बतलाते
विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य | हैं—] जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त
| हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात—
अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय-
इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- | रूप फलमें पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप-
बोधतया विविदिषा निवृत्ता | से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी
इत्यभिप्रायः, तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित—ज्ञात है।
विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और
ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि, आदिमें आत्मभाव करनेवाले
| असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म
मनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; | विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।*
वाक्य-भाष्य
आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः। स | अविषयरूपसे आत्मभावसे जाना है
सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है। जिसे विज्ञानकी
| प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म-
रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् | भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण
सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही
| सम्यग्दर्शी है। इससे विपरीत समझने-
मिथ्याज्ञानो भवति । कथम् ? मतं | वाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे ?
| [सो कहते हैं—] जिसका ऐसा
विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य | विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात
विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत
| विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि
विज्ञानो विदितान्यत्वाद्वह्मणो | ब्रह्म विदितेसे भिन्न है; इसलिये वह
न वेद स न विजानाति । | ब्रह्मको नहीं जानता—नहीं समझता ।
ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा- | इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका
नस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म-
तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है ।
कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नहीं; कपिल और कणाद
ब्रह्मविषयत्पादनवस्थिततर्कजन्य- | आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक,
त्वाद्द्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्या- | अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी
त्वमिति। स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही
बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | हैं। “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा
- इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि 'जिन्हें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है
वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं ।
और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके
साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है' ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
पद-भाष्य
न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न
नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी
अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो
| 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी
इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो
दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि
| उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं
पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके
| पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि
वाक्य-भाष्य
कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे
प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के-
स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस
इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और
र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम-
मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे
वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि
मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ
क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात
ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये
| 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे
अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही
अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है ।
तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म-
विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय
| न होनेसे अविज्ञात—अविदित है,
| इसलिये वही ज्ञान है । और जो
| अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- | आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे
पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- | 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी
ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते— | उचित ही है । अतः यहाँ 'विज्ञात-
विज्ञातमविजानतामिति । अथवा | मविजानताम्' इस वाक्यद्वारा
हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- | असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख
मित्यादिः ॥३॥ | किया गया है । अथवा 'अविज्ञातं
| विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका
| उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमें है ॥३॥
वाक्य-भाष्य
˙ ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात और अज्ञात पदार्थोंसे रहित,
व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- | अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप,
स्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- | आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,
रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् | अभय और अनन्यरूप होनेके कारण
अविजानतां बुद्ध्यादिविषया- | ब्रह्म किसी इन्द्रियका विषय नहीं है—
त्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । | उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त
तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे ही
धर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन | प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि-
सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । | के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है। अतः
शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- | विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त
ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥ | आदि धर्मोंके आरोपसे [ उनका जाना
| हुआ ब्रह्म ] कार्य-कारणभाव रहनेसे
| सविकल्प ही है क्योंकि वह अयथार्थ-
| विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति
| आदिमें आरोपित रजत आदि ज्ञानोंके
| समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥
* हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियोंको इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
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पद-भाष्य
'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात
इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार
एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है
विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें
ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके
परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है'
सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है ।
| फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे
| जाना जाता है—यही बात
| बतलानेके लिये कहते हैं—
विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया
है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व-
की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो
अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो
प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता
प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे
| होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का
| कथन हुआ है । अतः समस्त
वाक्य-भाष्य
प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है,
वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी
द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती हैं
बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय
जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों-
दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र
प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा
सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमें ही लक्षित
लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान
विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग
नहीं है ।
अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको
प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीस्वरूपसे
ब्रह्मणोऽभेद- तदा तन्मतं तत्- जाना जाता है उसी समय
'प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही
सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण
सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोंका साक्षी होनेपर ही
वाक्य-भाष्य
बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- बोधके प्रति ) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण
व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः प्रतीतियोंमें [ ब्रह्मकी ] व्याप्ति सूचित
करनेके लिये है । बुद्धिजनित सम्पूर्ण
तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानस्वरूपात्म- प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य
विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके
व्याप्तत्वाद् विज्ञानस्वरूपावभासाः, कारण उस विज्ञानस्वरूपसे ही
अवभासित हैं तथा उनसे पृथक् उनका
तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [ लोहपिण्डमें व्याप्त
हुए ] अग्निके समान उनसे सर्वथा
लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है । अतः वे
ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमें
द्वारस्वरूप हैं । इसलिये प्रत्येक बौद्ध
तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमें जो प्रत्यगात्म-
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
पद-भाष्य
पायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व,
विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- | नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व,
शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं | निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोंमें [ अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता
भवेत् ; लक्षणभेदाभावाद्द्योम्न | है, जिस प्रकार कि लक्षणोंमें भेद न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि-
इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- | में आकाशका अभेद है। इस प्रकार
विदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागम- | 'ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोंहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके
वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो | अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है। इसके
भवति । “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता | सिवा “वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवणका श्रोता है, मतिका मनन करने-
मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता” इति | वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है।
हि श्रुत्यन्तरम् । | [ उससे भी यही सिद्ध होता है ]।
वाक्य-भाष्य
तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वही ब्रह्म है,
ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- | वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञानके सहित प्रत्यगात्माका
त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । | ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है।
आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष- | ‘प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा’
दिति च काठके । | ऐसा कठोपनिषद्में कहा है। ‘अमृतत्वं
(आत्मज्ञानं अमृतत्व-निमित्तम्) 'अमृतत्वं हि विन्दते' | हि विन्दते’ (आत्मज्ञानसे अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य
इति हेतुवचनम्;विपर्यये | है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञानसे
मृत्युप्राप्तेः । विषया- | मृत्युकी प्राप्ति होती है। बुद्धि आदि
त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत | विषयोंमें आत्मत्व बोध होनेसे ही
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोध- | जिस प्रकार, जो वृक्षकी
क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- | शाखाओंको चलायमान करता है
| उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार—
तीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति- | जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्'
| इसका ऐसा अर्थ किया जाता है
बोधविदितमिति व्याख्यायते, | कि आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है;
| अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके
यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स | कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप-
| से विदित होनेके कारण वह
वायुरिति तद्वत्; तदा बोधक्रिया- | 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है
| उस समय—आत्मा बोधक्रियारूप
शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न बोध- | शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है,
| साक्षात् बोधस्वरूप ही सिद्ध नहीं
स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध ( बुद्धिगत प्रतीति )
विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी
| हो जाता है। अतः जिस समय
जायते, तदा बोधक्रियया स- | बोध उत्पन्न होता है उस समय तो
वाक्य-भाष्य
इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् | मृत्युका आरम्भ होता है, अतः
इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है;
| इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह
विन्दत इति । | हेतुवचन ठीक ही है।
आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु- | पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व
त्पाद्यते ? | उत्पन्न किया जाता है ?
न। | सिद्धान्ती-नहीं।
कथं तर्हि ? | पूर्व०-तब कैसे ?
आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- | सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे—
| अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते
त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । | हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। 'विन्दते'
नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति | इससे यह समझना चाहिये कि उसकी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
पद-भाष्य
विशेषः। यदा बोधो नश्यति, तदा | वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त
| होता है और जब उसका नाश हो
नष्टबोधो द्रव्यमात्रं निर्विशेषः। | जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र
तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- | रह जाता है। ऐसा माननेसे तो
| वह विकारी, सावयव, अनित्य और
यवोजनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा | अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके
न परिहर्तुं शक्यन्ते । | इन दोषोंका किसी प्रकार परिहार
| नहीं किया जा सकता ।
यदपि काणादानाम् आत्म- | तथा वैशेषिक मतावलम्बियोंका
कणादमत- मनः संयोगजो बोध | जो मत है कि 'आत्मा और मनके
समीक्षा | संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध
आत्मनि समवैति; अतः | आत्मामें समवाय-सम्बन्धसे रहता
आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु | है, इसीसे आत्मामें बोद्धृत्व है,
विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है,
मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोंके समवायी
| घटके समान केवल द्रव्यमात्र है'
वायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं | —सो इस पक्षमें भी ब्रह्म अचेतन
द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति "विज्ञान- | द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म" (बृ०उ० ३।९।२८) | विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है"
वाक्य-भाष्य
आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि | प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने-
विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं | वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न
भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न | किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके
| समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह
विद्योत्पाद्यम् । | विद्यासे उत्पाद्य नहीं है।
यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते | यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः
| ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या
किं पुन्र्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । | करती है, तो इसमें हमें यह कहना है
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
“प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) | “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियाँ
इत्याद्याः श्रुतयो बाधिताः स्युः । | बाधित हो जाती हैं। निरवयव होनेके
आत्मनो निरवयवत्वेन प्रदेशा- | कारण आत्मामें कोई देशविशेष नहीं
भावात् नित्यसंयुक्तत्वाच्च मनसः | है; और उससे मनका नित्यसंयोग है;
स्मृत्युत्पत्तिनियमानुपपत्तिरपरि- | इस कारण उसमें स्मृतिकी उत्पत्तिके
हार्या स्यात् । संसर्गधर्मित्वं | नियमकी अनुपपत्ति अनिवार्य हो
चात्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धं | जाती है तथा श्रुति, स्मृति और
कल्पितं स्यात् । “असङ्गो न हि | युक्तिसे विरुद्ध आत्माके संसर्गधर्मी
सज्जते” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | होनेकी कल्पना भी होती है। “असङ्ग
“असक्तं सर्वभृत्” (गीता १३ । | [आत्मा] का किसीसे संग नहीं
१४) इति हि श्रुतिस्मृती । | होता” “संगरहित और सबका पालन
न्यायश्च—गुणवद्गुणवता सं- | करनेवाला है” ऐसी श्रुति और स्मृति
सृज्यते, नातुल्यजातीयम् । अतः | प्रसिद्ध हैं। युक्तिसे भी जो वस्तु
निर्गुणं निर्विशेषं सर्वविलक्षणं केन- | सगुण होती है उसीका गुणवान्से
चिदप्यतुल्यजातीयेन संसृज्यत | संसर्ग होता है; विजातीय वस्तुओं-
इत्येतत् न्यायविरुद्धं भवेत् । | का संयोग कभी नहीं होता । अतः
तस्मात् नित्यालुप्तज्ञानस्वरूप- | निर्गुण निर्विशेष और सबसे विलक्षण
आत्माका किसी भी विजातीय
वस्तुसे संयोग होता है—ऐसा
मानना न्यायविरुद्ध होगा । अतः
नित्य अविनाशी ज्ञानस्वरूप प्रकाश-
वाक्य-भाष्य
अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा | कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त
तन्निवृत्त्या स्वाभाविकस्यामृत- | करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा
त्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । | स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है,
यत आह 'वीर्यं विद्यया विन्दते' । | क्योंकि [अगले वाक्यसे] 'विद्यासे
[अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका]
सामर्थ्य प्राप्त होता है' ऐसा कहा भी है।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
पद-भाष्य
ज्योतिरात्मा ब्रह्मेत्ययमर्थः सर्व- | मय आत्मा ही ब्रह्म है—यह अर्थ
बोधबोद्धृत्वे आत्मनः सिध्यति, | आत्माके सम्पूर्ण बोधोंके बोद्धा
नान्यथा । तस्मात् 'प्रतिबोध- | होनेपर ही सिद्ध हो सकता है,
विदितं मतम्' इति यथा- | और किसी प्रकार नहीं । इसलिये
व्याख्यात एवार्थोऽस्माभिः । | 'प्रतिबोधविदितम्' इसका—हमने
यत्पुनः स्वसंवेद्यता प्रतिबोध- | जैसी व्याख्या की है—वही अर्थ है ।
[ब्रह्मणः स्वपर-] विदितमित्यस्य वाक्य- | इसके सिवा 'प्रतिबोधविदितम्'
[संवेद्यताया] स्यार्थो वर्ण्यते, तत्र | इस वाक्यका जो स्वप्रकाशता अर्थ
[औपाधिकत्वम्] भवति सोपाधिकत्वे | बतलाया जाता है वहाँ आत्माको
आत्मनो बुद्ध्युपाधिरूपत्वेन | सोपाधिक मानकर उसमें बुद्धि
भेदं परिकल्प्यात्मात्मानं वेत्तीति | आदि उपाधिके रूपसे भेदकी
संव्यवहारः—"आत्मन्येवात्मानं | कल्पना कर 'आत्मासे आत्माको
पश्यति"(बृ० उ० ४।४।२३) | जानता है' ऐसा व्यवहार हुआ
“स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं | करता है, जैसा कि "आत्मामें ही
पुरुषोत्तम” (गीता १०।१५) | आत्माको देखता है" "हे पुरुषोत्तम !
