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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 152 में से

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पृष्ठ 77

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२

पद-भाष्य
मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह
| जानता ही नहीं—उसे ब्रह्मका
सः-न ब्रह्म विजानाति सः । | ज्ञान नहीं है ।
विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ | अत्र 'अविज्ञातं विजानताम्'
| ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्-
अवधारयति—अविज्ञातं विजान- | के उपर्युक्त पक्षोंका अवधारण
| ( निश्चय ) करते हैं—जाननेवालों
तामिति, अविज्ञातम् अमतम् | अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों-
| को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत
अविदितमेव ब्रह्म विजानतां | यानी अविदित ( अज्ञेय ) ही है;
सम्यग्विदितवतामित्येतत् । |
वाक्य-भाष्य
वचनेनागमप्रधानेन निगमन- | वह सबका उपसंहार करनेवाले इस
| शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे संक्षेपमें कहा
स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोंका
| अविषय होनेके कारण जाने हुए
विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- | पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा
| अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी
त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही
पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । | जानना चाहिये ।
कस्मात् ? यस्यामतं यस्य | किस कारणसे ? [ सो बतलाते
विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य | हैं—] जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त
| हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात—
अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय-
इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- | रूप फलमें पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप-
बोधतया विविदिषा निवृत्ता | से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी
इत्यभिप्रायः, तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित—ज्ञात है।
विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको