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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 152 में से

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पृष्ठ 75

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
पद-भाष्य
संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी
नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् | बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने
आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि- | और मन्दबुद्धियोंकी बुद्धिकी पहुँचसे
ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च | बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे
गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- | 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है
द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ | जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा
| होनेपर ही 'हममेंसे जो इस [वाक्यके
| मर्म ] को जानता है वही जानता
| है' यह गर्जना उचित हो सकती
| है ॥ २ ॥

वाक्य-भाष्य
यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- | 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम
निरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानु- | उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके
वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स | कारण इससे अन्य पक्षोंका निषेध
एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्य- | करनेके लिये है । हममेंसे जो
ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं | उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित-
वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता
वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- | है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा
वसीयत इत्युच्यते । उक्तार्थानुवा- | मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने-
दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही
वेद चेति ॥ २ ॥ | जाननेवाला है । 'वेद च' इस पदसे
| अन्य पक्षवालेमें ब्रह्मवित्त्वका निरास
| किया जाता है । किस कारण यह
| निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते
| हैं । ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद
| करनेके कारण; क्योंकि यहाँ 'नो न
| वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका
| ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