इति । न तु निरुपाधिकस्यात्मन | तुम स्वयं अपनेसे ही अपनेको
एकत्वे स्वसंवेद्यता परसंवेद्यता | जानते हो" इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा
वा सम्भवति । संवेदनस्वरूप- | गया है । किन्तु निरुपाधिक आत्मा
| तो एक रूप होनेके कारण उसमें
| स्वसंवेद्यता अथवा परसंवेद्यता
| सम्भव ही नहीं है । जिस प्रकार
वाक्य-भाष्य
वीर्यं सामर्थ्यमनात्माध्यारोप- | विद्यासे वीर्य—सामर्थ्य यानी
मायास्वान्तध्वान्तानभिभाव्य- | अनात्माके अध्यारोप तथा माया और
लक्षणं बलं विद्यया विन्दते । तच्च | अन्तःकरणके कारण प्राप्त हुए अज्ञानसे
किंवैशिष्टम् ? अमृतमविनाशि । | जिसका पराभव नहीं हो सकता ऐसा
| बल प्राप्त होता है । वह किस विशेषणसे
| युक्त है? वह अमृत यानी अविनाशी है।
८० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
| संस्कृत (पद-भाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| त्वात्संवेदनान्तरापेक्षा च न | प्रकाशको किसी अन्य प्रकाशकी |
| सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रका- | अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी |
| शान्तरापेक्षाया न सम्भवः तद्वत् । | प्रकार ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे [ अपने ज्ञानके लिये ] किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है। |
| बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तु | तथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञानकी |
| क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं च | स्वसंवेद्यता स्वीकार करनेपर भी उसकी |
| विज्ञानस्य स्यात्; “न हि विज्ञातु- | क्षणभङ्गुरता और निरात्मकता सिद्ध |
| र्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽवि- | होने लगेगी । [ ऐसा होनेपर ] |
| नाशित्वात्” (बृ० उ० ४।३।३०) | “अविनाशी होनेके कारण विज्ञाताकी |
| “नित्यं विभुं सर्वगतम्” (मु० | विज्ञातिका लोप नहीं होता” |
| उ० १ । १ । ६) “स वा एष | “नित्य विभु और सर्वगत है” “वह |
| महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽ- | यह महान् अज आत्मा अजर अमर |
| भयः” (बृ० उ० ४।४।२५) | अमृत और अभयरूप है” इत्यादि |
| इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् । | श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी । |
| यत्पुनः प्रतिबोधशब्देन | इसके सिवा जो लोग प्रति- |
| प्रतिबोधार्थ- निर्निमित्तो बोधः प्रति- | बोधशब्दसे, जैसा कि सुषुप्त पुरुषको |
| विचारः बोधः यथा सुप्तस्य | होता है वह निर्निमित्त बोध ही |
| इत्यर्थं परिकल्पयन्ति, सकृद्वि- | प्रतिबोध है—ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं अथवा जो दूसरे लोग |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत (वाक्य-भाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अविद्याजं हि वीर्यं विनाशि। | अविद्यासे होनेवाला बल नाशवान् |
| विद्ययाविद्याया बाध्यत्वात् । न | होता है, क्योंकि अविद्या विद्यासे बाधित |
| तु विद्याया बाधकोऽस्तीति | हो जाती है। किन्तु विद्याका बाधक |
| विद्याजममृतं वीर्यम् । अतो | और कोई नहीं है, अतः विद्याजनित |
| विद्यामृतत्वे निमित्तमात्रं भवति। | वीर्य अमृत होता है। इसलिये विद्या तो अमृतत्वमें केवल निमित्तमात्र होती |
| “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” | है। आथर्वण श्रुतिमें भी कहा है—"यह |
| इति चाथर्वणे (मु० उ० ३।२।४) | आत्मा बलहीनसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है"। |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
पद-भाष्य
ज्ञानं प्रतिबोध इत्यपरे; नि- | [मुक्तिके कारणभूत] एक बार
| होनेवाले विज्ञानको ही प्रतिबोध
र्निमित्तः सनिमित्तः सकृद्वासकृद्वा | समझते हैं—[वे कुछ भी माना
| करें] बिना निमित्तसे हो अथवा
प्रतिबोध एव हि सः। अमृतत्वम् | निमित्तसे तथा एक बार हो अथवा
| अनेक बार वह सबका सब प्रति-
अमरणभावं स्वात्मन्यवस्थानं | बोध ही है [इसका विशेष विवेचन
| करनेसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है]।
मोक्षं हि यस्माद् विन्दते लभते | क्योंकि मुमुक्षुगण उपर्युक्त प्रतिबोध-
| से अर्थात् प्रत्येक बौद्ध प्रत्ययमें
यथोक्तात् प्रतिबोधात्प्रतिबोध- | होनेवाले आत्मज्ञानसे ही अमृतत्व—
| अमरणभाव अर्थात् अपने आत्मामें
विदितात्मकात्, तस्मात्प्रतिबोध- | .स्थित होनारूप मोक्ष प्राप्त करते हैं।
| अतः वह (ब्रह्म) प्रत्येक बोधमें
विदितमेव मतमित्यभिप्रायः । | अनुभव होनेवाला ही माना गया है—
| ऐसा इसका अभिप्राय है। क्योंकि
बोधस्य हि प्रत्यगात्मविषयत्वं | बोधका प्रत्यगात्मविषयक होना ही
| अमृतत्वमें कारण माना गया है।
च मतममृतत्वे हेतुः। न ह्यात्मनोऽ- | आत्माकी अनात्मरूपता उसके
| अमृतत्वका कारण नहीं हो सकती ।
नात्मत्वममृतत्वं भवति । आत्म- | आत्माका अमरत्व उसका स्वरूप-
त्वादात्मनोऽमृतत्वं निर्निमित्तमेव, | भूत होनेके कारण अहैतुक ही है।
वाक्य-भाष्य
लोकेऽपि विद्याजमेव बलमभि- | लोकमें भी विद्याजनित बल ही दूसरे
| बलोंका पराभव करता है, शरीर आदि-
भवति न शरीरादिसामर्थ्यं यथा | का बल नहीं; जैसे हाथी-घोड़े आदिके
| शारीरिक बल [मनुष्यके] विद्याजनित
हस्त्यादेः । | बलको नहीं दबा सकते।
८२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
८२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य
एवं मर्त्यत्वमात्मनो यद- | इसी प्रकार आत्माकी मृत्यु भी
विद्यया अनात्मत्वप्रतिपत्तिः। | अविद्यावश उसमें अनात्मत्वकी
| उपलब्धि ही है ।
कथं पुनर्यथोक्तयात्मविद्यया- | तो फिर उपर्युक्त आत्मज्ञानसे
| किस प्रकार अमरत्व लाभ कर
ज्ञानेनामृतत्व- मृतत्वं विन्दत इत्यत | लेता है ? इसपर कहते हैं—
प्राप्तिप्रकारः आह—आत्मना स्वेन | [ मुमुक्षु पुरुष ] आत्मा अर्थात्
रूपेण विन्दते लभते वीर्यं बलं | अपने स्वरूपके ज्ञानसे वीर्य—बल
| यानी [ अमरत्व-प्राप्तिका ] सामर्थ्य
सामर्थ्यम् । धनसहायमन्त्रौषधि- | प्राप्त करता है। धन, सहाय, मन्त्र,
| ओषधि, तप और योगसे प्राप्त
तपयोगकृतं वीर्यं मृत्युं न | होनेवाला वीर्य अनित्य वस्तुका किया
शक्नोत्यभिभवितुम् अनित्यवस्तु- | हुआ होनेसे मृत्युका पराभव करनेमें
कृतत्वात्; आत्मविद्याकृतं तु वीर्य- | समर्थ नहीं है; किन्तु आत्मविद्यासे
| होनेवाला वीर्य तो आत्माद्वारा ही
मात्मनैव विन्दते, नान्येन इत्यतो- | प्राप्त किया जाता है—अन्य किसीसे
| नहीं। इसलिये आत्मविद्याजनित
ऽन्यसाधनत्वादात्मविद्यावीर्यस्य | वीर्य किसी अन्य साधनसे प्राप्त
तदेव वीर्यं मृत्युं शक्नोत्य- | होनेवाला नहीं है; अतः वही वीर्य
वाक्य-भाष्य
अथवा प्रतिबोधविदितं मत- | अथवा 'प्रतिबोधविदितं मतम्' इस
मिति सकृदेवाशेषविपरीतनिरस्त- | वाक्यका ऐसा अर्थ समझना चाहिये कि
संस्कारेण स्वप्नप्रतिबोधवद्यद्वि- | स्वप्नसे जागे हुएके समान जिसके सम्पूर्ण
| विपरीत संस्कारोंका एक बार ही बाध हो
दितं तदेव मतं ज्ञातं भवतीति । | गया है, उसीसे जो जाना जाता है वही
अथवा गुरूपदेशः प्रतिबोधस्तेन | मत अर्थात् ज्ञात होता है। अथवा गुरू-
| का उपदेश ही प्रतिबोध है, उससे जाना